वो तेरे नब्ज़ को देख कर अफसाना पढ़ा था कोई।
जी रहा हूं उसी मुक्कदर को जिन्नका अल्फाज बना था कोई।
चाहता था खुद अपना मुक्कदर लिखना
फिर याद आया उस अफसाने के लिए जज्बात था कोई l
~बृजेश कंचन