जिंदगी अब इस मोड़ पर ले आई है कि हमने मीम से ही दिल्लगी लगाई है....
जीना मरना हंसना रोना सब इसकी साथ बीतता है, मेरा हर जज्बात ये मीम बड़ी शिद्दत से पेश करता है....।
नियम कायदों की बात पर सलमान भाईजान याद आते है, और तो और अब्बा अब हारमोनियम बजाते नहीं खाते थे ।
गलत होने पर अब अपशब्दों की जगह अबे साले बोल देते है, और मारो मुझे मारो कहकर सारे जज्बात खोल देते है...।
हेराफेरी के हर डायलॉग मीम मटेरियल कहलाता है,
बाबूराव का लौटा और राजू का स्टाइल देश का प्रधानमंत्री और कैप्टन कोहली भी अपनाता है ।
हिन्दुस्तानी भाऊ के पवित्र शब्द हर जुबां पर छाए है,
और लाकडाउन में अनन्या के स्ट्रगल वाले दिन वापिस आए है ।
रणवीर का लहंगा हो या रणबीर की गर्लफ्रेंड सबके यहां चर्चे है,
जीतू भईया फैक्टरी वाले कर रहे खूब खर्चे है ।
इट्स हर चॉइस हो या इमोशनल नेहा कक्कड़,
मीम के जाल में हर कोई है घनचक्कर,
वो स्त्री है कुछ भी कर सकती है,
और नोरा की गर्मी में हर लडके की जान अटकती है ।
क्रोनोलॉजी समझा समझा के क्रेटिविटी दिखाते हैं और कुछ इमोशनल दिखा के सख्त लौड़ों को भी रुलाते है,
और कई बार तस्वीर पर लिखे #dedicated शब्द तीर का काम कर जाते है ।
भानू प्रताप की खीर से कबीर सिंह की प्रीति तक,
रामायण के हर कांड से, जन जागृति तक,
हर बात में हंसी मजाक लाते है,
मेरे जैसे लाखो के चेहरे पर ये ही तो मुस्कान लाते है ।
Reel Media
खूब मचा है शोर शराबा,
टीवी पर आ रहे है बाबा,
राशि से ये भविष्य बताए,
समस्याओं का समाधान दिखलाए,
ये टीवी वाला मीडिया जोरो शोरो से पाखंड का डंका बजाए ।
भूत प्रेत के नाम पर सेर ये कराते है,
भोली भाली जनता को बड़े प्यार से डराते है,
रहस्यमय किस्से साउंड इफेक्ट डाल के सुनाते है,
ये मीडिया वाले भूतो के भी , बयान अपने सूत्रों से मंगवाते है ।
5 बजे की बहस में सनसनी ये ला देंगे,
लालची नेताओ को देश की चिंता में बिठा देंगे,
सवालों पर सवाल का बंडल यहां तैयार होता है,
तभी दर्शक का धेर्य यहां फूटे डेम सा तबाह होता है।
प्राइम टाइम में ये 100 खबरे दिखाते है,
हैडलाइन में ही ये हदे पार कर जाते है,
पैसों के लिए तो हिन्दू मुस्लिम के दंगे भी ये कराते है,
बिकाऊ होकर लोकतंत्र के इस स्तम्भ को कमजोर ये बनाते है ।
खास की मौत पर ये कवरेज दिखाते ,
अनगिनत कैमेरे से एक एक फुटेज है लाते पर
उस भूखे मजदूर का दर्द देश के सामने ना ला पाते,
देश के बड़े नेटवर्क बस टीआरपी चार्ट पर ही नजर आते ।
मुद्दे से ये जनता को भटकाते है, वायरल के वायरस का ये मसाला बनाते है , सज धज के ग्राउंड फ्लोर पर जाते और वहां से देश को चूना ये मिलकर लगाते है ।
अर्धसत्य की मीडिया ने लोकतंत्र के मंदिर की तोड़ी सीढ़ियां है...
अरे भईया, यहां सब चलता है क्यूंकि ये मेरा इंडिया है...२
खबर पड़ी थी कानो में, कुछ अद्भुत सा नजारा हैं
हिंदुस्तान की धरती पर,प्रकृति ने स्वर्ग उतारा हैं
कश्यप की भूमि वो, अमरत्व का धाम हैं
शब्दों में न समा पाए ऐसा कश्मीर का बखान हैं।
डरे सहमे से पहुंचे हम, काश्मीर की भूमि पर,
मस्तक ऊंचा थाम हिमालय, खड़ा था शीर्ष चोटी पर,
स्वागत को आतुर थे वो नदी, बाग और झरने सारे
आंखो को भा रहे थे, दुर्लभ से वो सुंदर नजारे।
शौर्य पराक्रम की धरती पर, सेना सा हमसाया मिला
गौरवान्वित हैं हर इक क्षण वो, जब उन नायकों का सहारा मिला,
वात्सल्य की निगाहें उनकी, देशप्रेम से ओतप्रोत थी
श्रृंगार मेरा हो ऐसा वतन पर, मन में यही सोच थी।
बादलों की अठखेली में देखी ऐसी, लुका- छुपी
हिम के शिखरों ने जैसे पश्मीना हो ढांक रखी,
केसर के खुशबू से जिसकी महकता हैं जहां सारा,
जैसे कुदरत ने लुटा दिया हो अपनी खूबसूरती की पिटारा..।
लोग यहां के निश्चल मन के, प्यार खूब लुटाते है,
अदब की भाषा कहकर ये, अपने से बन जाते है,
हां मतभेद हैं कुछ अपनो से, फिर भी गले लगाते हैं,
मानवता के इस शिखर को कश्मीरी ही छू पाते हैं।
और
जाति धर्म के भेद मिटा भोले के रंग, रंग जाते है,
सेवा समर्पण के भाव से ये भारत दिखलाते हैं
आया देखो आया कौन आया,
अलग सा माहौल छाया,
देश की बदल रही काया,
नेता भी भूल रहे मोह और माया
क्युकी चुनावी मौसम जो है आया...।
पर ये मौसम थोड़ा अलग है,
इसमें धर्म के साथ राष्ट्रवाद की झलक है,
पक्ष - विपक्ष के वादे है,
देश के विकास के झूठे इरादे है,
मुफ्तखोरी की बाते है,
गठबंधन के सारे रिश्ते नाते हैं..।
महंगाई, बेरोजगारी का मुद्दा नहीं,
सेना के साहस के सहारे है,
हिंसा करके ही सही , कही तो वोट हमारे है,
सोशल मीडिया के जलवे है,
चाय की टपरी खाली है,
और पिछले चुनाव के नोट अब जाली है..।
चौकीदार चोर की लड़ाई है,
नए चेहरों की तो बाढ़ सी आई है,
हर देशवासी की अपनी एक आस है,
मीडिया के भी अपने अलग से कयास है..।
चुनाव अब देश के विकास का है,
जिसमे हर भारतीय का साथ होना चाहिए,
मत के दान में सबका हाथ होना चाहिए...।
जतिन लालवानी
गुल्लक
सच ही कहा है टीवीएफ वाले बाबा ने... असली मज़ा कहानी नहीं किस्सों में है, हजारों छोटे बड़े किस्से जिनसे भरता है यादों का गुल्लक...
हर मिडिल क्लास फैमिली के रोजमर्रा के किस्से हमे "गुल्लक" में देखने को मिलते है, जहा रोज़ की लौकी भिंडी खाकर भी मुंह बनाते बच्चे हो या उनके अकबर रूपी पापा के रोब जमाने से परेशान मां...।
मोहल्ले की हर खबर रखता बड़ा भाई हो....या पंगे लेने में माहिर छोटे भाई की कुटाई... सबकुछ है इस गुल्लक में
वो सन्डे की चिकचिक वाली सुबह से शाम होती खाने की हर फरमाइश और रोज़ इनके साथ होते किस्से भी जैसे खाने के वक्त बत्ती गुल हो जाना या बहन की कुछ नई रेसिपी पर उसका बिगड़ जाना... इमोशनल होने पर पापा की रिपिटेटिव संघर्ष भरी कहानियां हो या मम्मी के बचपन के किस्से और उनका और हमारा कंपैरिजन तो सदाबहार है ।
रिश्तेदारों के ताने पर मम्मी का काउंटर अटैक हो या पापा मम्मी के बीच होती इंटरेस्टिंग बहस...बस यही तो एक मिडिल क्लास फैमिली की अधूरी ख्वाहिशों के बावजूद पूरा एन्जॉय करने का हौसला देती है ।
और एक मिडिल क्लास फैमिली की पूरी कहानी इन किस्सों में ही समिटी मिलती है ।
कविता
कहानी नहीं किस्सों से गुल्लक हमने भरा है,
मां के प्यार - पापा की डांट... रिश्तेदारों दोस्तो के दुलार से ही हमने ये जीवन खुल के जिया है ।
रोक टोक से मन की मौज तक, हर किस्सा इस गुल्लक में समाया है... स्कूल में सीनियर की पिटाई हो या आए दिन पड़ोसी से लड़ाई, ये युद्ध हमने बखूबी लड़ा है, तभी तो सबसे अपना रिश्ता आज भी तगड़ा है ।
क्रिकेट के बल्ले से शॉट खूब उड़ाए है, गुस्सा दिलाने पर उसी से दुश्मन भी खूब भगाए है.., दोस्ती के लिए जान हमेशा हाज़िर की है, इसलिए तो पापा ने हजारों बार अपनी क्लास ली है ।
मम्मी के मोल भाव से दुकानदार भी परेशान है, मम्मी की इस स्किल से ही बचत का प्रावधान है ,
घर में कोई भी बर्तन आए उस पर नाम बच्चो का गढ़ेगा, और फालतू बहस की मम्मी से तो चाटा बड़ी जोर से पड़ेगा ।
शादियों में लिफाफे में कितने पैसे देना है ये घर की पिछली शादी को देख के तय होता,
हर साल बर्थडे गिफ्ट को लेकर पापा और हमारे बीच खूब होता समझौता,
दाव पेंच साम दाम सब इस लड़ाई में काम आते,
आखिर के पापा बच्चो की जिद के आगे हार जाते..।
ये पुराने किस्से आज भी खूब सुनाई देते है,
घर में सुख हो दुख हो जब सब साथ मिलते है,
कही तारीफे चलती तो कहीं बुराइयों का चिकचिक है... ये ही तो हमारी जिंदगी के किस्सो का गुल्लक है...२ ।
मध्यप्रदेश की धर्मप्रियता
मध्यप्रदेश... सबसे अजब गजब प्रदेश, जहां के लोगो की आस्था हमेशा चर्चा का विषय बनी होती हैं और ये धार्मिक चर्चाएं सत्ता की चाबी बन कीचड़ में कमल या कमल की सत्ता का नाथ बन भागवत प्रसंगों के बीच सुनाई जाती हैं। वैसे मध्यप्रदेश न उत्तराखंड की तरह देवभूमि हैं, न उत्तरप्रदेश की तरह विष्णु अवतारों की जन्मभूमि किन्तु यहां की संत परम्परा और उस पर लोगो का विश्वास बहुत अटूट हैं, जिसके वरदानस्वरूप मध्यप्रदेश की धरती में बाबा महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर विराजते हैं। जिनकी सिद्धि आम जनमानस तक पहुंचाने और सनातन परंपरा से मिलाने का कार्य कुछ कथावाचक और संत कर रहे है, उनमें से एक ख्यात नाम हैं पंडित प्रदीप मिश्रा, सीहोर वाले। भक्तों और आस्था चैनल के मुताबिक 5 लाख से अधिक भरे हुए पंडाल से धर्मकथा सुनाते
पंडित मिश्रा कथा के प्रसंगों को वाणी से जीवंत करते हुए नित पूजा पद्धति और सनातन संस्कृति का भी प्रचार करते हैं, जिनका लाखो श्रद्धालु मन में विश्वास रखते हुए आचरण भी करते है। पंडित जी का प्रभाव इतना है कि घरों में पूजे जाने वाले शिव के शिवालयों में चहलकदमी बढ़ी है,शिव शिवाय नमस्तुभ्यं का जाप अब प्रदेश के हर घर में सुनने को मिलता हैं।उनका प्रभाव इतना की कथा के लिए सारा सीहोर प्रशासन हिल जाता हैं तो उनके आंसू छलकने पर गृहमंत्री को उनसे माफी मांगनी पड़ती हैं,और आजकल उनके एक एक बयान अखबारों की कवर स्टोरी बन खूब सुर्खियां बटोर ले जाते हैं, ये मध्यप्रदेश की जनता की धर्मप्रियता नही तो क्या हैं। ऐसे एक और बाबा हैं जो आजकल चेहरा देख कर समस्या बताते हैं और समाधान भी निकाल के देते हैं पर वो निर्मल बाबा की तरह पानी पूरी या समोसे खाने को नहीं बल्कि भगवान के चरणों में शीश झुकाने को कहते हैं, छतरपुर के बागेश्वर धाम के 27 वर्षीय युवा धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री महाराज आजकल सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हो गए हैं, इनकी भी कथाओं में माताएं बहनें जोरो शोरो से हिस्सा लेकर रामकथा का श्रवण कर रही हैं। बागेश्वर सरकार पर होते कई स्टिंग ऑपरेशन और उनके बुलडोजर बयान राष्ट्रीय खबरों में भी टॉप पर होते है, यही स्थिति वृंदावन के कथावाचकों से लेकर चित्रकूट के जगद्गुरु की धर्मसभाओ की हैं, जहां इन धर्मात्माओं के बयान सत्ता की राग जैसे या उसके विपरीत सुनाई देते है पर यही संत सत्ता को साथ लेकर चलते हुए हमारे गौरवशाली इतिहास के दर्शन करा रहे हैं, जिसमे आयोजक मंडल में सत्ता के सिपहसालार बड़े बड़े बैनर और कटआउट में दिख धार्मिकता के विषय में पूरे नंबर लाकर जनता के जनार्दन बन ही जाते हैं और ये अजब गजब प्रदेश अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय इसी प्रकार देता हैं
अपने देश में रखा ही क्या है, विदेश में तो खूब पैसा है, मौज ही मौज है.. भारत में रखा ही क्या है - ये वाक्य हर उस भारतीय नौजवान का है जो राष्ट्रीय त्यौहार पर सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता गाता फिरता है और उसी के अगले दिन देश को कोसता हुआ पाया जाता है ।
पिछले कुछ वर्षों से अंग्रेजी भाषा के साथ युवा विदेशी वस्तुओं की तरफ कुछ ज्यादा ही आकर्षित हो चुका है । अपनी रईसी और अपने आप को अत्यधिक प्रगतिशील दिखाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार की विदेशी वस्तुओं का आयात देश में किया जा रहा है जिससे हर साल देश को 45 मिलियन डॉलर की चपत लगती है जीडीपी को चोट लगना लाजमी है ।
देश का युवा कमाने से ज्यादा लुटाने पर जुटा हुआ है ।
ब्रांडेड के नाम पर कपड़ों से लेकर घर के हर एक समान को हम विदेश से मंगवाना चाहते है और फिर भारतीय कम्पनियों के ठप होने का राग अलाप फिर यूरोप के अल्बर्ट बन सरकार को कोस अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर पतली गली से निकल जाते है ।
बीएमडब्लू , ऑडी, एप्पल वाला आई- फोन, मेकअप का हर एक समान बस ये ही तो हर युवा की ख्वाहिश है, और ये सपनों की गाड़ी में घूमने वाला युवा जब अपने देश को नीचा दिखाकर अन्य देशों से तुलना करता है तो उसे याद रखना चाहिए कि इस देश की सरकार उसकी शिक्षा से लेकर नौकरी तक उसके लिए प्रयास करती है , केवल उसके अच्छे भविष्य के सरकार हर वर्ष घाटे का बजट पेश करती जिसमें युवा कल्याण के लिए एक लाख करोड़ रुपए खर्च किए जाते है जिसमें वह अच्छी शिक्षा प्राप्त कर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सके , किंतु जब युवा सरकार से अपने कर्तव्य को पूर्ण ना कर देश की चुनी सरकार से ही प्रश्न करने लगते है तो उन्हें ये याद रखना चाहिए कि विश्व के विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में युवाओं के योगदान की अहम भूमिका रहती है ।
विश्व में ऐसे कई उदाहरण है जहा युवाओं के द्वारा शुरू किए गए स्टार्ट अप ने उस देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया है और बेरोज़गारी को भी खत्म किया है ।
दुनिया में सबसे अधिक लाभ का बजट पेश करने वाले देश डेनमार्क ने अपने सफलता का राज देश के युवा पीढ़ी को ही बताया । अपने खर्चों से 28% अधिक लाभ कमाने वाले डेनमार्क के युवा देश में निर्मित वस्तुओं का ही उपयोग करते है और अपने उद्योगों को बढ़ावा देते है और स्टार्ट अप के माध्यम से रोजगार उत्पन्न करने में भी सहायता प्रदान करते है जो देश की प्रगति को सुनिश्चित करता है ।
अगर हम अपने देश की बात करे तो 2015 के आंकड़ों के अनुसार 140करोड़ जनसंख्या वाले देश में केवल 5 लाख युवाओं ने ही अब तक स्टार्ट अप की शुरुआत की है और इसमें से कई स्टार्ट अप कमजोर प्रदर्शन के कारण टिक भी ना सके ।
पारंपरिक तरीकों के मशीनीकरण होने के साथ साथ देश की युवा शक्ति का भी दुरुपयोग हो रहा है, विदेशी वस्तुओं का आयात बढ़ने से सरकार पर भी बोझ बढ़ा है , युवाओं की ये जिम्मेदारी बनती है की देश को कोसने के बजाय देश की आगे बढ़ाने के लिए सामने आए और अपने देश की हर एक वस्तु को विश्व पटल पर पहुंचाए ।
हमारा समाज भी अजीब है, आंख तभी खोलता है जब कुछ ऐसा घटता है जिसे हम सोच भी नहीं सकते और ये घटना हमारे दिलो दिमाग पर इस तरह छप जाती है जिसे भूलना संभव ही नहीं है और ऐसा ही कुछ पिछले दिनों जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुआ जहा भारतीय सेना के 42 जवान एक आत्मघाती हमले में शहीद हुए । पहली बार इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों का शहीद होने की खबर देश के नागरिकों के दिल को दहला देने वाली थी, पूरा देश में इस हमले के बाद आक्रोश है और सभी का ये कहना है कि पड़ोसी मुल्क से बदला लिया जाए और 40 सिर के बदले 400 सिर काट के लाए जाए पर इंसानियत के नाते क्या ये सही होगा , जिस तरह हम हमारी सेना के जवानों से प्यार करते है तो पड़ोसी मुल्क के नागरिक भी तो अपनी सेना से प्यार करते होंगे, अगर हम 40के बदले 400 सिर ले भी आए तो क्या फायदा , जो असली दोषी है क्या उन्हें सजा मिली ?, क्या इस आतंकियों के सरगनाओं को कोई फर्क पड़ा ? क्या मौतों के सौदागर हमारी गिरफ्त में आए ?
शायद इन सब सवालों के जवाब किसी के पास नहीं होगा ।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारतीय सेना ने वर्ष 2019 में 242 कश्मीरी आतंकवादियों को मार गिराया, पिछले कई वर्षो से इस तरह के अभियान कश्मीर में चलाए जा रहे है जिसमें अभी तक 1708 आतंकी मारे गए है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रति माह 28 आतंकी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा मारे गए है । और गौर करने की बात है की ये सब आतंकियों कि उम्र लगभग 20-30 वर्ष के आसपास थी । एक तरफ हम युवा के सशक्तिकण की बात कर रहे है, और इस तरह के आकंडे हमें तब अचंभित करते है कि दुनिया का सबसे युवा देश आतंकवाद की चपेट है उसी देश के युवाओं के कारण ।
ऐसे क्या कारण है जिससे युवा इन आतंकी आकाओ के कहने पर खुद की जान बिना कुछ सोचे समझे दे देते है,
पुलवामा हमले के आरोपी आदिल अहमद केवल 20वर्ष का नौजवान है, जिसने पिछले वर्ष कक्षा 11वी की पढ़ाई छोड़ आतंकी संगठन जेश ए मोहम्मद से जुड़ा और सेना पर पत्थरबाजी समेत कई हमलों में शरीक रहा और पुलवामा हमले में भी पूरी तरह से उसकी ही योजना ही थी,
जन्नत पाने की लालसा के नाम पर इन युवाओं को बहला फुसलाकर अपने ही देश के बारे में भड़काया जा रहा है और इस तरह के कार्य कराए जा रहे है , इसी के साथ इन आतंकियों की आर्थिक तौर पर मदद कर रहे संगठनों पर भी शिकंजा कसना होगा ।
हमारी भारत सरकार को
अमन और शांति के राज्य कश्मीर का तालिबानीकरण करा रहे इन आतंक के आकाओं के ठिकाने ढूंढ़कर सफाया करना होगा, चाहे इसके लिए उसे पाकिस्तान को विश्व पटल से पूरी तरह अलग - थलग करने के लिए कुछ भी करना पड़े, अपनी रणनीति में बदलाव कर इस कायराना हिमाकत का बदला लेना होगा ।
क्युकी जब एक व्यक्ति सेना में भर्ती होता है तो वो पूरी तरह से देश की सेवा में समर्पित हो जाता है, उसकी हर एक सांस देश की हो जाती है और अगर इस तरह के कायराना हमले देश की सेना पर होते रहे तो हमारे बाकी सैनिकों के आत्मसम्मान पर भी गहरा हमला होगा ,और अगर देश की सेना का मनोबल गिरता है तो ये उस देश की लाचरता दिखाता है इसलिए भारतीय सेना को इस हमले का जवाब देना जरूरी है और इसी के साथ सरकार को भी कूटनीतिक तरीके से पाकिस्तान के इन मंसूबों का जवाब देना चाहिए और इन आतंक के सरगनाओं पर भी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगाकर गिरफ्तार करने की कोशिश की जानी चाहिए।
हमारा देश शुरुआत से ही शांति के पैग़ाम देता रहा है जिसका फायदा पड़ोसी देश लेते रहे है, हम अमेरिका जैसे अपने दुश्मनों पर मिसाइल तो नहीं चला सकते पर घर में घुसकर इन आतंकियों पर कार्यवाही तो कर ही सकते है , जिससे पिछले 30वर्षो से चले आ रहे इस आतंक का खात्मा तो कर ही सकते है ।
क्युंकि हर उस शहीद को देश में अमन - चैन की भावना और घाटी में शांति ही सच्ची श्रध्दाजंलि होगी ।