यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥२१॥
मर्मानुवाद—श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण करते हैं, साधारण लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। श्रेष्ठ लोग जिसे प्रमाणरूप से स्वीकार करते हैं, दूसरे लोग भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं॥२१॥
अन्वय—श्रेष्ठः (श्रेष्ठ व्यक्ति) यद् यद् (जैसे—जैसे) आचरति (आचरण करते हैं) इतरो जनः (दूसरे व्यक्ति) तत् तत् एव (वैसा—वैसा ही कर्म करने लगते हैं) स: (वे श्रेष्ठ लोग) यत् (जिसे) प्रमाणम् (प्रमाण के रूप में) कुरुते (स्वीकार करते हैं) लोक: (साधारण लोग भी) तद् अनुवर्तते (उन्हीं का अनुसरण करते हैं)॥२१॥
टीका—लोकसंग्रहप्रकारमेवाह—यद् यदिति॥२१॥
भावानुवाद—लोकसंग्रह के प्रकार बताते हुए यह श्लोक कह रहे हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥२१॥
मर्मानुवाद—श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण करते हैं, साधारण लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। श्रेष्ठ लोग जिसे प्रमाणरूप से स्वीकार करते हैं, दूसरे लोग भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं॥२१॥
अन्वय—श्रेष्ठः (श्रेष्ठ व्यक्ति) यद् यद् (जैसे—जैसे) आचरति (आचरण करते हैं) इतरो जनः (दूसरे व्यक्ति) तत् तत् एव (वैसा—वैसा ही कर्म करने लगते हैं) स: (वे श्रेष्ठ लोग) यत् (जिसे) प्रमाणम् (प्रमाण के रूप में) कुरुते (स्वीकार करते हैं) लोक: (साधारण लोग भी) तद् अनुवर्तते (उन्हीं का अनुसरण करते हैं)॥२१॥
टीका—लोकसंग्रहप्रकारमेवाह—यद् यदिति॥२१॥
भावानुवाद—लोकसंग्रह के प्रकार बताते हुए यह श्लोक कह रहे हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥२१॥
मर्मानुवाद—श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण करते हैं, साधारण लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। श्रेष्ठ लोग जिसे प्रमाणरूप से स्वीकार करते हैं, दूसरे लोग भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं॥२१॥
अन्वय—श्रेष्ठः (श्रेष्ठ व्यक्ति) यद् यद् (जैसे—जैसे) आचरति (आचरण करते हैं) इतरो जनः (दूसरे व्यक्ति) तत् तत् एव (वैसा—वैसा ही कर्म करने लगते हैं) स: (वे श्रेष्ठ लोग) यत् (जिसे) प्रमाणम् (प्रमाण के रूप में) कुरुते (स्वीकार करते हैं) लोक: (साधारण लोग भी) तद् अनुवर्तते (उन्हीं का अनुसरण करते हैं)॥२१॥
टीका—लोकसंग्रहप्रकारमेवाह—यद् यदिति॥२१॥
भावानुवाद—लोकसंग्रह के प्रकार बताते हुए यह श्लोक कह रहे हैं।