कोरोना संक्रमण के चलते अधिकांश लोग इनदिनों किसी ना किसी प्रकार के तनाव में हैं। बढ़ती बीमारियों, अनियमित दिनचर्या और बहुत सारी नेगेटिविटी के बीच कहीं ना कहीं हम पिछड़ते जा रहे हैं।
रेकी क्या है ?
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्ना देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं, किंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इस विद्या का लोप होता चला गया। 2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।
रेकी जापानी भाषा का शब्द है जो ‘ रे ‘ और ‘ की ‘ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘ रे ‘ का अर्थ है सर्वव्यापी अर्थात ओम्नीप्रेजेंट तथा ‘ की ‘ का अर्थ है जीवन शक्ति या प्राण अर्थात लाइफ फोर्स। इस प्रकार रेकी वह ईश्वरीय अथवा आध्यात्मिक ऊर्जा है , जो इस समस्त ब्रह्माण्ड में हमारे चारों ओर व्याप्त है। हम सब इसी जीवन शक्ति को लेकर पैदा होते हैं और इसी के द्वारा जीवन जीते हैं। समय के साथ-साथ अनेक कारणों से जब हमारे शरीर में इस ऊर्जा का प्रवाह कम हो जाता है अथवा इसका संतुलन बिगड़ जाता है , तभी हमारा शरीर रोगों की ओर आकर्षित होता है।
रेकी द्वारा उपचार या रेकी साधना में हम इसी सर्वव्यापी जीवन शक्ति का उपयोग अपने लाभ के लिए करते हैं। प्रार्थना क्या है ? हमारा प्रत्येक कर्म हमारे जीवन को निर्धारित करता है और कर्म के मूल में उपस्थित होता है ‘ विचार ‘ । अत: हमारे विचार ही हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। हर विचार एक प्रार्थना की तरह कार्य करता है। हमारे विचार एक तरह से प्रतिज्ञापन या स्वीकारोक्ति हैं। हम जो चाहते हैं उसकी स्वीकारोक्ति। प्रार्थना भी एक स्वीकारोक्ति है। हमारे मन में अनेक इच्छाएं जाग्रत होती रहती हैं। हम ईश्वर से जो चाहते हैं , वह भाव सदैव हमारे मन में बना रहता है। अत: हमारा हर भाव , हमारा हर संकल्प प्रार्थना ही है। हमारी इच्छाएं , हमारे विचार या भाव अथवा संकल्प कैसे हों यह अत्यंत महत्वपूर्ण है न कि प्रक्रिया। प्रार्थना क्योंकि एक भाव है , अत: यह करने की वस्तु नहीं है। यह स्वत: ही घटित होती है। भाव को नियंत्रित करने की जरूरत है। भाव प्रदूषण से बचने के लिए जरूरी है कि हमारे विचार सदैव सकारात्मक रहें। सकारात्मक विचारों का पोषण ही वास्तविक प्रार्थना है।
क्या रेकी और प्रार्थना में कुछ तत्व समान हैं ? ऊपरी तौर पर देखें तो रेकी और प्रार्थना में अंतर दिखाई पड़ता है , लेकिन वास्तव में रेकी और प्रार्थना एक ही हैं। प्रार्थना द्वारा हम ईश्वर से अपनी मनचाही वस्तु या स्थिति के लिए याचना करते हैं। या तो हम धन-दौलत या समृद्धि की कामना करते हैं या फिर कष्टों से मुक्ति की। प्रार्थना हम अपने परिवार के अन्य सदस्यों , मित्रों तथा परिचितों के लिए भी करते हैं। हम बस याचक होते हैं और ईश्वर या खुदा उन याचनाओं को पूरा करने वाला। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रेकी साधना भी की जाती है। रेकी और प्रार्थना के उद्देश्य और रेकी ऊर्जा तथा ईश्वरीय कृपा या ऊर्जा में कोई तात्त्विक अंतर नहीं है। रेकी ही नहीं , किसी भी अन्य शक्ति या उपचार पद्धति का सहारा व्यक्ति तब लेता है , जब उसके विश्वास में कमी आने लगती है। प्रार्थना और विश्वास का गहन संबंध है। जिस विचार अथवा प्रार्थना में विश्वास नहीं , वह मात्र शब्दाडम्बर है। जब किसी भी कारण से व्यक्ति का विश्वास डगमगाने लगता है तो ईश्वर से की गई उसकी प्रार्थना फलित नहीं हो सकती।
रेकी एक नए ईश्वर की खोज है , एक नए ईश्वर की कल्पना , जिसमें व्यक्ति की आस्था पुन: प्रतिष्ठित हो सके। धर्मांतरण या धर्मपरिवर्तन द्वारा भी हम किसी दूसरे ईश्वर की शरण में जाते हैं। लेकिन जब धर्मांतरण संभव नहीं होता या दूसरे धर्म के ईश्वर में भी विश्वास नहीं होता तो हम ईश्वर के नए रूप की खोज में जुट जाते हैं। सर्वव्यापी ऊर्जा के रूप में नए ईश्वर की स्थापना ही ‘ रेकी ‘ है। जैसे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं , वैसे ही रेकी ऊर्जा का आह्वान करते हैं। रेकी ऊर्जा या रेकी उपचार के प्रति आपके विश्वास का स्तर जितना अधिक होगा , उतना ही अधिक लाभ रेकी का अभ्यास आपको पहुंचाएगा। विश्वास के स्तर पर देखें तो जब तक ईश्वर में विश्वास था तो वह हमारी प्रार्थनाओं के माध्यम से हमारी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम था और अब यदि रेकी ऊर्जा में दृढ़ विश्वास है तो रेकी ऊर्जा हमारी इच्छाओं की पूर्ति में सहायक हो रही है। ईश्वर हो अथवा रेकी ऊर्जा या अन्य कोई ऊर्जा या ईश्वर रूप- हमारे विश्वास के बिना कोई हमारी सहायता नहीं कर सकता। विश्वास का उद्गम हमारा मन है , अत: ईश्वर हो अथवा रेकी ऊर्जा , दोनों हमारे मन की स्थितियां हैं। मन की ये स्थितियां हमारी अपनी कल्पना भी हो सकती हैं और परिवेश के प्रभाव से उत्पन्न स्थिति भी।
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्ना देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं, किंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इस विद्या का लोप होता चला गया। 2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।
रेकी (霊気 या レイキ, आईपीए: /ˈreɪkiː/) एक आध्यात्मिक अभ्यास पद्धति है जिसका विकास १९२२ में मिकाओ उसुई ने किया था। यह तनाव और उपचार संबंधी एक जापानी विधि है, जो काफी कुछ योग जैसी है। मान्यता अनुसार रेकी का असली उदगम स्थल भारत है। सहस्रों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था।
रेकी करने वाले प्रैक्टिशनर (विशेषज्ञ) अपने हाथ मरीज के शरीर पर रखते हैं या ऊपर से फेरते हैं, जिसकी मदद से मरीज के शरीर में ऊर्जा का संचार किया जाता है। यह एक जापानी तकनीक है, जो पूरी दुनिया मे इस्तेमाल की जाती है।