प्रश्न पत्र-25
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प्रश्न पत्र- 25 के उत्तर
प्रश्न 1 आचार्य पद्मनंदि जी ने किसका मूल कारण गृहस्थ श्रावक को बताया?
आचार्य पद्मनंदि जी ने मुनियों की स्थिति, धर्म और दान, इन तीनो का मूल कारण गृहस्थ श्रावक को बताया।
प्रश्न 2 : श्रावक के षट् आवश्यक बताने वाली गाथा कण्ठस्थ करके लिखे?
देवपूजा गुरूपास्ति: स्वाध्याय:संयमस्तप:।
दानं चेति गृहस्थानां, षट्कर्माणि दिने दिने।
प्रश्न 3: इस कलिकाल में श्रावक और श्रमण का कितना महत्व है ?
उ• - इस कलिकाल में श्रावक का भी उतना ही महत्व है जितना कि श्रमणों का है। धर्म रथ के दोनों पहिए हैं । एक के बिना दूसरा पहिया भी चल नहीं पाता है ।।
प्रश्न 4: श्रमण के लिए छह काल कौन से बताए है?
दीक्षा काल, शिक्षा काल, गण पोषण काल, आत्मसंस्कार काल, संलेखना काल एवं उत्तमार्थ काल।
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प्रश्न पत्र-26
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प्रश्न पत्र 26 के उत्तर
प्रश्न 1 : श्रमण के लिए छह काल कौन से बताए है?
दीक्षा काल, शिक्षा काल, गण पोषण काल, आत्मसंस्कार काल, संलेखना काल एवं उत्तमार्थ काल।
प्रश्न 2 : श्रावक किस प्रकार श्रमण की धर्म विराधना में निमित्त बनता है?
जो श्रावक अपने स्वार्थ से ऐसे श्रमण की पूजा में लगा है जो अपनी आवश्यक क्रियायें नहीं कर रहा है, वह श्रावक श्रमण की धर्म विराधना में निमित्त बनता है।
प्रश्न 3: व्युत्सर्ग किसे कहते है?
शरीर और आहार विषयक अशुभ मन एवं वचन की प्रवृत्तियों को हटाकर, ध्येय वस्तु की ओर एकाग्रता से चित्त निरोध करने को व्युत्सर्ग कहते है।
प्रश्न 4: श्रमण के छह आवश्यक के नाम लिखिए?
समता, स्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और व्युत्सर्ग।
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प्रश्न पत्र-27
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प्रश्न पत्र 27 के उत्तर
प्रश्न 1 : व्यक्ति के दुखी होने के पीछे मुख्य कारण क्या है ?
व्यक्ति के दुखी होने के पीछे मुख्य कारण होता है कि उसे किसी से जो अपेक्षा थी उसकी पूर्ति नहीं हुई।
प्रश्न 2: आवश्यक कार्यों में किन दोषो से बचना चाहिए?
आवश्यक में अतिक्रम और व्यतिक्रम दोषों से बचना चाहिए। यथा समय में करना चाहिए।
प्रश्न 3 : अप्रमत्त साधु कौन कहलाता है ?
जो साधु अपने आवश्यकों को पूर्ण करने में ना शीघ्रता करता है और न ही अधिक विलंब करता है , वह साधु अप्रमत्त है ।।
प्रश्न 4: सुखी जीवन का सूत्र किसे बताया है ?
जो धर्म करने में रुचि रखते हैं अथवा हिचकते है उनके लिए छह आवश्यकों का पालन करना सुखी जीवन के छह सूत्र हैं ।।
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प्रश्न पत्र-28
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प्रश्न पत्र 28 के उत्तर
प्रश्न 1 : आस्था क्या है?
उ. आस्था उन शक्तियों में से एक है जिसके द्वारा मनुष्य जीवित रहते है, और इसके पूर्ण आभाव का अर्थ है धराशायी हो जाना।
प्रश्न 2 : वर्तमान परिपेक्ष्य में छह आवश्यक का क्या महत्व है?
उ. वर्तमान परिपेक्ष्य में छह आवश्यक शारीरिक ओर मानसिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। सभी चिंता, तनाव, दैहिक रोग और अस्थिरता के निवारण के लिए षट् आवश्यक का बहुत महत्व है।
प्रश्न 3 : सही कायोत्सर्ग का फल किस प्रकार प्राप्त होगा?
उ. नौ बार णमोकार मंत्र को श्वासोच्छवास के आयाम के साथ पूर्ण करने पर ही सही कायोत्सर्ग का फल प्राप्त होता है।
प्रश्न 4: आत्म शांति किस प्रकार प्राप्त होती है?
उ. आत्म शांति इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने से स्वयं में स्वयं के द्वारा ही प्राप्त होती है। आचार्य समन्तभद्र कहते है कि अपने दोषों के दूर होने से आत्म शांति प्राप्त होती है।
धर्म ध्यान कितने प्रकार का होता है और इसे क्या सिर्फ साधु ही कर सकते हैं या श्रावक भी ? आइए समझते हैं आज की कक्षा में . आज आपको गाथा 112 का लिखित प्रवचन और गाथा 113 से 114 की वीडियो का स्वाध्याय करवाया जा रहा है।
आपको ये वीडियो 37:10 से अंत तक देखना है।
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प्रश्न पत्र-29
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प्रश्न पत्र 29 के उत्तर
प्रश्न 1 : भाव प्रतिक्रमण क्या है?
व्यवहार प्रतिक्रमण से जो भावो की विशुद्धि होती है उसे भाव प्रतिक्रमण कहते है।
प्रश्न 2: मोक्षपथिक के लिए सुख कौन से है और वह सुख कैसे प्राप्त होता है?
मोक्षपथिक का सुख दो प्रकार का है। पहला प्रशम भावो से उत्पन्न सुख और दूसरा आत्म विशुद्धि का सुख। आवश्यकों का पालन करने से दोनो ही प्रकार के सुख प्राप्त होते है।
प्रश्न 3: धर्म ध्यान के भेद लिखो?
धर्म ध्यान के चार भेद है। आज्ञा विचय, अपाय विचय, विपाक विचय और संस्थान विचय।
प्रश्न 4: अपाय विचय धर्म ध्यान क्या है?
इस जगत में प्रत्येक आत्मा मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र से दुखी है, उनके दुःख का चिंतन करना, दुःख दूर होने का उपाय का चिंतन करना, अपाय विचय धर्म ध्यान है।
आज आपको गाथा 113 के लिखित प्रवचन का स्वाध्याय करवाया जा रहा है।
आपको ये वीडियो 37:10 से अंत तक देखना है।
प्रवचन वीडियो की लिंक
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लिखित प्रवचन की लिंक(लिखित प्रवचन पढ़ना अनिवार्य है)
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प्रश्न पत्र-30
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प्रश्न पत्र 30 के उत्तर
प्रश्न 1 : व्यवहार चारित्र और निश्चय चारित्र क्या है और किस प्रकार होता है?
व्यवहार चारित्र क्रिया रूप है। यह क्रिया बाहर भी दिखाई देगी और भीतर भी महसूस होगी। जो इन बाह्य क्रियाओं में अभ्यस्त हो जाता है उसी का आत्मा में ठहरना होता है। आत्मा में स्थित हो जाने का नाम निश्चय चारित्र है।
प्रश्न 2 : द्रव्य संग्रह में व्यवहार और निश्चय चारित्र की क्या परिभाषा है?
द्रव्य संग्रह में आचार्य देव व्रत, समिति गुप्ति को व्यवहार चारित्र और बाह्य अभ्यंतर क्रियाओं का रुक जाने को निश्चय चारित्र कहते है।
प्रश्न 3: प्रत्याख्यान कषाय का अभाव कब तक नहीं हो सकता?
जब तक संकल्प पूर्वक आजीवन परिग्रह का त्याग नहीं होगा तब तक भीतर से प्रत्याख्यान कषाय का अभाव नहीं हो सकता।
प्रश्न 4: आचार्य अमृतचंद्र जी प्रवचनसार ग्रंथ में किससे क्या माँग रहे है?
आचार्य अमृतचंद्र जी प्रवचनसार ग्रंथ में व्यवहार चारित्र की शरण माँग रहे है, जब तक कि निश्चय चारित्र प्राप्त नहीं हो जाए।
आज आपको गाथा 114 के लिखित प्रवचन का स्वाध्याय करवाया जा रहा है।
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लिखित प्रवचन की लिंक(लिखित प्रवचन पढ़ना अनिवार्य है)
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प्रश्न पत्र-31
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प्रश्न पत्र 31 के उत्तर
प्रश्न 1 : मोक्षपथ के पथिक को सभी आवश्यकों को किस प्रकार करना चाहिए, उदाहरण सहित बताए?*
जैसे बुद्धिमान छात्र सभी विषयों में पूर्णांक प्राप्ति की इच्छा रखता है, उसी प्रकार मोक्षपथ के पथिक को प्रत्येक आवश्यक का महत्व बराबर समझते हुए, सभी आवश्यकों को रुचि पूर्वक समय पर करना चाहिए।
प्रश्न 2 : पुण्य कर्म के बंध से कौन बच सकता है?
पुण्य कर्म के बंध से वही बच सकता है जो अपरिमित काल तक नरक-निगोद में पचता है।
प्रश्न 3: आचर्यो ने अविरत सम्यग्दृष्टि का तप किस प्रकार का बताया है?*
आचर्यो ने भगवती आराधना, मूलाचार आदि ग्रंथों में कहा है अविरत सम्यग्दृष्टि का तप महागुणकारी नहीं है। उसमें निर्जरा से ज़्यादा बंध है। उनकी निर्जरा हाथी के स्नान की तरह है। वह जितनी निर्जरा करता है उससे अधिक कर्म बंध की धूलि आत्मा में बांध लेता है।
प्रश्न 4: आवस्स्यापरिहीण भावणा का सार क्या है?
इस भावना का सार यही है कि खूब पुण्य की क्रिया करो, परंतु उस पुण्य से सांसारिक फल की चाह मत करना। पुण्य के फल से जो मिलेगा उससे कोई हानि नहीं होगी और किसी ना किसी भव में मुक्ति अवश्य मिलेगी।
आपको ये वीडियो 37:10 से अंत तक देखना है।
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आपको ये वीडियो शुरू से 7:44 मिनट तक देखना है।
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प्रश्न पत्र-32
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प्रश्न पत्र 32 के उत्तर
1 - मोक्षमार्गी कौन है ?
उ• - संवर-निर्जरा तत्त्व का इच्छुक एवं ज्ञान-ध्यान की प्रधानता रखने वाला साधक ही मोक्षमार्गी कहलाता है ।।
2 - "मुख्योपचार दुभेद यूं बड़भागि रत्नत्रय धरें।" इसका क्या अर्थ है ?
उ• - जो मुख्य या उपचार रत्नत्रय धारण करते हैं, वह बड़े भाग्यवान हैं । ऐसे भाग्यवान जीव मुनिराज ही होते हैं । रत्नत्रयधारी मुनिराज ही होते हैं ।।
3 - निश्चय मोक्षमार्ग की उपमा किससे दी गयी है ?
उ• - निश्चय मोक्षमार्ग पानक की तरह है । निश्चय में दर्शन , ज्ञान, चारित्र का भेद ही नहीं है। सब कुछ आत्म रूप होता है। पेय - पानक- ठंडाई की तरह सब कुछ वहाँ एकमेक होता है ।।
4 - निकट भव्य जीव की भावना कैसी होती है ?
उ• - आत्महित के इच्छुक प्रत्येक भव्य जीव की भावना संसार तट के निकट आने पर शुद्धात्मा को जानने, समझने और प्राप्त करने की होती है ।।