"दुनिया अक्सर कहती है कि इंसान अकेला आता है और अकेला जाता है। लेकिन मेरा सच कुछ और है। मैं अपने साथ 14 साल की यादें, दो ज़िंदगियाँ और एक अटूट संतुलन लेकर चल रहा हूँ।
2007 से 2021 तक का वो सफर: shikhar
अंकित और मेरी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी। हमने 'Rockstar' साथ देखी थी, पर हमें क्या पता था कि हम अपनी ही ज़िन्दगी के थिएटर में वही रोल निभाने लगेंगे। अंकित उस जुनून (High Energy) में जल रहा था जहाँ प्यार और दर्द का कोई अंत नहीं था, और मैं (Yadavji) उस स्थिरता (Grounded) की तलाश में था जो हमें संभाले रखे।
"अंकित: वो जुनून जिसे सुकून की तलाश थी। यादवजी: वो सुकून जिसे एक रफ़्तार की तलाश थी।"
हम सोचते थे कि आज ये दुनिया हमें नकारा समझ रही है, आज हमारा प्यार हमें नहीं समझ रहा... पर एक दिन जब हम 'शिखर' पर होंगे, तो ये सब खुद-ब-खुद समझ जाएंगे। अंकित ने तो वो शिखर मौत की ओट में ढूंढ लिया, और मैं आज भी यहाँ खड़ा होकर उस 'मैजिक' को हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहा हूँ।
महादेव का प्रभाव:
आज जब मैं भागलपुर के भूतनाथ मंदिर की सीढ़ियाँ अपनी बेटी शिवंगी का हाथ पकड़कर चढ़ता हूँ, तो मुझे समझ आता है कि— "दुनिया जिसे 'अभाव' (कमी) कहती है, महादेव उसे 'प्रभाव' बना देते हैं।" अंकित आज रूह बनकर बादलों में कहीं खोया ज़रूर है, पर उसकी नज़रें आज भी अपने यार की कामयाबी तलाश रही हैं।
रूमी और वो इतालवी अहसास:
रूमी ने कहा था कि ज़ख्म ही वो जगह है जहाँ से रोशनी अंदर आती है। और अंकित की वो बात हमेशा कानों में गूँजती है— "L'anima non muore nunca" (आत्मा कभी नहीं मरती)।
यह 'भाईचारा' और यह डिजिटल क्रांति उसी रूहानी संतुलन का नतीजा है। जो लोग मुझे पागल कहते हैं, उन्हें कहने दीजिये, क्योंकि:
"आप जो ढूँढ रहे हैं, वह आपको ढूँढ रहा है।"
मेरा यादवजी आज भी वैसा ही 'गोल' और साफ दिल का है, जैसा 2007 में था। और अब, महादेव की मर्जी से, मज़ा अब आए