"अँधेरों की सुबह" मेरा पहला ग़ज़ल-संग्रह है. इस संग्रह में करीब एक वर्ष में लिखी गई ग़ज़लों के अलावा, पुराने दीवान की दो ग़ज़लों को भी सम्मिलित किया है। पिछले संग्रह का नाम भी “अंधेरों की सुबह” ही रखा था और वह शेर जिनके कारण यह उनवान हुआ है-

 

सूर्य काला हो गया है, आसमानी है ख़बर

ये अँधेरों की सुबह अब आपके पेशे-नज़र


पिछले एक वर्ष में अरूज़ को जितना समझ सका हूँ, ये गज़लें, उसी के आधार पर कहने का प्रयास किया है। इस कोशिश में अगर रिवायती ग़ज़ल के पाठकों को कुछ ख़ामी का अहसास हो तो उसके लिए मैं तहे-दिल से मुआफी चाहता हूँ। मैं अपनी कोशिश में कितना कामयाब रहा हूँ, ये आप पाठक ही बता सकते है। 

कविताई मुझे संस्कारों से ही मिली है. शायद यही कारण है कि गणित-विज्ञान स्नातक होने के बावजूद मेरी अभिरुचि साहित्यिक-सांस्कृतिक ही रही. मैंने इंजीनियर बनने का भरसक प्रयास किया किन्तु सच्चे मन से किया, यह नहीं कह सकता. जब गणित विज्ञान जैसे विषयों में मन नहीं रमा तो अपनी अभिरुचि के प्रति मुखर हो गया. पढ़ाई से संघर्ष का एक कठिन दौर था. अल्फ़ा, बीटा, गामा से लेकर फिजिक्स केमिस्ट्री की मिस्ट्री का दौर..... हाँ इस दर्मियान एक सॄजनात्मक कार्य अवश्य करता रहा कि एक उपन्यास, बीसियोंकहानियां और सैकड़ोंगज़ले, कवितायें आदि लिख गया. अपने इन्हीं शौकिया-कार्यों को जब साधने में लग गया तो परिणाम ये वेबसाईट है




अँधेरों की सुबह

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अँधेरों की सुबह (ग़ज़ल-संग्रह)

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