श्रीमद्भगवद्गीता
नवाँ अध्याय
राजगुह्ययोग
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१॥
मर्मानुवाद—हे अर्जुन! तुम ईर्ष्या रहित पुरुष हो, इसलिए मैं तुम्हें परम विज्ञानयुक्त गुह्यतम ज्ञान का उपदेश दे रहा हूँ, जिसे प्राप्त कर तुम सभी प्रकार के अमंगलों से मुक्ति प्राप्त करोगे। दूसरे एवं तीसरे अध्याय में जो मैंने आध्यात्मिक ज्ञान की बातें कहीं हैं, वे गुह्य हैं, सप्तम एवं अष्टम अध्याय में जो भगवत्तत्त्व ज्ञान की बातें बतायी हैं, वे भक्तिजनक होने के कारण गुह्यतर हैं एवं अब जिस ज्ञान की बातें कहने जा रहा हूँ वह केवला भक्ति के लक्षण हैं, इसलिए गुह्यतम हैं, इसके द्वारा तुम अशुभ से मुक्ति प्राप्त करते हुए गुणातीत हो जाओगे॥१॥
अन्वय—श्रीभगवान् उवाच (श्रीभगवान् ने कहा) इदं तु (इस) गुह्यतमम् (अति गूढ़) ज्ञानम् (मेरे कीर्तनादि शुद्ध भक्तिरूपी ज्ञान को) अनसूयवे (दोषदृष्टि रहित) ते (तुम्हें) विज्ञानसहितम् (साक्षात् अनुभव तक) प्रवक्ष्यामि (कहता हूँ) यत् (जिसे) ज्ञात्वा (जानकर तुम) अशुभात् (संसार या भक्ति प्रतिबन्धक अमंगलों से) मोक्ष्यसे (मुक्ति प्राप्त कर लोगे)॥१॥
टीका— आराध्यत्वे प्रभोदसैरैश्वर्यं यदपेक्षितम्।
तत्शुद्धभक्तेरुत्कर्षश्चोच्यते नवमे स्फुटम्॥
कर्मज्ञानयोगादिभ्यः सकाशात् भक्तेरेव उत्कर्ष:। सा च भक्ति: ‘प्रधानीभूता’ ‘केवला’ चेति सप्तमाष्टमयोरुक्तम्। तत्रापि केवलाया अतिप्रबलाया ज्ञानवदन्तःकरणशुद्ध्याद्यनपेक्षिण्या भक्तेः स्पष्टतया एव सर्वोत्कर्षः। तस्यामपेक्षितमैश्वर्यञ्च वक्तुं नवमोऽयमध्याय आरभ्यते। सर्वशास्त्रसारभूतस्य गीता-शास्त्रस्यापि मध्यममध्यायाष्टकमेव सारम्, तस्यापि मध्यमौ नवमदशमावेव सारावित्यतोऽत्र निरूपयिष्यमाणमर्थं स्तौति—इदन्त्विति त्रिभिः। द्वितीय तृतीयाध्यायादिषु यदुक्तं मोक्षोपयोगिज्ञानं ‘गुह्यम्', सप्तमाष्टमयोर्मत्प्राप्त्युपयोगि—ज्ञानं ज्ञायतेऽनेन भगवत्तत्त्वमिति ज्ञानं’—भक्तितत्त्वं—‘गुह्यतरम्’, अत्र तु ‘केवलशुद्धभक्तिलक्षणं ज्ञानं’ ‘गुह्यतमं’ प्रकर्षेणैव तुभ्यं वक्ष्यामि। अत्र तु ज्ञान-शब्देन भक्तिरवश्यं व्याख्येया, न तु प्रथमषट्कोक्तं प्रसिद्धं ज्ञानम्, परश्लोकेऽव्ययमनश्वरमिति विशेषणदानाद् गुणातीतत्वलाभाद् गुणातीता भक्तिरेव, न तु ज्ञानम्, तस्य सात्त्विकत्वात्। ‘अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य’ इत्यग्रिमश्लोके धर्मशब्देनापि भक्तिरेवोच्यते। अनसूयवेऽमत्सरायेत्यन्योऽपीदममत्सरायैवोपदिशेदिति विधिर्व्यञ्जितः। विज्ञानसहितं मदपरोक्षानुभवपर्यन्तमित्यर्थः। अशुभात् संसाराद्भक्ति प्रतिबन्धकादन्तरायाद्वा॥१॥
भावानुवाद—प्रभु के दास भगवान् की आराधना के लिए उनके जिस ऐश्वर्य को जानने की इच्छा रखते हैं, उसी ऐश्वर्य एवं शुद्ध भक्ति का उत्कर्ष इस नवें अध्याय में स्पष्टरूप से कहा गया है।
कर्म, ज्ञान, योग आदिकी तुलना में भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है। यह भक्ति दो प्रकार की है—प्रधानीभूता और केवला। इनका वर्णन सातवें तथा आठवें अध्याय में भी हुआ है। इन दोनों में केवला भक्ति अतिशय प्रबला है तथा ज्ञानकी भाँति अंत:करण शुद्धि की अपेक्षा नहीं रखती इसलिए निःसन्देह सबसे श्रेष्ठ है, उसके लिए अपेक्षित भगवान् के ऐश्वर्य का वर्णन नवम अध्याय में प्रारम्भ कर रहे हैं। बीच के आठ अध्याय समस्त शास्त्रों की सारस्वरूप गीता के भी सार हैं और नवाँ तथा दसवाँ अध्याय तो उन आठ अध्यायों का भी सार है। इसलिए इनमें जो भी निरूपण किया जायेगा वह प्रथम तीन श्लोकों में उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। दूसरे और तीसरे अध्याय में मोक्ष के उपयोगी ज्ञान को ‘गुह्य’ कहा गया है। सातवें तथा आठवें अध्याय में मुझे प्राप्त कराने के उपयोगी भक्ति—तत्त्व ज्ञान जिससे भगवत्—तत्त्व जाना जाय उसे ‘गुह्यतर’ कहा गया है, किन्तु यहाँ तो केवल शुद्ध भक्ति के लक्षणवाले ‘गुह्यतम’ ज्ञान को ही कहूँगा। यहाँ ज्ञान शब्द का अर्थ भक्ति ही समझना चाहिए, न कि प्रथम छ: अध्यायों में कथित प्रसिद्ध ज्ञान को। अगले श्लोक में अव्यय अर्थात् ‘अनश्वर’ विशेषण का प्रयोग होने से गुणातीत होने के कारण ज्ञान शब्द से भक्ति को ही इंगित किया जा रहा है, ज्ञान को नहीं, क्योंकि ज्ञान सात्त्विक होता है, निर्गुण या गुणातीत नहीं। ‘अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप’ इस तीसरे श्लोक में धर्म शब्द से भी भक्ति ही कही गई है। यहाँ ‘अनसूयवे’ अर्थात् ‘अमत्सर’ कहने का तात्पर्य है कि मत्सरता से रहित व्यक्ति के लिए ही यह उपदेश है, दूसरों के लिए नहीं। ‘विज्ञानसहितम्’ अर्थात् मेरे साक्षात् अनुभव तक के इस भक्ति रहस्य को सुनाऊँगा, जो तुम्हें इस अशुभ, भक्तिप्रतिबन्धक संसार से मुक्त कर देगा अर्थात् तुम सभी प्रकार के विघ्नों से रहित हो जाओगे॥१॥
राजविद्याराजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्त्तुमव्ययम्॥२॥
मर्मानुवाद—इस ज्ञान को राजविद्या (तमाम विद्याओं का राजा) सभी गुह्य तत्त्वों की अपेक्षा अधिक गुह्य, अत्यन्त पवित्र साधक, आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति करवाने वाला, समस्त धर्मसाधक, निर्गुण एवं सहज जानना॥२॥
अन्वय—इदम् (यह ज्ञान) राजविद्या (शाण्डिल्य वैश्वानरदहरादि विद्याओं का राजा) राजगुह्यम् (गोपनीय ज्ञानों का राजा) उत्तमं पवित्रम् (अतिशय पवित्र) प्रत्यक्षावगमम् (प्रत्यक्षानुभूति का विषय) धर्म्यम् (धर्म संगत) कर्त्तुं सुसुखम् (सुख साध्य) अव्ययम् (नित्य है)॥२॥
टीका—किञ्च, इदं ज्ञानं राजविद्या। विद्या उपासना विविधा एव भक्तयः, तासां राजा राजदन्तादित्वात् परनिपातः। गुह्यानां राजेति भक्तिमात्रमेवातिगुह्यं तस्य बहुविधस्यापि राजेत्यतिगुह्यतमं पवित्रमिदमिति सर्वपापप्रायश्चित्तत्वात्। त्वं—पदार्थज्ञानाच्च सकाशादपि पावित्र्यकरम्। अनेकजन्मसहस्रसञ्चितानां सर्वेषामपि पापानां स्थूलसूक्ष्मावस्थानां तत्कारणस्याज्ञानस्य च सद्य एवोच्छेदकम्, अतः सर्वोत्तमं पावनमिदमेवेति मधुसूदनसरस्वतीपादाः। प्रत्यक्ष एवावगमोऽनुभवो यस्य तत्। “भक्ति: परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः। प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम्॥” इत्येकादशोक्ते: प्रतिपदमेव भजनानुरूपभगवदनुभवलाभात्। धर्म्यं धर्मादनपेतं सर्वधर्माकरणेऽपि सर्वधर्मसिद्धेः “यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्ध भुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥” इति नारदोक्ते:। कर्त्तुं सुसुखमिति कर्मज्ञानादाविव नात्र कोऽपि कायवाङ् मानस—क्लेशातिशय:, श्रवण-कीर्त्तनादिभक्तेः श्रोत्रादीन्द्रियव्यापारमात्रत्वादव्ययं कर्मज्ञानादिवन्न नश्वरं निर्गुणत्वात्॥२॥
भावानुवाद—यह ज्ञान राजविद्या है। विद्या या उपासना कई प्रकार की होती है, किन्तु भक्ति ही उन सब विद्याओं की राजा है। यह गोपनीय विषयों की राजा है, अर्थात् एकमात्र भक्ति ही अतिगोपनीय है। अनेक प्रकार का होने पर भी विज्ञानसहित यह ज्ञान उन सबका राजा है अर्थात् अतिगुह्यतम है। सभी पापोंका प्रायश्चित्त होने के कारण यह पवित्र है। यह त्वम्-पदार्थ अर्थात् जीवात्मा के ज्ञानसे भी अधिक पवित्रकर है। श्रीपाद मधुसूधन सरस्वती कहते हैं—“हजारों जन्मोंसे सञ्चित तमाम प्रकार के पापों की स्थूल और सूक्ष्म अवस्थाओं एवं उनके कारणस्वरूप अज्ञान को पलक झपकते ही नाश करने वाली होने के कारण सर्वोत्तम पावन है,” जिसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सके, वही ‘प्रत्यक्षावगम’ है—“जैसे भोजन कर रहे व्यक्ति को प्रत्येक ग्रास के साथ-साथ तुष्टि, पुष्टि और भूख निवृत्ति तीनों की साथ-साथ अनुभूति होती है, वैसे ही भगवान् का भजन करने वाले को भक्ति, परमेश्वर का अनुभव और विषयों से वैराग्य ये तीनों साथ-साथ प्राप्त होते हैं। एकादश स्कन्ध की इस उक्ति के अनुसार भजन के अनुरूप भगवान् का अनुभव होता है।” ‘धर्म’ शब्द से अभिप्राय है कि अन्य समस्त धर्मों को पालन न कर केवल भक्ति करने मात्र से सभी धर्मों का फल प्राप्त हो जाता है। देवर्षि नारद ने कहा है—‘जैसे वृक्ष के मूल को जल से सींचने से वृक्ष का तना, शाखायें और प्रशाखायें इत्यादि सभी तृप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार एकमात्र भगवान् अच्युत की आराधना से ही अन्यान्य सबकी उपासना हो जाती है।” (भा ४/३१/१४) ‘कर्त्तुं सुसुखम्' कर्म-ज्ञानादि के समान भक्ति में शरीर, मन, वाणी को अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ता। श्रवण-कीर्त्तनादि भक्ति में केवल कान आदि इन्द्रियों का कार्य है। निर्गुण होने के कारण कर्म और ज्ञान आदि की तरह भक्ति नश्वर नहीं है॥२॥
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३॥
मर्मानुवाद—श्रद्धा ही इस ज्ञान का मूल है, क्योंकि इस ज्ञान का जो सहज विशुद्ध स्वरूप है, वह सबसे पहले बद्ध जीव के हृदय में श्रद्धारूप में प्रकट होता है। हे परन्तप! जिन जीवों में श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई है वे इस परमधर्म स्वरूप भगवद् रति से उत्पन्न ज्ञान को प्राप्त करने में असमर्थ होने के कारण मुझे प्राप्त नहीं कर पाते। फलस्वरूप दुःखमय संसार चक्र में ही पड़े रहते हैं॥३॥
अन्वय— परन्तप (हे परन्तप) अस्य धर्मस्य (मेरे भक्तिरूपी इस धर्म के प्रति) अश्रद्धानाः (श्रद्धारहित) पुरुषाः (व्यक्ति) माम् (मुझे) अप्राप्त (प्राप्त न होकर) मृत्युसंसारवर्त्मनि (जन्म-मृत्यु-रूपी संसार-चक्र में) निवर्तन्ते (बार-बार चक्र काटते रहते हैं)॥३॥
टीका—नन्वेवमस्य धर्मस्यातिसुकरत्वे सति को नाम संसारी स्यात्? तत्राह—अश्रद्दधानाः। अस्येति कर्मणि षष्ठी आर्षी। इमं धर्मम श्रद्दधानाः शास्त्रवाक्यैः प्रतिपादितं भक्तेः सर्वोत्कर्षं स्तुत्यर्थवादमेव मन्यमाना आस्तिक्येन न स्वीकुर्वन्ति ये ते उपायान्तरैर्मत्प्राप्तये कृतप्रयत्ना अपि मामप्राप्य मृत्यु व्याप्ते संसारवर्त्मनि नितरामतिशयेन वर्तन्ते॥३॥
भावानुवाद—यदि अर्जुन के मन में संशय हो कि यह धर्म इतना सहज-सरल है, तो कोई व्यक्ति संसार में क्यों फंसता है? तो इसके उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं—‘अश्रद्दधानाः' इत्यादि। शास्त्रों द्वारा भक्तिकी सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित होने पर भी श्रद्धाहीन व्यक्ति उसे ऐसा समझते हैं कि यह बढ़ा चढ़ा कर कहा गया है, जबकि वास्तव में भक्ति की इतनी महिमा नहीं है, इसलिए भक्ति की सर्वोत्कृष्टता को आस्तिक बुद्धि से स्वीकार नहीं करते हैं। इस प्रकार के भक्तिपथ त्यागी व्यक्ति मुझे प्राप्त करने के लिए अन्य प्रकार के प्रकृष्ट यत्न करने पर भी मुझे न प्राप्त कर मृत्युव्याप्त संसार-चक्र में ही भ्रमण करते रहते हैं क्योंकि मेरी भक्ति के बिना और किसी साधन से मेरी प्राप्ति नहीं होती।
‘अस्य’ अर्थात् भक्ति का—यहाँ कर्म में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग आर्ष है।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्त्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४॥
मर्मानुवाद—अव्यक्त मूर्ति अर्थात् इन्द्रियों से अतीत मैं इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हूँ। चैतन्य स्वरूप मुझ में ही सम्पूर्ण प्राणी अवस्थित हैं। जिस प्रकार घट में मिट्टी व्याप्त रहती है मैं उस प्रकार व्याप्त नहीं हूँ अर्थात् जगत् मेरा परिणाम या विवर्त्त है, ऐसा भी नहीं है, मैं चैतन्य स्वरूप हूँ, मेरी शक्ति के प्रभाव से यह जगत् उत्पन्न हुआ है, एवं मेरी शक्ति ही उसमें कार्य करने वाली हैं, मैं पूर्ण चैतन्यरूप में लब्धरूप एक पृथक् तत्त्व हूँ॥४॥
अन्वय—अव्यक्तमूर्तिना (अतीन्द्रिय स्वरूप) मया (मेरे द्वारा) इदम् (यह) सर्वं जगत् (सारा संसार) ततम् (व्याप्त है) सर्वभूतानि (सम्पूर्ण प्राणी) मत्स्थानि (मुझ में अवस्थित हैं) अहं च (किन्तु मैं) तेषु (उनमें) न अवस्थितः (अवस्थित नहीं हूँ)॥४॥
टीका—मद्दास्यभक्तावेतन्मात्रं मदैश्वर्यज्ञानं मद्भक्तैरपेक्षितव्यमित्याह सप्तभिः। अव्यक्ता अतीन्द्रिया मूर्त्तिः स्वरूपं यस्य तेन मया कारणभूतेन सर्वमिदं जगत् ततं व्याप्तम्। अत एव मत्स्थानि मयि कारणभूते पूर्णचैतन्यस्वरूपे स्थितानि सर्वाणि भूतानि चराचराणि सन्ति। एवमपि घटादिषु स्वकार्येषु मृदादिवत्तेषु भूतेषु नाहमवस्थितोऽसङ्गत्वात्॥४॥
भावानुवाद—श्रीभगवान् कह रहे हैं—मेरी दास्यभक्ति में मेरे भक्तों को इतने ही ऐश्वर्य ज्ञान की आवश्यकता रहती है। यहां से सात श्लोकों में इसे और भी बताया जा रहा है। अव्यक्त या अतीन्द्रिय स्वरूप कारणभूत मेरे द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, इसलिए कारणभूत अर्थात् पूर्ण चैतन्यस्वरूप मुझ में चर—अचर समस्त जीव स्थित हैं, तथापि मैं उनमें नहीं हूँ। जिस प्रकार घटादि में मृत्तिका अवस्थित रहती है, उसी प्रकार मैं भूतों में अवस्थित नहीं हँ क्योंकि मैं असंग हूँ॥४॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५॥
मर्मानुवाद—मैंने कहा कि ‘सभी प्राणी मुझ में ही स्थित हैं’ इससे यह मत समझना कि तमाम प्राणी मेरे शुद्ध स्वरूप में अवस्थित हैं, कारण, मेरी मायाशक्ति के प्रभाव में अवस्थित हैं। किन्तु तुम अपनी बुद्धि द्वारा यह समझ नहीं पाओगे। इसलिए इसे मेरा ऐश्वर्ययोग समझकर मेरे शक्ति के कार्य को मेरा कार्य समझ मुझे सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने वाला, पालन करने वाला जानना। मुझ में शरीर और शरीरी का भेद नहीं है। सब जगह रहते हुए भी मैं कहीं नहीं हूँ अर्थात् नितान्त असंग हूँ॥५॥
अन्वय—मे (मेरे) ऐश्वरं योगम् (असाधारण अनहोनी को होनी कर देने वाले चातुर्यको) पश्य (देखो) भूतानि मत्स्थानि न (तमाम प्राणी मुझ में नहीं हैं) मम आत्मा (मेरा आत्मस्वरूप) भूतभृत् (प्राणियों को धारण करने वाला और) भूतभावनः (पालन करने वाला) न भूतस्थ: (भूतों में स्थित नहीं है)॥५॥
टीका—तत एव मयि स्थितान्यपि भूतानि न मत्स्थानि ममासङ्गत्वादेवेति भावः। ननु तर्हि तव जगद्व्यापकत्वं जगदाश्रयत्वञ्च पूर्वोक्तं विरुद्धमित्याह—पश्य मे योगमैश्वरम् असाधारणं योगैश्वर्यमघटित घटना चातुर्यमयम्। अन्यदप्याश्चर्यं पश्येत्याह—भूतानि विभर्त्ति धारयति इति भूतभृत्, भूतानि भावयति पालयतीति भूतभावनः। एवम्भूतोऽपि ममात्मा भूतस्थो न भवति ममेति भगवति देहिदेह—विभागाभावात् ‘राहोः शिरः’ इतिवत् अभेदेऽपि षष्ठी। अयं भावः—यथा जीवो देहं दधत् पालयन्नपि तस्मिन्नासक्त्या देहस्थ एव भवति, एवमहं भूतानि दधत् पालयन्नपि मायिकसर्वभूत-शरीरोऽपि न तत्रस्थो नि:सङ्गत्वादिति ॥५॥
भावानुवाद—क्योंकि मैं असंग हूँ, इसलिए सभी प्राणी मुझ में अवस्थित होते हुए भी मेरे स्वरूप में अवस्थित नहीं हैं, यदि कहो कि ऐसा कहने से तो आपकी पहले कही गई जगद्व्यापकता और जगदाश्रयता की दोनों बाते कट जायेंगी तो इसका उत्तर है कि मेरे असाधारण योगैश्वर्य अर्थात् अघटित को घटित करने वाले ऐश्वर्य को देखो, यह उसी का कार्य या प्रभाव है—कि सब को धारण करने वाला और उनका पालन करने वाला होने पर भी मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। मुझ भगवान् में देह—देही का भेद नहीं है। जीव देह को धारण और पालन करता हुआ आसक्तिवश देह में ही अवस्थान करता है, किन्तु मैं उस प्रकार भूतों को धारण—पालन करने पर भी मायिक भूत शरीरों में स्थित होते हुए भी अनासक्त होने के कारण उनमें स्थित नहीं हूँ।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६॥
मर्मानुवाद—इस सम्बन्ध में ऐसे जड़ीय उदाहरण देना सन्तोषकर नहीं है, क्योंकि इन उदाहरणों के बिना बद्ध जीव समझ नहीं सकते, इसलिए कहीं-कहीं थोड़ा बहुत उदाहरण देना पड़ता है, वही कह रहा हूँ। विचार पूर्वक पूरी तरह न समझने पर भी तुम भाव अवश्य समझ जाओगे, आकाश एक सर्वव्यापी वस्तु है, उसमें वायु सर्वत्र व्याप्त है। किन्तु सबका आधार होने पर भी आकाश सब से अलग है, उसी प्रकार मेरी शक्ति से ही सब प्राणियों का उदय, अस्त होता है फिर भी आकाश की तरह मैं बिल्कुल निर्लिप्त हूँ ॥६॥
अन्वय—सर्वत्रग: (सब जगह विचरने वाली) महान् वायुः (महान् वायु) यथा (जैसे) नित्यम् (हमेशा) आकाशस्थितः (आकाश में स्थित रहती है) तथा (वैसे ही) सर्वाणि भूतानि (सम्पूर्ण प्राणी) मत्स्थानि (मुझमें अवस्थित हैं) इति (ऐसा) उपधारय (निश्चय कर लो) ॥६॥
टीका—असङ्गे मयि भूतानि स्थितान्यपि न स्थितानि तेष्वपि अहं स्थितोऽपि न स्थित इत्यत्र दृष्टान्तमाह—यथेति। यथैवासङ्गस्वभावे आकाशे स्थितो नित्यं वातीति वायुः सर्वदा चलनस्वभाव:, अत एव सर्वत्र गच्छतीति सर्वत्रगः, महान् परिमाणतः यथा स्वाकाशस्य असङ्गत्वात् तत्र स्थितोऽपि न स्थितः, आकाशोऽपि वायौ स्थितोऽपि न स्थितोऽसङ्गत्वात् एव तथैव असङ्गस्वभावे मयि सर्वाणि भूतानि आकाशादीनि महान्ति सर्वत्रगानि स्थितानि नापि स्थितानि इत्युपधारय विमृश्य निश्चिनु। ननु तर्हि “पश्य मे योगमैश्वरम्” इति भगवदुक्तं योगैश्वर्यस्यातर्त्स्यत्वं कथं सिद्धमभूत् दृष्टान्तलाभात्? उच्यते आकाशस्य जडत्वादेवासङ्गत्वम्, चेतनस्य तु असङ्गत्वं जगदधिष्ठाना धिष्ठातृत्वे एव परमेश्वरं विना नान्यत्रास्तीत्यतर्क्यत्वं सिद्धमेव, तदप्याकाशदृष्टान्तो लोकबुद्धिप्रवेशार्थ एव ज्ञेयः॥६॥
भावानुवाद—हे अर्जुन! मैं असंग हूँ इसलिए समस्त भूत मुझ में स्थित रहने पर भी मुझ में नहीं है और समस्त भूतो में रहने पर भी मैं उनमें नहीं हूँ। उदाहरणत—सर्वत्र गमनशील, परिमाण में भी महान्, नित्य प्रवाहित वायु जिस प्रकार से असंगस्वभाव वाले आकाश में स्थित होते हुए भी उसमें स्थित नहीं रहती, उसी प्रकार वायु में स्थित होते हुए भी आकाश उसमें स्थित नहीं रहता, उसी प्रकार असंग स्वभाव वाले मुझ में आकाशादि पंच महाभूत स्थित होकर भी मुझ में स्थित नहीं है, ऐसा विचार कर तुम निश्चय कर लो। यदि प्रश्न हो कि आपने अपने तर्कातीत योगैश्वर्य को तर्क से कैसे सिद्ध कर दिया? अर्थात् जब आपने उदाहरण द्वारा इसे समझा ही दिया, तो यह तर्कातीत कहाँ रहा? इसके उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं—आकाश जड़ होने के कारण ही ‘असङ्ग’ है, किन्तु चेतन का असंग होना आश्चर्य का विषय है। यह जगदधिष्ठान के अधिष्ठातृत्व परमेश्वर के बिना कहीं संभव नहीं है। अधिष्ठाता—अधिष्ठान से अछूता कैसे रह सकता है, यही तर्कातीत है। साधारण लोगों को सहजता से समझाने के लिए ही आकाश का दृष्टान्त दिया गया है। वास्तव में अतर्क्य वस्तु की तुलना किसी से नहीं की जा सकती ॥६॥
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७॥
मर्मानुवाद—हे कौन्तेय! कल्प के समाप्त हो जाने पर सब प्राणी मेरी ही प्रकृति में प्रवेश कर जाते हैं एवं कल्प के आरम्भ के समय पुनः प्रकृति के द्वारा मैं उन्हें सृष्ट करता हूँ॥७॥
अन्वय—कौन्तेय (हे कुन्तीपुत्र) कल्पक्षये (प्रलय काल में) सर्वाणि (समस्त) भूतानि (प्राणी) मामिकाम् (मेरी) प्रकृतिम् (त्रिगुणात्मिका प्रकृति में) यान्ति (लीन हो जाते हैं) पुनः (फिर) कल्पादौ (सृष्टि के समय) तानि (उन तमाम प्राणियों को) अहम् (मैं) विसृजामि (सृष्ट करता हूँ)॥७॥
टीका—ननु अधुना दृश्यमानानि एतानि भूतानि त्वयि स्थितानि इत्यवगम्यते महाप्रलये क्व यास्यन्तीत्यपेक्षायामाह—सर्वेति। मामिकां मदीयां मम त्रिगुणात्मिकायां मायाशक्तौ लीयन्त इत्यर्थः। पुनः कल्पक्षये प्रलयान्ते सृष्टिकाले तानि विशेषेण सृजामि॥७॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा भगवान्! वर्त्तमान में दृश्यमान समस्त प्राणी आपमें अवस्थित जाने जाते हैं, यह तो ठीक है, किन्तु महाप्रलय में ये सब कहाँ जाएँगे? इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं—वे मेरी त्रिगुणमयी मायाशक्ति में लीन हो जाते हैं तथा पुनः सृष्टि के आरम्भकाल में मैं फिर उनकी विशेषभाव से सृष्टि करता हूँ॥७॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८॥
मर्मानुवाद—यह सारा भूतजगत् मेरी ही प्रकृति के अधीन है। तमाम प्राणी प्रकृति के वशीभूत हुए मजबूरन, इच्छामय मेरे द्वारा पुनः पुनः सृष्ट होते हैं। मैं अपनी प्रकृति के द्वारा ही इन्हें सृष्ट करता हूँ॥८॥
अन्वय—स्वाम् (अपनी) प्रकृतिम् (त्रिगुणात्मिका प्रकृति को) अवष्टभ्य (आश्रय कर) प्रकृते : वशात् (प्राचीन कर्म निमित्त स्वभाववश) अवशम् (परन्तन्त्र हुए) इदम् (इस) कृत्स्नम् (समस्त) भूतग्रामम् (प्राणियों की) पुनः पुनः (बार-बार) विसृजामि (उनके कर्मों के अनुसार सृष्टि करता हूँ)
टीका—ननु असङ्गो निर्विकारश्च त्वं कथं सृजसीत्यपेक्षायामाह प्रकृतिमिति। स्वां स्वीयाम् अवष्टभ्य अधिष्ठाय प्रकृतेर्वशात् स्वीयस्वभाववशात् प्राचीनकर्मनिमित्तादिति यावत्, अवशं कर्मादि—परतन्त्रम्॥८॥
भावानुवाद—यदि अर्जुन प्रश्न करे कि अच्छा, आप तो निःसङ्ग तथा निर्विकार हैं, तब आप सृष्टि किस प्रकार करते हैं, इस प्रश्न का श्रीभगवान् उत्तर देते हैं—मैं अपनी प्रकृति में अधिष्ठित होकर पूर्व कर्मों के आधार पर, कर्मों के अधीन प्राणियों की सृष्टि करता हूँ॥८॥
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९॥
मर्मानुवाद—किन्तु हे धनञ्जय! विश्व सृष्टि आदि कर्म मुझे बांध नहीं सकते, क्योंकि मैं उन सब कर्मों में अनासक्त और उदासीन की तरह रहता हूँ किन्तु वास्तविकता में मैं उदासीन नहीं हूँ। मैं तो हमेशा चिदानन्द में ही आसक्त हूँ। उस चिदानन्द को पुष्ट करने वाली मेरी बहिरंगा माया और तटस्था शक्ति ही इन सब प्राणियों की सृष्टि करती है। उससे मेरा स्वरूप विचलित नहीं होता। ये प्राणी मेरी माया से मोहित हुए जो भी कर्म करते हैं, उससे मेरे शुद्ध चिदानन्द विलास की ही पुष्टि होती है। सांसारिक जड़ीय कार्यों के प्रति सहज ही मेरी उदासीनता देखी जाती है॥१॥
अन्वय—धनञ्जय (हे धनञ्जय) तेषु कर्मसु (उन सृष्टि रचना आदि कार्यों में) असक्तम् (आसक्ति रहित) उदासीनवत् (उदासीन की तरह) आसीनम् (अवस्थित) माम् (मुझको) तानि कर्माणि (विश्व सृष्टि आदि कर्म) न निबध्नन्ति (बाँध नहीं सकते।)॥१॥
टीका—नन्वेवञ्च नाना—कर्माणि कुर्वतस्तव जीववद्बन्धः कथं न स्यादत आह—नचेति। तानि सृष्ट्यादीनि। कर्मासक्तिर्हि बन्धहेतुः, स चाप्तकामत्वान्मम नास्ति उदासीनवदिति। अन्य उदासीनो यथा विवदमानानां दुःख-शोकादि—संसृष्टो न भवति, तथैवाहमित्यर्थः॥१॥
भावानुवाद—अच्छा, इस प्रकार विविध कर्म करने पर भी जीवों की भाँति कर्म आपको बाँधते क्यों नहीं? इसके उत्तर में श्रीभगवान् कह रहे हैं कि सृष्टि आदि कर्मों में आसक्ति ही बन्धन का कारण है, किन्तु पूर्णकाम होने के कारण मैं आसक्त नहीं हूँ। जैसे उदासीन व्यक्ति का दूसरों के दुःख—शोकादि से कोई लेना—देना नहीं होता, वैसे ही मैं भी सृष्टि आदि कार्यों में उदासीन की तरह ही रहता हूँ॥१॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्त्तते॥१०॥
मर्मानुवाद—प्रकृति मेरी ही शक्ति है। मेरी शक्ति मेरे ही आश्रय में रहकर मेरा कार्य करती है। अपनी चिद्विलास सम्बन्धिनी इच्छा से मैं प्रकृति की ओर जो कटाक्ष करता हूँ उसी से ही सभी कार्यों में मेरी अध्यक्षता जानी जाती है। उसी कटाक्ष के द्वारा चालित होकर प्रकृति सचराचर जगत् का प्रसव करती है, इसलिए यह जगत् बार-बार प्रकट होता है॥१०॥
अन्वय— कौन्तेय (हे कुन्तीपुत्र) अध्यक्षेण मया (मेरे अधिष्ठान के कारण) प्रकृति: (प्रकृति) सचराचरम् (स्थावर जंगमात्मक) जगत् (जगत्) सूयते (प्रसव करती है) अनेन हेतुना (इसी कारण से) जगत् (जगत्) विपरिवर्तते (पुनः पुनः उत्पन्न होता है)॥१०॥
टीका—ननु सृष्ट्यादिकर्त्तुस्तवेदमौदासीन्यं न प्रत्येमि इत्यत आह—मयेति। अध्यक्षेण मम निमित्तभूतेन प्रकृतिः सचराचरं जगत् सूयते प्रकृतिरेव जगत् जनयति, मम अत्राध्यक्षता-मात्रम्—यथा कस्यचित् अम्बरीषादेरिव भूपते: प्रकृतिभिरेव राज्यकृत्यं निर्वाह्यते, अत्रोदासीनस्य भूपतेः सत्तामात्रमिति यथा तस्य राजसिंहासने सत्तामात्रेण विना प्रकृतिभिः किमपि न शक्यते कर्त्तुम्, तथैव ममाधिष्ठानलक्षणमध्यक्षत्वं विना प्रकृतिरपि जडा किमपि कर्त्तुं न शक्नोतीति भावः। अनेन मदधिष्ठानेन हेतुनेदं जगत् विपरिवर्त्तते पुनः पुनर्जायते॥१०॥
भावानुवाद—सृष्टि आदि करने वाले आप इस प्रकार से उदासीन हैं मुझे विश्वास नहीं हो रहा है, तब इस संशय को दूर करते हुए श्रीभगवान् कहते हैं ‘अध्यक्षेण मया’—निमित्तमात्र मेरे द्वारा ही प्रकृति समग्र चराचर जगत् को प्रसव करती है। यहाँ मेरी अध्यक्षता मात्र है, जिस प्रकार अम्बरीषादि राजाओं की शक्ति ही राजकार्यों का निर्वाह करती है, उन कार्यों में तो उदासीन राजा की तो सत्तामात्र होती है और जिस प्रकार उनके राजसिहांसन पर विराजे बिना शक्ति या प्रजा कुछ भी नहीं कर सकती, उसी प्रकार मेरी अध्यक्षता के बिना जड़ प्रकृति कुछ भी करने में समर्थ नहीं है अर्थात् मेरे अधिष्ठान द्वारा यह जगत् पुनः पुनः प्रादुर्भूत होता है॥१०॥
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११॥
मर्मानुवाद—मैंने जो—जो कहा उससे तुम निश्चित रूप से यह समझ लेना कि मेरा स्वरूप—सच्चिदानन्दमय है। मेरे ही अनुग्रह से मेरी शक्ति तमाम कार्य करती है, किन्तु मैं सभी कार्यों से स्वतन्त्र हूँ। इस जड़ जगत् में जो मैं दिख रहा हूँ वह भी केवल मेरा अनुग्रह और शक्ति का प्रभावमात्र है। मैं इस संसार से अतीत वस्तु हूँ, इसीलिए चैतन्य—स्वरूप होते हुए भी स्व स्वरूप से संसार में प्रकट होता हूँ। मानव जिस अणुत्व, बृहत्त्व और अव्यक्तत्व इत्यादि असीम भावों का विशेष आदर करते हैं वह केवल उनकी मायाबद्ध बुद्धि का कार्य है। वह मेरा परमभाव नहीं है। मेरा परमभाव यही है कि मैं नितान्त अलौकिक, मध्यमाकार स्वरूप होने पर भी अपनी शक्ति द्वारा सर्वव्यापी भी हूँ और परमाणु से छोटा भी। मेरे स्वरूप का इस प्रकार प्रकाशित होना केवल मेरी अचिन्त्य शक्ति से ही सम्भव है। मूढ़ लोक मेरे इस सच्चिदानन्द स्वरूप को साधारण मानव शरीर समझ कर ऐसा विचार करते हैं कि मैंने भी प्रपञ्च के विधान के अधीन ही साधारण मनुष्य की तरह औपाधिक शरीर ग्रहण किया है। वे यह नहीं समझ पाते कि मैं इसी स्वरूप में ही सम्पूर्ण प्राणियों का महेश्वर हूँ। अविद्वत् प्रतीति वाले लोग मेरे इस स्वरूप को साधारण समझते हैं जबकि जिनके हृदय में ज्ञान उत्पन्न हो गया है, ऐसे विद्वत् प्रतीति वाले लोग मेरे इस स्वरूप को नित्य सच्चिदानन्द तत्त्व समझते हैं॥११॥
अन्वय—मूढाः (विवेक रहित व्यक्ति) मम (मेरा) मानुषर्षी तनुं (मनुष्य के रूप में) आश्रितम् (आश्रित) भावम् (तत्त्व ही) परम (उत्कृष्ट) अजानन्तः (नहीं जानते) भूतमहेश्वरम् (अपितु सब प्राणियों के महान् ईश्वर) मम (मुझको) अवजानन्ति (साधारण पुरुष समझ अवज्ञा करते हैं)॥११॥
टीका—ननु च, सत्यमनन्तकोटिब्रह्माण्डव्यापी सच्चिदानन्दविग्रहः कारणार्णवशायी महापुरुषः स्वप्रकृत्या जगत् सृजतीति यः प्रसिद्धः, स एव हि भवान्; किन्तु वसुदेवसूनोस्तवेयं मानुषी तनुरित्येतदंशेनैव केचित्तव निकर्ष वदन्तीत्यत आह—अवजानन्तीति। मम मानुष्यास्तनोरस्याः परं भावं कारणार्णवशायिमहापुरुषादिभ्योऽप्युत्कृष्टं स्वरूपमजानन्त एव ते। कीदृशम्? भूतं सत्यं यद्ब्रह्म, तच्च तन्महेश्वरञ्चेति, तन्महेश्वरपदं सत्यान्तरव्यावर्त्तकमत्र ज्ञेयम्—“युक्त क्षमादावृते भूतम्” इत्यमरः। “तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं वृन्दावनसुरभूरुहभावनासीनं सततं स—मरुद्गणोऽहं परमया स्तुत्या तोषयामि” इति श्रुतेः; “नराकृति परब्रह्म” इति स्मृतेश्च, ममास्याः मानुष्यास्तनोः सच्चिदानन्दमयत्वं मदभिज्ञभक्तैरुच्यत एव, तथा सर्वब्रह्माण्डव्यापित्वञ्च बाल्ये मन्मात्रा श्रीयशोदयादृष्टमेव; यद्वा, मानुषीं तनुमेव विशिनष्टि—परमुत्कृष्टं भावं सत्तां विशुद्धं सत्त्वं सच्चिदानन्दस्वरूपमित्यर्थः। “भावः सत्ता स्वभावाभिप्रायः” इत्यमरः। परं भावमपि विशिनष्टि—मम भूतमहेश्वरं मम सृज्यानि भूतानि ये ब्रह्माद्यास्तेषामपि महान्तमीश्वरम्। तस्माज्जीवस्येव मम परमेश्वरस्य तनुर्न भिन्ना; तनुरेवाहम्, अहमेव तनुः, साक्षाद् ब्रह्मैव—“शाब्दं ब्रह्म दधद्वपुः” इति मदभिज्ञशुकोक्तेरिति भवादृशैस्तु विश्वस्यतामिति भावः॥११॥
भावानुवाद—अर्जुन ने कहा—अनन्तकोटि ब्रह्माण्डव्यापी सच्चिदानन्द विग्रह कारणार्णवशायी महापुरुष जो अपनी शक्ति द्वारा जगत् की सृष्टिकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं, वे आप ही हैं। किन्तु वसुदेवपुत्र आपके इस मनुष्यशरीर के दर्शन कर कई व्यक्ति आपको ऐसा नहीं मानते हैं। इसके उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं—मेरे इस दृश्यमान मनुष्य शरीर, जो कि कारणार्णवशायी महान् पुरुषादि से भी श्रेष्ठ स्वरूप है, उसके परमभाव को न जानने के कारण ही मेरी अवज्ञा करते हैं। वह स्वरूप कैसा है, बताते हैं—मैं सत्यस्वरूप ब्रह्म का भी महेश्वर हूँ अर्थात् मैं परम सत्यस्वरूप हूँ। गोपालतापनी श्रुति में कहा गया है—“वृन्दावन के अमर वृक्षों के कुञ्ज में आसीन एकमात्र सच्चिदानन्द विग्रह गोविन्द को मरुद्गण के साथ मैं परम स्तुति द्वारा सन्तुष्ट करता हूँ।” (भा. ९/२३/२०) में भी ‘नराकृति परब्रह्म’ कहा गया है। मेरे इस मानुषी शरीर के सच्चिदानन्दमयत्व की महिमा एकमात्र मेरे तत्त्व को जानने वाले भक्तों के द्वारा ही गाई जाती है एवं मेरे बाल्यकाल में मेरा दर्शन श्रीयशोदा ने किया है कि मैं अपने इसी शरीर द्वारा किस प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी हूँ। मैं ‘मम भूतमहेश्वरम्’ अर्थात् मेरे द्वारा रचित ब्रह्मादि जो भूत हैं मैं उन सबसे बड़ा ईश्वर हूँ। शरीर और शरीरी मैं ही हूँ, जीव की तरह मुझ परमेश्वर का शरीर मुझ से भिन्न नहीं है, साक्षात् ब्रह्म ही हूँ। श्रीमद्भागवत (३/२१/४) में कथित है—शब्द ब्रह्म ने सच्चिदानन्द शरीर धारण किया है। यह मेरे तत्त्व को जानने वाले श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा है इसलिए तुम्हारे समान मेरे तत्त्व को जानने वाले व्यक्ति इस पर विश्वास करते हैं।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीञ्चैव प्रकृति मोहिनीं श्रिताः॥१२॥
मर्मानुवाद—यदि कहो कि अविद्वत् प्रतीति किस लिए उदित होती है? तब सुनो! मूढ़ लोग राक्षसी और आसुरी प्रकृति से मोहित होते हैं इसलिए उनकी आशायें, कर्म और ज्ञान सब निरर्थक हो जाता है। उच्च लोकप्राप्ति की आशावश उनका चित्त कर्मों से विक्षिप्त हो जाता है। तुच्छ फलप्रद कर्मों का अनुष्ठान करने के कारण वे विशुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। यदि कभी ज्ञान की खोज करें भी तो अभेदवाद-रूपी दुष्ट-ज्ञान द्वारा उनकी विद्या लुप्त हो जाती है, तब वे ऐसा समझते हैं कि मेरा यह श्यामसुन्दर स्वरूप माया का ही है। मैं ईश्वर हूँ, इसलिए ब्रह्म की अपेक्षा हीन तत्त्व हूँ। मुझ ईश्वर की उपासना द्वारा चित्त शुद्ध हो जाने से उन्हें निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति होगी। उनके ऐसा समझने का फल यह होता है कि अन्त में राक्षस और असुर स्वभाव द्वारा उनकी दैवी प्रकृति लुप्त हो जाती है और अविद्वत प्रतीति उदित होती है॥१२॥
अन्वय—मोघाशा (निष्फल काम) मोघकर्माणः (निष्फल कर्म) मोघज्ञाना: (विफल ज्ञान और) विचेतसः (विवेकहीन हो जाते हैं) मोहिनीम् (एवं मोहजनक) राक्षसीम् (तामस) आसुरीञ्च एव (और राजस) प्रकृतिम् (स्वभाव) श्रिताः (को प्राप्त होते हैं)॥१२॥
टीका—ननु ये मानुषी मायामयीं तनुमाश्रितोऽयमीश्वर इति मत्वा त्वामवजानन्ति, तेषां का गतिस्तत्राह—मोघाशा इति। यदि भक्ता अपि स्युस्तदपि मोघाशा भवन्ति, मत्सालोक्यादिमभिवाञ्छितं न प्राप्नुवन्ति। यदि ते कर्मिणस्तदा मोघकर्माणः कर्मफलं स्वर्गादिकं न लभन्ते; यदि ते ज्ञानिनस्तर्हि मोघज्ञाना ज्ञानफलं मोक्षं न विन्दन्ति, तर्हि ते किं प्राप्नुवन्तीत्यत आह—राक्षसीमिति। ते राक्षसी प्रकृति राक्षसानां स्वभावं श्रिताः प्राप्ताः भवन्तीत्यर्थः॥१२॥
भावानुवाद—अच्छा, जो आपको मायामय मनुष्यशरीरधारी ईश्वर समझकर आपकी अवज्ञा करते हैं, उनकी क्या गति होती है? इसके उत्तर में श्रीभगवान् कह रहे हैं—ऐसे व्यक्ति यदि भक्त हों, तब भी ‘मोघाशा’ अर्थात् निष्फल आशा वाले होते हैं। वे चाहते हुए भी मेरे लोक (सालोक्य) को प्राप्त नहीं कर सकते अर्थात् उन्हें मेरा सालोक्यादि प्राप्त नहीं होता। यदि वे कर्मी हैं तो वे कर्म के फल स्वर्गादि को प्राप्त नहीं कर सकते, और यदि वे ज्ञानी हैं, तो ज्ञान के फल मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं। अच्छा तब वे क्या प्राप्त करते हैं? उत्तर है कि वे तो राक्षसों जैसे स्वभाव वाले हो जाते हैं॥१२॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३॥
मर्मानुवाद—हे पार्थ! जो विद्वत् प्रतीति को प्राप्त करते हैं, वे महात्मा हैं। वे दैवी स्वभाव का आश्रय करते हुए अनन्य मन से अर्थात् यूं कह सकते हैं कि तुच्छ फल प्रदान करने वाले कर्म और आत्मविनाशक अभेदवाद रूपी शुष्क ज्ञान के प्रति आस्था न रखते हुए तमाम प्राणियों के आदि और अविनाशी मेरे इस कृष्णस्वरूप को ही चरम तत्त्व मानते हैं और मेरा भजन करते हैं॥१३॥
अन्वय—पार्थ (हे पार्थ) महात्मानः तु (भगवान् की भक्ति में लगे महात्मा) (दैवी प्रकृतिम् देवस्वभाव को) आश्रिताः (प्राप्त होकर) अनन्यमनसः (अनन्य चित्त से) माम् (मनुष्य आकृति मुझे ही) भूतादिम् (सम्पूर्ण प्राणियों का कारण) अव्ययम् (और अनश्वर) ज्ञात्वा (जानकर) भजन्ति (सेवा करते रहते हैं)॥१३॥
टीका—तस्माद् ये महात्मानः यादृच्छिक—मद्भक्तिकृपया महात्मत्वं प्राप्तास्ते तु मानुषा अपि दैवी प्रकृतिं देवानां स्वभावं प्राप्ताः सन्तो मां मानुषाकारमेव भजन्ते। न विद्यतेऽन्यत्र ज्ञानकर्मान्यकामनादौ मनो येषां ते। मां भूतादिं “मया ततमिदं सर्वम्” इत्यादि मदैश्वर्यज्ञानेन भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां कारणम्। अव्ययं सच्चिदानन्दविग्रहत्वादनश्वरं ज्ञात्वेति ममाराध्यत्वे मद्भक्तैरेतावन्मानं मज्ज्ञानमपेक्षितव्यम्। इयमेव त्वं—पदार्थज्ञानकर्माद्यनपेक्षा भक्तिरनन्या सर्वश्रेष्ठा राजविद्या राजगुह्यमिति द्रष्टव्यम्॥१३॥
भावानुवाद—इसलिए जो महात्मा हैं और मेरी भक्ति की कृपा से जिन्हें महानता प्राप्त हो चुकी है, वे मनुष्य होने पर भी देवताओं के स्वभाव वाले हो जाते हैं और मनुष्याकार मेरा ही भजन करते हैं। ज्ञान-कर्मादि अन्य-अन्य कामनाओं में जिनका मन आसक्त नहीं है, वे अनन्य मन वाले हैं। वे ऐसा जानते हैं कि सारा जगत् मुझ से व्याप्त है। मेरे ऐश्वर्यज्ञान के द्वारा वे यह भी जान जाते हैं कि तृण से लेकर ब्रह्माजी तक सबका कारण मैं ही हूँ। वे मुझे सच्चिदानन्दविग्रह होने के कारण अनश्वर जानते हैं। मेरी आराधना के लिए भक्तों को मेरे सम्बन्ध में मात्र इतने ज्ञान की ही आवश्यकता है। इसलिए त्वम्पदार्थ के ज्ञान और ज्ञान-कर्मादि की अपेक्षा से रहित अनन्य भक्ति को सर्वश्रेष्ठ राजविद्या तथा राजगुह्य के रूप में समझना चाहिए॥१३॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४॥
मर्मानुवाद—उस विद्वत्प्रतीति से युक्त महात्मा हमेशा मेरे नाम, रूप, गुण और लीला का कीर्तन करते रहते हैं अर्थात् श्रवण कीर्तनादि नवधा भक्ति का पालन करते हैं, मेरे इस सच्चिदानन्द-स्वरूप की नित्यदासत्व की प्राप्ति के लिए वे अपनी सारी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्रियाओं द्वारा दृढ़ता पूर्वक मेरा अनुशीलन करते हैं। सांसारिक कर्मों में चित्त विक्षिप्त न हो इस लिए संसार—निर्वाह करते हुए भक्तियोग के द्वारा मेरी शरण ग्रहण करते हैं॥१४॥
अन्वय—सततम् (वे काल, देश और पात्र की शुद्धि की तरफ ध्यान दिये बिना हमेशा) मां कीर्तयन्तः (मेरे नामादि का कीर्तन करते हुए) यतन्तः च (मेरे स्वरूप गुणादि निर्णय में यत्नशील) दृढव्रताः (निरन्तर एकादशी आदि और नामग्रहणादि नियम पालन करते हुए) नमस्यन्तः च (मेरे को नमस्कार करते हुए) नित्ययुक्ताः (भविष्य में मेरे साथ नित्यसंयोग की आकांक्षा से) भक्त्या (भक्ति योग द्वारा) माम् (मेरी) उपासते (उपासना करते हैं)॥१४॥
टीका—भजन्तीत्युक्तं तद्भजनमेव किमित्यत आह—सततं सदेति नात्र कर्मयोग इव कालदेशपात्रशुद्धाद्यपेक्षा कर्त्तव्येत्यर्थः,—“न देशनियमस्तत्र न कालनियमस्तथा। नोच्छिष्टादौ निषेधोऽस्ति श्रीहरेर्नाम्नि लुब्धक॥” इति स्मृतेः। यतन्तो यतमाना:—यथा कुटुम्बपालनार्थं दीना: गृहस्थाः धनिकद्वारादौ धनार्थं यतन्ते तथैव मद्भक्ताः कीर्तनादिभक्तिप्राप्त्यर्थं साधुसभादौ यतन्ते, प्राप्य च, भक्तिमधीयमानं शास्त्रं पठतः इव पुनः पुनरभ्यस्यन्ति च। एतावन्ति नामग्रहणानि एतावत्यः प्रणतयः एतावत्यः परिचर्याश्चावश्यकर्त्तव्याः इत्येवं दृढानि व्रतानि नियमाः येषां ते, यद्वा, दृढानि अपतितानि एकादश्यादि—व्रतानि नियमा येषां ते। नमस्यन्तश्च इति चकार: श्रवणपादसेवनाद्यनुक्तसर्वभक्तिसंग्रहार्थ:। नित्ययुक्ता भाविनं मन्नित्यसंयोगमाकाङ्क्षन्तः आशंसायां भूतवच्चेति वर्तमानेऽपि भूतकालिकः क्त—प्रत्ययः। अत्र मां कीर्तयन्त एव मामुपासत इति मत्कीर्तनादिकमेव मदुपासनमिति वाक्यार्थः। अतो मामिति न पौनरुक्त्यमाशङ्कनीयम्॥१४॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा—हे कृष्ण! आपने कहा—वे मेरा भजन करते हैं, किन्तु आपका भजन है क्या, उसे कब और कैसे करना चाहिये? इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं—सततम् अर्थात् हर समय मेरा कीर्तन करना कर्तव्य है, मेरे भजन में कर्मयोगी की तरह समय, स्थान और पात्र की शुद्धि—अशुद्धि की आवश्यकता नहीं है। विष्णुधर्मोत्तरस्मृति में कहा गया है श्रीहरि के नामकीर्तन के लोभी व्यक्तियों के लिए स्थान और समय का नियम नहीं है फिर जूठे मुख की तो बात ही क्या। वे तो दृढ़ निश्चय के साथ यत्न—शील रहते हैं, जिस प्रकार गृहस्थ व्यक्ति अपने परिवार पालनके लिए धन की चाहना से धनी व्यक्ति के पास धन प्राप्ति के लिए परिश्रम करते हैं, उसी प्रकार मेरे भक्त कीर्तनादि भक्ति प्राप्त करनेके लिए साधुओं की सभाओं में जाकर भक्तिप्राप्ति हेतु यत्न करते रहते हैं एवं भक्ति—लाभ करने पर भी पवित्र शास्त्रों के पाठ की भाँति पुनः—पुनः इसका अभ्यास करते रहते हैं। जिनके निश्चित नियम हैं कि मुझे इतनी संख्या में नाम ग्रहण करना ही है, इतनी बार प्रणाम एवं इतनी और इस प्रकार सेवा पूजा करनी है, इस प्रकार नियमपूर्वक एकादशी आदि व्रतादि पालन करते हैं, वे ही यत्नवान् हैं। ‘नमस्यन्तश्च’ — यहाँ ‘च’ से—श्रवण, पादसेवनादि सभी भक्ति अङ्गो को समझना चाहिए। ‘नित्ययुक्तः’ अर्थात् वे भविष्य में भी मेरे नित्य संयोग की आकांक्षा करते हुए मेरा भजन करते हैं। इस श्लोक में मां कीर्तयन्ते', ‘माम् उपासते’—इन दोनों पदों का यही तात्पर्य है कि मेरा कीर्तनादि ही मेरी उपासना है। अतः ‘माम्’ शब्द से पुनरुक्ति दोषकी आशंका नहीं है अपितु ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा कहा गया है॥१४॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५॥
मर्मानुवाद—हे अर्जुन, आर्त्तादि भक्तों से अनन्य भक्त श्रेष्ठ हैं एवं ‘महात्मा’ कहलाते हैं मैंने तुम्हें कई प्रकार से समझाया। अब उनसे न्यून तीन प्रकार के भक्तों की बात बताता हूँ। पण्डित व्यक्ति इन तीन प्रकार के भक्तों को ‘अहंग्रहोपासक’ ‘प्रतीकोपासक’ एवं ‘विश्वरूपोपासक’ कहते हैं। उन तीन प्रकार के भक्तों में से अहंग्रहोपासक ही प्रधान हैं, वे अपने आपको भगवान् होने का अभिमान करते हुए उपासना करते हैं, यही परमेश्वर यजनरूप एक प्रकार का ‘यज्ञ’ है। इसी अभेदज्ञानरूप यज्ञ का यजन करते हुए अहंग्रहोपासक ब्रह्म की उपासना करते हैं। प्रतीकोपासकगण उनसे थोड़ा
कम हैं, यह भगवान् से अपने आप को पृथक् समझ कर सूर्य और इन्द्रादि देवताओं को भगवान् की विभूति समझ उनकी उपासना करते हैं। इनसे भी मन्दबुद्धि व्यक्ति ‘विश्वरूप’ के रूप में भगवान् की उपासना करते हैं, इस तरह तीन प्रकार के ज्ञानयज्ञ देखे जाते हैं॥१५॥
अन्वय—अपि च (और दूसरे) ज्ञानयज्ञेन (ज्ञानरूप यज्ञ के द्वारा) यजन्तः (यजनकारी) अन्ये (अहंग्रहोपासक अर्थात् अपने आपको भगवान् समझने वाले) एकत्वेन (अभेद चिन्तन द्वारा और कई प्रतीकोपासकगण) [अन्ये] [प्रतीकोपासकगण] पृथक्त्वेन (विष्णु ही आदित्यरूप में विराजमान है, इस प्रकार भेदचिन्तन द्वारा [अन्ये] [कई विश्वरूप की उपासना करने वाले] बहुधा (कई प्रकार से) विश्वतोमुखम् (विश्वरूप मेरी) उपासते (उपासना करते हैं।)॥१५॥
टीका—तदेवं अत्राध्याये पूर्वाध्याये च अनन्यभक्त एव महात्मशब्दवाच्यः, आर्त्तादिसर्वभक्तेभ्यः श्रेष्ठ इति दर्शितम्। अथान्येऽपि अनुक्तपूर्वा ये त्रिविधा भक्ताः पूर्वतो न्यूनाः ‘अहंग्रहोपासका:’ ‘प्रतीकोपासका:’ विश्वरूपोपासकास्तान् दर्शयति। ज्ञानयज्ञेनेति अन्ये न महात्मनः पूर्वोक्त साधनानुष्ठानासमर्था इत्यर्थः, ज्ञानयज्ञेन “तं वा अहमस्मि भगवो देवता अहं वै त्वमसि” इत्यादि—श्रुत्युक्तमहंग्रहोपासनं ज्ञानं स एव परमेश्वरयजनरूपत्वात् यज्ञस्तेन, चकार एवार्थे, अपि-शब्दः साधनान्तरत्यागार्थः, एकत्वेन उपास्योपासकयोरभेदचिन्तनरूपेण। ततोऽपि न्यूना अन्ये पृथक्त्वेन भेदचिन्तनरूपेण ‘आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः’ इत्यादिश्रुत्युक्तेन प्रतीकोपासनेन ज्ञानयज्ञेन। “अन्ये ततोऽपि मन्दा बहुधा बहुभिः प्रकारैर्विश्वतोमुखं विश्वरूपं सर्वात्मानं मामेवोपासते” इति मधुसूदन-सरस्वतीपादानां व्याख्या। अत्र'नादेवो देवमर्चयेत्’ इति तान्त्रिकदृष्ट्या गोपालोऽहम् इति भावनावत्त्वे या गोपालोपासना, सा ‘अहंग्रहोपासना'। तथा “यः परमेश्वरो विष्णुः स हि सूर्य एव नान्यः; स हि इन्द्र एव नान्यः, स हि सोम एव नान्यः” इत्येवं भेदेन एकस्या एव भगवद्विभूतेर्या उपासना सा ‘प्रतीकोपासना'। ‘विष्णुः सर्वः’ इति समस्त-विभूत्युपासना विश्वरूपोपासनेति ज्ञानयज्ञस्य त्रैविध्यम्, यद्वा, एकत्वेन पृथक्त्वेन इत्येक एव'अहंग्रहोपासना'—'गोपालोऽहं“गोपालस्य दासोऽहम्’ इत्युभयभावनामयी समुद्रगामिनी नदीव समुद्रभिन्नाऽभिन्ना चेति। तदा च ज्ञानयज्ञस्य द्वैविध्यम्॥१५॥
भावानुवाद—इस अध्याय एवं पिछले अध्यायमें अनन्य भक्त को ही ‘महात्मा’ कहा गया है और यह दिखाया गया है कि वे आर्त, जिज्ञासु आदि सभी प्रकार के भक्तों से श्रेष्ठ हैं। जिनका पहले उल्लेख नहीं हुआ अब उन तीन प्रकार के भक्तों के विषय में बता रहे हैं, जो आर्त्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इन तीनों प्रकार के भक्तों से भी निम्न श्रेणी के हैं! जैसे ‘अहंग्रहोपासक’ ‘प्रतीकोपासक’ तथा विश्वरूपोपासक। ये लोग महात्मा नहीं है। अनन्य भक्त के बिना और किसी को महात्मा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे पूर्वोक्त साधनके अनुष्ठान में असमर्थ हैं। श्रुति में ज्ञानयज्ञ का तात्पर्य इस प्रकार बताया गया है—‘हे ऐश्वर्यसम्पन्न देवपुरुष! जो आप हैं, वही मैं हूँ, जो मैं हूँ, वही आप हैं।’ यही अहंग्रहोपासना है तथा ज्ञानी इसी यजनरूप यज्ञसे परमेश्वर की उपासना करते हैं। ‘च’ का प्रयोग ‘एव’ के अर्थ में हुआ है। तथा ‘अपि’ शब्द का प्रयोग ‘अन्य साधनों को त्यागने’ के अर्थ में हुआ है। अर्थात् जो अनन्य सभी उपासनाओं को त्यागकर अहंग्रहोपासना द्वारा मेरा भजन करते हैं। वे एकत्वेन अर्थात् उपास्य और उपासक में कोई भेद न समझते हुए भजन करते हैं। इनसे भी तुच्छ ‘पृथक्त्वे न’ उपासनावाले हैं। जिसमें उपासक भेद—चिन्तन रूप से मेरा भजन करते हैं, जैसे श्रुति कहती है ‘आदित्य ही ब्रह्म है—इन वाक्यों के अनुसार वे प्रतीकोपासनारूप ज्ञानयज्ञ द्वारा भजन करते हैं अर्थात् देवताओं को मुझ भगवान् से अलग समझकर सूर्य—इन्द्र आदि विभूतियों की पूजा करते हैं। ‘इनसे भी मन्दबुद्धि वे हैं, जो विश्वतोमुखम् अर्थात् विश्वरूप मुझ सर्वात्मा की ही उपासना करते हैं।”—इस प्रकार की व्याख्या श्रीपाद मधुसूदन सरस्वती ने की है। तंत्र में कहा गया है—नादेवो ‘देवमर्चयेत्’ इस तन्त्रवाक्य की दृष्टि से जो देवता नहीं हैं, वे देवता का अर्चन न करें। इस वाक्य के अनुसार मैं गोपाल हूँ—इस भावना से गोपाल की उपासना ही अहंग्रहोपासना है। उसी प्रकार, जो परमेश्वर विष्णु हैं, उनके अतिरिक्त और कोई सूर्य नहीं है, वे इन्द्र हैं और कोई इन्द्र नहीं है, वे ही सोम हैं और कोई सोम नहीं है, इस प्रकार आकारभेद द्वारा एक ही भगवान् की विभूतियों की जो उपासना है, वही ‘प्रतीकोपासना’ है। ‘विष्णु ही सर्व है’—इस प्रकार के ज्ञान से जो विभूतियों की उपासना की जाती है, वही ‘विश्वरूपोपासना’ है। इस प्रकार तीन प्रकार के ज्ञानयज्ञ कहे गये हैं। अथवा, एकत्व तथा पृथक्त्व—ये एक ही है। अहंग्रहोपासना’ अर्थात् ‘मैं’ गोपाल हूँ—ऐसी भावना तथा ‘मैं गोपालका दास हूँ—ऐसी भावना—ये दोनों भावनाएँ समुद्रगामिनी नदी के समान समुद्रसे भिन्न भी हैं और अभिन्न भी। इस प्रकार ज्ञानयज्ञ दो प्रकार का कहा जा सकता है॥१५॥
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्सामयजुरेव च॥७॥
गतिर्भर्त्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८॥
तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतञ्चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९॥
मर्मानुवाद—मैं ही अग्निष्टोमादि ‘श्रौत’ एवं वैश्वदेवादि ‘स्मात', यज्ञ हूँ, मैं ही स्वधा, मैं ही औषध, मैं ही मन्त्र, मैं ही घृत, मैं ही अग्नि, मैं ही होम, मैं ही जगत् का पिता, माता, धाता और पितामह हूँ, मैं ही पवित्र ॐकार हूँ। मैं ही ऋक्, साम और यजुः हूँ। मैं ही सब की गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी निवास, शरण और सुहृत् हूँ, उत्पत्ति, नाश, स्थिति, हेतु एवं अविनाशी बीज हूँ। ग्रीष्मकाल में मैं ही ताप और वर्षाकाल में मैं ही वृष्टि हूँ, मैं ही जलवर्षण करता हूँ और जल का आकर्षण करता हूँ। मैं ही अमृत, मैं ही मृत्यु हूँ एवं हे अर्जुन! सद् असत् भी मैं ही हूँ, इस प्रकार ध्यान करते हुए विश्वरूप स्वरूप में मेरी उपासना होती है॥१६-१९॥
अन्वय—अहम् (मैं) क्रतुः (अग्निष्टोमादि श्रौत कर्म हूँ) अहम् (मैं) यज्ञः (वैश्वदेवादि स्मार्त्त कर्म) अहम् (मैं) स्वधा (पितृदेव श्राद्धादि हूँ) अहम् (मैं) औषधम् (सर्व प्राणियों की रोगनिवारक औषध हूँ) अहम् (मैं) मन्त्रः (मन्त्र हूँ) अहम् (मैं) आज्यम् (घृतादि हूँ) अहम् (मैं) अग्निः (अग्नि हूँ और) अहम् (मैं ही) हुतम् (होम क्रिया हूँ)॥१६॥
अहम् (मैं) अस्य (इस) जगतः (जगत् का) पिता (पिता) माता (माता) धाता (कर्मफल प्रदाता) पितामहः (पितामह) वेद्यम् (जानने योग्य वस्तु हूँ) पवित्रम् (पवित्र) ऊँकारः (प्रणव) ऋक् (ऋग्वेद) साम (सामवेद) यजुःएव च (एव यजुर्वेद स्वरूप भी मैं ही हूँ)॥१७॥
गतिः (मैं ही कर्मफल) भर्ता (पति) प्रभुः (नियन्ता) साक्षी (शुभ अशुभ द्रष्टा) निवासः (आश्रयस्थान) शरणम् (रक्षाकर्ता) सुहृत् (निरुपाधिहितकारी) प्रभवः (सृष्टि) प्रलयः (प्रलय) स्थानम् (और स्थिति क्रिया) निधानम् (शंख पद्मादि निधि) अव्ययम् (अविनाशी) बीजम् (कारण हूँ)॥१८॥
अर्जुन (हे अर्जुन) अहम् (मैं) तपामि (ताप देता हूँ) वर्षम् (वर्षा करता हूँ) निगृह्णामि (आकर्षण करता हूँ) उत्सृजामि च (और पुनः वर्षा करता हूँ) [मैं] अमृतम् (मोक्ष) मृत्युः च (और संसार हूँ) अहम् (मैं) सत् (स्थूल) असत् च (और सूक्ष्म भी मैं ही हूँ) । १९॥
टीका—बहुधोपासते कथं त्वामेव इत्याशङ्कय आत्मनो विश्वरूपत्वं प्रपञ्चयति चतुर्भिः। क्रतुः श्रौतोऽग्निष्टोमादिः यज्ञः, स्मार्तों वैश्वदेवादिः, औषधम् औषधि—प्रभवमन्नम्, ‘पिता’ व्यष्टिसमष्टिसर्वजगदुत्पादनात्, ‘माता’ जगतोऽस्य स्वकुक्षि—मध्य एव धारणात्, ‘धाता’ जगतोऽस्य पोषणात्, ‘पितामहः’ जगत्स्रष्टुः ब्रह्मणोऽपि जनकत्वात्, वेद्यं ज्ञेयं वस्तु, पवित्रं शोधकं वस्तु, गतिः फलं, भर्ता पतिः, प्रभुर्नियन्ता, ‘साक्षी’ शुभाशुभद्रष्टा, निवासः’ आस्पदम्, ‘शरणं’ विपद्भ्यस्त्राता, ‘सुहृत्’ निरुपाधिहितकारी, ‘प्रभवाद्याः’ सृष्टिसंहार-स्थितयः क्रियाश्चाहं, निधानं निधि: पद्मशङ्खादिः, बीज'कारणम्, ‘अव्ययम्’ अविनाशि, न तु व्रीह्यादिवन्नश्वरम्, आदित्यो भूत्वा निदाघे तपामि, प्रावृषि वर्षम् उत्सृजामि, कदाचिच्चैव ग्रहरूपेण वर्षं निगृह्णामि च। ‘अमृतं’ मोक्षः, मृत्युः’ संसारः, सदसत्’ स्थूलसूक्ष्मः,—एतत् सर्वम् अहमेव इति मत्वा विश्वतोमुखं मामुपासते इति पूर्वेणान्वयः॥१६-१९॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा हे कृष्ण! लोग इस प्रकार भिन्न-भिन्न उपायों से आपकी उपासना क्यों करते है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीभगवान् चार श्लोकों में अपने विश्वरूपत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहे हैं। ‘क्रतुः’ का तात्पर्य है वेदों में बताया गया अग्निष्टोमादि यज्ञ मै हूँ। स्मृति विहित वैश्वदेवादि यज्ञ मै हूँ। औषधम्’ अर्थात् औषधि से उत्पन्न होने वाला अन्न। ‘पिता’ अर्थात् व्यष्टि और समष्टि जगत् का उपादान होने के कारण पिता हूँ। इस जगत् को अपनी कुक्षि में धारण करने के कारण ‘माता’ हूँ। ‘धाता’ अर्थात् जगत् का पोषण करने के कारण धाता हूँ, ‘पितामह’ अर्थात् जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी का भी पिता होने के कारण पितामह हूँ, ‘वेद्यम्’ अर्थात् जानने योग्य वस्तु हूँ, ‘पवित्रम्’—पवित्र करने वाला हूँ, ‘गतिः’ अर्थात् फल, ‘भर्त्ता’ अर्थात् पति, ‘प्रभुः’ अर्थात् नियन्ता, ‘साक्षी’ अर्थात् शुभ-अशुभ द्रष्टा, निवासः’ अर्थात् आधार, ‘शरणम्’ अर्थात् विपत्तियों से रक्षा करने वाला हूँ। ‘सुहृद्’ अर्थात् निरुपाधिक हित करने वाला मैं हूँ। ‘प्रभवाद्याः’ अर्थात् सृष्टि, संहार एवं स्थिति कार्य करने वाला मैं ही हूँ। ‘निधानम्’ अर्थात् निधि अर्थात् शंख, पद्म। बीजमव्ययम्’ अर्थात् अविनाशी बीज किन्तु, गेहूँ आदि बीजों की तरह नश्वर बीज नहीं हूँ। आदित्यरूप में मैं ग्रीष्मकाल में ताप प्रदान करता हूँ, वर्षा काल में जल बरसाता हूँ एवं कभी ग्रहरूप से वर्षा रोक भी देता हूँ। ‘अमृत’ अर्थात् मोक्ष हूँ ‘मृत्युः’ अर्थात् संसार, ‘सदसत्’ अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म-ये समस्त मैं ही हूँ। इस प्रकार से जानकर वे मुझ विश्वतोमुख की उपासना करते हैं॥१६-१९॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥२०॥
मर्मानुवाद—इन तीनों प्रकार की उपासनाओं में यदि भक्ति की गन्ध भी हो तभी परमेश्वर के रूप में उपासना करता हुआ जीव क्रमशः उन—उन उपासनाओं से जनित अज्ञानरूपी मल का परित्याग कर मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है ‘अहंग्रहोपासना’ के अन्तर्गत उपासक में अपने आपको भगवान् समझने की धारणा भक्ति का अनुसरण करने से क्रमश: भक्ति के रूप में परिणत हो सकती है। प्रतीकोपासना’ में जो अन्य देवताओं को भगवान् समझने जैसी धारणा है, वह तत्त्व आलोचना और साधु—संग के प्रभाव से सच्चिदानन्द स्वरूप मुझ में ही पर्यवसित हो सकती है। ‘विश्वरूपोपासना’ में जो अनिश्चित परमात्मज्ञान है, वह मेरे स्वरूप के आविर्भाव से क्रमश: दूर हो कर सच्चिदानन्द स्वरूप मध्यमाकार मुझ में ही घनीभूत हो सकता है, किन्तु इन तीन प्रकार की उपासनाओं में जिन के अन्दर भगवद् विमुखता के लक्षण अर्थात् कर्मज्ञान के प्रति रुचि होती है उनको नित्य मंगल स्वरूप भक्ति की प्राप्ति नहीं होती। ‘अभेद उपासक’ क्रमशः भगवद् विमुखतावश मायावादरूपी कुतर्क जाल में फंसते जाते हैं। ‘प्रतीकोपासकगण’ ऋक्, साम और यजुर्वेद में लिखित कर्मतन्त्र में आबद्ध होकर उपर्युक्त तीनों वेदों की कर्म का उपदेश देने वाली तीनों विद्याओं का अध्ययन करते हुए और सोमपान द्वारा धौतपाप हो जाते हैं और क्रमश: सभी यज्ञों द्वारा मेरी उपासना करते हुए स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। बाद में पुण्य से प्राप्त होने वाले देवलोक में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं॥२०॥ अन्वय—त्रैविद्याः (तीनों वेदों में कहे गये कर्मपरायण) सोमपाः (यज्ञशेष सोमपान करने वाले) पूतपापा: (निष्पाप व्यक्ति) माम् (इन्द्रादि के रूप में मेरी) यज्ञैः (यज्ञ के द्वारा) इष्ट्वा (पूजा करके) स्वर्गतिम् (स्वर्ग के लिए) प्रार्थयन्ते (प्रार्थना करते हैं) ते (वे) पुण्यम् (पवित्र सुरेन्द्रलोकम् (इन्द्रलोक को) आसाद्य (प्राप्त होकर) दिवि (स्वर्ग में) दिव्यान् (उत्तम) देवभोगान् (देवभोग्यसुख) अनन्ति (भोगते हैं)॥२०॥
टीका—एवं त्रिविधोपासनावन्तोऽपि भक्ता एव मामेव परमेश्वरं जानन्तो मुच्यन्ते। ये कर्मिणस्ते न मुच्यन्ते एव इत्याह द्वाभ्यां—त्रैविद्या इति। ऋग्यजु:सामलक्षणास्तिस्रो विद्या अधीयन्ते जानन्ति वा त्रैविद्या वेदत्रयोक्तकर्मपरा इत्यर्थः। यज्ञैर्मामिष्ट्वा इन्द्रादयो ममैव रूपाणीत्यजानन्तोऽपि वस्तुत इन्द्रादिरूपेण मामेव इष्ट्वा यज्ञशेषं सोमं पिबन्तीति सोमपास्ते पुण्यं प्राप्य॥२०॥
भावानुवाद—श्रीभगवान् आगे बोले—अहंग्रहोपासक, प्रतीकोपासक, विश्वरूपोपासक यदि मेरे भक्त बनकर मुझे परमेश्वररूप में जान पायें तभी मुक्त होते हैं, किन्तु जो कर्मी हैं, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है। यही बात विद्या’ इत्यादि दो श्लोकों में बता रहे हैं। जो ऋक्, यजुः और सामवेद—इन तीनों विद्याओं का अध्ययन करते हैं या इन्हें जानते हैं, वे ‘विद्य’ हैं अर्थात् तीनों वेदों में कहे गये कर्मों के परायण रहते हैं। वे यज्ञ द्वारा मेरी ही पूजा करते हैं। इन्द्रादि देवता मेरे ही रूप हैं—यह न जानकर वे इन्द्रादि रूप में मेरी ही पूजा करके यज्ञ के अवशेष सोमरस का पान करते हैं। सोमरस पीनेवाले वे पुण्य लाभकर स्वर्गसुख का भोग करते हैं॥२०॥ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥२१॥
मर्मानुवाद—बाद में उस अत्यन्त सुखजनक स्वर्ग को भोगकर पुण्य समाप्त हो जाने पर वे पुनः मृत्युलोक में आगमन करते हैं। भोगों के इच्छुक वे व्यक्ति तीनों वेदों का अनुसरण करते हुए पुनः पुनः आवागमन करते रहते हैं॥२१॥
अन्वय—ते (वे) तम् (उन) विशालम् (विपुल) स्वर्गलोकम् (स्वर्ग लोक को) भुक्त्वा (भोगकर) पुण्ये क्षीणे (पुण्यों के समाप्त होने पर) मर्त्यलोकम् (मृत्युलोक में) विशन्ति (प्रवेश करते हैं) एवम् (इस प्रकार) त्रयीधर्मम् (तीनों वेदों में विहित धर्म) अनुप्रपन्नाः (के अनुष्ठान में) कामकामाः (भोगेच्छुक व्यक्ति) गतागतम् (संसार में गमनागमन) लभन्ते (करते रहते हैं)॥२१॥
टीका—गतागतम् पुनः पुनर्मृत्युजन्मनी॥२१॥
भावानुवाद—'गतागतम्’ का अर्थ है बार-बार जन्म मृत्यु॥२१॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२॥
मर्मानुवाद—तुम ऐसा नहीं सोचना कि सकाम कर्मी तो सभी सुख प्राप्त करते हैं, और मेरे भक्त कष्ट उठाते हैं। मेरे भक्त अनन्य रूप से मेरा ही चिन्तन करते हैं। वे अपने शरीरनिर्वाह के लिए भक्तियोग के अनुकूल सभी विषयों को स्वीकार करते हैं, वे नित्य मेरे भजन में लगे हुए रहते हैं। वे निष्काम भावना से सब कुछ मुझे ही अर्पण कर देते हैं। मैं ही उन्हें सारे पदार्थ प्रदान करता हूँ, उनकी रक्षा भी करता हूँ। इसका तात्पर्य यह है कि भक्तियोग विहित विषयों को स्वीकार करने से बाहरी दृष्टि से तो समस्त विषय भोगते देखा जाता है, जिस कारण सकामी प्रतीकोपासकों और मेरे निष्काम भक्तों में कोई भेद नहीं नजर आता। किन्तु मेरे भक्तों में कामना न होने पर भी मैं उनका योगक्षेम वहन करता हूँ अर्थात् जो नहीं है वह देता हूँ यह जो है उसकी रक्षा करता हूँ। मेरे भक्तों को विशेषलाभ यह होता है कि वे मेरी कृपा से समस्त विषयों को यथायोग्य भोग कर अन्त में नित्यानन्द की प्राप्ति करते हैं, जबकि प्रतीकोपासक इन्द्रिय सुख का भोग करते हुए अन्त में पुनः कर्मक्षेत्र इस संसार में आ उपस्थित होते हैं, उनका सुख नित्य नहीं हैं। समस्त विषयों के प्रति उदासीन होते हुए भी भक्तवत्सलतावश मैं भक्तों का उपकार कर आनन्द का अनुभव करता हूँ। इसमें मेरे भक्तों का कुछ भी अपराध नहीं है, क्योंकि वे तो मेरे से कुछ भी नहीं माँगते, मै स्वयं ही उनका अभाव पूरा करता हूँ॥२२॥
अन्वय—अनन्याः (अन्य कामना रहित) मां चिन्तयन्तः (मेरे चिन्तन में रत) ये जनाः (जो व्यक्ति) पर्युपासते (सर्वतोभाव से मेरी उपासना करते हैं) तेषाम् (उन्हीं) नित्याभियुक्तानाम् (नित्य संयोग की कामना करने वालों का) योगक्षेमम् (योग और क्षेम) अहम् (मैं) वहामि (वहन करता हूँ)॥२२॥
टीका—मदनन्यभक्तानांसुखन्तुनकर्मप्राप्यं किन्तु मद्दत्तमेव इत्याह—अनन्या इति। नित्यमेव सदैवाभियुक्तानां पण्डितानामिति तदन्ये नित्यमपण्डिता इति भावः; यद्वा नित्यसंयोगस्पृहावतां योगध्यानादिलाभः क्षेमं तत्पालनञ्च तैरनपेक्षितमप्यहमेव वहामि, अत्र करोमीत्यप्रयुज्य वहामीतिप्रयोगात् तेषां शरीरपोषणभारोमयैवोह्यते, यथास्व—कलत्रपुत्रादिपोषणभारो गृहस्थेनेति भावः। नचान्येषामिव तेषामपि योगक्षेमकर्मप्राप्यमेवेत्यत आत्मारामस्य सर्वत्रोदासीनस्य परमेश्वरस्य तव किं तद्वहनेनेति वाच्यम्—“भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रो पाधिनैरास्येनामुष्मिन् मनःकल्पनमेतदेव नैष्कर्म्यम्” इति श्रुतेर्मदनन्य—भक्तानां निष्कामत्वेन नैष्कर्म्यात् तेषु दृष्टं सुखं मद्दत्तमेव तत्र मम सर्वत्रोदासीनस्यापि स्वभक्तवात्सल्यमेव हेतुर्जेयः। न चैवं त्वयि स्वेष्टदेवे स्वनिर्वाहभारं ददानास्ते भक्ताः प्रेमशून्या इति वाच्यम्; तैर्मयि स्वभारस्य सर्वथैवानर्पणात् मयैव स्वेच्छया ग्रहणात्। न च सङ्कल्पमात्रेण विश्वसृष्ट्यादिकर्तुं ममायं भारो ज्ञेयः, यद्वा भक्तजनासक्तस्य मम स्वभोग्यकान्ताभारवहनमिव तदीय—योग—क्षेमवहनमति सुखप्रदमिति॥२२॥
भावानुवाद—मेरे उन भक्तों को प्राप्त होने वाला सुख कर्मों का फल नहीं है, अपितु मेरे द्वारा दिया हुआ होता है। ‘नित्याभियुक्तानां’ अर्थात् सर्वदा ही विशेषरूप से मेरे भजन में लगे हुए विद्वानों का, क्योंकि उनके अतिरिक्त अन्य सभी अविद्वान् हैं, नित्य मेरे मिलन की इच्छा रखने वालों को योग अर्थात् ध्यानादि की प्राप्ति मेरे द्वारा प्रदत्त होती है। ‘क्षेमम्’ अर्थात् उनके न चाहने पर भी मैं ही उनका पालन करता हूँ और उनका भार वहन करता हूँ।
यहाँ श्रीभगवान् ने ‘करोमि’ शब्द का प्रयोग न कर ‘वहामि’ शब्द का प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि उनके शरीर भरण-पोषण का भार मैं स्वयं ही वहन करता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे कि एक गृहस्थ अपने पुत्रादि के भरण-पोषण का भार वहन करता है, क्योंकि अन्य लोगों की भाँति उनका योगक्षेम कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाला नहीं है। यहाँ यदि प्रश्न हो कि सर्वत्र उदासीन, आत्माराम, परमेश्वर आपके लिए उनके भरण—पोषण के भार को वहन करने का क्या प्रयोजन है? इसका उत्तर है—गोपाल तापनी उपनिषद् (पूर्व विभाग—१५) में कहा गया है—‘भक्ति' का अर्थ है—भजन। ऐहिक और पारलौकिक उपाधियों का परित्याग कर केवल मुझमें ही जो मनोनिवेश है, उसे ‘नैष्कर्म्य’ कहते हैं।’ मेरे अनन्य भक्त निष्काम होते हैं, इसलिए उनमें जो सुख दृष्टिगोचर होता है, वह मेरे द्वारा ही प्रदत्त है। यह ठीक है कि मैं सर्वत्र उदासीन हूँ, पर यहाँ मेरे भक्तवात्सल्य को ही भक्तों को सुख प्रदान करने का कारण जानो। अपने इष्टदेव मुझ पर अपने पालन पोषण का भार डालने के कारण उन्हें प्रेमशून्य नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वे अपनी इच्छा से अपना भार मुझ पर नहीं डालते, मैं तो अपनी इच्छा से वह भार स्वीकार करता हूँ। सङ्कल्पमात्र से ही समस्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि करने वाले मेरे लिए यह भार कुछ भी नहीं है। अपितु भक्तों में आसक्त होने के कारण वह मेरे लिए उसी प्रकार अत्यन्त सुखप्रद है, जिस प्रकार लोगों को अपनी भोग्या पत्नी का भार वहन करनेमें सुख प्राप्त होता है॥२२॥
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३॥
मर्मानुवाद—वास्तव में सच्चिदानन्द स्वरूप में ही एक मात्र परमेश्वर हूँ: मेरे से स्वतन्त्र और कोई देवता नहीं है। मैं स्व—स्वरूप में सर्वदा ही प्रपञ्चातीत अप्राकृत सच्चिदानन्द तत्त्व हूँ। अनेक लोग सूर्य आदि देवताओं की उपासना करते हैं अर्थात् संसार में मेरी माया के द्वारा प्रतिभात मेरे वैभव रूपों को ही माया में फंसे जीव अन्य—अन्य देवताओं के रूप में पूजते हैं, किन्तु विचार करने से वे देवता लोग मेरी विभूतियां है, मेरे गुणावतार हैं उनके एवं मेरे स्वरूपतत्त्व से अवगत होकर जो मेरे गुणावतार उन देवताओं का भजन करते हैं उनका भजन वैध अर्थात् उन्नति का सोपान है। देवताओं को नित्य वस्तु मानकर उनकी उपासना करना, अविधि—पूर्वक भजन है। इससे उन्हें नित्यफल की प्राप्ति भी नहीं होती॥२३॥
अन्वय—कौन्तेय (हे कौन्तेय) अन्यदेवता भक्ता: ये अपि (जो भक्त अन्य देवताओं की) श्रद्धयान्विताः (श्रद्धापूर्वक) यजन्ते (पूजा करते हैं) तेऽपि (वे भी) अविधिपूर्वकम् (मुझे प्राप्त करवाने वाली विधि के विपरीत अविधि पूर्वक) माम् एव (मेरी ही) यजन्ति (पूजा करते हैं)॥२३॥
टीका—ननु च ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये इत्यनेन त्वया स्वस्यैवोपासना त्रिविधोक्ता, तत्र बहुधा विश्वतोमुखमिति तृतीयाया उपासनाया ज्ञापनार्थम् “अहं क्रतुरहं यज्ञः” इत्यादिना स्वस्य विश्वरूपत्वं दर्शितम्, अतः कर्मयोगेन कर्माङ्गभूतेन्द्रादियाजकास्तथा प्राधान्येनैव देवतान्तरभक्ता अपि त्वद्भक्ता एव। कथं तर्हि ते न मुच्यन्ते? यदुक्तं—“त्वया गतागतं कामकामा लभन्ते” इति, “अन्तवत्तु फलं तेषाम्” इति च तत्राह—येऽपीति। सत्यं मामेव यजन्तीति किन्त्वविधिपूर्वकं मत्प्रापकं विधिं विनैव यजन्त्यतः पुनरावर्त्तन्ते॥२३॥
भावानुवाद—प्रभो! आपने (गीता ९/१५) अपनी उपासना को तीन प्रकार का बताया, इसमें भी ‘बहुधा विश्वतोमुखम्’—वाक्य से तृतीय उपासना के सम्बन्ध में समझाने के लिए आपने ‘मैं क्रतु, मैं यज्ञ’ इत्यादि वाक्यों से अपने विश्वरूपत्व को प्रदर्शित किया। यदि कर्मयोग में कर्म के अङ्गीभूत इन्द्रादि देवताओं के उपासक एवं प्रधानभाव से अन्य देवताओं के भक्त भी आपके ही भक्त है, तब फिर वे लोग मुक्त क्यों नहीं होते? आपने और भी तो कहा है—‘वे सकामी व्यक्ति जन्ममृत्यु के चक्र में फँसे रहते है और उनको प्राप्त होने वाले फल अनित्य हैं।’ इसका क्या कारण है? श्रीभगवान् ने कहा—यह सत्य है कि वे मेरी ही आराधना करते हैं, किन्तु वे यह अविधिपूर्वक करते हैं अर्थात् मुझे प्राप्त करवाने वाली विधि का पालन किए बिना मेरी आराधना करते हैं, इसलिए वे बार-बार संसार में आना जाना करते हैं॥२३॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४॥
मर्मानुवाद—मैं ही समस्त यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। जो लोग अन्य देवताओं को मुझ से स्वतन्त्र समझ कर उनकी उपासना करते हैं, उन्हीं को ‘प्रतीकोपासक’ कहा जाता है। वे मेरे तत्त्व से अवगत नहीं है। इसलिए अतात्त्विक उपसना करने के कारण वे तत्त्व से च्युत हो जाते हैं। सूर्यादि देवताओं को मेरी विभूति के रूप में उपासना करने से अन्त में फिर भी मंगल हो सकता है॥२४॥
अन्वय—हि (क्योंकि) अहम् (मैं ही) सर्वयज्ञानाम् (सब प्रकार के यज्ञों का) भोक्ता (भोक्ता) प्रभु:च (एवं फलदाता हूँ) तु (किन्तु) ते (वे) माम् (मुझे) तत्त्वेन (यथार्थरूप से) न अभिजानन्ति (नहीं जानते) अत: (इसलिए) च्यवन्ति (बार-बार संसार में पतित होते हैं)
टीका—अविधिपूर्वकत्वमेवाह—अहमिति। देवतान्तर—रूपेणाहमेव भोक्ता प्रभुः स्वामी फलदाता चाहमेवेति। मान्तु तत्त्वेन न जानन्ति—यथा सूर्यस्याहमुपासकः सूर्य एव मयि प्रसीदतु, सूर्य एव मदभीष्टं फलं ददातु—सूर्य एव परमेश्वर इति तेषां बुद्धिर्न तु परमेश्वरो नारायण एव सूर्यः, स एव तादृशश्रद्धोत्पादकः, स एव मह्यं सूर्योपासनाफलप्रद इति बुद्धिरतस्तत्त्वतो मदभिज्ञानाभावात्ते च्यवन्ते भगवान्नारायण एव सूर्यादिरूपेणाराध्यते इति भावनया विश्वतोमुखं मामुपासीनास्तु मुच्यन्त एव। तस्मान्मद्विभूतिषु सूर्यादिषु पूजा मद्विभूतिज्ञानपूर्विकैव कर्त्तव्या, न त्वन्यथेति द्योतितम्॥२४॥
भावानुवाद—अविधिपूर्वक किसे कहते हैं—इसके उत्तर में कह रहे हैं कि अन्य देवताओं के रूप में मैं ही भोक्ता, प्रभु तथा स्वामी हूँ एवं फलदाता भी मैं ही हूँ, किंतु प्रतीकोपासकगण यथार्थ रूप से यह नहीं जानते हैं। जैसे कि—वे सोचते हैं कि मैं सूर्य का उपासक हूँ, सूर्य ही मेरे ऊपर प्रसन्न होवें, सूर्य ही मुझे अभीष्ट फल प्रदान करें, सूर्य ही परमेश्वर हैं। उनकी बुद्धि में यह बात नहीं आती है कि परमेश्वर नारायण ही सूर्य हैं। वे नारायण ही ऐसी श्रद्धा उत्पन्न करने वाले हैं। वे ही मुझे सूर्य—उपासना का फल देने वाले हैं, इसलिए इस रहस्य को न जानने के कारण वे च्युत हो जाते हैं, किन्तु जो ऐसा सोचते हैं कि भगवान् नारायण ही सूर्यादि के रूप में आराधित होते हैं, ऐसी भावना के साथ विश्वतोमुख मेरी आराधना करते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। इसलिए सूर्यादि देवताओं को मेरी विभूतियाँ समझकर ही उनकी पूजा करनी चाहिए ॥२४॥
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥२५॥
मर्मानुवाद—अन्य—अन्य देवताओं को ‘ईश्वर’ समझकर जो उनकी उपासना करते हैं, वे अनित्य वस्तु या वस्तुधर्म का आश्रय लेकर अपने उपास्य देवता की अनित्यता को प्राप्त करते हैं। जो पितृलोक के उपासक हैं, वे अनित्य पितृलोक को प्राप्त करते हैं, जो भूतों के उपासक हैं वे अनित्य भूतलोकों को प्राप्त करते हैं और जो नित्य चित्तत्त्व स्वरूप मेरी ही उपासना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त करते हैं। इसलिए मैं फल देने के सम्बन्ध में पक्षपात नहीं करता। मेरा अटल नियम ही निरपेक्ष रूप से जीवों को कर्मफल प्रदान करता है॥२५॥
अन्वय—देवव्रताः (देवताओं की पूजा करने वाले) देवान् (देवताओं को) यान्ति (प्राप्त होते हैं) पितृव्रताः (पितरों को पूजने वाले) पितॄन् (पितरों को) यान्ति (प्राप्त होते हैं) भूतेज्याः (जो भूतों की उपासना करते हैं) भूतानि (भूतों को) यान्ति (प्राप्त होते हैं) मद्याजिनः (एवं मेरी पूजा करने वाले) माम् (मुझे) यान्ति (प्राप्त होते हैं)॥२५॥
टीका—ननु च तत्तद्देवतापूजापद्धतौ यो यो विधिरुक्तस्तेनैव विधिना सा सा देवता पूज्यत एव। यथा विष्णुपूजापद्धतौ य एव विधिस्तेनैव वैष्णवा विष्णुं पूजयन्त्यतो देवतान्तरभक्तानां को दोषः इति चेत्? सत्यं तर्हि तां तां देवतां तद्भक्ताः प्राप्नुवन्त्येव इत्ययं न्याय एव इत्याह—यान्तीति। तेन तत्तद्देवतानामपि नश्वरत्वात् तत्तद्देवताभक्ताः कथमनश्वरा भवन्तु। “अहन्त्वनश्वरो नित्यो मद्भक्ता अप्यनश्वराः” इति ते नित्या एवेति द्योतितम्—“भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः” इति, “एको नारायण एवासीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः” इति, “परार्द्धान्ते सोऽबुध्यत गोपरूपो मे पुरस्तादाविर्बभूव” इति, “न च्यवन्ते च मद्भक्ता महत्यां प्रलयादपि” इत्यादि—श्रुतिभ्यः॥२५॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा हे कृष्ण! यदि जिस देवता के पूजन की जो विधि बतायी गई है उसी विधि से यदि उसका पूजन होता है? और जिस प्रकार विष्णु—पूजा की विधि है, उस विधि से वैष्णव विष्णुपूजा करते हैं, तो इसमें अन्य—अन्य देवभक्तों का दोष ही क्या है? इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं—सत्य है, इसीलिए वे देवभक्त उन देवताओंको ही प्राप्त करते हैं—यही न्याय भी है। जब वे देवता ही नश्वर हैं, तो भला उनके भक्त किस प्रकार अनश्वर होंगे? किन्तु मैं अनश्वर और नित्य हूँ इसलिए मेरे भक्त भी अनश्वर और नित्य हैं। श्रीमद्भागवत द्वारा भी यह प्रमाणित होता है—‘भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः’ अर्थात् अनन्त नामों से कहे जाने वाले एकमात्र आप ही अन्त में वर्तमान रहते हैं और भी वाक्य हैं जैसे—‘पहले एक नारायण ही थे, ब्रह्मा भी नहीं थे और शिव भी नहीं थे’ और ‘परार्द्ध के अंत में उन्होंने समझा कि मेरा गोपरूप से उनके सम्मुख आविर्भाव हुआ है एवं ‘मेरे भक्त महाप्रलय के पश्चात् भी वापस नहीं लौटते हैं’ इत्यादि इन श्रुति वाक्यों से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा—शिवादि और कोई भी देवता अनश्वर नहीं है॥२५॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६॥
मर्मानुवाद—मेरी भक्ति के प्रभाव से विशुद्धचित्त भक्त जब मुझे भक्तिपूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी प्रदान करते हैं, वह मैं अत्यन्त स्नेहपूर्वक स्वीकार करता हूँ। जबकि अन्य देवताओं के उपासक बहुत श्रमपूर्वक बहुत से उपकरणों के द्वारा मेरी तात्कालिक श्रद्धा के साथ जो पूजा करते हैं, मैं उसे ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे केवल स्वार्थवश ही मेरी पूजा करते हैं॥२६॥
अन्वय—यः (जो) भक्त्या (भक्ति के साथ) मे (मुझे) पत्रम् (पत्र) पुष्पम् (पुष्प) फलम् (फल) तोयम् (और जल) प्रयच्छति (प्रदान करते हैं) अहम् (मैं) प्रयतात्मनः (मेरी भक्ति के प्रभाव से विशुद्धचित्त उन व्यक्तियों द्वारा) भक्त्युपहृतम् (भक्ति से प्रदत्त) तत् (वह पत्रादि) अश्नामि (खाता हूँ)॥२६॥
टीका—वरंदेवतान्तरभक्तावायासाधिक्यं, न तुमद्भक्तावित्याह—पत्रमिति। अत्र भक्तयेति करणं,—तृतीयायां भक्त्युपहतमिति पौनरुक्तं स्यात्, अत: सहार्थे तृतीया, भक्तया सहिता, मद्भक्ता इत्यर्थः। तेन मद्भक्तभिन्नो जनस्तात्कालिक्या भक्तया यत् प्रयच्छति, तत् तेनोपहृतमपि पत्रपुष्पादिकं नैवाश्नामीति द्योतितम्। ततश्च मद्भक्त एव पत्रादिकं यद्ददाति, तत् तस्याहमश्नामि यथोचितमुपयुजे। कीदृशम्? भक्तया उपहृतं न तु कस्यचिदनुरोधादिना दत्तमित्यर्थः। किञ्च मद्भक्तस्याप्यपवित्रशरीरत्वे सति नाश्नामीत्याह—प्रयतात्मनः शुद्धशरीरस्येति रजस्वलादयो, व्यावृत्ताः, यद्वा प्रयतात्मनः शुद्धान्त:करणस्य, मद्भक्तं विना नान्यः शुद्धान्त:करण इति। “धौतात्मा पुरुषः कृष्णपादमूलं न मुञ्चति” इति परीक्षिदुक्तेर्मत्—पादसेवात्यागासामर्थ्यमेव शुद्धचित्तत्वचिह्नम्, अतः क्वचित् कामक्रोधादिसत्वेऽपि उत्खातदंष्ट्रोरगदंशवत्तस्याकिञ्चित्करत्वं ज्ञेयम्॥२५॥
भावानुवाद—भगवान् कह रहे हैं कि मेरी भक्ति की श्रेष्ठता यह है कि अन्य देवताओं की भक्ति में क्लेश अधिक है जबकि मेरी भक्ति में कोई क्लेश नहीं उठाना पड़ता, वह अनायास ही हो जाती है, यह भक्ति के कारण ही होता है। इस श्लोक के तृतीय पाद में भक्त्युपहृतम् एवं द्वितीय पाद में ‘भक्त्या’ दो बार भक्ति शब्द के प्रयोग होने से पुनरुक्ति हो रही है, इसलिए ‘भक्त्या’ भक्ति के साथ तृतीया विभक्ति अर्थात् भक्ति से युक्त मेरे भक्त—यह अर्थ ही संगत है। यदि कोई भक्तिरहित व्यक्ति तात्कालिक भक्ति के साथ कुछ प्रदान करता है, तो उसके द्वारा प्रदत्त पत्र—पुष्पादि को मैं नहीं ग्रहण करता हूँ। किंतु मेरे भक्त भक्तिभाव से पत्रादि जो कुछ भी देते हैं, उन द्रव्यों को मैं ‘अश्नामि’ अर्थात् यथा उचित उपभोग करता हूँ। परन्तु किसी के अनुरोध से दी हुई वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता। यदि मेरे भक्त का भी शरीर अपवित्र हो, तब भी अस्वीकार कर देता हूँ, इसलिए कहते हैं—‘प्रयतात्मनः’ अर्थात् जिसका शरीर शुद्ध है उसका ग्रहण करता हूँ। इस कथन से रजस्वलादि सब अशुद्धियों का निषेध किया गया है या ‘प्रयतात्मनः’ का तात्पर्य है—जिनका अंत:करण सर्वथा शुद्ध है। भगवान् के भक्तों को छोड़कर और किसी का अन्तःकरण शुद्ध नहीं होता। परीक्षित् महाराज ने कहा है—‘पवित्र
आत्मावाले पुरुष श्रीकृष्ण—पादपद्म का त्याग नहीं करते हैं।’ ‘शुद्धचित्त’ होने का लक्षण यही है कि मेरी चरणसेवा का त्याग करने में वे असमर्थ होते हैं, अतएव यदि कभी किसी के चित्तमें काम-क्रोधादि देखा भी जाता है, तो उनका वह क्रोध विषदन्तहीन सर्प के डंसने के समान कुछ भी अनर्थ करने वाला नहीं होता, ऐसा समझना चाहिए॥२६॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥२७॥
मर्मानुवाद—भक्ति के अधिकारियों की चार श्रेणियां हैं, आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। भक्तिपद पर आरूढ़ होने से पहले उनका साधन तीन प्रकार का है—अंहग्रहोपासना, प्रतीकोपासना और विश्वरूपोपासना। भक्तिपद पर आरूढ़ होते समय मानव का संसार के सम्बन्ध में व्यवहार चार प्रकार का है—सकाम कर्मयोग, निष्काम—कर्मयोग, ज्ञानयोग या अष्टांगयोग। ये सब बता कर मैंने विशुद्ध भक्ति के स्वरूप की व्याख्या की है। हे अर्जुन! अब तुम अपना अधिकार निश्चित कर लो, तुम धर्मवीर के रूप में मेरे साथ अवतीर्ण होकर मेरी लीला पुष्ट करने में लगे हुए हो, इसलिए शान्त भक्तों या सकाम भक्तों में तुम्हारी गणना नहीं हो सकती, इसलिए निष्काम कर्म ज्ञान—मिश्रा भक्ति ही तुम्हारे द्वारा अनुष्ठित होगी। इस कारण तुम्हारा कर्तव्य यह है कि तुम जो करो, जो खाओ, जो हवन करो जो तपस्या करो वह सभी मुझे अर्पण करो। कर्मजड़ लोग व्यावहारिक मतानुसार किसी अन्य संकल्प के साथ कर्म करने के बाद अन्त में मुझे अर्पण करते हैं, वह कुछ भी नहीं हैं। पहले ही मुझे अर्पण करते हुए भक्ति का अनुष्ठान करो॥२७॥
अन्वय—कौन्तेय! (हे कुन्तीपुत्र!) यत् (लौकिक वैदिक जो भी कर्म तुम) करोषि (करते हो) यत् (जो) अश्नासि (खाते हो) यत् (जो) जुहोषि (होम करते हो) यत् (जो) ददासि (दान करते हो) यत् (जो) तपस्यसि (व्रतादि करते हो) तत् (वह) मदर्पणम् (जिस प्रकार मेरे अर्पित हो उसी प्रकार) कुरु (करो)॥२७॥
टीका—ननु च “आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी” इत्यारभ्य एतावतीषु त्वदुक्तासु भक्तिषु मध्ये खल्वहं कां भक्तिं करवै इत्यपेक्षायां भो अर्जुन! साम्प्रतं तावत्तव कर्मज्ञानादीनां त्यक्तुमशक्यत्वात् सर्वोत्कृष्टायां केवलायामनन्यभक्तौ नाधिकारो नापि निकृष्टायां सकामभक्तौ तस्मात्त्वं निष्कामां कर्मज्ञानमिश्रां प्रधानीभूतामेव भक्तिं कुर्वित्याह—यत् करोषीति द्वाभ्याम्। लौकिकं वैदिकं वा यत् कर्म त्वं करोषि यदश्नासि व्यवहारतो भोजनपानादिकं यत् करोषि, यत्तपस्यसि तपः करोषि तत् सर्वं मय्येवार्पणं यस्य तद् यथा स्यात्, तथा कुरु। न चायं निष्कामकर्मयोग एव न तु भक्तियोग इति वाच्यम्। निष्कामकर्मिभिः शास्त्रविहितं कर्मैव भगवत्यर्प्यते, न तु व्यावहारिकं किमपि कृतम्, तथैव सर्वत्र दृष्टेः। भक्तैस्तु स्वात्मनः प्राणेन्द्रियव्यापारमात्रमेव स्वेष्टदेवे भगवत्यर्प्यते। यदुक्तं भक्तिप्रकरण एव—” कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात्। करोति यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥” इति। ननु च जुहोषीति हवनमिदमर्चनभक्त्यङ्गभूतं विष्णूद्देश्यकमेव, तपस्यतीति तपोऽप्येतदेकादश्यादिव्रतरूपमेव अत इयमनन्यैव भक्तिः किमिति नोच्यते? सत्यम् अनन्या भक्तिर्हि कृत्वापि न भगवत्यर्प्यते किन्तु भगवत्यर्पितैव क्रियते, यदुक्तं श्रीप्रह्लादेन—“ श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणम्” इत्यत्र “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा क्रियते” इत्यस्य व्याख्या च श्रीस्वामिचरणानां—“भगवति विष्णौ भक्तिः क्रियते सा चार्पितैव सती यदि क्रियते, न तु कृता सती पश्चादर्प्यत इत्यतः पद्यमिदं न केवलायां पर्यवसेदिति॥२७॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा प्रभो! आर्त्त (दुःखी), जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी से आरम्भकर अभी तक कही गई नाना प्रकार की भक्तियों में से मैं किस भक्ति का अनुसरण करूँ? इस पर भगवान् कहते हैं—हे अर्जुन! अभी तुम कर्म—ज्ञानादिका परित्याग करने में असमर्थ हो, इसलिए सर्वोत्कृष्टा या केवला या अनन्या भक्तिमें तुम्हारा अधिकार नहीं है और न ही निकृष्टा सकाम भक्तिमें भी तुम्हारा अधिकार है, इसलिए तुम निष्काम कर्म-ज्ञानमिश्रा प्रधानीभूता भक्तिको अपनाओ। यही बात दो श्लोकों में कहते हैं। तुम लौकिक अथवा वैदिक जो कुछ कर्म करो, व्यवहारवश जो कुछ भोजन पान, और जो भी तप करो—वे सभी मुझे अर्पण करो, किंतु याद रहे कि यह न तो निष्काम कर्मयोग ही है, न ही इसे भक्तियोग कहा जा सकता है। निष्काम कर्मपरायण व्यक्तिगण शास्त्रविहित कर्मों को ही भगवान् को अर्पित करते हैं, न की व्यावहारिक कर्मों को। किन्तु भक्त अपनी आत्मा, मन, प्राण एवं समस्त इन्द्रियों के कार्यमात्र को अपने इष्टदेव भगवान् को अर्पित करते हैं। जैसे कि भक्तिप्रकरण मे कहा गया है—शरीर, वाक्य, मन, इन्द्रियों एवं बुद्धि द्वारा या स्वभाववश भक्त जो कुछ करें, उन सबको परात्पर श्रीनारायण को समर्पण करें।
यदि प्रश्न हो कि ‘जुहोषि’ अर्थात् हवन क्रिया अर्चन भक्ति के अङ्गीभूत विष्णु को उद्देश्य करने वाली है तथा ‘तपस्यसि’ अर्थात् यह तप भी एकादशी व्रत के समान है, तो इन्हें भी अनन्या भक्ति क्यों नहीं कहा जाता है? तो इसके उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं—यह ठीक है, किन्तु अनन्या भक्ति में अनुष्ठित होने के बाद कर्म भगवान् को अर्पित नहीं होता, बल्कि भगवान् को अर्पित होनेके बाद किया जाता है। जैसा कि श्रीप्रह्लाद महाराजने भी कहा है विष्णु के चरणों में समर्पित होकर यदि श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि नवधा भक्ति की जाय तो उसको मैं उत्तम मानता हूँ। यहाँ यह स्पष्ट देखा जाता है कि विष्णु को अर्पित करते हुए ही उनकी भक्ति की जाती है, न कि करने के बाद अर्पित होती है।
श्रीधरस्वामिपाद इसकी व्याख्या में कहते हैं—विष्णु की भक्ति का अनुष्ठान विष्णु में अर्पित करते हुए किया जाता है, न कि अनुष्ठान करने के बाद उसे अर्पित किया जाता है, इसलिए यह श्लोक केवला भक्ति में पर्यवसित नहीं होता है॥२७॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८॥
मर्मानुवाद—ऐसा होने से युद्धादि करने का जो भी शुभ-अशुभ फल होगा, उसके बन्धन से कर्मफल त्यागरूप संन्यासयोग द्वारा मुक्ति प्राप्त करते हुए तुम मेरे स्वरूपगत तत्त्व को प्राप्त करोगे॥२८॥
अन्वय—एवम् (इस प्रकार) शुभाशुभफलैः (शुभाशुभ फल रूपी) कर्मबन्धनैः (कर्मबन्धन से) मोक्ष्यसे (मुक्त हो जाओगे) संन्यासयोगयुक्तात्मा (कर्मफल त्यागरूप योगयुक्त होकर) विमुक्तः (मुक्त व्यक्तियों में विशिष्ट होकर) माम् उपैष्यसि (मेरे पास आओगे)॥२८॥
टीका—शुभाशुभफलैरनन्तैः कर्मरूपैर्बन्धनैर्विमोक्ष्यसे। “भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधिनैरास्येनामुष्मिन्मनः कल्पनमेतदेव नैष्कर्म्यम्” इति श्रुतेः। संन्यासः कर्मफलत्यागः, स एव योग: तेन युक्त आत्मा मनो यस्य सः। न केवलं युक्त एव भविष्यसि, अपि तु विमुक्तो मुक्तेष्वपि विशिष्टः सन् मामुपैष्यसि साक्षात् परिचरितुं मन्निकटमेष्यसि—” मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥” इति स्मृतेः। “मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्मन भक्तियोगम्” इतिशुकोक्तेः, मुक्तेः सकाशादपि साक्षान्मत्प्रेमसेवया उत्कर्षोऽयमेवेति भावः॥२८॥
भावानुवाद—भगवान् ने कहा कि इस प्रकार तुम अनन्त शुभ और अशुभ फल वाले कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाओगे। श्रीगोपालतापनी उपनिषद् में कहा गया है—श्रीकृष्ण का भजन ही भक्ति है, लौकिक और पारलौकिक उपाधि अर्थात् फलकामनासे रहित होकर केवल उनमें मन का लग जाना ही नैष्कर्म्य है। कर्मफल का त्याग ही संन्यास है। यही योग है। जो ऐसे योग से युक्त हैं वे युक्तात्मा हैं। इस प्रकार योग से तुम केवल मुक्त नहीं, अपितु विमुक्त हो जाओगे अर्थात् मुक्तों में विशिष्ट होकर साक्षात् मेरी परिचर्या के लिए मेरे पास आओगे। श्रीमद्भागवत में वर्णित है—‘हे महामुने! इस प्रकार करोड़ों मुक्त और सिद्धों में भी नारायण-परायण प्रशान्तात्मा भक्त अत्यन्त दुर्लभ है।’ और (भा ५/५/१८) भी कहा गया है ‘वह मुक्ति तो प्रदान करते हैं, किन्तु भक्ति नहीं देते हैं।’ श्रीशुकदेव गोस्वामी की इस उक्ति से यह पता चलता है कि मुक्ति की अपेक्षा भी मेरी साक्षात् प्रेमसेवा का उत्कर्ष है ॥२८॥
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥२९॥
मर्मानुवाद—मेरा रहस्य यही है कि मैं सभी प्राणियों के साथ समान व्यवहार करता हूँ। न तो मेरा कोई प्रिय है और न कोई अप्रिय। यही मेरी साधारण विधि है, किन्तु मेरी विशेष विधि यह है कि जो मेरा भक्तिपूर्वक भजन करते हैं वे मुझ में आसक्त और मैं उनमें आसक्त हो जाता हूँ॥२९॥
अन्वय—अहम् (मैं) सर्वभूतेषु (सब प्राणियों में) समः (समान हूँ) मे (मेरा) द्वेष्यः (अप्रिय) न अस्ति (नहीं है) प्रियः न (और प्रिय भी नहीं है) ये तु (किन्तु जो) माम् (मेरा) भक्त्या (भक्ति पूर्वक) भजन्ति (भजन करते हैं) ते (वे) मयि (मुझ में जैसे आसक्त होते हैं) अहम् अपि (मैं भी) तेषु च [तथा आसक्तः] [उनके प्रति वैसा ही आसक्त रहता हूँ]॥२९॥
टीका—ननु भक्तानेव विमुक्तीकृत्य स्वं प्रापयसि, न त्वभक्तानिति चेत्तर्हि तवापि किं रागद्वेषादिकृतं वैषम्यमस्ति? नेत्याह—समोऽहमिति। ते भक्ता मयि वर्त्तन्ते, अहमपि तेषु वर्त्ते इति व्याख्याने भगवत्येव सर्वं जगद्वर्त्तत एव, भगवानपि सर्वजगत्सु वर्त्तत एव इति नास्ति विशेष:, तस्मात् “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” इति न्यायेन, मयि ते आसक्ता भक्ता वर्त्तन्ते यथा तथाहमपि तेष्वासक्त इति व्याख्येयम्। अत्र कल्पवृक्षादि-दृष्टान्तस्त्वेकांशेनैव ज्ञेयः, हि कल्पवृक्षफलाकाङ्क्षया तदाश्रिता आसज्जन्ति नापि कल्पवृक्षः स्वाश्रितेष्वासक्तः, नापि स आश्रितस्य वैरिणो द्वेष्टि, भगवांस्तु स्वभक्तवैरिणं स्वहस्तेनैव हिनस्ति; यदुक्तं प्रह्लादाय – “यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम्” इति। केचित्तु तु-कारस्य भिन्नोपक्रमार्थत्वमाख्याय भक्तवात्सल्यलक्षणन्तु वैषम्यं मयि विद्यत एवेति, तच्च भगवतो भूषणं न तु दूषणमिति व्याचक्षते। तथा हि भगवतो भक्तवात्सल्यमेव प्रसिद्धं न तु ज्ञानि-वात्सल्यं योगिवात्सल्यं वा—यथा ह्यन्यो जनः स्व—दासेष्वेव वत्सलो, नान्यदासेषु तथैव भगवानपि स्वभक्तेष्वेव वत्सलो न रुद्रभक्तेषु, नापि देवीभक्तेष्विति॥२९॥
भावानुवाद—अर्जुन ने कहा हे कृष्ण! यदि आप अपने भक्तों को ही मुक्त करके अपने पास ले जाते हो, अभक्तों को नहीं, तब क्या आप में भी राग-द्वेषादिजनित विषमता है? इस पर श्रीभगवान् कहते हैं—नहीं! मैं सम हूँ, मेरे में विषमता नहीं है। वे भक्त मुझ में रहते हैं, और मैं उनमें रहता हूँ। इस व्याख्या के अनुसार भगवान् में ही सम्पूर्ण जगत् रहता है और भगवान् भी सम्पूर्ण जगत् में रहते हैं, इसमें कोई विशेषता नहीं हैं इसलिए ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ अर्थात् जो जिस भाव से मेरा भजन करते हैं, मेरी शरण ग्रहण करते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनको भजता हूँ। भावार्थ है कि भक्त जिस प्रकार मुझ में आसक्त रहते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनमें आसक्त होकर उनमें वर्तमान रहता हूँ। इस विषय में कल्पवृक्षादि के दृष्टान्त को आंशिक ही समझना चाहिए, क्योंकि जो फल की आकांक्षा से कल्पवृक्ष का आश्रय लेते हैं, वस्तुतः वे कल्पवृक्ष में नहीं, उसके फल में आसक्त होते हैं। कल्पवृक्ष भी अपने आश्रित के प्रति आसक्त नहीं होता और आश्रित से वैर रखने वाले से द्वेष नहीं होता है। जबकि भगवान् तो भक्तों के वैरी का अपने हाथों से हनन करते हैं। जैसा कि भगवान् ने प्रह्लाद के उद्देश्य से कहा है—जिस समय हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से द्रोह करेगा, उस समय ब्रह्माके वरदान से शक्तिशाली होनेपर भी निश्चय ही मैं उसका विनाश करूँगा। भक्त वात्सल्य लक्षण वाली विषमता तो मुझ में विद्यमान है ही, वह तो मेरा सर्वदा भूषणस्वरूप है, दोष नहीं। इसलिए भगवान् की भक्तवत्सलता प्रसिद्ध है। जिस प्रकार मनुष्य की अपने दास के प्रति वत्सलता होती है, दूसरे के दास के प्रति नहीं, उसी प्रकार भगवान् भी अपने भक्तों के प्रति वत्सल होते हैं, रुद्र या देवी भक्तों के प्रति नहीं॥२९॥
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३०॥
मर्मानुवाद—जो अनन्य चित्त से मेरा भजन करते हैं, सुदुराचारी होने पर भी उन्हें साधु समझना क्योंकि उनका व्यवसाय सर्वप्रकार से सुन्दर है। सुदुराचार शब्द का अर्थ अच्छी तरह समझना चाहिए। बद्ध जीव का आचरण दो प्रकार का है—‘साम्बन्धिक’ और ‘स्वरूपगत’। शरीर की रक्षा, समाज की रक्षा और मन की उन्नति सम्बन्धी जितने प्रकार के शौच, पुण्य, पुष्टि करने वाले और अभाव दूर करने वाले आचरण किये जाते हैं वे सारे ‘साम्बन्धिक’ हैं। शुद्ध जीव स्वरूप आत्मा का मेरे प्रति जो भजन आचरण है, वह जीव का स्वरूपगत है। इसी का दूसरा नाम ‘अमिश्रा’ या ‘केवला’ भक्ति है। बद्ध दशा में जीव की केवला भक्ति भी साम्बन्धिक-आचरण के साथ अनिवार्य सम्बन्ध रखती है। बद्ध जीव की अनन्य भजनरूपी भक्ति उदित होने पर भी देह रहने तक साम्बधिक आचरण अवश्य रहेगा। भक्ति के उदित होने पर जीव की अन्य कामों में रुचि नहीं रहेगी। जितनी मात्रा में कृष्ण में रुचि समृद्ध होती है, उतनी मात्रा में अन्य रुचियां क्षय होती रहती हैं। बिल्कुल समाप्त न होने तक कभी-कभी अन्य तरफ की रुचि अपना प्रभाव दिखाती हुयी कदाचार का अवलम्बन करती है, किन्तु अतिशीघ्र ही वह कृष्ण रुचि द्वारा दमित हो जाती है। भक्ति की उन्नति-सोपान पर आरूढ़ जीवों के कार्य सर्वांग सुन्दर हैं। उसमें यद्यपि घटनावश दुराचार यहां तक कि सुदुराचार (परहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमन, जिनमें भक्तों की सहज रुचि नहीं हो सकती) देखे जाते हैं, वह भी शीघ्र ही दूर हो जायेंगे। इनके द्वारा प्रबल प्रवृत्तिरूपा मेरी भक्ति दूषित नहीं होती, यही जानना। किसी-किसी परम भक्त द्वारा भूतकाल में किये गये मत्स्यादि भोजन एवं परस्त्री-संग आदि को देखते हुए भी उन्हें असाधु नहीं समझना॥३०॥
अन्वय—चेत् (यदि) सुदुराचारः अपि (अतिकुत्सित आचारी व्यक्ति भी) अनन्य भाक् (दूसरों का भजन त्याग एक मात्र) माम् (मेरा) भजते (भजन करते हैं) स: (वे) साधुः एव (साधु ही) मन्तव्य: (माने जाते हैं) हि (क्योंकि) स: (वे सुन्दर निश्चय वाले होते हैं)॥३०॥
टीका—स्वभक्तेष्वासक्तिर्मम स्वाभाविक्येव भवति सा दुराचारेऽपि भक्ते नापयाति तमप्युत्कृष्टमेव करोमीत्याह—अपि चेदिति। सुदुराचारः परहिंसा परदार-परद्रव्यादिग्रहण-परायणोऽपि मां भजते चेत्, कीदृग्भजनवानित्यत आह—अनन्यभाक् मत्तोऽन्यदेवतान्तरं मद्भक्तेरन्यत् कर्मज्ञानादिकं मत्कामनातोऽन्यां राज्यादिकामनां न भजते स साधुः। नन्वेतादृशे कदाचारे दृष्टे सति कथं साधुत्वम्? तत्राह—मन्तव्यो मननीयः साधुत्वेनैव स ज्ञेय इति यावत्; मन्तव्यमिति विधिवाक्यं अन्यथा प्रत्यवायः स्यात्; अत्र मदाज्ञैव प्रमाणमिति भावः। ननु त्वां भजत इत्येतदंशे न साधुः परदारादिग्रहणांशेनासाधुश्च स मन्तव्यस्तत्राह—एवेति। सर्वेणाप्यंशेन साधुरेव मन्तव्यः कदापि तस्यासाधुत्वं न द्रष्टव्यमिति भावः। सम्यग् व्यवसितः निश्चयो यस्य सः। दुस्त्यजेन स्वपापेन नरकं तिर्यग्योनिर्वा यामि ऐकान्तिकं श्रीकृष्णभजनन्तु नैव जिहासामीति स शोभनमध्यवसायं कृतवानित्यर्थः॥३०॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं अपने भक्तों के प्रति मेरी आसक्ति स्वाभाविक ही है। उसके दुराचारी होने पर भी वह आसक्ति दूर नहीं होती है एवं मैं उसे भी श्रेष्ठ ही कर देता हूँ। सुदुराचारी अर्थात् परहिंसा-परस्त्री परद्रव्यादि के परायण होकर भी यदि मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही है। वह किस प्रकार भजन करने वाला होना चाहिए? इस के उत्तरमें कहते है—‘अनन्यभाक्’ अर्थात् जो मुझे छोड़ और किसी देवता का भजन नहीं करता, मेरी भक्ति को छोड़कर ज्ञान कर्मादि का अनुष्ठान नहीं करता है, मेरी प्राप्ति की कामना के अतिरिक्त राज्य-सुखादि की कोई कामना नहीं करता तो वह व्यक्ति साधु है। यहां यदि प्रश्न हो कि इस प्रकार कदाचार के होने पर उसका साधुत्व ही कहाँ रहा? इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं ‘मन्तव्यः’ अर्थात् उसे साधु ही मानना होगा। ‘मन्तव्य’ इस शब्द से विधि (नियम) सूचित होती है, अतः यदि ऐसा न माना जाय तो उससे दोष होगा। इस विषय में मेरा आदेश ही प्रमाण है। यदि कहा जाय कि वह व्यक्ति आपका भजन करता है और दुराचारी भी है, अत: उसे अंशतः असाधु मानना चाहिए। परस्त्रीसंगी है इसलिए असाधु मानना चाहिए तो इसके उत्तर में कहते हैं—‘एव’ अर्थात् पूर्ण अंश में उसे साधु मानना होगा। कभी भी उसका असाधुत्व नहीं देखना, क्योंकि वह ‘सम्यग्व्यवसितः’ अर्थात् दृढ़ निश्चयवान् है। उसका निश्चय ऐसा होता है—अपने पापों से भले ही नरक अथवा पशु-पक्षी योनियों में चला जाऊँ, किन्तु ऐकान्तिक कृष्ण-भक्तिका कभी भी परित्याग नही करूँगा॥३०॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१॥
मर्मानुवाद—हे कौन्तेय! मेरी यह प्रतिज्ञा है कि मेरी अनन्य भक्ति के पथ पर आरूढ़ जीव कभी भी पतित नहीं होगा। प्राथमिक अवस्था में 'निसर्ग’ और ‘घटना’ वश उसमें अधर्म आचरणादि दिखने पर भी वे शीघ्र ही परम औषधिरूपा हरिभक्ति द्वारा दूर हो जायेंगे। वह जीव के नित्यधर्मरूप स्वरूपगत आचारनिष्ठ होकर पाप-पुण्य बन्धन से मुक्त होकर भक्तिजनित परम शान्ति प्राप्त कर लेगा॥३१॥
अन्वय—क्षिप्रम् (वह व्यक्ति शीघ्र) धर्मात्मा (सदाचारनिष्ठ चित्तवाला) भवति (हो जाता है) शाश्वत (हमेशा) शान्तिम् (काम क्रोधादि शान्ति को) निगच्छति (प्राप्त हो जाता है) कौन्तेय (हे कुन्ती पुत्र) मे भक्तः (मेरे भक्त का) न प्रणश्यति (नाश नहीं होता) प्रतिजानीहि (यह प्रतिज्ञा करो)॥३१॥
टीका—ननु तादृशस्याधर्मिणः कथं भजनं त्वं गृह्णासि कामक्रोधादिदूषितान्त:करणेन निवेदितमन्नपानादिकं कथमश्नासीत्यत आह—क्षिप्रं शीघ्रमेव स धर्मात्मा भवति। अत्र क्षिप्रं भावी स धर्मात्मा शश्वच्छान्ति गमिष्यति इति अप्रयुज्य ‘भवति’ ‘गच्छति’ इति वर्त्तमानप्रयोगात् अधर्मकरणानन्तरमेव मामनुस्मृत्य कृतानुतापः क्षिप्रमेव धर्मात्मा भवति। हन्त हन्त! मत्तुल्यः कोऽपि भक्तलोकं कलङ्कयन्नधमो नास्ति, तद्धिङ्मामिति शश्वत् पुनः पुनरपि शान्ति निर्वेदं नितरां गच्छति, यद्वा, कियतः समयादनन्तरं तस्य भावि धर्मात्मत्वं तदानीमपि सूक्ष्मरूपेण वर्त्तत एव। तन्मनसि भक्तेः प्रवेशात् यथा पीते महौषधे सति तदानीं कियत्कालपर्यन्तं नश्यदवस्थो ज्वरदाहो वा विषदाहो वर्त्तमानोऽपि न गण्यत इति ध्वनिः। ततश्च तस्य भक्तस्य दुराचारत्वगमकाः कामक्रोधाद्या उत्खातदंष्ट्रोरगदंशवदकिञ्चित्करा एव ज्ञेया इत्यनुध्वनिः। अत एव शश्वत् सर्वदैव शान्ति कामक्रोधाद्ययुपशमं नितरां गच्छति अतिशयेन प्राप्नोतीति दुराचारत्वदशायामपि स शुद्धान्त:करण एवोच्यत इति भावः। ननु यदि स धर्मात्मा स्यात्तदा नास्ति कोऽपि विवाद:, किन्तु कश्चिद्दुराचारभक्तो जन्मपर्यन्तमपि दुराचारत्वं न जहाति तस्य का वार्त्तेत्यतो भक्तवत्सलो भगवान् सप्रौढ़ि सकोपमिवाह—कौन्तेयेति। मे भक्तो न प्रणश्यति, तदपि प्राणनाशे अध:पातं न याति। कुतर्ककर्कशवादिनो नैतन्मन्येरन्निति शोकशङ्काव्याकुलमर्जुनं प्रोत्साहयति—हे कौन्तेय, पटहकाहलादि—महाघोषपूर्वकं विवदमानानां सभां गत्वा बाहुमुत्क्षिप्य निःशङ्कं प्रतिजानीहि प्रतिज्ञां कुरु। कथम्? मे मम परमेश्वरस्य भक्तो दुराचारोऽपि न प्रणश्यत्यपि तु कृतार्थ एव भवति ततश्च ते तत्प्रौढिविजृम्भिविध्वंसितकुतर्का: सन्तो नि:संशयं त्वामेव गुरुत्वेनाश्रयेरन् इति स्वामिचरणाः। ननु कथं भगवान् स्वयमप्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातुमर्जुनमेवादिदेश यथैवाग्रे “मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि में” इति वक्ष्यते तथैवात्रापि “कौन्तेय! प्रतिजानेऽहं न मे भक्तः प्रणश्यति” इति कथं नोक्तम्? भगवता तदानीमेव विचारितं भक्तवत्सलेन मया स्वभक्तापकर्षलेशमप्यसहिष्णुना स्वप्रतिज्ञां खण्डयित्वापि स्वापकर्षमङ्गीकृत्यापि भक्तप्रतिज्ञैव रक्षिता बहुत्र; यथा तत्रैव भीष्मयुद्धे स्वप्रतिज्ञामप्यपाकृत्य भीष्मप्रतिज्ञैव रक्षिष्यते। बहिर्मुखा वादिनो वैतण्डिका मत्प्रतिज्ञां श्रुत्वा हसिष्यन्ति, अर्जुनप्रतिज्ञा तु पाषाणरेखेवेति ते प्रतियन्ति। अतोऽर्जुनमेव प्रतिज्ञां कारयामीत्यत्रैतादृशदुराचारस्याप्यनन्य। भक्ति श्रवणादनन्य भक्ताभिधायक-वाक्येषु सर्वत्र विद्यतेऽन्यत्स्त्रीपुत्राद्यासक्ति—विधर्मशोकमोहकामक्रोधादिकं यत्रेति कुपण्डितव्याख्या न ग्राह्येति॥३१॥
भावानुवाद—अर्जुन ने पूछा—हे कृष्ण! ऐसे अधार्मिक व्यक्ति का भजन आप कैसे ग्रहण करते हैं, काम—क्रोधादि द्वारा दूषित अन्तःकरणवाले व्यक्ति द्वारा निवेदित अन्न—पानादि को किस प्रकार भक्षण करते हैं, तो इसके उत्तरमें श्रीभगवान् कहते हैं—वे शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाते हैं। और शाश्वत शान्ति प्राप्त करते हैं। यहाँ ‘शीघ्र धर्मात्मा हो जायेगा’ तथा ‘नित्यशान्ति को प्राप्त करेगा’ जैसे भविष्यत् काल के पद का प्रयोग न कर ‘भवति', ‘गच्छति’ इत्यादि वर्तमान काल का पद प्रयुक्त हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है कि अधर्म आचरण के पश्चात् ही अनुताप करते हुए पुनः पुनः मेरा स्मरण करते हुए शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाते हैं। “हाय! हाय! भक्ति के नाम को कलङ्कित करने वाला मेरे जैसा कोई और अधम नहीं है, इसलिए मुझे धिक्कार है।” इस प्रकार पुनः पुनः अनुताप करते हुए नित्य निर्वेद को प्राप्त हो जाते हैं अथवा, कुछ समय के बाद धर्मात्मत्व प्राप्त करने पर भी अधर्म सूक्ष्मरूप में वर्तमान रहता है, जैसे कि महौषध पान करने पर भी कुछ समय तक नाशवान् ज्वरका दाह या विष का दाह रहता है परन्तु वह गिना नहीं जाता। दुराचारादि बोधक काम—क्रोधादि विद्यमान रहनेपर भी वह विषदन्तहीनसर्प के दंश के समान प्रभावहीन होते हैं—ऐसा जानना चाहिए। अत एव ‘शाश्वत’ सर्वदा ही ‘शान्तिम्’ अर्थात् काम-क्रोध आदिका उपशम अद्वितीय रूप में प्राप्त होता है। दुराचारी की अवस्था में भी वे शुद्ध अंतःकरणवाले
ही कहलाते हैं।
श्रीधरस्वामिपाद कहते हैं—यदि वे धर्मात्मा हो जायँ, तो कोई विवाद नहीं है—किन्तु दुराचारी भक्त अन्तकाल तक दुराचार का त्याग न कर पाये, तो उनके विषयमें क्या कहा जाएगा? इसके उत्तर में श्रीभगवान् बलपूर्वक क्रोधसहित कहते है—‘कौन्तेय मे भक्तो न प्रणश्यति’ प्राण छूटने पर भी उनका अध: पतन नहीं होता है। कुतर्क के कारण कठोर वचन बोलने वाले इसे स्वीकार नही करेंगे ऐसा सोचकर वे शोक और शङ्का से व्याकुल अर्जुन को उत्साह प्रदान करते हुए कहते हैं—हे कौन्तेय! डंके की चोटसे महाध्वनि करते हुए विवाद करने वालों की सभा में जाकर दोनों हाथों को ऊपर करते हुए निःसन्देह ‘प्रतिजानीहि’ अर्थात् प्रतिज्ञा करो कि दुराचारी होनेपर भी मेरे भक्त का नाश नहीं होता है, अपितु कृतार्थ ही होता है। ऐसा होने पर तुम्हारी वाक् चातुरीसे उनके कुतर्क खण्डित हो जाएँगे एवं निश्चय ही वे तुम्हें गुरु मानकर तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेंगे।
यहाँ पुनः आपत्ति हो सकती है कि भगवान् ने स्वयं प्रतिज्ञा न कर अर्जुन को प्रतिज्ञा करने का आदेश क्यों दिया? जैसा कि श्रीभगवान् (१८/५५ में) कहेंगे—“तुम मुझे प्राप्त होओगे ही, मैं तुम्हारे निकट सत्य ही प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो, ” वैसे ही यहाँ श्रीभगवान् ने क्यों नहीं कहा कि हे कौन्तेय! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरे भक्त का विनाश नहीं होता है? इसके उत्तर में कहते हैं उस समय श्रीभगवान् ने विचार किया कि मैं अपने भक्तोंका लेशमात्र भी अपकर्ष सहने में अक्षम हूँ, अतः अनेक स्थान पर मैं अपनी प्रतिज्ञा को भंग करके भी अपने भक्त की प्रतिज्ञा की रक्षा करता हूँ। जैसा कि इस युद्ध में ही अपनी प्रतिज्ञा को भङ्गकर भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा करूँगा। जो बहिर्मुख तथा वितण्डावादी हैं, वे मेरी प्रतिज्ञा को सुनकर हँसेंगे, किन्तु अर्जुन के द्वारा की गई प्रतिज्ञा उनके लिए पत्थर की लकीर होगी, इसलिए अर्जुन के द्वारा ही उन्होंने प्रतिज्ञा करवाई।
ऐसे दुराचारी की भी अनन्य भक्ति के बारे में श्रवणकर कुछ लोग इस प्रकार का अर्थ करते हैं कि स्त्री-पुत्रादि के प्रति आसक्ति जनित शोक, मोह, क्रोधादि विधर्म जिसमें नहीं है, वही अनन्य भक्त है, किन्तु कुपण्डितों की ऐसी व्याख्या ग्राह्य नहीं है॥३१॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२॥
मर्मानुवाद—हे पार्थ! अन्त्यज, म्लेच्छ और वेश्यादि पतिता स्त्रियां तथा वैश्य-शूद्रादि नीच वर्ण वाले नर मेरी अनन्य भक्ति का विशिष्टरूप से आश्रय लेकर अविलम्ब ही परागति को प्राप्त करते हैं। मेरे शुद्धभक्ति मार्ग में आश्रित व्यक्तियों में जाति-वर्णादि सम्बन्धी किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है॥३२॥
अन्वय—पार्थ! (हे पार्थ!) ये अपि (जो लोग) पापयोनयः (अन्त्यज आदि योनियों में उत्पन्न) स्त्रियः (स्त्री) वैश्या: (वैश्य) तथा शूद्राः (एवं शूद्र) स्यु: (हैं) ते अपि (वे भी) माम् (मुझे) व्यपाश्रित्य (आश्रय कर) परां गतिम् (परम गति को) यान्ति (प्राप्त होते हैं)॥३२॥
टीका—एवं कर्मणा दुराचाराणामागन्तुकान् दोषान् मद्भक्तिर्न गणयतीति किं चित्रम्? यतो जात्यैव दुराचारणां स्वाभाविकानपि दोषान् मद्भक्तिर्न गणयतीत्याह—मामिति। पापयोनयो ऽन्त्यजा म्लेच्छा अपि यदुक्तम्—“किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा, आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। येऽन्ये च पापास्तदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥” “अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” किं पुनः स्त्रीवेश्याद्या अशुद्ध्यलीकादिमन्तः॥३२॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं इस प्रकार मेरी भक्ति दुराचारी व्यक्ति में कर्मवश आये दोषों की गणना नहीं करती है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है? क्योंकि मेरी भक्ति जातिगत दुराचारी व्यक्तियों के स्वाभाविक दोषों की गणना नहीं करती। ‘पापयोनयः’ अन्त्यज़ म्लेच्छादि को कहा गया है। जैसा कि (भा २/४/१८ में भी) कहा गया है—किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, कंक, यवन और खसादि जो समस्त लोग जातिगत पाप से दुष्ट हैं एवं जो कर्म से भी पापयुक्त हैं, वे भी जिन भगवान् के आश्रित भागवतस्वरूप सद्गुरु के चरणाश्रय मात्र से ही जातिगत और कर्मगत दोषोंसे शुद्ध हो जाते हैं, उन शीलतः प्रभुतासम्पन्न भगवान् को नमस्कार है और जिनकी जिह्वा के अग्रभाग में उनका नाम एक बार भी उच्चारित होता है, वे चाण्डाल के गृह में जन्म लेते हुए भी इस नामोच्चारणके कारण पूज्यतम हैं। जो आपके नामका कीर्तन करते हैं, वे सभी प्रकार की तपस्या, यज्ञ, सभी तीर्थों में स्नान, सभी वेदों का अध्ययन और सदाचारादि समाप्त कर चुके हैं, (भा ३/३३/७)। अतः इस अशुद्धि और मिथ्या बोलने वाली स्त्रीवेश्यादि की तो बात ही क्या है?॥३२॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३॥
मर्मानुवाद—जब अन्त्यज सभी जातियाँ भी मेरी विशुद्ध भक्ति की अधिकारी हो सकती हैं। उनके संसर्गजात पापाचार उनके लिए बन्धक नहीं हो सकता क्योंकि भक्ति के आविर्भाव से चित्त के सारे पाप जब अतिशीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, तब पुण्यवान् ब्राह्मण और क्षत्रियों के भी भक्तिसम्बन्धी आचार द्वारा सारे अमंगल शीघ्र ही दूर हो जायेगें, इसमें क्या सन्देह है? इसलिए इस अनित्य और असुखमय लोक में निरन्तर मेरा ही भजन करो॥३३॥
अन्वय—पुण्याः (पवित्र) ब्राह्मणाः (ब्राह्मण) तथा (एवम्) भक्ता: राजर्षयः (भक्त क्षत्रिय) [परमगति प्राप्त करते हैं] किं पुनः (इसमें क्या आश्चर्य है?) अनित्यम् (अनित्य) असुखम् (दुःखकर) इमम् (इस) लोकम् (मनुष्यदेह को) प्राप्य (प्राप्त हो कर) माम् (मेरा) भजस्व (भजन करो)।
टीका—ततोऽपि किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः सत्कुलाः सदाचाराश्च ये भक्ताः? तस्मात्त्वं मां भजस्व॥३३॥
भावानुवाद—जब ऐसा ही है तो भला सत्कुल और सदाचारी ब्राह्मणादि जो भक्त हैं उनका तो कहना ही क्या? इसलिए हे अर्जुन! तुम मेरा भजन करो॥३३॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥३४॥
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः।
मर्मानुवाद—अपने मन को मेरी भावना में नियुक्त करो। अपने शरीर को मेरी भक्ति में नियुक्त करो। तब मेरे परायण होकर युद्धादि समस्त कर्म करके भी तुम मुझे अवश्य प्राप्त करोगे॥३४॥
भक्ति ही राजगुह्ययोग है एवं पात्र-अपात्र के दोषों का विचार नहीं करती। दोष प्रबल हो भी जायें तब भी भक्ति द्वारा सहज ही वे नष्ट हो जाते हैं, यही इस अध्याय का अर्थ है।
नवें अध्याय के रसिकरंजन मर्मानुवाद का भावानुवाद समाप्त।
अन्वय—मन्मनाः (मद्गत चित्त) मद्भक्तः (मेरे सेवक) मद्याजी [एवं] [मेरी पूजा पारायण] भव (हो जाओ) माम् (मुझे) नमस्कुरु (नमस्कार करो) एवम् (इस प्रकार) आत्मानम् (मन और देह) युक्त्वा (मुझ में अर्पण कर) मत्परायणः (मुझे आश्रय करो) मामेव (मुझे ही) एष्यसि (प्राप्त हो जाओगे)॥३४॥
टीका—भजनप्रकारं दर्शयन्नुपसंहरति—मन्मना इति। एवमात्मानं मनो देहञ्च युक्त्वा मयि नियोज्य॥३४॥
पात्रापात्रविचारित्वं स्वस्पर्शात् सर्वशोधनम्।
भक्तेरेवात्रैतदस्या राजगुह्यत्वमीक्ष्यते॥
इति सारार्थवर्षिण्यां हर्षिण्यां भक्तचेतसाम्।
गीतासु नवमोऽध्यायः सङ्गतः सङ्गतः सताम्॥
भावानुवाद—इस श्लोक में भजनकी प्रणाली बताते हुए इस अध्यायको समाप्त कर रहे हैं। ‘आत्मानम्’ अर्थात् मन और देह को मुझ में नियोजित कर मेरा भजन करो॥३४॥
भक्ति अपने स्पर्शमात्र से ही पात्र-अपात्रादि सभी को पवित्र कर देती है यही राजगुह्य कहलाने वाले इस नवम अध्याय में कथित हुआ है। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय की श्रीलविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकृत साधुजनसम्मता भक्तानन्ददायिनी सारार्थवर्षिणी टीका समाप्त हुई।
नवें अध्याय की सारार्थवर्षिणी टीका का भावानुवाद समाप्त।
नवाँ अध्याय समाप्त