कई यात्राएं अपने आप में एक बदलाव लिए रहती हैं। वो दिखने में तो साधारण सफ़र जैसी दिखती हैं जिसमें से गुजरकर हम एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, परंतु कुछ यात्राओं में इतनी ताकत होती है कि वो जगह ही नहीं यात्री को भी बदल देती हैं। वो हमें स्वतंत्रता का असली अर्थ सिखाती हैं। आमतौर पर रोजमर्रा के जीवन में हम एक सहूलियत लिए घूमते हैं जिसमें नयापन जैसा कुछ नहीं होता। इन खास यात्राओं में उन सारी सहूलियतों की धज्जियाँ उड़ जाती हैं और यात्री के आवरण को ही नहीं बल्कि उसके अंतर्मन पर भी गहरा प्रहार होता है। उस प्रहार से जो भी आराम और आलस की बरसों से चढ़ी गाढ़ी परत है वो टूटने लगती है। रोजमर्रा का रूटीन चरमरा जाता है। सब कुछ टूटने के बाद जो बचता है वो अनमोल होता है, अनछुआ होता है, अडिग होता है। उस व्यक्तित्व के पहलू को जानकर आश्चर्य सा होता है कि ये भी मौजूद था अंदर मगर कभी दिखा नहीं। जब ये आश्चर्य बारम्बार होने लगे तो उसे आनंद कहते हैं। एक जगह टिक जाने के आराम को सुख कहा जाता है, और उस जगह को बार बार तोड़कर सब मिटा देने के बाद जो बचता है उसके वजूद में आनंद बसा होता है। कोई छोटा - बड़ा लक्ष्य बनाकर उसे पा लेना, ये माया देवी हमें खूब सिखाती हैं। मगर बिना किसी लक्ष्य के खुद को तोड़ते रहना, ये सत्य का आवरण है। यही मुक्ति की दिशा है। बेवजह ली हुई मौज का असली मजा तो इन यात्राओं से गुजर कर ही मिलता है। इन यात्राओं की खास बात ये है कि इसमें आप वो नहीं रहते जो आमतौर पर होते हो, बल्कि आप वो बन जाते हो जिसे आप जानते तक नहीं। और अगर ये यात्राएं रोजमर्रा का जीवन ही बन जाएं तो फिर बात ही क्या...
दिन भर के आलस में चाय पकौड़ों के साथ बैठे हुए मैं अक्सर अपना फोन खोल लेता हूं। किसी और से बात करने के लिए नहीं, बल्कि खुद से गुफ्तगू करने के लिए। लिखने के लिए! बाहर का शोर बंद करने के लिए! विचारों को एक दिशा देने के लिए!हमारी रोजमर्रा की जिंदगी बड़ी उबाऊ होती है। हम एक जैसा जीवन रोज जीते चले जाते हैं, और फिर ऊब कर एक एस्केप तलाशने लगते हैं। मैं अपने लेखन में छुप जाता हूं जब भी बोरियत सामने आती है। काफी समय से लेखन मेरा हमसफर बना हुआ है, पीछा ही नहीं छोड़ता। मन में कोई भाव आएं, कोई माकूल वजह न भी हो, तो भी मैं लिखने लगता हूं। कई बार तो लिखने में ही इतना आनंद आने लगता है कि मैं असल जिंदगी में भी कहानियां खोजने लगता हूं, और अपनी लिखाई और अपने जिए में संपर्क बिठाने लगता हूं। मगर कभी भी अपना जिया हुआ अपने लिखे हुए से बेहतर होता नहीं पाता। शायद इसलिए कि लिखने में कलम अपने हाथ में होती है, और जीते समय कलम का कुछ हिस्सा ही अपने हाथ में रह जाता है, और बाकी हिस्से इधर उधर बिखरे पड़े रहते हैं जिन्हें और लोग अपने अपने हिसाब से नियंत्रित करते हैं।
मुझे अपने जिए में किसी और का नियंत्रण कभी भी पसंद नहीं रहा है। मैं खुले दिल से जीवन को जीता हूं, भरपूर डूब कर हर पल का हिसाब किताब लेता हूं। ज्यादातर मेरी जी हुई कहानियां मेरी ही लिखी होती हैं, मगर कभी कभार मन की कालिख से कुछ अक्षर छुप जाते हैं। फिर थोड़ा समय लग जाता है कहानी को वापस पटरी पर लाने में और उसे ढंग से फलीभूत कर पाने में। ऐसी स्थिति में मन थोड़ा खट्टा तो होता ही है, मगर फिर जीवन की धूप छांव यही तो है। बिना अंधेरे के रोशनी का अस्तित्व नहीं होता, वहीं बिना बंधन के मुक्ति का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए मैं अपने लेखन के बंधन से आजाद होने के लिए भाग कर असल जिंदगी में आ जाता हूं, और जब यहां बंधन लगता है तो वापस लेखन की दुनिया में चला जाता हूं। इतना आने जाने के बाद भी लगता है कुछ सीख नहीं पाया!
काश मुझे पता होता कि क्या लिखना है!
काश कि मुझे पता होता कि कैसे जीना है!
आज मैं उसके बारे में लिखने जा रहा हूं जिसे कभी लिखना नहीं चाहता था। तुम्हें! तुम मेरा निजी जीवन हो। अपने निजी अस्तित्व को कागज़ पर उकेरकर दुनिया के सामने परोसना मुझे कभी ठीक नहीं लगा। एक दिन मैंने एक गिलहरी को घास पर खेलते हुए देखा। वो दुनिया से बेखबर अपनी क्रीड़ा में मग्न थी, बिल्कुल तुम्हारी तरह। उसे बड़ी देर तक देखने के बाद समझ आया कि प्रकृति की सुंदरता पर किसी का हक नहीं होता, वो निश्छल, निष्काम होती है। फिर मैं कौन होता हूं तुम्हें सिर्फ अपने आप तक रखने वाला। मेरा ये दायित्व है कि तुम्हें तुम्हारी दुनिया में रमण करते देखूं, और उस खूबसूरती को जैसे का तैसे अपने भावों के परिदृश्य से लिख दूं। आज मैं तुम्हें लिखने जा रहा हूं, और तुम्हारे उस रूप को जिसे तुम भी शायद नहीं जानती। मैं अक्सर रात को टहलते हुए तुम्हारे घर तक जाता हूं, और फिर बिना कुछ कहे ही वापस लौट आता हूं। उस चहलकदमी में तुम मेरे साथ होती हो - मेरा घर बनकर मेरे साथ घूमती हो। उस घर में मैं सुकून से रहता हूं, बेफिक्र होकर, बेबाक ढंग से जीता हूं। तुम शायद मुझे नहीं जानती, मगर मैं तुम्हें खूब जानता हूं। तुम दृश्य हो तो मैं दृष्टा हूं। तुम प्रकृति का बहाव हो तो मैं ब्रह्म की नाव हूं। तुम जीवन की धार हो तो मैं मृत्यु का हाहाकार हूं। तुम जीव का शरीर हो तो मैं उसकी चेतना हूं। तुम दुनिया भर का ज्ञान हो तो मैं उसकी जीने की प्रेरणा हूं। आज उसी जीवन और मृत्यु के बीच एक रेखा खींचने जा रहा हूं। आओ, दोनों साथ मिलकर उस रेखा पर टहलते हैं। इंसान और भगवान दोनों को एक होता देखते हैं। चलो, तुम और मैं आज सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक का सफर तय करते हैं।
बिलकुल सुबह अपनी चाय लिए मैं आज़ बालकनी में रोज़ की तरह बैठा था। सूरज अभी पूरा उगा नहीं था, इसलिए बादलों के सफेद फुहासे दिखाई दे रहे थे, जो सूरज की रोशनी में गायब हो जाते हैं। हवा चल रही थी जिससे पेड़ों के पीले, लाल पत्ते उड़ उड़ के झड़ रहे थे। बगल वाले घर से एक लड़की अपने सफेद लैब्राडोर को लिए निकली और टहलाने चली गई। उसकी जैकेट पर वर्जीनिया टेक लिखा हुआ थी, शायद वहां पढ़ती हो। सामने वाले घर के गार्डन में दो बच्चे अपनी अपनी क्रीड़ा में रमे हुए थे। चाय में अदरक आज कुछ ज्यादा ही डाली थी मैंने, यह आदत मुझे कब लगी पता ही नहीं चला। दूसरों की आदतें कब आपको लग जाती हैं, पता ही नहीं चलता। कोई इंसान कभी इतना खूबसूरत लगने लगता है कि आप उसकी आदतों को भी सुंदरता के आईने में देखने लगते हो, और भूल जाते हो कि उसी आईने में आपका अपना अक्स भी रहता है।
ये हवा, ठंड, पेड़, और पत्ते देखकर मुझे शिमला की याद आ गई। मुझे लगा जैसे मैं किसी लंबी छुट्टी पर आया हूं। पहाड़ों पर टहलना, कैफे में खाना, और मौसम का मजा लेना, यही तो करते हैं। यहां भी तो यही कर रहा हूं, और शायद कुछ ज्यादा ही कर रहा हूं। अचानक से मैं मुस्कुराने लगा! बिना किसी बात के। उस लैब्राडोर वाली लड़की ने मुझे शायद हंसते हुए देख लिया, मैने उसकी ओर देखा तो उसने कुछ और कपड़े पहने हुए थे। तभी मुझे समझ आया कि ये तो कोई दूसरी लड़की है, शायद उसकी बहन हो। मैं तो पहले से ही मुस्कुरा रहा था बिना किसी बात के, उसे लगा कि मैं उसे देखकर मुस्कुरा रहा हूं तो उसने भी मुस्कुरा दिया। ये सारी लड़कियां मुझे एक जैसी क्यों लगती हैं!
मैं बिना बात के क्यों मुस्कुरा रहा था? शायद खालीपन के क्षणों में हम और सुंदर हो जाते हैं, खुद पर और ज्यादा ध्यान दे पाते हैं, और हमारा अस्तित्व बदले में हमें खुशी की सौगात देता है। मैं अपनी इस बिना बात की खुशी को सहेज कर रखना चाहता था, अपनी किसी प्रेमिका की तरह संभालकर! तभी मुझे एक जोरदार हंसी की आवाज़ आई। मेरा अंतर्मन शायद मेरे इस ख्याल पर हंस रहा था। उसने कहा, कितनी बार ये गलती दोहराओगे? समझदार लोग एक दो बार ठोकर खाकर समझ जाते हैं, फिर तुम क्यों बार बार ठोकर खाकर भी फिर से वही गलती दोहराते हो! जानते नहीं हो कि प्रेमिका नहीं, प्रेम इंपोर्टेंट है। प्रेमिका को नहीं, प्रेम को सहेज कर रखना होता है। प्रेमिकाएं प्रेम की तरह सुंदर नहीं होती, वो अपने अतीत का कचरा और भविष्य की उम्मीदों का भार अपने साथ लिए आती हैं। क्यों इतना बोझ उठाना चाहते हो? प्रेम करो मगर दूर से, क्यों किसी से चिपककर रहना चाहते हो? ये बात सुनकर मुझे भी हंसी आ गई। मुझे अपनी सारी प्रेमिकाओं के चेहरे दिखने लगे। सबके चेहरे पर अतीत की स्याही से रंगे भाव दिखने लगे, उनका बदलता हुआ वजूद दिखने लगा और हंसी बढ़ती गई। उनमें से किसी को भी प्रेम का मतलब नहीं पता था, सब बस अपने संकीर्ण दृष्टिकोण में बंधी हुई थीं। वक्त के अनेक पड़ावों में इन सारों से मुलाकाते हुई थी, कुछ समय के लिए। मैं वैसे भी एक अनुभव को ज्यादा समय जी नहीं पाता, अगर कोई अनुभव मुझपर हावी होने लगता है तो मैं उससे दूर चला जाता हूं। कई बार तो किसी रिश्ते के टूटने को मैं रोकना भी नहीं चाहता, क्योंकि उसके टूटने की कहानी उसके बने रहने की कहानी से ज्यादा सुंदर होती है। अब मुझे लगता है कि मुझे किसी लड़की से कभी प्रेम हुआ ही नहीं, हमेशा ही प्रेम मुझे सुंदरता से हुआ है। जैसे अभी सामने वाले पेड़ पर एक गिलहरी दौड़ लगा रही है, इससे सुंदर और क्या है!
मैं बर्लिन की ट्रेन में बैठा था। मेरी आंखों में नींद थी मगर फरवरी की जाती हुई सर्दी रह रह कर मुझे जगा दे रही थी। बॉस्टन से दो हफ्ते की छुट्टी लेकर मैं यूरोप घूमने आया था। आजकल डॉलर और यूरो लगभग बराबर ही चल रहे हैं। मैने सोचा जो उधर खर्चता हूं वो यहां कर दूंगा तो मेरा क्या बिगड़ जाएगा। जब जगह का चुनाव सामने आया तो मेरे दिमाग में सुकरात आ गए और बोलने लगे कि अगर खुद से मिलना हो तो चले आओ, मैंने भी सोचा कि चलो इसी बहाने प्लेटो और अरस्तू के साथ एक कप चाय पी ली जाएगी और उनके जाने के बाद बिगड़ते हुए देश को भी देख लिया जाएगा। उनका मेसेडोनिया अब ग्रीस कहलाता था जिसकी अर्थव्यवस्था गहरी त्रासदी से गुज़र रही थी। तीन दिन एथेंस की गलियों में सुकरात के साथ घूमने के बाद एक दिन शाम को एक छोटे से रेस्त्रां में मूसाका खाते हुए मुझे आईआईटी बॉम्बे के हॉस्टल ग्यारह की याद आई, उस हॉस्टल का नाम एथेना था और उन्हीं के नाम पर एथेंस का नाम रखा गया था। मैंने सुकरात से पूछा कि चलें क्या एथेना से मिलने? सुकरात अपनी बीयर पर चुप बैठे थे, वो मुस्कुराए और बोले, "द ओनली थिंग आई नो इज दैट आई डोंट नो!" अगले दिन मैंएथेंस के एक्रोपोलिस पहुंच गया जहां रानी एथेना की बड़ी सी प्रतिमा थी और उनके बारे में पूरा विवरण था। मुझे विवरण पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी तो मैं उन्हें निहारता रहा। जैसे मैं अभी ट्रेन में मेरे सामने बैठी लड़की को निहार रहा था।
एक लड़की मेरे सामने बैठी मुराकामी की काफ्का ऑन द शोर पढ़ रही थी। उसके बैग में से एक और किताब झांक रही थी, मेरा मन हुआ मैं तुरंत वो किताब निकाल के देख लूं मगर मैने कुछ नहीं किया। मुझे अचानक काफ्का याद आ गए और मैंने अपना फोन निकाल कर बर्लिन से प्राग का टिकट और एयर बीएनबी बुक कर लिया। मैं कभी भी अपनी यात्राओं की जगह नहीं चुनता, मुझे रास्ता कहीं से कोई और ही दिखा देता है। काफ्का को याद करते हुए मेरे मुंह से द ट्रायल निकल आया! मुझे लगा मैं मन में कह रहा हूं मगर शायद उसने सुन लिया। वो मेरी तरफ देखी, "एक्सक्यूज मी?" मेरे मुंह से निकला, "आपने काफ्का की द ट्रायल पढ़ी है?" वो मुस्कुराई और बोली, "जी मैं टी यू बर्लिन से काफ्का पर पीएचडी कर रही हूं! उनका एक एक अक्षर मैने पढ़ा है।"हम दोनों काफी देर तक काफ्का पर चर्चा करते रहे। सोफिया स्टेशन आ गया और मुझे कॉफी की तलब हुई। यहां ट्रेन दस मिनट रुकती है, उसने कहा। हम दोनों बाहर निकल आए और एक कैफे से उसने ड्रिप कॉफी ली और मैंने अपनी मोका। उसने एक सिगरेट जला ली! मुझे पृथ्वी थियेटर की वो शाम याद आ गई जब मैंने रणबीर कपूर को अपने बगल में सिगरेट पीते देखा था और मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था।
"तुम किससे बात कर रहे हो?" उसने पूछा।
"अतीत से!" मैं मुस्कुराया।
"एक सिगरेट मिलेगी?" मैंने उससे एक सिगरेट मांगी और निकोटिन को महसूस करने लगा। मुझे वैसे पीने की आदत नहीं है मगर यादों को जीने के लिए कभी कभार होठों को तकलीफ दे देता हूं।
"नाम क्या है तुम्हारा?" उसने पूछा।
"आई एम डॉ अंकित। एंड यू?"
"आई एम लिसा।" उसने अपना नाम बताया।
हम ट्रेन में वापस आ गए। अतीत भी हमारे साथ चलते चलते आ गया। वो मेरे बगल वाली सीट पर बैठी थी और मैं विंडो सीट पर। मैंने उसे अपनी ओर देखते देखा, मगर अतीत हमारे बीच में बैठ गया था जिससे वो मुझे साफ नहीं दिख रही थी। पता नहीं क्यों कोई नई कहानी शुरू करते समय अतीत बीच में आ जाता है। मैंने अपनी यादों की सिगरेट बुझाई और फेंक दी, उसके साथ अतीत भी विदा हो लिया। गाड़ी पूरे रफ्तार पर थी और नींद ने मुझे अपनी यात्रा में शामिल कर लिया। मेरे सपने में मैं बैंगलोर के एयरपोर्ट पर खड़ा था मुंबई जाने के लिए। मोना मुझे छोड़ने आई थी, और काफी देर से मेरे गले लगी हुई थी। अक्सर बिछड़ने के ऐसे मौकों पर मैं रो पड़ता हूं मगर आज वो रो रही थी, तो मैं अपने आंसू थामे खड़ा था। काले रंग का उसने टॉप पहना था जो हमने अभी दो दिन पहले ही जारा से खरीदा था। "अब जाने भी दो मोना! फ्लाइट छूट जाएगी!" मैंने बोला।"मगर तुम तो अभी ट्रेन में हो न!" उसने सिर उठाकर कहा। उसकी आंखें गीली थीं। मेरी भी नम थीं। "तुम्हें पता है, आज़ मैं लिसा से मिला यहां ट्रेन में। तुम दोनों काफी एक सी हो।"
मुझे लगा मैं कोई पेंटिंग बना रहा हूं जिसमें मोना और लिसा दोनो हैं, दो दुनिया की दो बिलकुल अलग लड़कियां पर फिर भी कितनी एक जैसी, और उस मोनालिसा को बनाने वाला मैं लियोनार्डो डा विंची हूं। मैंने मन ही मन सोचा कि प्राग के बाद मैं इटली जाऊंगा लियोनार्डो से मिलने। गाड़ी और जिंदगी की गाड़ी दोनों अपने रफ्तार पर थीं।
फ्लाइट की बोर्डिंग में अभी एक घंटे का समय था। मैं अक्सर एयरपोर्ट जल्दी पहुंच जाता हूं। दीवाली मनाकर लखनऊ से मुंबई वापस जा रहा था। तभी पीछे से एक आवाज़ आई! ऐसा लगा किसी ने मेरा नाम पुकारा। मैंने पीछे मुड़ के देखा तो उसे पहचानने में थोड़ा वक्त लग गया। इतनी देर में वो मेरे पास आ गई।
"अरे तुम यहां! तुम तो बिल्कुल नहीं बदले।" प्रिया अपने पुराने अंदाज में मुस्कुराई।
"कहां! देखो तो मोटा हो गया हूं पहले से।" मेरे मुंह से निकला।
"कहां जा रहे हो?" उसने पूछा।
"मुंबई! तुम?"
"दिल्ली!" वो बोली।
मेरी नज़र उसके हाथों पर गई। उसने मेंहदी लगा रखी थी, दोनों हाथों में दर्जन भर चूड़ियां पहन रखी थीं। "शादी हो गई क्या तुम्हारी?" मेरे होंठ चलने लगे। "हां! उसी सिलसिले में तो घर आई थी। तुम बताओ? तुम्हारा क्या सीन है शादी का?" वो मुस्कुराई।"क्यों! मेरी खुशी देखी नहीं जा रही है क्या तुमसे? तुम्हें याद है उस दिन मैंने क्या कहा था, जब हम स्कूल के बाहर आखिरी बार मिले थे?"
"हां याद है! कितने साल हो गए उस बात को! तुम मुझे रातरानी बुलाया करते थे, कहते थे मेरी आंखें जुगनू की तरह चमकती हैं और मेरी खुशबू रातरानी के फूल जैसी है। क्लास की पिछली बेंच पर बैठकर तुम डेस्क पर चॉक से वो फूल बनाकर उसके बीच में मेरा नाम लिख देते थे। स्कूल के बाद आधे रास्ते तुम मुझे साइकिल से छोड़ने आते थे। स्कूल के आखिरी दिन जब मैंने तुमसे कहा था कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे क्योंकि पापा ने हमारे मैसेजेस पढ़ लिए थे, तो तुमने कहा था कि मेरे बाद तुम किसी और के नहीं होगे! पर मुझे लगा वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। तुम बदल जाओगे! मूव ऑन कर जाओगे। वैसे भी वो तो बचपन का प्यार था न! तुम तो दिल ही लगा बैठे थे।" वो यादों की दुनिया में जाकर बोली।
"मैं बिना दिल लगाए कोई काम नहीं करता। बचपन का प्यार था तो क्या हुआ! वो प्यार तो मेरा था न! मैं अपनी चीज कैसे छोड़ दूंगा! मैंने तो अपना वो ज्योमेट्री बॉक्स भी संभालकर रखा है जिस पर तुमने एक छोटा सा दिल बनाया था कंपास से खोदकर, और मैथ्स वाली गुप्ता मैडम ने मेरा ज्योमेट्री बॉक्स देखकर मुझे खूब डांट लगाई थी।"
"अच्छा छोड़ो वो सब। अब याद करके क्या फायदा। इतने दिन बाद मिले हो, गले तो मिल लो। फिर पता नहीं कब मुलाकात हो।" वो आगे बढ़ी और मैं पीछे हट गया।
"मैं पराई औरतों के गले नहीं लगता।" मैं मुस्कुराया और अपनी फ्लाइट की ओर चल दिया।
मुझे हमेशा से मृत्यु का ख्याल बहुत पसंद रहा है। मृत्यु जीवन में जोश भर देती है। एक दिन सब कुछ खत्म हो जाने का ख्याल मुझे दो तरह से मुक्ति देता है: मैं ज्यादा कुछ इकट्ठा नहीं करता - न चीजें और न विचार, साथ में मैं बहुत देर तक अपना समय बर्बाद होते नहीं देख पाता जिसकी वजह से नए नए अनुभवों की तलाश में रहता हूं।
गांव में पिछले दो दिनों में मैंने जितने बूढ़े लोगों को देखा है, उतने मैंने पिछले दो सालों में नहीं देखा। उनके प्रश्नों में मुझे एक लंबे जीवन की थकान सी दिखती है, उनकी बातों से नीरसता की खुशबू आती है, और उनके हाव भाव में समय का पहिया घूमता हुआ दिखता है। मैं अपने जीवन को बहुत उबाऊ समझता था, मगर यहां इनका जीवन देखकर मुझे समझ आया कि कैसे एक उम्र के बाद इंसान अपनी बोरियत के साथ समझौता कर लेता है। शायद बोरियत से समझौता करना उसकी मजबूरी भी हो जाता है, क्योंकि नएपन की तलाश जहां एक तरफ इंसान की शख्सियत को निखारती है वहीं उसे हमेशा कुछ नया करने को ललचाती भी है। उस नएपन के लालच से भी एक हद के बाद इंसान उकता जाता है।
"इन्होंने अपने नाती का नाम भी बिट्टू रखा है!" बूढ़ी दादी ने कहा। मैं काफी समय से बाहर दो बूढ़े लोगों से घिरा हुआ बैठा था और वो मुझसे अपने वही तमाम सवाल कर रहे थे जो वो शायद हर नए इंसान से करते होंगे। दादी को लगा मैं वहां बोर हो रहा हूंगा, इसलिए वो चाय के बहाने से मुझे अंदर बुला लाईं। मुझे ये सुनकर बड़ा अजीब लगा कि किसी का नाम मेरे नाम पर रखा गया है। ऐसा पहली बार सुना था मैंने। उनकी बातों से पता चला कि गांव के काफ़ी लोग मुझे मिलने आए थे सुबह, जब मैं छत पर अपने अकेलेपन में मस्त था। कल सुबह उन सबसे मिलूंगा, यह बोलकर मैं चाय पीने लगा। मैंने चाय के कप से ऊपर की ओर देखा, दादी की झुर्रियां मुझे बरसों के इंतज़ार और उम्र भर की बोरियत का प्रमाण दे रही थीं।
"आज बिट्टू बाबू के लिए बाटी दाल बनी!" उनकी आवाज में वही ५ साल के बच्चे जितनी हंसी थी। क्या हम कभी बड़े हो पाते हैं? या बस हमारे ऊपर उम्र की तमाम परतें चढ़ती रहती हैं और हम समय की छाप को अपनी हकीकत मान लेते हैं। शायद मेरा लेखन भी एक तरह का बचपना ही है! जीने से ज्यादा मुझे शायद लिखने में मजा आता है। या शायद मैं एक जिंदगी में दो किरदार जीना चाहता हूं, एक जो जी रहा है और दूसरा जो उसे लिख रहा है। मैं मृत्यु को मुंह चिढ़ाकर एक जिंदगी में दो जिंदगियां जी रहा हूं, इस ख्याल से मुझे और मज़ा आता है। बुढ़ापे की झुर्रियां मेरी कलम बनकर मेरी जवानी के कागज़ पर जीवन भर की थकान दर्ज करती जा रही हैं।
बहुत समय बाद आज गांव आया। कुछ लोग दिखे जो जाने पहचाने से लग रहे थे, कुछ जगहें दिखीं जहां अब भी पुराने निशान ताज़ा थे, कुछ किस्से याद आए जो यहां जिए हुए थे। लोगों के चेहरे पर एक कौतूहल सा दिखा, जैसे कोई एक नया प्राणी उनकी दुनिया में घुस आया हो। काफी कुछ बदलने के बाद भी बहुत कुछ अभी भी वैसा ही था, जैसे बिल्थरा रोड स्टेशन का वो बरगद का पेड़, स्टेशन के सामने वाली मिठाई की दुकान, और आधी अधूरी धूल उड़ाती और पानी से धंसी सड़कें। ऐसा लगा जैसे जहां से इसे छोड़ गया था अब वापस आकर वहीं से शुरू कर रहा हूं। नहर के किनारे की वो समोसों की दुकान और उसके साथ दी जाने वाली उबली मिर्ची का स्वाद अब भी वैसा ही था। घर के बरामदे का वो नीम का पेड़ अब काफी बड़ा हो गया था और अपने पंख पसार रहा था। बचपन में हम बच्चे इसकी नीम की पत्तियां तोड़कर गाय को खिलाया करते थे। चाची के हाथ के खाने का स्वाद भी वैसा ही था, दादी के प्यार का अंदाज़ भी वैसा ही था। पंखे की आवाज से लेकर दीवारों की नमी भी वही पुरानी थी। मैं सोचने लगा कि आखिर बदला क्या है?
जामुन का पेड़! पीछे की तरफ एक जामुन का पेड़ हुआ करता था। गर्मियों में हम जब भी आते थे गांव, आम खाने के बाद जामुन के पकने का इंतज़ार करते थे। जामुन के पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर मैं दिन में अक्सर वहां सो जाया करता था। कई बार ऐसा होता था कि सोते में एक जामुन पक कर गाल पर गिर जाया करता था और मैं उठ जाता था। जामुन के बैंगनी रंग में धूपरंजित नीला आसमान भी बैंगनी लगता था। जामुन खाते हुए सबका मुंह बैंगनी होता था, मगर मेरा गुलाबी हो जाता था। लोग मुझे मुंह गुलाबी होने की वजह से लाल मुंह वाला बंदर कह कर चिढ़ाते थे। आज वहां खाली जगह थी। पेड़ काट दिया गया था।
पड़ोस में रहने वाले बूढ़े बाबा भी अब नहीं थे। चार वर्ष पहले जब आया था तब वो काफी बूढ़े दिख रहे थे, उनकी याद्दाश्त भी काफी कमज़ोर लग रही थी। मगर उन्होंने मुझे देखते ही पहचान लिया था। मैं जब भी गांव जाता था वो मुझसे लखनऊ और तमाम शहरों की (जिनमें भी मैं रहा हूं) कहानियां सुनते थे, और मैं भी बड़े चाव से उन्हें सुनाता था - कुछ सच्ची कुछ मनगढ़ंत। आज वो नहीं हैं, तो कुछ खाली खाली सा लग रहा है।
जामुन का पेड़ और वो बूढ़े बाबा दोनों ही समय के काल में समा गए। हम भी उसी कतार में खड़े हैं, आज नहीं तो कल हमारे निशान भी मिट जाएंगे। खेतों में लहलहाती धान की फसल तो कुछ दिनों में कट जाती है, मगर हमारी जिंदगी थोड़ी बड़ी होती है, उसे काटने में कुछ समय लग जाता है। उसे काटने के लिए चाहिए जामुन के पेड़ जैसी मजबूती और बूढ़े बाबा जैसी उमंग भरा जीवन जीते रहने की कला। गांव अब भी बचे हुए हैं, हमें याद दिलाने के लिए कि हमारी जड़ें अभी भी मजबूत और गहरी हैं। हमारी रगों में आज भी हमारे इतिहास का खून बह रहा है और हमारे शरीर पर अपने पूर्वजों की मिट्टी लगी हुई है जो हमारे जीवन का मूलभूत आधार हैं। इसलिए शायद आज भी जब किसी के होठों पर गुलाबी लिपस्टिक को देखता हूं तो मुझे वो जामुन खाने के बाद के अपने गुलाबी होंठ याद आते हैं। वो जामुन का पेड़ आज भी मुझमें कहीं जिंदा है।
"मृत्यु का संज्ञान आपको जीवन के और करीब ले जाता है, फिर जब आप आईना देखोगे तो आपको राख दिखेगी, और आप हंसते हुए बोलोगे कि तुझमें रखा क्या है! फिर आपमें एक बेफिक्री आ जाएगी और मौज में रहोगे" वो काफी देर से मुझे जीवन-मृत्यु का खेल समझा रहा था, और मैं एकटक उसके होठों से निकलने वाले एक एक शब्द का नृत्य देख रही थी। मैं कब का उसे सुनना भूल गई थी और उसके चेहरे के हाव भाव निहार रही थी। उसे यूं बेधड़क बोलते देख मैं कभी कभी उसकी ऊर्जा से खुद को ऊर्जावान महसूस करती थी। जैसे उससे बातें करके मुझे एनर्जी मिलती हो, जो मेरे सारे आलस को भगा देती हो।
"आप मुझे सुन भी रही हैं?" सहसा उसने मुझे टोका तो मेरा ध्यान टूटा।
"अजी बिल्कुल!" मैं मुस्कुराई।
"क्या लगता है आपको, बारिश होगी आज?" आसमां की ओर देखकर उसने पूछा।
हम कुछ देर पहले अमृतसर के मशहूर रंग पंजाब रेस्त्रां में खाना खाकर आए थे और सामने के एक बेंच पर बैठकर बतिया रहे थे। जब मैं बोलती तो वो मुझे बस बिना पलक झपके निहारता रहता, जब मैं खाती तो वो मेरा मुंह चलाना देखता, जब मैं फोन में लगी होती तो वो मेरी आंखें पढ़ता, जब मैं रास्ते पर चल रही होती, तो वो मेरे चलने के अंदाज को कॉपी करता, जब मैं चुप हो जाती तो वो बोलने लगता। जितनी गहरी और मजेदार बातें हमने इन बीते तीन दिनों में की हैं, उतनी शायद मैने कभी नहीं की। मैं उससे मिली तो लगा जैसे कोई पुरानी खुशबू लौट आई हो, जिसका इंतजार बरसों से रहा हो, पर समय के साथ उसकी आस छूट गई हो। जैसे कोई चुपके से आकर मनचाहा तोहफा पास रख गया हो।
"जी! बारिश तो आयेगी ही, आप जो बॉस्टन से अपने साथ लाए हो! अपने तमाम तोहफों के साथ गिफ्ट रैप करके बारिश की बूंदें भी ले आए होगे मेरे लिए" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा।
"बारिश क्या, हम तो सारा आसमान लेकर आए हैं आपके लिए। आपके प्यारे रंग में रंगा हुआ ये स्याह आसमान हमारे प्यार के नगमें लिखने वाली स्याही का ही तो रिप्रेजेंटेशन है!"
उसकी बातें मुझे हमेशा से ही निराली लगती हैं। जैसे वो जीवन के साधारण मुद्दों को भी अपने शब्दों में पिरोकर नायाब बना देता है, वैसे ही वो जिंदगी के छोटे बड़े लम्हों को अपनी मौजूदगी से खास बना देता है।
मैं खुद को ज्यादा एक्सप्रेस नहीं कर पाती, शायद बचपन से ही खुद में रहने की आदत के कारण। मगर वो मेरे मन का हाल बिना कहे ही समझ लेता है। कभी कभी मुझे उसका इतना प्यार देखकर डर सा भी लगता है, कभी कभी सोचती हूं कि इतना प्यार क्या कोई कर भी सकता है, फिर उसकी बातें मुझे याद आती हैं। वो कहता है कि वो खुद में कुछ नहीं है, बिलकुल खाली है, वो बस सामने वाले का दर्पण बन जाता है। वो एक खाली पात्र है जिसमें वो सामने वाले को अपने अंदर उतार लेता है। शायद वो मेरे पुराने प्यार की नई सुगंध बन कर मेरे जीवन में आया है। वो प्यार जो कभी मुकम्मल नहीं हो पाया, ये उस प्यार का पैगाम लेकर आया है। ये मेरे ही प्यार को मुझे सौंप रहा है, अपने शब्दों में पिरोकर, अपने गीतों में संजोकर, अपनी बच्चों वाली मासूम हरकतों में ढालकर, अपने पैंपरिंग वाले रूप में सजाकर, अपनी समझ और ज्ञान के स्वरूप में बिखराकर, अपनी मौजों की रवानियां सिखाकर...ये मुझे मेरा ही प्यार वापस दे रहा है।
वो प्यार जिसकी मैं हकदार हूं।वो प्यार जो मुझे कभी तोड़ गया था, वो अब मुझे जोड़ने वापस आया है।उससे जुड़कर मैं अब शायद खुद से जुड़ जाऊंगी।न जाने कैसे खुद से अलग थी अब तक, सारा ध्यान और ऊर्जा अपने काम को समर्पित कर देती थी कि खुद पर ध्यान ही न रहा। वो मेरा ध्यान मुझे वापस देने आया है।
कौन है वो?क्या खुदा का कोई फरिश्ता है?या उससे कोई पुराना रिश्ता है?उससे बातें करते हुए कभी परायापन सा नहीं लगा!वो इतना खास क्यों है?वो दूर होते हुए भी इतना पास क्यों है?मैं उसके लिखे हुए में खुद की तस्वीर देख लेती हूंमैं उसके इश्क की गर्मी में अपने इतिहास की रोटियां सेक लेती हूंवो कहता है उसकी दुनिया हूं मैंमैं सोचती हूं इतनी जल्दी कैसे मैं उसकी दुनिया बन गईपर ये नहीं जानती कि प्रेम मासूम होता है बच्चे की तरहबड़े होने पर हम करप्ट हो जाते हैं, खुद से ही बेइमानी करने लगते हैंमगर बच्चा मन का भोला और मासूम होता हैशायद इसलिए उसका बचपन अभी भी जिंदा हैशायद इसलिए उसके मन में इतनी मासूमियत और दिल में इतना प्रेम हैशायद इसलिए उसका बचपन नहीं गयाया शायद उसका प्रेम उसे करप्ट होने नहीं देताअपना प्रेम अब वो मुझे सौंपने आया हैअब वक्त आ गया है मेरा उस प्रेम सागर में गोते खाने का...उसके तोहफे को सीने से लगाने का...
शाम के साढ़े पांच बजने वाले थे। सूरज अपनी दिनचर्या पूरी करके डूबने की फ़िराक में था। दिन भर की बारिश से आसपास का सारा वातावरण धुल सा गया था, मानो मौसम ने सबको अपने रंग में रंग डाला हो। गंगा आज कुछ ज्यादा हरी लग रही थी। दोनों अपने पैर गंगा में डाले किनारे पर बैठे हुए थे। किसी मंदिर से आते हुए भजन संध्या के बोल उनके कानों में पड़ रहे थे। वो दोनों शांत बैठे थे, पर उन्हें देखकर लग नहीं रहा था कि वो अजनबी हों। ऐसा भी नहीं था कि वो दोनों बहुत समय से साथ रह रहे हों। अभी दो दिन पहले ही वो आपस में टकराए थे - हां उसे टकराना कहना ही ठीक होगा। दो दिन पहले तक वो अपनी अपनी दुनिया में रमे थे। अब उनकी दुनिया एक होने वाली थी। जब उन्होंने पहली दफा एक दूसरे से बात की, उन्हें लगा ही नहीं कि वो पहली बार बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में कोई बनावटीपन नहीं था, कोई परायापन नहीं था। ऐसा नहीं लगा जैसे वो कोई नई बात शुरू कर रहे हों। उनकी बातें ऐसी थीं जैसे कहीं पहले का कुछ छोड़ आए हों, और अभी उसी को आगे बढ़ा रहे हों। अभी दोनों चुप बैठे थे - मौसम के रंग में रंगे हुए।
"टहलें?" लड़के ने धीरे से कहा।
"चलो!" लड़की मुस्कुराई और खड़ी हो गई।
दोनों सीढियां चढ़ते हुए सड़क पर आ गए। उन्हें सीढियां चढ़ते देख एक राहगीर हतप्रभ रह गया। उसे लगा जैसे शिव पार्वती साक्षात् गंगा से बाहर निकल रहे हैं और उनके पीछे डूबता सूरज उनकी आभा को महिमामंडित कर रहा है। उसके हाथ अपने आप प्रणाम की मुद्रा में आ गए। लड़के ने भी उसे देखकर नमस्कार कर दिया। अब सड़क दो तरफ जाती थी - बाएं और दाएं। लड़के ने लड़की की ओर देखा और पूछा, "किधर चलें?"
लड़की ने लड़के का हाथ पकड़ा और कहा - "मेरे सपनों की दिशा में।" वो लहलहाते हुए चले जा रहे थे आज हवा उनके चेहरे को छूती हुई बह रही थी।
"तुम कितने सपने देखती हो!" लड़के ने लड़की के बालों को उड़ते देखकर कहा।
"क्यों? सपने देखना बुरी बात है?" लड़की ने अपनी मासूम निगाहें लड़के की ओर कीं।
"बिलकुल नहीं!"
दोनों चुप चलने लगे। थोड़ी देर में लड़की ने पूछा "तुम भी मेरी तरह सपने क्यों नहीं देखते?"
लड़का मुस्कुराया और बोला "क्योंकि मैं सपनों में नहीं सत्य में जीता हूं। और मेरा सत्य मेरे सामने है। सत्यम शिवम सुंदरम। फिर मैं और कोई सपना क्यों देखूं!"
"तुम भी न! तुमसे बातों में कोई नहीं जीत सकता।" लड़की ने लड़के के बालों पर हाथ फेरा और आगे बढ़ गई।
चलते चलते रात होने को आ गई थी।
"वापस चलें?" लड़की ने पूछा।
"मैं तुम्हारे साथ आगे बढ़ना चाहता हूं। पीछे नहीं जाना चाहता!" लड़के ने कहा।
"तुम भी न! हर समय फिलोसॉफी झाड़ते रहते हो।" लड़की ने मुंह बनाते हुए कहा।
"अपनी नाक तेज करो। कुछ खुशबू आ रही है?" लड़के ने दूर से आती एक सुगंध की बात करते हुए कहा।
"पता नहीं।" लड़की कोई कुछ समझ नहीं आया।
"चलो आगे!"
थोड़ी देर चलते हुए लड़की खुशी के मारे उछल पड़ी।
सड़क के किनारे एक बड़ी सी कढ़ाई रखी थी जिसमें ताज़ा समोसे तले जा रहे थे। वो खुशबू गरम समोसों की थी।
"इसलिए मैं कह रहा था तुमसे की आगे बढ़ते चलो। वो कोई फिलोसॉफी नहीं थी, बल्कि स्वाद-व्याकरण था। चलो अब चटखारे लिए जाएं।" लड़के ने दुकान की ओर चलते हुए कहा।
"भैया, दो समोसे देना" लड़की ने बिना लड़के का इंतज़ार करते हुए कहा।
पीछे से लड़का चहकते हुए बोला, "और हरी चटनी भी!"
दुकान का नाम था "प्रेम मिष्ठान भंडार"।
न हिन्दू हूं न मुसलमान हूं
न खुदा हूं न भगवान हूं
खुद की तलाश करता हुआ
मैं अदना सा इंसान हूं
सत्य की तलाश में दर दर भटकता हूं
खुद को जानने के लिए तरसता हूं
इन पारलौकिक बातों से अनजान हूं
मैं अदना सा इंसान हूं
मंदिरों और मस्जिदों के बाहर
लोगों को लाइन में लगे देखता हूं
जो तेरे दर्शन करने को उत्सुक रहते हैं
कभी तुझे पत्थर में ढूंढते हैं
तो कभी नीले आकाश में
कभी खुद के अंदर तलाशते हैं
तो कभी कैलाश के आवास में
कोई नदी में तुझे ढूंढता है
तो कोई दूध तुझे पिलाता है
कोई पुष्प चढ़ाने आता है
तो कोई चादर चढ़ाने आता है
कहां है तू
तेरा बसेरा कहां है
तेरी रात कहां रहती है
तेरा सवेरा कहां है
थक हार कर मैं भी पत्थर में तुझे मान लूंगा
यह आसान तरीका है खुद को बहलाने का
इससे प्रश्न ही खत्म हो जाता है
तुझे ढूंढने में समय गवाने का
मैं तेरा किया हुआ एक एहसान हूं
अपने कर्मों से नादान हूं
मैं अदना सा इंसान हूं…
खुद का लिखा मैं खुद ही भूल जाता हूं
तुझे क्या सुनाऊं
तुझसे भागकर मैं तेरे ही पास आता हूं
तुझे क्या बताऊं
कहानी नहीं है हमारी कोई
यह अच्छे से जानता हूं
मगर खुद को कैसे समझाऊं
कुछ बातें समझ के परे होती हैं
जिन पर किसी का बस नहीं होता
हम उन बातों के बाद की बात का हिस्सा हैं
जिन्हें करते करते
मैं खुद ही थक जाऊं
इस एहसास के बारे में मैं खुद नहीं जानता
फिर तुझपे क्या हक जताऊं
खुद का लिखा मैं खुद ही भूल जाता हूं
तुझे क्या सुनाऊं...
वो मज़दूर होने से पहले मजबूर था
वो अपने घर से कोसों दूर था
चल पड़ा था पटरियों के किनारे अपने घर की ओर
उसे क्या पता था वो रास्ता जाएगा मृत्यु लोक
चलते चलते वो थक गया था
भूख के मारे वो पटरियों पर बैठ गया
सोचा उसने कुछ रोटी बाद के लिए बचा देता हूं
दो रोटी खाकर आधा पेट वो सो गया
जहां सारी दुनिया कोराेना से लड़ रही थी
उसकी लड़ाई घर पहुंचने की थी
उसकी लड़ाई भूख से थी
उसकी लड़ाई हर उस दुख से थी
जो उसने जीवन भर झेले थे
उसकी लड़ाई उस गरीबी से थी
जिसके साए में उसने न जाने कितने दिन देखे थे
नींद के आगोश में उसे पटरियां खा गईं
ट्रेन की आवाज़ में दबकर उसके जीवन में खामोशी छा गई
चीथडों के बीच उसका वजूद खो गया
वो मजबूर मज़दूर हमेशा के लिए सो गया
रह गईं तो बस उसकी खून में लिपटी रोटियां
और उसके घर से उसकी दूरियां
जहां हमेशा के लिए अंधकार छा गया था
सुबह हुई सरकार की तरफ से मुआवजे का संदेश आ गया था...
गलती किसकी थी, ये कोई नहीं जानता
कोई अपने आप को कभी दोषी नहीं मानता
सबके चुप रहने में ही शायद सबकी भलाई है
बचपन से सबको हमने यही दुनिया दिखलाई है...
इसी पर हम नाज़ करेंगे फक्र करेंगे
इसी पर हम अपने इंसान होने पर गर्व करेंगे...
तेरा वजूद उस भगवान की तरह है
जिसकी तलाश में हर कोई भटकता रहता है
मुस्कुराती हुई लाश के जैसे इंसान
अंदर ही अंदर तड़पता रहता है....
तुझे पाने की चाह अंदर से झकझोर देती है
तेरे न मिलने पर हर उम्मीद दम तोड़ देती है
तू मिल जाए तो कायनात अपने कंधे पर बिठा लेती है
तू न मिले तो सारी दुनिया साथ छोड़ देती है....
आज के दौर में तू ऑक्सीजन बन गई है
तेरे बिना इस लाश में जान नहीं आएगी
कितने भी जतन करने पड़े तेरे लिए
तू जब भी आएगी मेरे सारे अरमान रंग लाएगी....
सारी खुशियां त्याग दी तुझे पाने की खातिर
इतनी आसानी से हाथ नहीं आयेगी तू है बड़ी शातिर
घर परिवार से दूर रह कर मैं थक सा गया हूं
तेरे चक्कर में मैं ज़िन्दगी से बहक सा गया हूं...
आखिर तू भी एक समाज का ढकोंस्ला ही है
लोगों के लिए दिखावे का चोंचला ही है
फिर भी मैं तुझसे हार नहीं मानूंगा
तुझे हासिल कर के ही सत्य को जानूंगा
वो सत्य जो बिना ठोकर खाए अच्छा नहीं लगता
वो सत्य जिसको जानकर मैं जी नहीं सकता....
मैं कौन हूं ?
यह सवाल हर किसी के मन में
कभी न कभी आता तो जरूर है
क्या मैं वो हूं जो सबको बतलाता हूं
या मैं वो हूं जिसे जानने से खुद ही घबराता हूं
इस सवाल का जवाब जानना
जितना जरूरी है उतना ही निरर्थक भी
दुनिया भर की किताबें पढ़ कर भी
अगर खुद को नहीं जान पाए
तो क्या जाना इस युग में
कर्म ही करना था तो मशीन ही बन जाते
मानवता का चोला क्यों ओढ़ा ?
सफलता की चाहत में अंधे होकर
अपने वजूद का गला क्यों घोटा
क्या स्वयं को जानना इतना जरूरी है
क्या इस सवाल का जवाब ढूंढना मजबूरी है?
अगर नहीं भी है तो जानने में क्या हर्ज है
यह प्रश्न मानवता की सबसे अनोखी रिसर्च है…
चलते-चलते वो थक सा गया था
तेज धूप में पसीने से तर-बतर
छांव में कुछ देर सुस्ताने लगा
उसकी ज़िन्दगी उसकी आंखों के सामने तैर गई
कितने अरमानों के साथ वो मुंबई आया था
आज दस साल बाद भी ले-देकर उसके पास
अपना कहने लायक कुछ भी नहीं है
मकान भी किराए का है
नौकरी का भी कोई ठिकाना नहीं है
शायद ज़िन्दगी भी वो उधार की जी रहा है।
इतने में एक बस आकर रुकी
भींड़ का एक झोंका उसकी ओर दौड़ पड़ा
वो भी उन लोगों की भीड़ में
कहीं खो सा गया था
जो हर साल अनेक सपने सजाए मुंबई आते हैं
और अधूरे अफसानों के साथ
सारी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं
हर चीज बेगानी है यहां
अगर अपना कहने को कुछ है
तो वो है अपनी परछाईं....
कांपते हाथों से वो लकड़ियां जुटा रहा था
सर्द हवा उसके वृद्ध शरीर को चीरकर जा रही थी
ठिठुरता हुआ वो घर के अंदर दाखिल हुआ
कमरा बंद करके उसने लकड़ियां जला लीं
आग तापते हुए उसकी आंखें भर आईं
आंसू छलक कर अलाव में गिर रहे थे
ऐसा लग रहा था मानो
कोई आग में घी डाल रहा था।
बरसों पुरानी याद उसके जेहन में उभर आयी
जब उसके बच्चे साथ बैठकर अलाव सेंकते थे
और अपने स्कूल की दिनचर्या बताते थे
आज वो सब अपनी दुनिया में मस्त हैं।
और ये बूढ़ा आज भी इस इंतजार में है
कि उनकी एक झलक दिख जाए
कराहते हुए वह उठ खड़ा हुआ
इस उम्मीद में कि शायद
आज खाने को कुछ मिल जाए...
इन राशन की कतारों में खड़े लोगों को देखकर
ऐसा लगा मानो यह कतार ज़िन्दगी है
हर कोई एक-एक कदम आगे बढ़ रहा है
अपने अंतिम सफर की ओर
ज़िन्दगी और मौत के बीच का फासला
इस कतार जितना ही तो है
अंत में किसी को राशन मिले या न मिले
सफरनामा चलता रहता है
मनुष्य यूंही आगे बढ़ता रहता है
सुख दुख की सीढ़ी चढ़ता रहता है
ख्वाबों के महल गढ़ता रहता है
किसी को नहीं पता यह कतार कब खत्म हो जाएगी
राशन की दुकान कब बंद हो जाएगी....
गुजरती शाम को देख कर आज एक ख्याल आया
एक दिन इस शाम की तरह हम भी ढल जाएंगे
सूर्यास्त की किरणों को देख मन में सवाल आया
जाना तो है एक दिन आज नहीं तो कल चले जाएंगे।
शाम ढली तो रात ने सबको अपने आगोश में घेर लिया
इतना सन्नाटा छाया जैसे सबने उसकी बात मान ली
सब थके हारे यात्री अपने घरौंदों को लौट गए
अन्धकार देख कर हमने भी अपनी चादर तान ली।
कुछ समय में यह रात भी गुजर जाएगी
कल की सुबह फिर नया मुकाम लाएगी
ज़िन्दगी की कशमकश में बस जीना मत भूल जाना
वरना मौत का क्या पता कब अपना अक्स दिखलाएगी।।
खामोशियों के समंदर में
जब अल्फा़जों ने गोते लगाए
हम भी समझ गये
कि समय आ गया है
कुछ नये विचार लाने का
कहीं दूर चले जाने का
सबको विश्वास दिलाने का
कि सब कुछ ठीक है...
हाँ सब कुछ ठीक है
देखो हम मुस्कुरा रहे हैं
दुनिया के सामने
कायदे से पेश आ रहे हैं
अपने वजूद को कहीं
पीछे छोड़ते जा रहे हैं…
उस राह से कभी गुजर मुसाफिर...
जहाँ शंखनाद हो
हाहाकार हो।
जहाँ सत्य बिकता
बीच बाजार हो।
जहाँ प्राणियों की
चीख-पुकार हो।
जहाँ देशभक्ति
सिर पे सवार हो।
हर भाषा में जहाँ
ललकार हो।
जहाँ इंसानियत
शर्मसार हो।
उस राह से कभी गुजर मुसाफिर...
कुदरत का खेल किसी की समझ में नहीं आता
वैसे समझ में भी कैसे आएगा
किसी मानव द्वारा रचित खेल थोड़े ही है
जिसे समझना आसान होगा
कभी कभी हम कुदरत को समझने की
गुस्ताखी कर बैठते हैं
और कुदरत भी हमारे मजे लेने लगती है
हमें लगता है हम कुदरत से जीत जाएंगे
मगर हम उसके खेल में और फंसते जाते हैं
लोभ की दलदल में और धंसते जाए हैं
और जब हमारी जीतने की उम्मीद टूट जाती है
तो कोई बिन बुलाया मेहमान आकर
हमें आश्चर्यचकित तो करता ही है
साथ में हमें खेल भी जीतवा देता है
या शायद हमें भ्रम होता है जीतने का
हम हमेशा से ही भ्रम में जीते हैं
इस भ्रम में कि हम जी रहे हैं....
यूं तो बहुत से चांद देखे थे हमने
आसमान से धरती पर उतरते हुए
कुछ सितारे भी आए थे दावत में हमारी
चमक बिखेर कर चहकते हुए
दहलीज पर हमारी सूरज खड़ा था
आशियाने का पहरेदार बनकर
उसकी रोशनी से शमा भी रोशन हुई थी
हमने उनको भी देखा बहकते हुए
फूलों के ऊपर भंवरे भी मंडराए
उनकी खुशबू में वो भी महकते हुए
शाम गुजरने से पहले चांदनी भी आई
चांद के पास से गुजरते हुए
यूं तो बहुत से चांद देखे थे हमने
आसमान से धरती पर उतरते हुए...
घनघोर तपस्या में हूं लगा
मैं पूरे अपने तन मन से
तेरे दर्शन को तत्पर हूं
न जाने कितने जन्मों से
अघोरी बन कर बैठा हूं
गंगा के मैं हर तट पे
दर्शन देने का जब भी मन हो
आ जाओ भोले पनघट पे
रहूंगा यहीं जीवन भर मैं
मेरा काल भी क्या बिगाड़ेगा
मुझे किसकी है क्या चिंता
मेरा महाकाल मुझसे संवारेगा
शिव शम्भू तू है वर दाता
मेरी हर श्वास से है तेरा नाता
तू ही मेरी अभिलाषा है
तू ही है प्रतिकार मेरा
मुझमें तू ही समाया है
मुझ पर है अधिकार तेरा
धन्य हो गया पाकर मैं वरदान तेरा
तेरी पूजा करने में है सम्मान मेरा
मेरा जीवन तुझपे न्यौछवर है
कभी ले लेना बलिदान मेरा...