हिन्दी-साहित्यकार एवं ध्यान-योगी श्री ईशान महेश के आध्यात्मिक उपन्यास ‘रघुवंशनाथम्’ के अब तक आठ खंड प्रकाशित हो चुके है। नौवाँ खंड सृजन-प्रक्रिया में है।
रघुवंशनाथम्
1. वचन
2. परीक्षा
3. भरत की साधना
4. चित्रकूट के घाट पर (in part-5)
5. वन-वन में राम
6. शूर्पणखा के राम (in part-7)
7. सीताहरण
8. रामबाण
9. सिय सुधि लाए
भगवान कृष्ण के जीवन-दर्शन पर दो खंड प्रकाषित हो चुके हैं:
कृष्ण एक रहस्य
मुझे कृष्ण चाहिए
The Mystery of Krishna
‘वचन’ ईशान महेश द्वारा सृजित महाकाव्यात्मक उपन्यास श्रृंखला ‘रघुवंशनाथम्’ का पहला भाग है। उपन्यास का आरंभ दशरथ की युवावस्था के एक अति संवेदनशील घटनाक्रम से होता है। इसकी कथा विश्वामित्र के द्वारा राम को राक्षसों से रक्षा के लिए दशरथ से माँगे जाने और राम द्वारा राक्षसों से यज्ञ की रक्षा तथा ताड़का वध पर केंद्रित है। विश्वामित्र, राम का बहुत बारीकी से निरीक्षण परीक्षण कर रहे हैं और राम को उपयुक्त पात्र के रूप में देखने के बाद वे उनको अतीन्द्रीय रूप से दिव्यास्त्र प्रदान करते हैं। वे राम को शक्ति संतुलन को स्थापित करनेवाले एक वीर और धीर योद्धा के रूप में देख रहे हैं।
सीता स्वयंवर के प्रसंग को इसमें वास्तविक तथा बहुत ही रोचक रूप में दिखाया गया है। इस प्रसंग को पढ़ने के बाद पाठक के लिए दिव्य अस्त्रों के संबंध में जानकारी का एक नया ही द्वार खुलता है।
उपन्यास के अंत में कैकेयी के द्वारा दशरथ से अपने दो वरों का माँगना और उन वरों को सुनकर दशरथ की मार्मिक मन;स्थिति को बहुत ही सूक्ष्म तल पर उकेरा गया है। कुल मिलाकर ‘वनवास’ पाठक को एक ऐसे राम के निकट लाकर खड़ा कर देता है, जिसकी कथा तो पारंपरिक है; किंतु राम का इस कोण से देखा जाना बिल्कुल ही नया अनुभव है।
‘परीक्षा’ ’रघुवंशनाथम्’ का दूसरा भाग है। इसकी कथावस्तु राम के चौदह वर्ष के वनवास और भरत को अयोध्या का राजा बनाए जाने के अनपेक्षित वरदान के चारों ओर घूम रही है। इस घटना को आज तक हम यूँ ही सुनकर आगे बढ़ते गए हैं ; किंतु यह उपन्यास बताता है कि यह एक ऐसी अनहोनी थी, जिसने अयोध्या के प्रत्येक मनुष्य को हिला कर रख दिया था। वे कौन से कारण थे, जिनके रहते दशरथ आपात् स्थिति में राम का राज्याभिषेक करना चाह रहे थे? वह कौन-सी नकारात्मक शक्ति थी, जिसने कैकेयी को अपने पुत्र भरत से भी प्रिय लगनेवाले श्रीराम को वनवास देने के लिए बाध्य किया? सारी अयोध्या को यह घटना ऐसा घाव देकर गई, जिसकी पीड़ा सभी के लिए असहनीय रही। रामकथा के अनेक अनछुए प्यारे पात्रों के दिव्य रूप को, यह उपन्यास किसी स्वप्नलोक के समान दिखाने में सफल हुआ है। राम और केवट का अति संवेदनशील प्रसंग इस उपन्यास में अपने गहरे रहस्यात्मक रूप में उभर कर सामने आया है। केवट को राम के परमात्मा रूप का पता कैसे चला? इसका उद्घाटन इस उपन्यास में देखते ही बनता है। दशरथ का विलाप तथा अन्य अनेक मार्मिक तथा हृदय को छू जानेवाले प्रसंग इस उपन्यास में बहुत ही खूबसूरती के साथ पिरोए हुए हैं। इस उपन्यास के शिल्प ने श्रीराम के सौंदर्य की प्रतिमा को भक्तों और कथा-प्रेमियों के लिए भावपूर्ण होकर उद्घाटित किया है। यह एक ऐसी रचना है जिसे पढ़कर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी दिव्य जगत् की सैर करके आए हैं या किसी रेगिस्तान में मीठे जल का कोई सरोवर आपको मिल गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि लाभ-हानि, सुख-दुख, यश-अपयश ये सब विधाता के हाथ हैं। इस महावाक्य के दर्शन ‘भरत की साधना’ उपन्यास में हो रही हैं। भरत अपने ननीहाल से अयोध्या लौटते हैं और देखते हैं कि वहाँ अनहोनी घट गई है। कोई यह स्वीकार नहीं कर पर रहा है कि भरत सर्वथा निर्दोष और निष्पाप हैं। तात्कालीन परिस्थितियों में उनको श्रीराम के वनवास का दोषी मानकर, भारी कलंक झेलना पड़ा। समाज में घोर अपयश मिला। पिता का देहांत हो चुका है, माताएँ शोक से रो-रोकर बेहाल हैं। राम को चौदह वर्षों के लिए राज्य से निष्कासित कर, वनवास दे दिया गया है। अयोध्या में अराजकता की स्थिति हो गई है। अयोध्यावासी इस महान् दुर्घटना के पीछे भरत का षड्यंत्र ही देख रहे हैं और उनका सारा व्यवहार भरत को अपराधी घोषित कर रहा है। भरत को ऐसा लग रहा था कि अयोध्या का एक-एक कण उनको षड्यंत्रकारी के रूप में देख रहा है। उनके लिए अयोध्या में किसी से आँखें मिला पाना भी दुष्कर हो गया था। कोई इस बात को पचा ही नहीं पा रहा था कि भरत निष्पाप और निर्दोष है। उनको अपनी जननी कैकेयी के द्वारा दशरथ से माँगे जानेवाले वरों की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। ऐसी विकट स्थिति में भरत की कठोर परीक्षा हो रही है। उन्हें ऐसे समय में सबकुछ साधना है। यह काल उनकी साधना का प्रखर काल है। उनकी साधना अपयश के कलंक को धोकर; धर्मपूर्वक अपना कर्तव्यपालन करने की है। उनकी तपस्या में विधाता ने पग-पग पर काँटे बिछाए हुए हैं। उनके लहुलुहान पगों में वे काँटे तब तक चुभते रहते हैं, जब तक कि वे चित्रकूट में श्रीराम के श्रीचरणों में अपना शीश नहीं नवा लेते। यहाँ उनको आत्मग्लानि और अपराध-बोध से मुक्ति मिलती है और अपनी भातृभक्ति की साधना का फल प्राप्त होता है।
सीता के पिता सीरध्वज, सम्राट जनक को ‘विदेह’ क्यों कहा जाता है, इसका स्पष्टीकरण यह उपन्यास सूक्ष्म तथा गहरे अर्थवाली घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास त्याग, तपस्या और चिंतन का प्राण है।
रघुवंशनाथम् भाग-4
(This novel is included in Van-Van me Ram)
चित्रकूट के घाट पर
इस उपन्यास में भरत के द्वारा श्रीराम को चित्रकूट से अयोध्या लौटाने के विभिन्न प्रयासों और उपायों का मार्मिक चित्रण है। भरत का राम के पास अयोध्या के अति विशिष्ट जनों के साथ पहुँचना तथा उनको अयोध्या लौटने के लिए अनुनय-विनय करना, विलाप करना तथा अपने निर्दोष होने की बात कहना-ये सभी प्रसंग इस उपन्यास के प्राण है। इस खंड में चित्रकूट को त्यागकर सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम का वनों की गहराइयों में प्रवेश आरंभ हो जाता है। वनवास की इस यात्रा में राम राक्षसों के आतंक और अत्याचार को अपनी आँखों से देखते हैं। वे देखते हैं कि राक्षसों के आतंक के कारण समाज का ऋषि, वनवासी और आदिवासी वर्ग त्रस्त और भयभीत है। राम हृदय से उनके कष्ट और दुखों को अनुभव करते हुए हैं। वे यह स्पष्टतापूर्वक देख रहे हैं कि वह क्षत्रिय समाज जिसे जनमानस की रक्षा का कार्य सौंपा गया था-वह या तो राक्षसों के हाथों बिक चुका है या उससे भयभीत हो गया है। ऐसे में वे धरती से राक्षसों के नाश की प्रतिज्ञा करते हैं। इस खंड में राक्षसों के अत्याचार और राम के द्वारा उस अत्याचार के प्रतिकार तथा उनकी तेजस्विता का अति सार्थक चित्रण हुआ है। इन सारी संघर्षपूर्ण और भयावह परिस्थितियों में भी सीता, राम और लक्ष्मण के वैचारिक और हास्यपूर्ण संवादों से यह उपन्यास सुगंधित है।
रघुवंशनाथम् भाग-5
("Chitrakoot Ke Ghat Par" also included)
वन-वन में राम (INR 1100 INR 999)
VIDEO: https://youtu.be/DKV03Cchu3g
एक सहजए स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि राम 14 वर्ष वनों में रहे तो उन वर्षों में उन्होंने वनों में क्या किया। किस प्रकार वे जीवन व्यतीत करते थे। कैसा उनका रहन-सहन होता था। किन-किन लोगों से मिलते थे। क्या दृश्य देखते थे। किस प्रकार का भोजन करते थे। वनों के लोगों का उनके प्रति क्या दृष्टिकोण था। ऐसे ही बहुत सारे प्रश्न हमारे सामने मुँह बाए खड़े होते हैं। यह बात सदियों से चर्चा का विषय रही है कि क्या लक्ष्मण विवाहित थे? इस खंड में इस बात का सटीक उत्तर दिया गया है। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के द्वारा की जा रही तपस्या के माध्यम से पाठक इस बात के मर्म को जान सकेंगे। भरत की पत्नी माण्डवी, एक सामान्य राजपुत्री और पत्नी के समान भरत को उनके संकल्प से डिगाना चाहती है; किंतु भरत अपने उत्तरों के माध्यम से उसे सहज कर देते हैं। वनों में राम और सीता की बातचीत अति महत्वपूर्ण है। सीता के माध्यम से उन प्रश्नों को पूछा गया है जो अनेक लोग सदियों से राम के संबंध में पूछते आए हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? वैसा क्यों किया? उन सभी प्रश्नों के जो उत्तर राम देते हैं, उनको देखकर यही लगता है कि राम के अतिरिक्त ऐसा उत्तर कोई अन्य दे ही नहीं सकता। इस उपन्यास में राम के व्यक्तित्व को देखकर पता चलता है कि वास्तविक वीर कैसा होता है? सच्चा क्षत्रिय कौन होता है? षस्त्र धारण करने का अधिकारी कौन है? इन सभी प्रश्नों के उत्तरों को देता हुआ, यह उपन्यास आगे की यात्रा पर निकलता है। आइए, हम भी राम के साथ वन-वन डोलें।
रघुवंशनाथम् भाग-6
(This novel is included in Sitaharan)
शूर्पणखा के राम
इसमें शूर्पणखा की दृष्टि से देखे गए राम हैं। शूर्पणखा ने जबसे राम को देखा; तब से वह उनके प्रति एकतरफा प्रेम में ऐसी खो गई कि अपनी सब सुध.बुध खो बैठी। इस उपन्यास में शूर्पणखा के मन की वेदना का बहुत ही सार्थक और मार्मिक चित्रण हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम किस प्रकार इस विकट परिस्थिति को बड़ी सहजता के साथ सँभाल रहे हैं य इसका वर्णन देखते ही बनता है। शूर्पणखा की क्रूरता और कामुकता का कहानी इस खंड में अपने चरम पर है। क्या शूर्पणखा शुरू से ही राक्षसी स्वभाव की थी? वे कौन-सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने शूर्पणखा के मन को पत्थर जैसा कठोर और तलवार जैसा धारदार बना दिया था? क्या शूर्पणखा लंका का और रावण का विनाश चाहती थी? शूर्पणखा अपने अपमान का प्रतिशोध रावण से लेना चाहती थी या राम से? विभीषण क्यों राम के पक्षधर थे और रावण के विरोधी? मंदोदरी का चरित्र कैसा था? क्यों रावण सीता का अपहरण करना चाहता था? कुंभकर्ण, मेघनाद का चरित्र कैसा था? ऐसे अनेक अलसुलझे प्रश्न हैं; जिनके घटना के हिसाब से यह उपन्यास उत्तर देता चलता है। झँरोंखे साथ-ही-साथ यह उपन्यास अपने नाम शूर्पणखा के राम के माध्यम से बहुत कुछ अनकहा कह रहा है। आइए, काम की लपटों से घिरे इस झँरोंखे से शूर्पणखा के मन में झाँकें ।
रघुवंशनाथम् भाग-6+7
("Shrupnakha ke Ram" also included)
सीताहरण (INR 999)
सीताहरण उपन्यास में रावण के अहंकार, उसकी कामवासना, विलासी कुमार्गगामी जीवन और कुटिल बुद्धि का बहुआयामी चित्रण हुआ है। राक्षसों के राजा के रूप में रावण का लंका में क्या स्थान था? एक शक्तिशाली राष्ट्र का राजा होने पर उसकी नीति क्या थी? राम को रावण किस दृष्टि से देखता था? क्यों वह सीता का अपहरण छलपूर्वक करना चाहता था? और इसके साथ-ही-साथ युगों से उठते एक सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर यह उपन्यास देता है कि क्यों रावण ने सीता को एक बार भी नहीं छुआ? अनेक रावणप्रेमी इस बात को आधार बनाकर उसके चरित्रवान होने की घोषणा करते हैं। किंतु क्या वह वास्तव में चरित्रवान था? या कोई अज्ञात भय उसे सीता को छूने से रोक रहा था? यदि कोई भय था तो वह क्या था? यहाँ हम एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि लेखक ईशान महेश ने शाप के द्वारा रावण के सिर फट जाने की बात को नकार दिया है और उसके स्थान पर जो मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक उत्तर दिया है, वह इन सारी अनसुलझी गुत्थियों को सुलझा देता है।
जिस समय विश्वामित्र राम को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए दशरथ से माँग कर ले गए थे; तब से मारीच राम का षत्रु था। राम ने उसकी माँ ताड़का का वध किया था। इस प्रतिशोध की अग्नि में उसने अनेक बार राम की हत्या के प्रयत्न किए और हर बार राम ने उसको जीवित छोड़ दिया। इन सब बातों का चिंतन करने के उपरांत उसका हृदय परिवर्तन होता है और उसी समय रावण सीताहरण के लिए मारीच को अपने षड्यंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग बनाने का आदेशात्मक प्रस्ताव देता है। उस समय मारीच के संवादों की रहस्यात्मकता देखते ही बनती है।
सीता जैसी उच्च चरित्र से संपन्न संकल्पवती नारी के मन में नकारात्मक ऊर्जा लगाई गई सेंध हमें बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश करती है।
इस उपन्यास का एक अनूठा अलंकार सीताहरण के लिए रचे गए स्वर्णमृग की सृजनशीलता है। वास्तव में वह स्वर्णमृग क्या हो सकता था ; जिसको मारीच ने अपनी माया से रचा था। उसका रहस्योद्घाटन यह उपन्यास अपने पूर्ण कौशल के साथ करता है। जटायु का वध तथा राम का सीता से विरह होने की स्थिति में उनकी वेदना का मार्मिक तथा अति संवेदनशील वर्णन पढ़कर पाठक अति भावुक हो उठता है।
इस उपन्यास में उन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर हैं जो आज तक जनमानस को द्वंद्वग्रस्त करते रहे हैं। जिसमें मूल प्रश्न है कि राम ने वाली को छिपकर क्यों मारा? क्या राम के द्वारा वाली को इस प्रकार छिपकर मारे जाना उचित था? वह कौन सा शाप था, जिसके कारण वाली ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जा सकता था? वह कौन सा वरदान था, जिसके कारण वाली अपने सामने वाले की आधी शक्ति का हरण कर लेता था? वाली के वध के बाद उसकी पत्नी तारा ने सुग्रीव से विवाह क्यों कर लिया? संदेह ग्रस्त होकर सुग्रीव ने राम की परीक्षा क्यों ली? लंका में बंदिनी सीता किस प्रकार का जीवन व्यतीत कर रही थी? रावण और उसकी पत्नी मंदोदरी के आपसी संबंध कैसे थे? बाली और रावण के क्या संबंध थे? इसके साथ-साथ इस खंड में सुग्रीव, वाली, हनुमान, सीता, तारा इत्यादि पात्रों के मन के गहरे द्वंद्व उभरकर सामने आए हैं। हनुमान और राम की प्रथम भेंट भी इसी खंड में है। राम और हनुमान की प्रथम भेंट का वास्तविक और सटीक वर्णन देखते ही बनता है। यह वर्णन एक अपूर्व दिव्य सौंदर्य को दर्शाता है। इसके बाद इस खंड में वानर दलों के द्वारा सीता की खोज का कार्य दिखाया गया है। विशेष आकर्षण का केंद्र तो वह दल है, जो दक्षिण दिशा में गया है और जिसके प्रमुख पात्र हनुमान रहे।
कुल मिलाकर रामबाण उपन्यास आजतक हमारी बुद्धि के अनेक अनसुलझे प्रश्नों को सुलझाने की सुंदर और सार्थक क्षमता लिए हुए है।
रघुवंशनाथम् भाग-9
सिय सुधि लाए (INR 1,200)
इस आध्यात्मिक उपन्यास सिय सुधि लाए में संपूर्ण सुंदरकांड की सुगंध समाई है।
यह हनुमान जी के बजरंगबली बनने की दिव्य यात्रा है; उनके अनूठे पुरुषार्थ की जीवंत प्रतिमा है। प्रत्येक हनुमान भक्त के लिए तो यह उपन्यास रामबाण औषधि है।
कृष्ण एक रहस्य
आध्यात्मिक उपन्यास (INR 499/-)
कृष्ण एक रहस्य जब मुझसे लिखा जा रहा था; तब उस पूरे काल में मैंने यह अनुभव किया कि मैं बाँसुरी हो गया हूँ। बाँसुरी होने की आत्मा को मैंने दिव्य रूप में अनुभव किया। मैंने देखा कि उसमें से जो संगीत झर रहा है, वह आ तो मुझमें से होकर तो आ रहा है ; किंतु मैं भली-भांति जानता हूँ कि उसमें बहती प्राणवायु मेरी नहीं हैं। जिन अधरों पर यह बाँसुरी रखी है, उसके छिद्रों पर जो अंगुलियाँ नृत्य कर रही हैं और शब्दों का जो महारास हो रहा है-यह सब कृष्ण की विराट् ऊर्जा से अनुप्राणित है। इस उपन्यास का आधार कृष्ण और सुदामा की सुप्रसिद्ध पारंपरिक लोक-कथा है। इस कथा में मैंने ध्यान के अनुभवों को समोने का आनंद लिया है। सुदामा को यादव शिरोमणि श्रीकृष्ण के पास उनकी पत्नी ने भेजा तो आर्थिक सहायता प्राप्ति के उद्देश्य से था ; किंतु द्वारका पहुँचकर सुदामा ने देखा कि जिस कृष्ण को वे अभी तक अपना बालसखा समझे बैठे थे--वह तो करुणा, प्रेम, भक्ति, न्याय, सत्य, ज्ञान,रस, योग और भोग की पराकाष्ठा हैं। सुदामा बाकि सबकुछ भूल कर कृष्ण की थाह लेने में जुट जाते हैं। अपने इस खोजी अभियान में वे कृष्ण का पार तो पा नहीं पाते ; अपितु यह अनुभव करते हैं कि कृष्ण उनकी प्रत्येक श्वास में आ बसे हैं और वे पूर्णतः कृष्णमय हो चुके हैं। कृष्ण उनके मन के उठनेवाले अनेक जटिल प्रश्नों के मौलिक उत्तर देकर उनकी प्यास बुझा रहे हैं। अंततः सुदामा नतमस्तक हो यह स्वीकार कर लेते हैं कि वे कृष्ण के विराट् रूप को बुद्धि के द्वारा तो जान ही नहीं सकते ; किंतु उनके प्रेम की गंगा में नित् स्नान कर आनंदित तो हो ही सकते हैं। इस उपन्यास के संगीत ने मेरी चेतना को मंत्रमुग्ध कर दिया। मधुराधिपति भगवान् श्रीकृष्ण का सब कुछ मधुर है। मैं अस्तित्व के प्रति अहोभावपूर्ण हूँ कि उसने मुझे कृष्ण के रहस्य जगत पर लिखने के लिए चुना।
मुझे कृष्ण चाहिए
आध्यात्मिक उपन्यास (INR 495/-)
इस उपन्यास में उन गालियों का लेखा-जोखा है; जो कृष्ण को चुनने पर; अर्जुन को पड़ी थीं। संसार को छोड़कर जो भगवान को चुनता है; समकालीन समाज उसे इस चयन के लिए कभी क्षमा नहीं करता। इस सनातन सत्य को समझने के लिए यह उपन्यास अनूठा है। गूढ़ भक्ति से परिपूर्ण यह आध्यात्मिक उपन्यास प्रत्येक भक्त और साहित्य प्रेमी के लिए गंगाजल के समान है। इसमें अर्जुन की आँख से देखे गए कृष्ण हैं
THE MYSTERY OF KRISHNA
English Translation of "Krishna Ek Rahasya" (INR 699/-)
The Mystery of Krishna...
is a song of gratitude towards the Supreme Power. It is also like a remedy for those whose minds are always occupied with varied unknown thoughts that it don’t let them rest for a while. This tale of Krishna and Sudama has all the situations, human emotions and relationships depicted with utmost beauty and authenticity, is enough to enthrall the heart and soul of the reader; still singing the divine song in the background.
महानुभावों के उद्गार
ईशान महेश के आध्यात्मिक उपन्यासों को पढ़ते-पढ़ते आपको लगेगा कि भगवान राम और कृष्ण की दिव्य ऊर्जा आपके हृदय-क्षेत्र में प्रवेश कर रही है।...इन उपन्यासों में हृदय की संवेदनशील वीणा की झंकार अनुपम संगीत उत्पन्न कर रही है।
■ पंडित राजन-साजन मिश्र
Eeshaan Mahesh has unfolded those secrets in his mysterious mythological novels which were never expressed before...
Ma Madhu* (Hrishikesh, INDIA)
*Ma Madhu is the first disciple of Zen Master OSHO
दो शब्द प्रकाशक की तरफ से...
राम जी की दिव्य ऊर्जा से अनुप्राणित होकर हिंदी-साहित्यकार तथा ध्यान-योग के मार्गदर्शक ईशान महेश के द्वारा आध्यात्मिक उपन्यास 'रघुवंशनाथम' पिछले बीस वर्षों से लिखा जा रहा है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को ईशान जी ने अपने उपन्यासों में कलात्मक, उदात्त और गरिमामयी रूप में प्रस्तुत किया है।
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