कोहबर पेंटिंग
यह कोहबर पेंटिंग का उदहारण है इस प्रकार की कोहबर पेंटिंग पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बनाई जाती है
Education for future
यह कोहबर पेंटिंग का उदहारण है इस प्रकार की कोहबर पेंटिंग पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बनाई जाती है
प्रस्तुत शोध में शोधकर्ता ने आदिवासी शिक्षा को संदर्भित कर अपना लेख प्रस्तुत किया है, जिसमे आदिवासी शिक्षा की वर्त्तमान स्थिति एवम भविष्य की बात की गई है कि वर्त्तमान अन्धकार की स्थिति से निकल कर भविष्य के प्रकाश के मार्ग पर चल सके और सामाजिक निम्न वर्ग से निकल कर आदिवासी समाज मुख्य धारा में जुड़ जाये, जो देश की प्रगति में बराबर का भागीदार बन जाये, एवम आदिवासी शिक्षा से सम्बंधित जीतनी भी योजनाये है उनका सफल सञ्चालन हो, जो आदिवासीओ को संबैधानिक आधिकार प्राप्त है उनका उन्हें ज्ञान हो जाय जिससे उनका शोषण न हो सके और वे अपनी परम्परा एवम संस्कृति को संरक्षित कर सके और उनके गौरवपूर्ण इतिहास का साक्षी वर्त्तमान समाज बने एवम आने वाली हमारी पीढ़ीया भी रूबरू हो सके |
“जब एक किसान अपने हाथो में बन्दुक उठता है, तब पुराने मिथक धुधले पड़ने लगते है और एक एक करके वर्जनाए विस्मृत होने लगाती है | एक विद्रोही का हथियार उसकी इंसानियत का सबूत है”- ज्या पाल् सात्रे (रेचेड आफ दि अर्थ की भूमिका)
मानव एक समाजिक प्राणी है वह समाज में जन्म लेता है तथा समस्त सामाजिक क्रिया कलाप करते हुए वही पर मृत्यु को प्राप्त होता है | मनुष्य अपने सवतंत्र अस्तित्व के साथ समाज के हित को ध्यान में रखकर एक साथ जीवन यापन कर मानवता का परिचय देता है कोई भी समाज तभी तक संगठित रहता है जब तक की उस समाज में सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है चुकी विकास हेतू, उस समाज की सामाजिक व्यवस्था को जानना अति आवश्यक है उस समाज की सामाजिक स्तर को पहचान कर उसको ऊचा उठाने हेतू शिक्षा एक महत्वपूर्ण इकाई के रूप में कार्य करती है |
शिक्षा ही वह साधन है जिसके माध्यम से हमारे जैसे आधुनिक समाज में व्यक्ति और वर्ग सामाजिक परिवर्तन लाते है | शिक्षा सामजिक व्यवस्था के पुनर्निर्माण का भी माध्यम है जो सामान्यत: पदानुक्रम रूप में व्यवस्थित है और जहा सर्वत्र असमानताए व्याप्त है भारतीय समाज में, जो अनिवार्य और एतिहासिक रूप से जातीय आधार पर संरचित है, जहा सामाजिक असमनाताये प्राथमिक तौर पर जातीय आधार पर बनती और नए सिरे से पनपती रहती है सामाजिक हैसियत राजनितिक भागीदारी और शैक्षिक अवसरों के संदर्भ में कुछ जातीया विशेषाधिकार प्राप्त है और कुछ नहीं है अनुसूचित जनजातियो जैसी जातीया जो विशेषधिकार से वंचित है वे परम्परागत पेशेवर वर्गीकरण के सबसे निचले पायदान पर है और उन्हें विशेषकर ग्रामीण समाज में आमतौर पर समाज की स्थानिक एवं सामजिक सीमायों से दूर रखा जाता है इसी तरह मोते तौर पर भारतीय समाज में हाशिए पर रहा एक वर्ग अनुशुचित जनजातियो का है जो भौगोलिक रूप से अलग थलग,तथा कथित व्यवस्थित मुख्यधारा सभ्य समाज से दूर जंगलो पहाड़ो और दुर्गम इलाकों में अपनी अनोखी संस्कृतियों धार्मिक पद्तीयो भाषायो और जीवन शैलियों के साथ रहती है झा एक इस वर्ग का जीवन भारतीय समाज के अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न है वही उनके जीवन में आसपास की प्राकृति के साथ एक अनोखी समकालिक भी है हलाकि भौगिलिक अलगाव के कारण विकसित समाज के सामजिक आर्थिक राजनितिक एवम शैक्षिक क्षेत्रो में इन वर्गो की भागीदारी भी असमान रही है |
इसके परिणाम स्वरूप, ये जनजातीय कई दशको और सदियों तक सामाजिक आर्थिक विकास के हाशिये पर है और पराधीन एवम वंचित जीवन बिताने को बाध्य है, ये जनजातीय सामाजिक मुख्यधारा से भी बिल्कुल अलग थलग रही है | हालांकि स्वाधीनता के पश्चात्, भारत को लोकतान्त्रिक समाज बनाने, सभी नागरिको को उनकी सामाजिक पहचान और उनके वर्ग की परवाह किए बगैर, समान अधिकार प्रदान करने से जाहिर तौर पर शिक्षा सहित सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रो में उनकी भागीदारी की स्थिति में सचमुच आमूल चुल बदलाव आया है हालांकी एतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की तुलना में समाज और शैक्षिक क्षेत्र में इस वर्ग की समावेशिता का स्तर भिन्न रहा है
जनगणना २०११ के आकड़े के आधार पर जनजातीय समुदाय की साक्षरता दर 58.96% है जबकि अन्य सामजिक वर्ग जिसकी साक्षरता दर 72.99% है अन्य सामजिक वर्ग और जनजातीय वर्ग के मध्य साक्षरता अंतराल 14.03% का है | जबकि जनजातीय समूह के विद्यार्थियों तक शिक्षा की पहुच या शिक्षा तक जनजातीय विद्यार्थियों की पहुच सके | प्राथमिक स्तर तक 11.00%, उच्च प्राथमिक स्तर तक 8.7%छात्र तथा माध्यमिक स्तर तक 6.4% ही छात्रो का नामांकन हुआ है या शिक्षा तक पहुच हुई है| वही सकल नामांकन अनुपात (जी इ आर ) 2010-2011 में सभी सामाजिक समूह का 119.8% है तथा वाही जनजातीय समूह का 86.5% है अगर जनजातीय समूह में उच्च शिक्षा में सकल नामंकन अनुपात की बात करे तो वह मात्र 10.5% ही है, जो निम्न स्तर है, जनजातीय समूह में बालिकायो तक शिक्षा की पहुच 100 बालको के अनुपात में मात्र 91बलिकयो तक ही है |
ये विभिन्न आकड़े जनजातीय समूह में शिक्षा के स्तर और उनकी शिक्षा तक पहुच को प्रदर्शित करता है, जो उनकी वर्त्तमान शिक्षा की स्थिति को प्रदर्शित करते
है,वाही जनजातीय समूह में अपव्यय एवम अवरोधन दोनों समस्याए विद्यमान है कक्षा 1 से 10 के मध्य तक 78.9% विद्यार्थी बीच में ही स्कुल को छोड़कर चले जाते |
(1) जनजातीय लडको एवम लडकियों हेतू छात्रावास–लडको के वेहतर आवासी सुबिधा उपलब्ध कराने के उद्येश्य से 1989-90 में छात्रावास की शुरुआत की गई जबकि लडकियों हेतू 2000-2001 के दौरान छात्रावास निर्माण का कार्य किया गया |
(2)आश्रम विद्यालय – यह योजना 1990-91 में शुरू हुई थी इसमे जनजातीय बच्चो को शिक्षा देने की व्यवस्था की गई
(3)जनजातीय क्षेत्रो में व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र – इस योजना का उद्देश्य विभिन्न पारम्परिक आधुनिक व्यवसाय में उनके शैक्षिक योग्यता के अनुसार वर्तमान आर्थिक रुझानो तथा बाजार क्षमता के आधार पर जनजातीयो के कौशल का उन्नयन करना है |
(4)जनजातीय लड़कियों के बीच शिक्षा सुदृढ़करण – यह सरकार की जेंडर आधारित योजना है इस योजना का उद्देश्य पहचाने गए जिलो एवम ब्लाको में जनजातीय लडकियों को 100% नामांकन की सुबिधा के माध्यम से जनजातीय महिलायों के बीच शिक्षा स्तर के अंतर को समाप्त करना तथा शिक्षा के अपेक्षित के परिवेश के सृजन द्वारा शिक्षा बीच में छोड़ने की दर को कम करना है |
शिक्षा का अधिकार अधिनियम एवम् आदिवासी शिक्षा- भारतीय संबिधान के अनुच्छेद 21(क) में शिक्षा के अधिकार अधिनियम को 1 अप्रैल 2010 को जोड़ा गया, यह 6 से 14 वर्ष के बालको को निःशुल्क एवम अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है |
शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागु हो जाने के पश्चात् जनजातीय समूह की शिक्षा में आमूल परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है खास जनजातीय समूह के बालको सकल नामांकन अनुपात प्रारंभिक शिक्षा में जो 119.81 है इस बात को परिणाम है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रभावी होने के पश्चात् जनजातीय शिक्षा में वृद्धि हुई |
कल में आदिवासी शिक्षा की बात की जाय तो वह वर्त्तमान के अन्धकार से निकल कर प्रकाश के मार्ग पर चल पड़ी है बस उसे सही रास्ते दिखाने की जरुरत है जिससे इस समाज की शैक्षिक स्थिति अच्छा से वेहतर हो सके |उपर्युक्त योजनाओ के प्रभावों एवम क्रियान्वयन का अध्यन के पश्चात् कहेगे की इन क्रियान्वित योजनाओ के माध्यम से जनजातीय शिक्षा में सुधार के अथक प्रयास जरी है जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते है वशरते इन योजनाओ का संचालन एवम् क्रियान्वयन सही तरीके से किया जाय और इनका प्रभाव धरातलीय स्तर पर उतर सके, जिससे इन योजनाओ का लाभ जनजातीय समूह को सीधे प्राप्त हो सके, क्योकि किसी भी चीज को ऊपर उठाने के लिए सही एवम् सार्थक प्रयासों की जरुरत होती है, इन आदिवासियों को जंगलो से निकल कर मुख्यधारा में जोड़ना ही हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए| आदिवासियों के पारम्परिक ज्ञान की तथा कथित मुख्य धारा के समाज द्वारा घोर उपेक्षा भी की जाती रही है यह तथा कथित मुख्यधारा का समाज आज के युग को विज्ञान का युग मानता है और आदिवासीयो के पारंपरिक ज्ञान विज्ञान एवम कलाओ को हेय दृष्टि से देखता है |
आदिवासियों की कल शिक्षा के सम्बन्ध हम यही कहेगे कि इनकी शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मका का विकास किया जाय साथ ही इन्हे शिक्षा प्राप्ति हेतू अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाय, बच्चो को स्कूली शिक्षा जरी रखने और स्कूली पढाई छोड़ने से रोकने के लिए, सरकारों ,स्कुलो और समुदाय के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वे जनजातीय बच्चो को भेदभाव रहित वातावरण उपलब्ध कराये यदि स्कुल इन बच्चो के अरुचिकर और प्रतिकूल स्थान बना रहेगा, तो ऐसे में स्कूली शिक्षा में इन बच्चो की समग्र शैक्षिक भागीदारी की दिशा में बहुत करना बाकि रह जायेगा | इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि महज शिक्षा के प्राथमिक और बाद के स्तरों पर दाखिला लेने तक सीमित न रहकर उससे आगे बढ़ा जाय, जनजातीयो की लडकियों को साथ जोड़ने और उनकी स्कुल तक पहुच संभव बनाने के लिए विशेष प्रयास करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है क्योकि अपने वर्ग के लडको की तुलना में ये लडकिया जनजाति, जेंडर और सामाजिक वर्ग के संदर्भ में दोगुना या तीनगुना ज्यादा सुबिधाहीन है | जिससे उनका शिक्षा से वहिष्क्रिप रहना और जयादा वढ जाता है |
परिवर्तन की किसी की गयी प्रक्रिया को मिश्रित प्रयासों या जनजाति,जेंडर और अंतर-वर्गीयता पर सावधानी से गौर करना होगा ,जनजातीय लडको व लडकियों के लिए स्कुल ऐसा होना चाहिए जो उन्हें उनके ऐतिहासिक पूर्व्वृत्तो और किसी समुदाय बिशेष जन्म लेने की वजह से मिले अभावो से मुक्ति दिलाए स्कुल और समाज दोनों को न्ययोचित्त और निष्पक्ष रवैया अपनाने की आवश्यकता है ताकि भारतीय समाज सही मायनों में लोकतान्त्रिक समाज होने का दावा कर सके जहा सभी नागरिको से बराबरी का व्यवहार होता है|
वर्तमान समय में आदिवासी शिक्षा को हम वैसे ही परिभाषित कर सकते हैं जैसे श्री लाल शुक्ल ने शिक्षा को परिभाषित किया हैं, “ भारत में शिक्षा सड़क पर भटकती आवारा कुतिया है जिसे सब लतियाते है, परन्तु कोई उसका उपचार नहीं करता है |” अब जरुरत इस बात की है कि महज शिक्षा के प्राथमिक और बाद के स्तरों पर दाखिला लेने तक सीमित न रहकर उनसे आगे बढ़ा जाय, स्कुल जैसे ही उल्लास और व्यापक रूप से सिखाने की जगह बने बनेगा, वः इन वर्गों के बच्चो को शिक्षा के उच्च स्तरों तक पहुचने में सहायक होगा, जिससे उनका शिक्षित श्रम बाजार में समावेश सुनिश्चित हो सकेगा वास्तव में जरूरत इस बात की है कि सरकार विशेषकर जनजातीय समूह के विद्यार्थीय पर विशेष फोकस कर सके जिससे उनमे शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ सके जो उनके सामाजिक प्रक्रिया के हाशिये से निकल कर मुख्यधारा से जुड़े | प्रमुख शिक्षा शाष्त्री जान डीवी का कहना है कि व्यक्तित्व की श्रेष्ठता का सामाजिक दक्षता से विरोध सामन्तवादी व्यवस्था के आधार पर संगठित समाज की देन है जिसमे हीन और श्रेष्ठ के बीच कठोर बिभाजन होता है | मगर लोकतान्त्रिक समाज के सभी सदस्यों से यह उपेक्षा की जानी चाहिए कि वे समाज को कुछ दे और सभी को अपनी विशिष्ठ क्षमताओ का विकास करने का अवसर मिलाना चाहिए |
शिक्षा आज विश्व में अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जब से मानव ने समाज में रहना आरंभ किया है, तभी से अब तक चलती आ रही है। वर्तमान समय में शिक्षा इन तीन अर्थों में समझी जाती है, अतः शिक्षा का अर्थ है-विद्यार्थी की छिपी हुई शक्तियों का विकास करना, उसे ज्ञान या प्रशिक्षण देना, उसके ज्ञान और नैतिकता को इस प्रकार विकसित करना जिससे कि वह अपने पर्यावरण और समाज में समायोजन कर सकें और मानव जीवन की सभी संभावनाओं को प्राप्त कर सकें।
आज के समाज में दिव्यांगो की शिक्षा महत्वपूर्ण है क्योंकि दिव्यांगता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अभिशाप मानना सहानुभूति-दया आदि की भावना से ग्रसित होकर उनका सर्वागीण विकास सम्भव नहीं है स्टीफन हाकिंग महोदय ने दिव्यंगो के संदर्भ में कहा है कि “दिव्यांग लोगों को कई बाधाओं का सामना करने के कारण व्यावहारिक शारीरिक और वित्तीय रूप कमजोर पड़ना पड़ता है इन बाधाओं को दूर करना हमारी पहुच के भीतर है और ऐसा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इन अवरोधों को समाप्त करना होगा इन सरे लोगों की क्षमता को खोला जाए जिससे ये दुनिया में अपना योगदान दे सके प्रत्येक सरकारे लाखो करोड़ो लोग जो अक्षमता से ग्रसित है उनकी अनदेखी नहीं कर सकती है इस वंचित समाज को स्वास्थ्य पुनर्वास समर्थन शिक्षा और रोजगार द्वारा कभी चमकाने का मौका नहीं मिला है” जब तक कि इनके बीच कार्य करने वाले व्यक्तियों, अध्यापकों एवं संचालित कार्यक्रमों का विकास इनके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर न किया जाए। शिक्षक समाज के सजग प्रहरी, मार्गदर्शक एवं प्रकाश पुंज के रूप में कार्य करता है, इसलिए शिक्षक की भूमिका दिव्यांग विद्यार्थियों की शिक्षा में अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है।
दिव्यांग से तात्पर्य है, मानसिक-सामाजिक या मनोवैज्ञानिक, किसी भी क्षेत्र में हुई दिव्यांगता, बालक में जब सीखने-सिखाने की समस्या उत्पन्न कर देती है तो वे दिव्यांग कहलाते है। सामान्य रूप से दिव्यांग प्रकार में वे दिव्यांग भी आ जाते है जिन्हें विद्यालयी शिक्षा ग्रहण करने हेतु विशेष शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होती है विशेष शिक्षा प्राप्त होने पर ही दिव्यांग अपनी शक्तियों का अधिकतम उपयोग कर सकता है।
दिव्यांगता को परिभाषित एवं वर्गीकृत करने में मानव सभ्यताओं ने समाज में कई प्रकार की व्यवस्थायें की हैं। विषेष रूप से भारत के सभ्य व संभ्रातसमाज में दिव्यांगता का विभेद कर व्यक्ति की शारीरिक अक्षमता के भावों में कुछ विषिष्ट सम्बोधन उन व्यक्तियों को दिये गये हैं। जैसे- अंधा, कांणा, लंगड़ा, लूला,गूंगा, बहरा, पागल, कोड़ी आदि सभ्य समाज द्वारा दिये गये विषिष्ट असभ्य सम्बोधन हैं जो दिव्यांग व्यक्तियों को प्रताड़ित करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। किन्तु समाज में कुछ अन्य सम्बोधन भी दिव्यांग व्यक्तियों को दिये गये हैं जैसे- सूरदास, नैनसुख, पंगु,लंगु, मौनी इत्यादि।
सम्पूर्ण भारत में दिव्यंगो की जनसंख्या जनगणना 2011 के आधार पर 2.68 करोड़ है जो सम्पूर्ण जनसंख्या 121 करोड़ में 2.21 प्रतिशत है जिनमें दृष्टि बाधित 19 प्रतिशत श्रवण ह्रास 19 प्रतिशत वाक् बाधित 7 प्रतिशत क्रिया आधारित दिव्यांग 20 प्रतिशत मानसिक मंद 6 प्रतिशत, मानसिक बीमार 3 प्रतिशत, बहु दिव्यांग 18 प्रतिशत तथा अन्य प्रकार के दिव्यांग की जनसख्या 18 प्रतिशत है जिसमें से ग्रामीण क्षेत्रो में 69 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रो में 31 प्रतिशत दिव्यांग निवास करते है
दिव्यंगो की साक्षरता स्थिति भारत की साक्षरता दर 73 प्रतिशत के सापेक्ष में मात्र 55 प्रतिशत (1.46करोड़) है जिसमेसें 62 प्रतिशत पुरुष साक्षरता दर एवं 45 प्रतिशत महिला साक्षरता दर राष्ट्रीय साक्षरता दर के अनुपात में निम्नतम स्थिति है जो इनकी दयनीय शैक्षिक स्थिति को इंगित करता है स्कूल तक पहुच की बात करे तो 5 से 19 वर्ष के सम्पूर्ण दिव्यंगो में सें मात्र 57 प्रतिशत बालक एवं 47 प्रतिशत बालिका तक हो पाई है सम्पूर्ण दिव्यांग जनसँख्या 2.68 करोड़ में सें 11 प्रतिशत प्राथमिक से नीचे शिक्षा प्राप्त, 12 प्रतिशत प्राथमिक तक शिक्षा प्राप्त, 9 प्रतिशत माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त तथा मात्र 3 प्रतिशत दिव्यांगो की स्नातक शिक्षा तक पहुच है (जन गणना 2011 के अनुसार) ये आकड़े हमें ये इंगित करते है की यह समाज आज भी शैक्षिक रूप से मुख्य समाज से काफी पिछड़ा हुआ है
किसी भी समाज की उन्नति में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कराती है भारत जैसे लोकतंत्रीय देश में शिक्षा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जैसा की इमाइल दुर्खिम ने कहा है कि ‘शिक्षा वह साधन है जिसके द्वारा समाज बालको में अपने अस्तित्व की अनिवार्य अवस्था को तैयार करता है’ शिक्षा और समाज एक दुसरे से इस प्रकार सम्बन्धित है कि कहा जायेगा कि ये दोनों एक सिक्के दो पहलू है
भारत ने दिव्यंगो के अधिकारों से संबंधित कई अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्रों एवं संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं एवं दिव्यंगो के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र समझौते पर भारत ने 2006 में हस्ताक्षर किया और उसे स्वीकार किया। यूएनसीआरपीडी का अनुच्छेद 24 विशेष रूप से शिक्षा की बात करता है तथा सरकारों को दो काम करने के लिए बाध्य करता है
दिव्यांग बच्चों, युवाओं को अन्य बच्चों के समान शिक्षा मुहैया कराना
ऐसी शिक्षा समावेशी व्यवस्था में प्रदान करना
क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 भारत में दिव्यांग बच्चों के समावेशन का परिदृश्य बदलने में सक्षम है?
शिक्षा पर समग्र नीति मूलतः राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं राजनीतिक दृष्टि को कार्य में बदलने का मार्ग तलाशने का प्रयास है। हमारे समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा एवं विकास की मुख्यधारा में लाना ऐसी प्रक्रिया है, जिस के लिए समावेशन की राह में आने वाले सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-
प्रशासनिक एवं अन्य प्रकार की बाधाओं को पहचानने तथा व्यवस्थित तरीके से दूर करने की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 में समावेशी शिक्षा की व्यापक समझ दिखती है। भारतीय संदर्भ में समावेशी शिक्षा में अनुसूचित जाति/जनजाति/अल्पसंख्यकों/दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं और अत्यंत गरीबी तथा कठिन/ चुनौतीपूर्ण स्थितियों में रह रहे बच्चों की विविध आवश्यकताओं को शामिल करना होगा। भारत में पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समावेशी शिक्षा का भारतीय दृष्टिकोण शामिल किया गया है, जिसमें वैश्विक चिंताएं तथा प्रतिबद्वताएं झलकती हैं, जिनमें भारत प्रतिभागी है अथवा जिन पर उसने हस्ताक्षर किए हैं।
नीतियां इस बात को नजरअंदाज करती हैं कि दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं को शैक्षिक मुख्यधारा में शामिल किए बगैर सभी के लिए शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है
सभी के लिए शिक्षा में प्रगति पर नजर रखने वाला ढांचा दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं को अनदेखा करता है
योजना, प्रशासन, निगरानी एवं क्रियान्वयन के स्तरों पर समावेशी शिक्षा की राह में मौजूद व्यवस्थागत बाधाओं को पहचानने एवं दूर करने में असपफलता
यह स्वीकार नहीं करना कि समावेशी शिक्षा पर प्रभाव डालने वाले कारक उन सामाजिक अंतरों में ही निहित हैं, जो अनुसूचित जाति/जनजाति/अल्पसंख्यक वर्गों के दिव्यांग बच्चों तथा युवाओं की शिक्षा में होते हैं एवं इन वर्गों के बच्चों के बीच भेद के रूप में होते हैं।
दिव्यांगता राज्य/पीआरआई का विषय है और शिक्षा समवर्ती विषय है, जिस कारण भारत के विभिन्न राज्यों में दिव्यंग बच्चों/युवाओं को शिक्षा प्रदान करने में कठिनाई होती है।
दिव्यांग बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना दो मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। समावेशी शिक्षा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी है तथा विशेष शिक्षा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की जिम्मेदारी है। राज्य स्तर पर भी ऐसी तालमेल भरी भूमिकाएं हैं। इस कारण दिव्याग बच्चों की शिक्षा में विरोधाभासी नीतियां तथा चलन दिखते हैं। दिव्यांग बच्चों को कम आयु में ही शिक्षा प्रदान करने की भारत में कोई नीति नहीं है। आरंभिक बाल्यकाल में देखभाल एवं विकास के सबसे बड़े कार्यक्रम एकीकृत बाल विकास सेवा ;आईसीडीएसद्ध में आंगनवाड़ी केद्रों को एकीकृत आरंभिक बाल्यकाल विकास केद्रों के रूप में कार्य करने हेतु विकसित किया जाना अभी बाकी है।
दिव्यंाग महिलाओं/कन्याओं के लिए हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों के अनुरूप पुनर्वास रणनीतियों की आवश्यकता है। हमें दिव्याग महिलाओं के अधिकारों एवं आवश्यकताओं के संदर्भ में व्यापक जागरूकता लाने की आवश्यकता है क्योंकि इस आधुनिक जगत में उन पर अधिक मार पड़ती है, जहां महिला के मूल्य को समझकर उसका सम्मान नहीं किया जाता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 में नीचे से ऊपर बढ़ने की नीति अपनाई गई है, जिससे समुदाय की चर्चा/बहस, प्रतिभागिता आरंभ होती है। इस नीति की यह अनूठी विशेषता है समावेशी शिक्षा पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 इस प्रयास में सफल है। हम देखते हैं कि इस प्रारूप में समावेशी शिक्षा पर वैचारिक स्पष्टता साफ बताई गई है। उदाहरण के लिए समावेशी शिक्षा को दिव्यांग बच्चों के लिए अलग रणनीति के रूप में देखने के बजाए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 इसे शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न अंग मानती है और प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक दिव्यांग बच्चों/युवाओं की विविध आवश्यकताओं को मोटे तौर पर समझती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 ने शिक्षा व्यवस्था के सभी अंगों में विकलांगता को शामिल किया है चाहे शिक्षा में प्रवेश हो, प्रवेश नीतियां हों, शिक्षकों का प्रशिक्षण हो, पाठ्यक्रम का विकास हो, शिक्षण की रणनीतियां हों, पठन सामग्री हो, मूल्यांकन व्यवस्था हो, आभासी शिक्षा माध्यम हों। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ में दिव्यंगो को व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी जिससे दिव्यांगो को व्यवसाय एवं तकनीकी रूप से दक्ष बनाया जा सके जिससे रोजगार प्राप्त करने में इनको सुबिध हो
इसमें समावेशी नीति के मामले में दिव्यांगता के बजाए शिक्षा का दृष्टिकोण अपनाया गया है। यह नीति दिव्यांग बच्चों को अलग-थलग करने के प्रचलन को समाप्त करती है। यह प्रत्येक बच्चे के लिए ऐसे सक्षम तथा सहयोगी वातावरण में शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने हेतु समावेशी दृष्टिकोण एवं लक्ष्यों को विशिष्ट, दिखाई देने वाले, मापने योग्य एवं प्राप्त करने योग्य कदमों से जोड़ती है, जिस वातावरण में बच्चों से दिव्यांगता अथवा लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ में अनेक किये गए प्रावधानों के उपरांत कुछ बिंदु छूट गए है जो निम्न लिखित है जिन पर अमल किये जाने की जरुरत है
दिव्यांगो की शिक्षा में व्याप्त अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या को समाप्त किया जाए इसे समाप्त करने हेतू यह सुनिश्चित किया जाऐ कि प्रत्येक दिव्यांग आर्थिक सामाजिक एवं पारिवारिक कारणों से स्कूल न छोड़े
दिव्यांग बच्चो को गुणवत्ता युक्त समावेशी शिक्षा उपलब्ध करने के लिए नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर प्रत्येक जिलो में सम्भव न हो तो प्रत्येक मंडल में एक आवासीय समावेशी माडल स्कूल की स्थापना की जाए
इस शिक्षा नीति में सुनिश्चित किया जाए कि प्रत्येक दिव्यांग बच्चे की कम से कम स्नातक तक शिक्षा निः शुल्क एवं अनिवार्य किया जाए जो दिव्यांग बच्चो के लिए एकीकृत योजना (आईसीडीएस) के अंतर्गत न्यूनतम 15 से 18 वर्ष तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा से आगे का प्रावधान करेगा
इस शिक्षा नीति के द्वारा यह सुनिश्चित किया जाए कि दिव्यांगता जो राज्य ध्पीआरईआई का विषय है उसे राज्य सूचि ने निकल कर समवर्ती सूचि में शिक्षा के साथ जोड़ा जाए जिससे दो मन्त्रालयो एवं राज्य सरकारों एवं केन्द्र के बीच विरोधाभास् की स्थिति समाप्त हो जाए
हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आशा करनी चाहिए एवं उसके लिए कार्य करना चाहिए, जिसके दरवाजे सभी दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए खुले हों और उनके लिए अनुकूल वातावरण हो। लचीली शिक्षा व्यवस्था, ई-लर्निंग सुविधाएं, प्रस्तावित स्वयं ऑनलाइन शिक्षण, समावेशी शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम, राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम, सभी वर्तमान शिक्षकों में क्षमता निर्माण तथा अन्य उपायों से सभी के लिए शिक्षा भारत में यथार्थ बन जाएगी।