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प्रश्न पत्र-13
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प्रश्न पत्र 13 के उत्तर
1. देह और आत्मा का भ्रम विलीन कैसे होता है?
➡️जैसे-जैसे आत्मा श्रुत सागर मे अवगाहन करता जाता है, वैसे-वैसे देह और आत्मा का भ्रम विलीन होता जाता है।
2. चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग से किसका ज्ञान होता है?
➡️ चरणानुयोग से वर्तमान में आचरण की विधि का और द्रव्यानुयोग से आत्म तत्व की वीतरागता का ज्ञान होता हैं।
3. लोक मूढ़ता क्या है?
➡️लोक मे प्रचलित मान्यता जब बिना विवेक के स्वीकारी जाती हैं तो यही लोक मूढ़ता कहलाती हैं जैसे गंगा नदी की देवी मानकर पूजा करना।
4. गंगा आदि नदियों की लोग पूजा क्यु करते हैं?
➡️गंगा आदि नदियों में व्यंतर आदि देवों का स्थान मानकर भय से लोग उनकी पूजा करते हैं ऐसी मूढ़ता विश्व में सर्वत्र व्याप्त है।
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प्रश्न पत्र-14
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प्रश्न पत्र 14 के उत्तर
1. सम्यग्ज्ञान की भावना क्या है ?
➡️ आचार्य कुन्द-कुन्द ने पंचास्तिकाय में ज्ञान के दुरुपयोग को पाप कहा है | ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो या न हो किन्तु उसका दुरुपयोग न हो यही सम्यग्ज्ञान की भावना है।
2. श्रुतज्ञान किसकी आराधना के लिए है ?
➡️ श्रुतज्ञान रत्नत्रय की आराधना के लिए है और श्रुतज्ञान सुनने से ही नहीं होता है किन्तु देखने से भी होता है।
3. विनय का पहला और तीसरा अर्थ क्या है ?
➡️ विनय का पहला अर्थ है ख्याति, पूजा की इच्छा के बिना नमन में प्रवृत्ति करना और विनय का तीसरा अर्थ है विशेष रूप से नयों का जानकार ।
4. चन्द्रगुप्त मुनि ने समाधिमरण कैसे किया ?
➡️ एक महान् सम्राट होकर भी भद्रबाहु के चरणों की पूजा करते थे और गुरु भक्ति उनमें कूट-कूट कर भरी थी व गुरु चरणों का ध्यान करते हुए उन्होंने समाधिमरण किया था।
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प्रश्न पत्र-15
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प्रश्न पत्र 15 के उत्तर
1. किस नय के कारण शरीर और आत्मा को अलग अलग कहते है ?
➡️निश्चय नय के कारण शरीर और आत्मा को अलग अलग कहते है।
2. वर्तमान में कौन से ग्रंथ है जिनका सम्बन्ध श्रुत के अंग और पूर्व से है?
➡️वर्तमान में कसायपाहुड़ और षट्खंडागम सूत्र ग्रन्थ हैं उनका सम्बन्ध श्रुत के अंग,पूर्व से है ।
3. द्वादशांग और द्वादशांग शास्त्र किसे कहते हैं?
➡️बारह अंगों में निबद्ध श्रुतवाणी को ही द्वादशांग कहा जाता है, बारह संख्या को संस्कृत में द्वादश कहते हैं और द्वादश अंग जिसमें हों वह द्वादशांग शास्त्र हैं।
4. चौदह पूर्व पृथक् रूप से कहे जाने का क्या कारण है?
➡️पूर्वगत जो भेद है उसका विस्तार बहुत है व इस पूर्व के चौदह भेद हैं और इन पूर्व शास्त्रों का विस्तार इतना अधिक है कि चौदह पूर्व पृथक् रूप से कहे जाने लगे यही कारण है।
प्रश्न पत्र-16
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प्रश्न पत्र 16 के उत्तर
1. भावश्रुतकेवली कौन होते हैं?
➡️ जो श्रमण ज्ञानामृत के रस से भरे अपने आत्मा को चैतन्य मात्र, सभी प्रकार के उत्पन्न हुए विकल्प जाल से रहित, ज्ञानमात्र अनुभव करते हैं वही वस्तुतःसमस्त श्रुत के धारक हैं। इन्हें ही भावश्रुतकेवली कहा जाता है।
2. द्रव्य श्रुतकेवली कौन है और वे श्रमण निर्विकल्प समाधि में कब होतें हैं?
➡️ जो सम्पूर्ण श्रुतज्ञान को जानते हैं वे द्रव्य श्रुतकेवली हैं। ऐसे ऋद्धिधारी महाश्रमण भी जब द्रव्यश्रुत से आत्मा को जानकर मात्र आत्मरस का आनन्द लेते हैं, तभी वह निर्विकल्प समाधि में होते हैं ।
3. भव्य आत्मा अपने लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता हैं?
➡️ भव्य आत्मा यदि आत्मार्थी बनकर मोक्षमार्ग पर चले तो वह अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करता है।
4. आत्म ज्ञान कैसे होता है एवं व्यवहार और निश्चय का सही प्रयोग क्या है?
➡️ आत्मज्ञान पुरुषार्थ सहित आत्मभावना से ही आता है, केवल चर्चा करने से आत्मज्ञान नहीं होता है इसीलिए धर्म का लायसेंस लो और आगे बढ़ो यही व्यवहार और निश्चय का सही प्रयोग है।