मनुष्य की विशेषता है भाषा । मन के भाव भाषा से प्रकट करने का वरदान केवल मनुष्य को ही मिला है। यह भाषा विभिन्न प्रांतों में विभिन्न होती है।
भारत की गोद विभिन्न संस्कृतियों के सैकड़ों भाषियों से भरी है और इन सबको एकत्रित करनेवाली उत्तम भाषा है हिन्दी।
हिन्दी शब्द मधुर - भाषा अति मधुर
हिन्दी भाषा की इस माधुर्य से ही आज हमारी 'राजभाषा' व 'राष्ट्रभाषा' बनी है। इस भाषा का संबंध हमारी संस्कृति तथा परम्परा से है।
भाषाओं के विकास-क्रम की ओर जब हम दृष्टिपात करते है तब हमें पता चलता है कि पहले संस्कृत भाषा, बाद में पाली, प्राकृत, अपभ्रंश एक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ। हिन्दी भाषा का उद्गम लगभग एक हजार वर्ष पूर्व हुआ। हिन्दी का विकास शौरसेनी और अर्धभागधी अपभ्रंश से हुआ। हिन्दी की लिपि देवनागरी है। यह एक वैज्ञानिक लिपि है।
प्राचीन काल से हिन्दी जनसम्पर्क की भाषा रही। सारे भारत वर्ष में तीर्थ यात्री, साधु संत, व्यापारी, उपदेशक तथ घुमान्तु जातियाँ हिन्दी से अपसी संपर्क करती रही। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कच्छ से कामरूप तक हिन्दी जन-सम्पर्क की भाषा थी। आज हम जिस खडी बोली का प्रयोग करते है, वह वस्तुतः उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र की एक बोली है जिसका विकास राष्ट्रभाषा के रूप में हुआ।
मनुष्य के भावुकता और काल्पनिकता-प्रावीणा के कारण प्रत्येक देश का साहित्य अपनी आरंभिक अवस्था में पद्म के रूप में मिलता है हिन्दी भी इसका अपवाद नहीं है। आधुनिक काल से पूर्व हिन्दी का अधिकांश साहित्य पदमय था तथा प्रांतों की बोली प्रकाशित थी जैसे कबीर की बीजक सधुक्कडी भाषा में, मीरा के राजस्थानी हिन्दी पद, सूर के पद ब्रजभाषा में, तुलसी का अवधी भाषा-काव्य, विद्यापति का मैथिलि भाषा काव्य और दक्षिण का दकनी काव्य कवियों, विद्वानों गायकों, उपदेशकों का कंठहार बना। गद्य साहित्य में गद्य की कुछ छिटपुट रचनाएँ ही मिली थी। हिन्दी गद्य का बहुमुखी विकास परिणाम क्रम में विभिन्न विधाओं जैसे - निबंध, आलोचना, कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, रिपोर्ताज, स्केच, यात्रा वर्णन, संस्मरण आदि का समुचित विकास हुआ है। हिन्दी गद्य साहित्य बहुत विशाल है, बहुत संपन्न है। इसमें सैंकडों लेखकों का योगदान है।
इस तरह से भाषा के कई स्तर है। अभिव्यक्ति की अनेकानेक शैलियाँ है चाहे पद्य हो या हो गद्य। हिन्दी किसी राज्य की राजभाषा नहीं रही, पर उसे जन भाषा का सम्मान सर्वत्र मिला। हिन्दी की एक शैली उर्दू का विकास भी भारत में ही हुआ। हिन्दी भाषा ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिन्दी की पत्र पत्रिकाओं ने राष्ट्रीयता और सामाजिक नव-निर्माण की भूमिका बनाई। हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता ने जन-जागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया।
भारत के स्वतंत्रता के बाद हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने हिन्दी को एक स्वर से राष्ट्रभाषा व राजभाषा बनाने का निश्चय किया। भारतीय संविधान के सत्रहवें अध्याय में राष्ट्रभाषा व राजभाषा हिन्दी स्वीकार की गई।
आज हिन्दी ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य-व्यापार प्रशासन और रोजगार की भाषा बनती जा रही है, यह अत्यंज समृद्ध, विकास-शील भाषा है। वर्तमान सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं परिवर्तनों, जन आकांक्षाओं को मुखरित करती है। हिन्दी एक सुसंपन्न, एक विश्वभाषा के रूप में अपने आपको स्थापित कर चुकी है। उसके कई रूप और कई दायित्व हमारे सामने है।