अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषाशिक्षण तथा साहित्य चिंतन की पत्रिका (ISSN: 0435-1460)

पत्रिका के बारे में

‘गवेषणा’ केंद्रीय हिंदी संस्थान की सबसे पुरानी त्रैमासिक शोध पत्रिका है। इस पत्रिका का प्रकाशन संस्थान द्वारा 1962-63 के दौरान आरंभ किया गया था। पहला अंक जनवरी 1963 में प्रकाशित हुआ। इसे हिंदी अकादमिक जगत में अत्यंत सम्मान और प्रतिष्ठा हासिल है।

आरंभ में यह पत्रिका अर्धवार्षिक रूप में प्रकाशित होती थी। बाद में इसकी प्रकाशन अवधि त्रैमासिक कर दी गई। गवेषणा में अनुप्रयुक्त हिंदी भाषाविज्ञान, भाषाशिक्षण, शिक्षण प्रविधि और साहित्य चिंतन से संबंधित अधिकारी विद्वानों एवं शोधार्थियों द्वारा लिखे गए शोधपत्र, चिंतनपरक आलेख, पुस्तक समीक्षाएँ और हिंदी अकादमिक जगत की गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण समाचार आदि समाहित रहते हैं। समय-समय पर हिंदी भाषा ,साहित्य, भाषाविज्ञान, भाषाशिक्षण आदि क्षेत्रों से जुड़े प्रासंगिक विषयों तथा अनेक लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों तथा भाषाविदों पर केंद्रित इसके विशेषांक प्रकाशित होते रहे हैं जो पाठकवर्ग के लिए संग्रहणीय रहे हैं।

अब तक इस पत्रिका के कुल 115 अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

यह पत्रिका यूजीसी-केअर सूची में सम्मिलित है।

गवेषणा के प्रकाशित अंक