जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।
[Published in गीता-कविता online here]
आराम नहीं था पर उस तक जाने की राह थी,
अच्छा घर नहीं था पर महल बनाने की चाह थी,
धन नहीं था पर समय की भरमार थी,
मशहूर नहीं था पर दोस्तों में बड़ी हस्ती थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।
गद्देदार आसन नहीं था पर ज़मीन पर ही ठाठ थी,
बिस्तर मख़मली नहीं था पर सितारों की गोद थी,
अंधेरा बिजली से रौशनमय नहीं था पर जुगनुओं की टिमटिमाहट असीम थी,
मन बहलाये ऐसा साधन नहीं था पर दादी की कहानियाँ बेहतरीन थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।
हवाई जहाज़ में उड़ना नहीं था पर सपनों की उड़ान आसमानी थी,
विदेशों में घूमना नहीं था पर अपने मोहल्ले में ही दुनिया पूरी थी,
मोटर कार नहीं था पर अपनी साइकिल भी नहीं किसी से कम थी,
जीवन में सफल नहीं था पर अभाव में भी ख़ुशियाँ बेहिसाब थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।
ज़िंदगी का तज़ुर्बा नहीं था पर जीने की समझ कहीं ज़्यादा थी,
सयाना नहीं था पर बचपन में हँसी बेशुमार थी,
जीवन आसान नहीं था पर जीने में सरलता थी,
कल का प्रावधान नहीं था पर ज़िंदगी आज की सुकून थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।
हेमंत कुमार मिश्रा
अक्टूबर 9, 2024