लिख जाता हूँ मैं
यूँ ही कभी लिख जाता हुँ मैं,
अपने भावनाओ के कारण औरों को दिख जाता हुँ मैं ||
सोचा ना था की मैं भी खेलूंगा ये शब्दों का खेल,
और कहानियों को कहानियों से कराऊंगा मेल |
ख़ुशी, ज्वलन, उत्तेजना, दुख थे मन मे मेरे,
जो उभर कर आना चाहते थे शामों सवेरे |
बस इसी मन के आगे बिक जाता हुँ मैं,
क्युकी यूँ ही कभी लिख जाता हुँ मैं,
अपने भावनाओ के कारण औरों को दिख जाता हुँ मैं ||
डर रहता है की कही अकेले ना पड़ जाऊ,
औरों से दूर रहकर कहीं अदृश्य ना हो जाऊ |
कहीं शुन्य से सुरु होकर शुन्य पे ही न आ जाऊ,
और कहीं चिंतन के अनंत खाई के धुरी मे न गिर जाऊ |
लेकिन इसी डर से जीत जाता हुँ मैं,
क्युकी यूँ ही कभी लिख जाता हुँ मैं,
अपने भावनाओ के कारण औरों को दिख जाता हुँ मैं ||
सत्य है या मिथ्य? पास है या दूर?
असमंजस के परिस्थिति में, है हर व्यक्ति मज़बूर |
किसको ठहराउ दोषी और किसका है कसूर?
किसका ख्याल है किसको पसंद, और किसको नामंज़ूर |
इन्हीं कल्पनाओं के कश्मकश के आगे टिक जाता हुँ मैं,
क्युकी यूँ ही कभी लिख जाता हुँ मैं,
अपने भावनाओ के कारण औरों को दिख जाता हुँ मैं ||
इस समाज व दुनिया में कहलाते है वही कवि,
जो लिखें कविता ऐसे, जैसे चित्रकार पेश करे कोई छवि |
परन्तु कुछ कवि लिखते है समाज के दलदल से बचने के लिए,
होती है वो ऐसी कविताएँ जो लोगों से ज्यादा होती है उनको प्रिय |
इसी समाज के दलदल में कमल रूपी खिल जाता हुँ मैं,
क्युकी यूँ ही कभी लिख जाता हुँ मैं,
अपने भावनाओ के कारण औरों को दिख जाता हुँ मैं ||