प्रश्न पत्र-33
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प्रश्न पत्र- 33 के उत्तर
1. कौन सा मोक्षमार्ग अभेद रूप और कौन सा मोक्षमार्ग भेद रूप है?
उत्तर - निश्चय मोक्षमार्ग अभेद, अखण्ड रूप है तो व्यवहार मोक्षमार्ग भेद, विकल्प रूप है।
2. किस को सर्वथा हेय और अभूतार्थ मानने पर समस्त मूलाचार आदि ग्रन्थ अप्रयोजनीय सिद्ध होंगे?
उत्तर- व्यवहार को सर्वथा हेय और अभूतार्थ मानने पर समस्त मूलाचार आदि ग्रन्थ अप्रयोजनीय सिद्ध होंगे!
3. किस के बिना मोक्ष त्रिकाल में सर्वथा असम्भव है?
उत्तर- संवर, निर्जरा के बिना मोक्ष त्रिकाल में सर्वथा असम्भव है।
4. कर्म सिद्धान्त में किस के माध्यम से कर्म की उदीरणा का सिद्धान्त कहा है?
उत्तर- कर्म सिद्धान्त में नोकर्म (अर्थात् सहायक सामग्री) के माध्यम से कर्म की उदीरणा का सिद्धान्त
कहा है ।
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प्रश्न पत्र 34 के उत्तर
१. स्थितिकरण करने के कितने मार्ग बताए गए है और कब कौन सा उपयोग करना चाहिए?
दो, उपदेशात्मक और प्रयोगात्मक ।
जिसके लिए उपदेश से स्थिरता आ जाती है उसके लिए उपदेशात्मक ।
जब उपदेशात्मक मार्ग से परिणति सुधार का संयोग नही बनता है तब प्रयोगात्मक मार्ग का उपयोग करना चाहिए ।
२. सम्यकदृष्टि जीव क्या नही करता ?
किसी भी जीव के अज्ञान दशा में किये गए दुष्कृत्य को उजागर नही करता ।
३. भगवान क्यों पूज्य हैं ?
उन्होंने विषय रूप सागर में पड़े हुए भव्य जीवो को दर्शन ज्ञान रूपी हाथों से पार उतार दिया है ।
४. उपगूहन अंग का पालन कौन कर सकता है ?
जो जीव मान, ख्याति लाभ से अधिक जिन शासन की प्रभावना का अनुपम भाव रखता है ।
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प्रश्न पत्र 35 के उत्तर
1. मार्ग की प्रभावना कैसे की जाती है ?
जिनवाणी की रक्षा और जीर्ण शास्त्रों का उद्धार करने से होती है ।
2. आचार्य वीरसेन जी का क्या उपकार है ?
आचार्य वीरसेन महाराज ने प्राचीन की रक्षा करते हुए नवीन टीका की रचना कर आज जो हमें ज्ञान प्रकाश दिया है, उस उपकार की महत्ता का वर्णन किसी के वश की बात नहीं है ।
3. किसे संसार स्व से भिन्न प्रतिभासित होता है ?
जैनदर्शन का वास्तविक रूप से अध्ययन जिस व्यक्ति का हो जाता है उसे दुनिया अपने से भिन्न प्रतिभासित होने लगती है।
4. पूर्व पुण्य से क्या प्राप्त होता है ?
जीर्ण जिनगृह, जीर्ण जिनबिम्ब, जीर्ण शास्त्र और दर्शनीय स्थानों का उद्धार करके स्थापना करना पूर्व में किए गए पुण्य से प्राप्त होता है।
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प्रश्न पत्र-36
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प्रश्न पत्र 36 के उत्तर
1 - मार्ग की प्रभावना करने वाला व्यक्ति कैसा होता है ?
उ - सर्वप्रथम तो संयम से बंधा होना आवश्यक है और दूसरा वह जिनशासन और गुरुजनों की आज्ञा से भी बंधा हुआ होना चाहिए ।
2 - व्याप्य और व्यापक में क्या अंतर है ?
उ- कोई भी गुण, क्रिया,धर्म जब वस्तु के एकदेश में रहता है तो वह "व्याप्य" कहलाता है और जो सर्वदेश में रहे वह "व्यापक" कहलाता है ।।
3 - जिनशासन का भक्त या जिनशासन में दीक्षित किसे कहेंगे ?
उ- जो श्रमण और श्रावक दोनों धर्मो का पालन करने वाला है वह जिनशासन का भक्त या जिनशासन में दीक्षित कहलाता है ।।
4 - आज्ञा सम्यक्त्व एवं प्रभावना क्या है ?
उ- जिनशासन की आज्ञा में बंधे रहना आज्ञा सम्यक्त्व है और जिनशासन की महिमा का प्रकाशन करना प्रभावना है ।।
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प्रश्न पत्र-37
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प्रश्न पत्र 37 के उत्तर
1 - कौन सी तीन बातों में निरत् व्यक्ति मार्ग प्रभावना में तत्पर रहता है ?
उ- 1 - अनुवीचि भाषण में जो कुशल हो ।
2 - सामायिक आदि को बिना आलस के करता हो ।
3 - सब जीवों के प्रति समभाव रूपी धर्म को अपने हृदय में रखकर प्रवृति करता हो ।
2 - क्या मार्ग प्रभावना में रत व्यक्ति को अपनी आत्म प्रशंसा करनी चाहिए ?
उ - नहीं ! मार्ग प्रभावना में रत व्यक्ति को कभी अपनी आत्म प्रशंसा नहीं करनी चाहिए ।
3 - तप की प्रभावना भी अप्रभावना में कब बदल जाती है ?
उ - बड़े-बड़े तपस्वी भी कषाय विष्ट होकर जब अप्रिय भाषण करते हैं तो तप की प्रभावना भी अप्रभावना में बदल जाती है ।।
4 - मनोगुप्ति और वचनगुप्ति किसे कहते है ?
उ- मन से अशुभ विचार न करना ही मनोगुप्ति है और वचन में मन ही मन अशुभ व्यापार न चलाना ही वचनगुप्ति है।।