प्रश्न पत्र-43
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प्रश्न पत्र- 43 के उत्तर
1 - चित्त की कलुषता को किससे धोया जाता है ?*
उ• - प्रवचन वत्सलत्व रूपी जल से ।।
2 - "सुमण में सु " से क्या तात्पर्य है ?
उ• -श्रेष्ठ , सुन्दर, अच्छा ।।
3 - आत्मा को अधम से अधम भी कौन बना देता है ?
उ• - " परचिन्ताधमाधमा " अर्थात् पर की चिन्ता आत्मा को अधम से भी अधम बना देती है।।
4 - प्रवचन वात्सल्य कौन करता है ?
उ• -जो सभी जीवों में सुख की कांक्षा करता है, भावना करता है और अपाय विचय धर्मध्यान करता है, वह प्रवचन वात्सल्य करता है ।।
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प्रश्न पत्र-44
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प्रश्न पत्र 44 के उत्तर
1 - वात्सल्य और विनय दोनों स्तर पर कैसे हैं ?
उ• - भावात्मक स्तर पर दोनों एक ही हैं किंतु क्रियात्मक स्तर पर थोड़ा सा भेद दिखता है ।।
2 - जगत् के प्राणिमात्र पर सर्वाधिक वात्सल्य भाव किसका होता है ?
उ• - जगत् के प्राणिमात्र पर जैसा वात्सल्य भाव तीर्थंकर प्रभु के भीतर होता है वैसा अन्य किसी के पास नहीं होता है ।।
3 -कौन वीतराग मार्ग पर आरूढ़ नहीं हो सकता है ?
उ• - जिसने अभी वैर भाव या ईर्ष्या भाव नहीं जीता , वह वीतराग मार्ग पर आरूढ़ कैसे हो सकता है।।
4 - मात्सर्य भाव किससे उत्पन्न होता है ?
उ• -द्वेष से ही मात्सर्य भाव उत्पन्न होता है ।।
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प्रश्न पत्र-45
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प्रश्न पत्र 45 के उत्तर
1 - मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी किसे कहा है ?
उ• -मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी सम्यग्दर्शन कही है ।।
2 - कौन सा जीव तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करता है ?
उ• -मोक्षमार्गी जीव ही इन षोड़श कारण भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करता है ।।
3 - क्या पंचमकाल में भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है , ऐसा उल्लेख किन आचार्य ने किया है ?
उ• -हां ! आचार्य कुन्दकुन्द देव ने इस काल मे भी तीर्थंकर प्रकृति के बन्ध का उल्लेख किया है ।।
4 - तित्थयर भावणा ग्रन्थ की प्राकृत गाथाओं को गुरुदेव ने किस स्थान पर लिखना प्रारम्भ किया था ?
उ• -बण्डा (सागर ) के शान्तिनाथ जिनालय में दोपहर सामायिक के उपरान्त सोलहकारण भावनाओं को मूल प्राकृतगाथा में 1 अप्रैल 2010 से लिखना प्रारम्भ किया था ।।
*1. सम्मत्त-विसोही भावणा*
दर्शनविशुद्धि आदि भावों के द्वारा भावना करने वाले सम्यग्दृष्टि आत्मा को तीर्थकर नाम कर्म का बंध होता है।
*2. विणय भावणा*
रत्नत्रय सहित आत्मा की विनय करना मोक्षपथ के सम्यग्दृष्टि जीव के लिए प्रथम आवश्यक गुण है
*3. णिरदियार सीलभावणा*
जो सम्यग्दृष्टि जीव आत्मा की भावना करता है और पुण्यफल की आकांक्षा रहित है वह शील,व्रतों में अतिचार रहित होता है
*4. णाण भावणा*
संवर का आदर और मोक्षमार्ग में निर्जरा की इच्छा करने वाला जीव ज्ञानोपयोगी है
*5. संवेग भावणा*
अभीक्ष्ण संवेगी आत्मा संसार से भयभीत, आत्म तत्त्व का ध्याता ,जिनरूप में लीन रहता है
*6. तवो भावणा*
ख्याति, पूजा, लाभ को त्याग करके सम्यक्त्व की विशुद्धि सहित बारह प्रकार का तप निश्चय से कर्मों को नष्ट करने वाला है
*7. पासुग-परिच्चागदा भावणा*
तीर्थकरों की दिव्यध्वनि, साधुओ का रत्नत्रय धर्म का दान,श्रावक के द्वारा शक्ति अनुसार चार प्रकार का प्रासुक दान प्रासुक परित्याग है
*8. साहुसमाहिभावणा*
धर्म और शुक्ल ध्यान को ध्याने वाला, मुनि के ध्यान में चित्त लगाने वाला आत्मा ही साधु-समाधि की भावना भाता है
*9. वेज्जावच्च भावणा*
रत्नत्रय से हमेशा पवित्र साधुओं की वैयावृत्य तप करना निश्चय से प्रमुख धर्म है इस तप से श्रीकृष्ण ने तीर्थकर शुभ नाम कर्म बांधा था
*10. अरिहंत भत्ती भावणा*
चौंतीस अतिशय वाले अष्ट महा प्रातिहार्यों से सहित अरिहंतों की भक्ति मोह विष का नाश करने वाली और मूल्यवान फल को देने वाली है
*11. आइरिय भत्ती भावणा*
तीर्थंकर की वाणी को पीने एवं पिलाने वाले, शिष्यों की रक्षा करने वाले आचार्य सदा जयवन्त हो
*12. बहुसुदभत्ती भावणा*
विनय से जिन महामुनियों ने गुरु के निकट बहुश्रुत का अध्ययन किया, रत्नत्रय से संयुक्त उन श्रमणों की वंदना करता हूँ
*13. पवयण भत्ती भावणा*
जिस प्रवचन में छह द्रव्य, नौ पदार्थ , पंचास्तिकाय के साथ सात तत्त्व, और लोक-अलोक है उस प्रवचन को सदा प्रणाम करता हूँ
*14. आवस्स्यापरिहीण भावणा*
श्रमण के छह आवश्यक और छह काल निश्चय पूर्वक रत्नत्रय को साधने के लिए आवश्यकों में अपरिहीनता कहा है
*15. मग्गपहावणा भावणा*
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र (रत्नत्रय) को स्वयं धारण करना या अन्य को प्रदान करना मार्ग प्रभावना है
*16. पवयण वच्छलत्त भावणा*
सागार, अनगार चर्या में युक्त जीवों में, दर्शन, श्रेष्ठ ज्ञान, चारित्र में लगे जीवों पर वात्सल्य करना प्रवचन वत्सलत्व भावना है