चित्त[1] का परिघटनाशास्त्र[2] (भूमिका: संज्ञान पर)
चित्त[1] का परिघटनाशास्त्र[2] (भूमिका: संज्ञान पर)
[1] चित्त = mind (or thought), and spirit as a universal mind.
[2] परिघटनाशास्त्र = Phenomenology. परि + घटना + शास्त्र
परि = दार्शनिक या अनुभव से जुड़े सन्दर्भों में इसका मतलब हो सकता है — "किसी अनुभव या वस्तु के दायरे में", "उससे संबंधित", या "उसके चारों ओर होने वाली बातों से जुड़ा।"
घटना = कोई बात जो होती है, जैसे कोई वाक़या, हादसा, या पेश आने वाली चीज़। कभी-कभी इसका मतलब किसी ऐसे अनुभव या चीज़ से भी होता है जो सीधे नज़र तो आए, लेकिन पूरी तरह समझ में न आए — यानी 'परिघटना' या 'phenomenon'
शास्त्र = विज्ञान, व्यवस्थित अध्ययन। क्योंकि जिस शब्द का अनुवाद किया जा रहा है वह ‘phenomenology’ (यानि phenomenon + logy का मेल) है, इसलिए हम ‘तर्कशास्त्र’ और ‘अर्थशास्त्र’ के अनुरूप ‘शास्त्र’ का इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि आधुनिक शब्द ‘विज्ञान’। ‘विज्ञान’ शब्द हमने सिर्फ़ ‘science’ के लिए रखा है।
जर्मन शीर्षक Phänomenologie des Geistes का 1910 में अंग्रेजी में बैली नें Phenomenology of Mind के रूप में अनुवाद किया था, और फिर 1950 में मिलर ने इसका Phenomenology of Spirit के रूप में अनुवाद किया। इस पृष्ठभूमि में ‘आत्मा’ के बजाय ‘चित्त’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, ताकि इसे सिर्फ निजी मन नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सोच और उसकी ऐतिहासिक वास्तविकता के रूप में समझा जा सके।
उस रचना का एक वैकल्पिक शीर्षक है: "चेतना के अनुभव का विज्ञान"।
इमैनुएल काँट ने अपनी किताब क्रिटीक ऑफ प्योर रीज़न में यह दिखाया था कि तर्क और बुद्धि का दायरा केवल प्रतीति (phenomena) तक सीमित है — यानी वे चीज़ें जो हमारी इंद्रियों के ज़रिए अनुभव में आती हैं और जो प्रत्यक्षता और समझ की श्रेणियों से आकार पाती हैं। जो वस्तु अपने-आप में है (thing-in-itself), जिसे नौमेनन कहते हैं, वह हमारे ज्ञान की पहुँच से बाहर है। इसी वजह से ईश्वर, चित्त, आदि जैसे विषयों को तर्क और अनुभव के सहारे समझना संभव नहीं माना गया।
हेगेल की किताब फेनोमेनोलॉजी ऑफ स्पिरिट में “चित्त” को एक स्थिर या अपने-आप-में वस्तु की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत और गतिशील प्रक्रिया की तरह समझाया गया है — ऐसी प्रक्रिया जिसमें यथार्थ (actuality) न केवल अस्तित्व में आता है, बल्कि हमारे लिए अर्थपूर्ण भी बनता है। चित्त कोई जड़ सत्ता नहीं, बल्कि वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए चेतना स्वचेतन बनती है, और इस तरह से विषय (subject) और वस्तु (object) के बीच की दीवार टूटती है।
हेगेल यह दिखाते हैं कि तर्क और विचार-प्रक्रिया का उपयोग चित्त के द्वन्द्वात्मक विकास को समझने के लिए किया जा सकता है — जिससे उसकी अंदरूनी संरचना और सृजन-शक्ति उजागर होते हैं।
यह उजागर होना, यानी चित्त का अपने आप को प्रकट करना, विषय और वस्तु के बीच के फासले को सीधा मिटाता नहीं, बल्कि उसे एक उच्चतर एकता में बदल देता है। इस ज्ञान का अनुभव करते हुए, मानव चेतना — या कहें कि चित्त — धीरे-धीरे और विकसित होता जाता है, और ज़्यादा समग्र और गहरा रूप लेता है।