ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम पूरी तरह से ग्रिड से स्वतंत्र होता है। इसमें बैटरी लगाई जाती है जो दिन में चार्ज होती है और रात में या धूप न होने पर बिजली देती है। यह सिस्टम उन जगहों के लिए आदर्श है जहाँ बिजली का कनेक्शन नहीं है या बहुत कटौती होती है।
सोलर पैनल
सोलर चार्ज कंट्रोलर – बैटरी में चार्ज नियंत्रित करता है।
बैटरी बैंक – बिजली स्टोर करता है।
ऑफ-ग्रिड इन्वर्टर – डीसी को एसी में बदलता है।
वायरिंग और स्ट्रक्चर
सोलर पैनल बिजली बनाते हैं।
चार्ज कंट्रोलर बैटरी को चार्ज करता है।
इन्वर्टर बैटरी की डीसी बिजली को एसी में बदलकर घर में सप्लाई करता है।
रात में बिजली बैटरी से मिलती है।
ग्रिड से स्वतंत्र – बिजली कटौती में भी बिजली मिलती है।
दूरदराज इलाकों के लिए उपयुक्त।
पूरी तरह से ग्रीन एनर्जी।
बैटरी महंगी होती है और 4-6 साल में बदलनी पड़ती है।
मेंटेनेंस ज्यादा।
शुरुआती लागत अधिक।
बैटरी खत्म हो जाने पर बिजली नहीं मिलती।
ऑन-ग्रिड सिस्टम –
शहरों, कस्बों और ऐसी जगहों के लिए जहाँ बिजली की सप्लाई अच्छी है।
यह उन लोगों के लिए सही है जो बिजली का बिल बचाना चाहते हैं और बैकअप की जरूरत नहीं है।
ऑफ-ग्रिड सिस्टम –
गाँवों, पहाड़ी क्षेत्रों और जहाँ बिजली कटौती ज्यादा होती है।
यह उन जगहों के लिए सही है जहाँ बिजली ग्रिड उपलब्ध नहीं है।
ऑन-ग्रिड और ऑफ-ग्रिड दोनों सोलर सिस्टम के अपने फायदे और सीमाएँ हैं।
यदि आपका लक्ष्य बिजली बिल कम करना है, तो ऑन-ग्रिड सिस्टम सबसे अच्छा विकल्प है।
यदि आप बिजली की पूरी स्वतंत्रता चाहते हैं और बैकअप जरूरी है, तो ऑफ-ग्रिड सिस्टम सही रहेगा।