रहमान -"मुक्तिधन" पाठ का मुख्य पात्र है।
वह एक गरीब किसान है , लेकिन ईमानदार व्यक्ति है ।
किसी वजह से पैसों की सख्त ज़रूरत से वह अपनी प्यारी गऊ को बेचने तैयार होता है ।
वह रु.5/- का नुकसान पाकर भी अपनी गऊ को लाला दाऊदयाल को बेचता है।
अपनी माता को हज पर लेजाने के लिए और वापस आने पर उसकी बीमारी का इलाज करावाने के लिए, अंत में उसकी बूढ़ी माता की मृत्यु होजाने पर इन सभी के लिए वह दाऊदयाल से पैसे कर्जा लेता है।
अंत में उसका सारा खेत जल जाने पर वह दाऊदयाल के आगे अपने आपको गुलाम बनाने के लिए तैयार हो जाता है।
लाला दाऊदयाल "मुक्तिधन" पाठ का मुख्य पात्र है।
वह एक महाजन है , जो लोगों को ज़रूरत पर पैसे कर्ज देता है ।
इतना ही नहीं पैसे वापस नहीं देने पर लोगों के साथ कठिन व्यवहर करता है। ।
एक दिन वह अचानक बाजार में एक सुंदर गऊ को देखकर वह रु.5/- कम कीमत में खरीदता है। वह रहमान के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित होता है ।
फिर एक बार रहमान अपनी बूढ़ी माता को हज पर लेजाने के लिए और वापस आने पर उसकी बीमारी का इलाज करावाने के लिए, अंत में उसकी बूढ़ी माता की मृत्यु होजाने पर इन सभी संदर्भों में वह रहमान को पैसे कर्जा देता है।
अंत में रहमान सारा खेत जल जाने पर भी अपने स्वभाव के विरुद्ध उन्हें सारा कर्ज माफ़ कर देता है। ।
दीपा "हार " पाठ का मुख्य पात्र है।
वह एक स्वतंत्र विचार वाली निर्भीक युवती है , जो कॉलेज के दिनों से ही राजनीति के प्रति रुचि दिखती है ।
अंत में वह राजनीति में प्रवेश करके अपना छाप दिखती है ।
जब विवाह का संदर्भ आनेपर वह अपने विरोधी पार्टी के सदस्य शेखर को अपना जीवन साथी के रूप में चयन करती है ।
पति -पत्नी दोनों यह निश्चय करते हैं कि वे अपने - अपने पार्टियों के प्रति ईमानदारी से कार्य करेंगे।
अंत में जब चुनाव का समय आजता है , तो दीपा अपनी पार्टी के सदस्य को जितवाने के लिए अपने ही पति पर कड़ी नींद करती है ।
चुनाव के कुछ ही दिनों के पहले अपने पति और उसके मित्र के प्रति बात चीत को चुपके से सुनती है और चुनाव में रहस्य रूप में जाकर अपने पति को ही वोट देकर आती है ।
नारायण राव "भूख हड़ताल " पाठ का मुख्य पात्र है।
वह एक मेहनती लकड़ हारा है , जो अपनी मेहनत से कमाई करता है ।
हड़ताल के कारण वह बहुत परेशान होकर लेखक से सस्ते दाम में जलावन खरीदने विनती करता है ।
लेखक के मुफ़्त में २ रुपये देने प्रस्ताव पर गुस्से आकार कहता है कि वह मजबूर है लेकिन भिखमंगा नहीं है।
जब लेखक से देश के हालात और गरीबी पर सवाल उठता है , जिसका लेखक के पास कोई जवाब नहीं है ।
अंत में लेखक की समस्या दूर होजाती है , लेकिन अभी भी उसके सवाल गूँजते रहते हैं।