आइए पहले समझें कि स्वास्थ्य क्या है। सबसे पहली बात तो यह कि हम जीवन भर स्वास्थ्य और परम स्वास्थ्य खोजते रहते हैं, परन्तु स्वास्थ्य क्या है इसकी कोई सार्थक व्याख्या या विस्तृत चित्रण उपलब्ध नहीं है। मजे की बात यह है कि हमारे पास ढेर सारे मोटे-मोटे ग्रंथों के रूप में एक-एक बीमारी का विज्ञान मौजूद है, जिनमें हरेक बीमारी का वृहद एवं सचित्र वर्णन है, रोगों की उत्पत्ति से लेकर उनकी अंतिम स्थिति तक का वृहद वर्णन है, परंतु स्वास्थ्य किसे कहते हैं यह बताने वाला कोई ग्रंथ आज तक नहीं लिखा गया। चिकित्सा विज्ञान की किसी भी पुस्तक में स्वास्थ्य, उसकी कोई सटीक एवं मौलिक परिभाषा, तथा किसी अनुभवजन्य स्थिति का कोई वर्णन नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज के मनुष्यों में से 99 प्रतिशत लोग उस प्राकृतिक अवस्था से सर्वथा अपरिचित हैं जिसे स्वास्थ्य कहा जाता है और जिसके बारे में हम थोड़ा प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे। तो अगर हमें यही मालूम न हो कि जाना कहाँ है, तो हमारी यात्रा का मतलब क्या है। हम जो चीज़ जानते नहीं, जिससे हमारा परिचय नहीं, उसको पाने की अभीप्सा हम कैसे कर सकते हैं? और जब हमें उस स्वास्थ्य का ज्ञान था, हमारे पूरे बचपन में, उस समय हमें होश नहीं था। तब उस स्वास्थ्य का हमें अनुभव ज़रूर था, मगर अभी उसका कुछ पता नहीं है।
लोगों से पूछें कि स्वास्थ्य का मतलब क्या हुआ तो वे कहेंगे कि बीमारी का न होना ही स्वास्थ्य है। लेकिन यह तो स्वास्थ्य की परिभाषा नहीं हुई, यह तो हम बीमारी के बारे में बता रहे हैं। बीमारी की अनुपस्थिति स्वास्थ्य नहीं हैं। बीमारी की अनुपस्थिति शारीरिक दुर्बलता और अवसाद के रूप में भी हो सकती है। तो क्या ऐसी स्थिति में हम अपने आपको स्वस्थ कह सकते हैं?
राम राज्य काहुँही नहीं व्यापा।" तो यह स्वास्थ्य लगभग ऐसी ही कुछ बात है। इस पुस्तक का गंतव्य या अंतिम लक्ष्य उस स्वास्थ्य की सम्पूर्ण रूप से प्राप्ति करना ही है। और मैं वादा करता हूँ कि पुस्तक के अंत तक जाते-जाते आप निश्चित रूप से कह पाएँगे कि 'अरे! यह मामला तो बिलकुल आसान है और हम भी इसे आराम से प्राप्त कर सकते हैं।'
तो इसी स्थिति को हम स्वास्थ्य कहेंगे।
गाँवों में या छोटे कस्बों में या शहर की आपाधापी से दूर बसे इलाकों में आप चले जाएँ तो पाएँगे कि लोग बिस्तर पर जाते ही सो जाते हैं, उन्हें ज़रा भी देर नहीं लगती नींद के आगोश में समाने में। जबकि महानगरों में या अमेरिका जैसे विकसित देशों में आधे से ज्यादा लोग बिना नींद की गोली या किसी अन्य ट्रॅक्वेलाइज़र के सो ही नहीं सकते, क्योंकि सोते वक्त उनका मस्तिष्क इतना परेशान है, इतना विचारों में घिरा है कि वो विश्राम में जा ही नहीं सकते। सोते वक्त भी शरीर के ऊपर मस्तिष्क हावी रहता है। इस तरह से हम कभी स्वस्थ नहीं हो सकते।
तो पहली बात यह मान लेना चाहिए हमें कि शरीर होने का भाव, शरीर का नकारात्मक रूप से पता लगना ही बीमारी है। वहीं शरीर का पता न लगना या शरीर का शून्य हो जाना और शरीर में एक wellness का एहसास होना, जिसमें उदासीन शांति का भाव न होकर स्वतःस्फूर्त आनंद का एहसास हो, उसको हम कह सकते हैं कि 100 प्रतिशत स्वास्थ्य वही है। यानी एक तरफ तो हमें अपने स्थूल शरीर का एहसास न हो, वह शून्यवत हो, और दूसरी ओर हम मानसिक रूप से किसी नकारात्मक उत्तेजना से ग्रसित न होकर एक नैसर्गिक प्रफुल्लित अवस्था या आनंदित होने के एहसास से भरे हों। इसी को सम्पूर्ण स्वास्थ्य कह सकते हैं।
यह जो शरीर की शून्यता एवं वेलनेस का अहसास है, यह हमारे स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों को वायरसों से मुक्त किए बिना या कहें कि स्कैन किए बिना पाना असंभव है। यह कैसे घटित होगा, इसकी चर्चा हम मुख्य रूप से सम्पूर्ण पुस्तक के फैले कैनवास में करेंगे। प्रकृति ने यह परम अहसास और इसको पाने का हक सभी प्राणियों को दिया है और प्राकृतिक रूप से, नैसर्गिक रूप
से ऐसी व्यवस्था और संरचना बनाई है जिससे पूरी मानव जाति आसानी से इस अवस्था को प्राप्त कर ले। परन्तु आज मानव को छोड़ अन्य सभी प्राणी प्रकृति की इस अनुपम अमूल्य भेंट का मज़ा ले पाते हैं। क्यों, इन कारणों की भी हम गहराई से समीक्षा करेंगे। जब तक हमें कठिनाइयों या गड़बड़ियों का पता नहीं चलेगा, तब तक सुधार की दिशा में हम पहला सही कदम भी नहीं बढ़ा सकते। इसमें होम्योपैथी का क्या सहयोग हम ले सकते हैं, उस पर वृहद रूप से इस पुस्तक में हम चर्चा करेंगे।
आज की मानव जाति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सुदूर पहाड़ों पर, गाँवों में, तथा शहरों की आपा-धापी से दूर जंगलों में रहने वाले लोगों को, जिनके पास हमारे जैसे रहन-सहन के आधुनिक साधन और ऐश-ओ-आराम के उपकरणों का नितांत अभाव है, वे इस नैसर्गिक स्वास्थ्य का भरपूर आनंद लेते हैं जबकि हम अपनी तमाम तरक्की के बावजूद रोगी बनकर जीने को मजबूर हैं। दोस्तो, उन भौतिक रूप से विपन्न किंतु स्वास्थ्य की दृष्टि से मालामाल लोगों की तुलना में हमारा यह वैभव दो कौड़ी का भी नहीं है। इस बात की सत्यता का अनुभव आप तभी कर पाएँगे जब कुछ दिनों के लिए इस परम स्वास्थ्य की एक झलक आपको भी मिल जाए। परन्तु ऐलोपैथी का जंजाल ऐसा है कि वह आपको हर दिन इस परम सुख से दूर और दूर करती चली जाती हैं।
यह स्वास्थ्य दुर्लभ क्यों है?
अभी ऐसे स्वास्थ्य वाले विरले ही लोग बचे हैं शहरों में हाँ, नगरों की आबादी से दूर पहाड़ों पर या सुदूर गाँवों में या जंगलों में ऐसे लोग बहुतायत में मिलेंगे। आखिर ऐसा क्यूँ है? और मैं आपको कहता हूँ कि अगर आपने उस स्वास्थ्य का ज्ञान और अनुभव एक बार होश में कुछ दिनों के लिए भी कर लिया, तो अगर वह वापस लेने की बात आ जाए और अगर आपको पूर्व की स्थिति वाले स्वास्थ्य में पहुँचा दिया जाए तो आप अपना सर्वस्व देकर भी इस स्वास्थ्य को, ऐसे स्वास्थ्य को किसी कीमत पर भी खोना नहीं चाहेंगे। इस पुस्तक में न सिर्फ हम यह समझेंगे कि यह स्वास्थ्य क्या है बल्कि यह भी कि कैसे एक शहरी आदमी को भी यह स्वास्थ्य उपलब्ध हो। इसकी कीमिया और इसका विज्ञान हम पूरे विश्व को देने की कोशिश करेंगे। और मैं आपको कहना और विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि ऐसा स्वास्थ्य प्रकृति या परमात्मा द्वारा आपको दिया गया एक अमूल्य नैसर्गिक उपाय है जिसकी हम कोई कीमत नहीं चुकाते और जिस पर पूरी मानव जाति का सम्पूर्ण अधिकार है। और वस्तुतः हम अभागे मनुष्यों को छोड़कर समस्त पृथ्वी के जीव इस नैसर्गिक, प्रकृति प्रदत्त स्वास्थ्य का मज़ा लेते हुए आनंदित जीवन जीते हैं। यदि आप तमाम पशु-पक्षियों को गौर से देखें, उनके जीवन और उल्लास को देखें तो हैरान रह जाएँगे। एक नन्हीं सी चिड़िया एक मिनट में जितनी बार अपने पंख फड़फड़ा लेती है, उतनी बार एक घंटे में भी हम अपनी दोनों बाहें नहीं हिला सकते। यह है सम्पूर्ण और नैसर्गिक स्वास्थ्य और मजे की बात यह है कि पूरी पृथ्वी पर मनुष्यों को छोड़कर किसी जानवर या प्राणी के पास इतने बड़े-बड़े डॉक्टर, हकीम, वैद्य या हॉस्पिटल नहीं हैं। हाँ, अपवाद स्वरूप ऐसे कुछ जानवरों के लिए ज़रूर हैं जो हमारे संसर्ग में आकर हमारी तरह, मनुष्यों की तरह ही अभिशप्त और नारकीय जीवन जीने को विवश हो गए हैं। जैसे- हमारे पालतू पशु-पक्षी या चिड़ियाघरों में रहने वाले जानवर।
मुझे आश्चर्य होता है कि पूरे संसार में किसी का भी ध्यान इतने बड़े अभिशाप की ओर क्यूँ नहीं जाता कि आखिर पूरे ब्रह्मांड के सबसे विकसित प्राणी होने और सबसे उच्च तकनीक से लैस होने के बावजूद हम मनुष्यों की यह दशा क्यों है? हमारा शरीर और स्वास्थ्य, जो हमारा सबसे बड़ा धन है, वही हमको क्यों उपलब्ध नहीं है? आखिर हमने ऐसी क्या भूल-चूक कर दी है कि हमारी ऐसी हालत हो गयी है कि हम शुरू के 10-20 सालों के बाद आजीवन, मौत आने तक, ऐसे नैसर्गिक स्वास्थ्य से क्रमशः दूर और होते चले जाते हैं और हमारी रोगों के मकड़जाल में फँसकर, कई तरह के रोगों से आक्रांत होकर, और एड़ियाँ रगड़-रगड़कर मौत होती है? जबकि जंगलों में या पहाड़ों पर शिकार किए गए जानवरों को छोड़कर ऐसी मौत अन्य किसी जानवर की नहीं होती। हाँ, यह बात है कि प्रकृति प्रदत्त ऐसे नैसर्गिक स्वास्थ्य का कुछ मजा हम अपने बचपन में, जब तक हमारी बुद्धि परिपक्व नहीं होती और हम समाज के हिस्से नहीं बनते, जब तक हम परिवार के हिस्से बने रहते हैं, अपने जन्म के शुरुआती दो साल, तीन साल, पाँच सालों तक ज़रूर ले पाते हैं। आपके बिस्तर पर चिव पड़ा या गोद में लेटा हुआ बच्चा एक मिनट में जितनी बार हँसता-खिलखिलाता हुआ आनंद से पैर हिला लेता है, उतना आप एक 25 साल के युवक लेटकर 10 मिनट में नहीं हिला पाएँगे। इसका मतलब है कि हम बचपन के 100 प्रतिशत स्वास्थ्य से पाँच-सात सालों के बाद ही अपने स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर खोते चले जाते हैं। जबकि पशु-पक्षी, जानवर इत्यादि बचपन से उत्तरोत्तर बलशाली और स्वस्थ होते चले जाते हैं। आखिर हमसे कहाँ और क्या भूल-चूक हो रही है? क्या हमें इसके गहरे कारणों में जाकर इसकी खोज और निदान नहीं करना चाहिए कि ऐसा क्यूँ हो रहा है? कि आखिर इसका उपाय क्या है? और क्या इसके लिए कुछ किया जा सकता है? मैं समझता हूँ कि 30-40 साल के बाद के किसी व्यक्ति को यह विकल्प दिया जाए कि तुम्हें आदमी बने रहना है या तुम्हें एक आकाश में उड़ती हुआ चील या कोई और पक्षी बना दिया जाए, तो हममें से अधिकांश लोग अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दुर्दशा के कारण पक्षी का जीवन चुनना ज्यादा पसंद करेंगे। क्या स्वास्थ्य के कारणों को लेकर मनुष्य की दशा इतनी खराब है कि वह अपने शरीर से इतना त्रस्त हो गया है? मैं नहीं समझता कि इससे बड़ा दुर्भाग्य और कोई इस पूरी मानव जाति का हो सकता है।
दोस्तो, मैं अपने स्वयं के अनुभव एवं अपने कुछ इष्ट मित्रों व संबंधियों के अनुभव से यह घोषणा करता हूँ कि होमियोपैथी और होमियोपैथिक दवाओं के माध्यम से ऐसा ही कुछ कुछ 100 प्रतिशत खरे सोने वाला स्वास्थ्य हम स्थाई तौर पर प्राप्त कर सकते हैं। मुझे खुद को होमियोपैथी सीखे हुए लगभग 10 साल हो गए हैं और कुछेक अपवादस्वरूप स्थितियों को छोड़कर मुझे अन्य दवा खाए भी 10 साल हो गए हैं। और मैं होमियो की दवा भी साल भर में 10 बूँद या 10 खुराक से ज्यादा नहीं लेता, और लगभग 55 साल मेरी उम्र है और मैं और मेरा परिवार सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अनुभव करता है। और ऐसा आप सभी के लिए भी संभव है। हाँ, उम्र के साथ शरीर जब पुराना होता है तो प्राकृतिक घिसावट या डेप्रिसिएशन तो होगा ही होगा, लेकिन उसमें भी कुछ स्थिरता और उसको आगे बढ़ाने के कुछ उपाय भी किए जा सकते हैं। मेरा दावा है कि आप सभी सामान्य स्वास्थ्य वाले लोगों को ऐसे नैसर्गिक स्वास्थ्य का मैं अनुभव करा सकता हूँ। यहाँ तक कि श्री बराक ओबामा एवं श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसे विश्व नेताओं को भी इसमें सबसे बड़ी रुकावट जो आती है, वह है होमियोपैथी के मटेरिया मेडिका के संसार में से सही दया और सही पोटेंसी का चुनाव, जिसके लिए मेरी समझ से एक मरीज को कम-से-कम पूरा दिन मेरे साथ बिताकर अपने विगत जीवन के सारे पन्नों को मेरे समक्ष खोलना होगा। मगर यह कोई असंभव काम नहीं है। हाँ, यह जरूर है कि कुछ विशेष प्रकार के मनुष्यों के विगत जीवन में जाकर जाँच पड़ताल में थोड़ी दिक्कतें आ सकती हैं, मगर ऐसा मरीज भी सही से अगर अपने पन्ने खोल पाए तो उस पर भी काम किया जा सकता है।
अगले अध्यायों में हम इस बिंदु पर ध्यान रखते हुए इस पुस्तक में समग्र रूप से इस चर्चा को आगे बढ़ाएँगे कि ऐसा स्वास्थ्य पूरी मानव जाति के लिए होमियोपैथी और होमियो दवाओं से कैसे संभव है। आपसे निवेदन है कि इस पुस्तक के किसी अंश या भाग को हल्के से न लें तथा इसे उपन्यास की तरह न पढ़ें, बल्कि पूरी तन्मयता से इसमें लिखे शब्दों के माध्यम से इशारा किए गए तथ्यों की गहराई में जाने का प्रयास करने की कृपा करें तथा पुस्तक के अंत तक अपने विचारकुशल संचेतन मस्तिष्क के हिस्सों को विश्राम देकर इसमें डूबने की कोशिश करें। हाँ, अंत तक पढ़ने के बाद अपनी निष्पक्ष राय बनाने को आप स्वतंत्र होंगे। इस पुस्तक में मैंने एक नवीनतम विषय को, एक क्लिष्ट विषय को सरल से सरल शब्दों में एक कहानी की किताब की तरह साधारण से साधारण उदाहरणों को देते हुए समझाने का भरपूर प्रयास किया है। और इस पुस्तक में जो भी तथ्य मैंने दिए हैं वह कोई बासी या उधार का ज्ञान नहीं है, अपितु वह मेरी पिछले 10 सालों की अनवरत खोज, वैज्ञानिक दृष्टि और अनुसंधान, मेरे द्वारा उपचारित कई रोगियों से लिए गए फीड बैंक, तथा कुछ स्वयं के अनुभूत प्रयोगों के द्वारा निकाले हुए निष्कयों व तथ्यों पर आधारित हैं। मैंने यह पुस्तक स्वांतः सुखाय के लिए लिखी है। होमियोपैथी दवाओं से स्वयं का उपचार करके मैंने जिस अंतिम स्वास्थ्य 100 प्रतिशत स्वास्थ्य को जाना व महसूस किया और उसके फलस्वरूप रोगों के मकड़जाल में उलझी मानव जाति के प्रति मेरे मन में जो करुणा उपजी, उस करुणा से उत्पन्न ताप से बचने के लिए लिखी है।
अब मैंने अपना काम कर दिया है और करके मैं इस महा करुणा के ताप से मुक्त हुआ। अब बाकी स्वास्थ्य से जुड़े विश्व भर के विशेषज्ञ लोग और बुद्धिजीवी वर्ग जाने। पिछले लगभग पाँच-सात सालों से मैं इस ऊहापोह में रहा कि मुझे इस पुस्तक को लिखना चाहिए या नहीं लिखना चाहिए। लेकिन फिर मैंने विश्व समाज के बुद्धिजीवियों की नकारात्मकता और हँसी का पात्र होने की संभावना के बावजूद इस पुस्तक को आप सब को देकर निर्मार हो जाना ज्यादा श्रेयस्कर समझा।
तो चलिए, आगे चर्चा करते हैं। इस पुस्तक में हमारा स्वास्थ्य से यही अभिप्राय है और इसी स्वास्थ्य की खोज मानव जाति का लक्ष्य होना चाहिए। इस स्वास्थ्य की प्राप्ति से हमारा शरीर बेहद आराम व तनावरहितता महसूस करता है। यह ऐसा ही है जैसे घर में सीलिंग फैन एवं कूलर लग गया हो। यह परम सुख की स्थिति है और पूरी मानव जाति के लिए बुनियादी ज़रूरतों का मामला है और हर बुद्धिमान और जागरूक इंसान के लिए इसे प्राप्त करना जीवन में प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। यह यूँ कहें कि इसको प्राप्त करना हमारे जीवन का मूलभूत उद्देश्य होना चाहिए। क्योंकि इस पूरे संसार में हमारा इस शरीर से निकटतम और अपना दूसरा कोई नहीं है। इसलिए इसका परम स्वास्थ्य की स्थिति में होना अत्यंत आवश्यक है। और मैं आपको बताऊँ कि इस स्थिति को उपलब्ध होना हर व्यक्ति के लिए संभव है। यह परम स्वास्थ्य हर आम ओ खास को उपलब्ध हो सकता है। परमात्मा ने यह अमूल्य उपहार हर किसी के लिए रख छोड़ा है।
लेकिन इससे आगे का स्वास्थ्य 'चेतना के विज्ञान' या कहें कि पूर्वी दुनिया के 'आध्यात्मिक विज्ञान' का क्षेत्र है। इससे आगे की बात सुख की नहीं अपति आनंद की है। कूलर की नहीं बल्कि एसी की है। इससे आगे का क्षेत्र सुप्रीम लग्ज़री का है। वह क्लाइमैक्स की बात है। उससे आगे पाने को फिर कुछ रह नहीं जाता और उसके आगे दुनिया का तमाम वैभव तुच्छ मालूम होता है।
उसकी प्राप्ति से हमारा जीवन धन्य हो सकता है, मगर को विश्व के सर्वाधिक प्रज्ञावान लोगों के लिए ही उपलब्ध है और अभी इस पुस्तक का विषय भी नहीं है। महर्षि पंतजलि ने योग का विज्ञान इन्हीं मंजिलों तक पहुँचने के लिए दिया था। परन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हमने उनके इस विज्ञान का कद छोटा करके इसे 'योग भगाए रोग' तक सीमित कर दिया। पूरब के मनीषियों के पास इसकी पूरी तकनीक और विज्ञान साधना के रूप में मौजूद है, जिसे कुछ परम बुद्धिमान लोग प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु वह हमारे इस पुस्तक का कार्यक्षेत्र नहीं है, इसलिए फिलहाल हम उस दिशा में हम नहीं बढ़ेंगे। यदि आप उस विज्ञान को जानने के इच्छुक हों तो आपको मेरी अगली पुस्तक तक रुकना पड़ेगा। उस पुस्तक में मैं विस्तार से इस अल्टीमेट लग्ज़री को प्राप्त करने के विज्ञान का वर्णन करूँगा।
शरीर की विस्मृति
अब हम चर्चा करेंगे कि यह जो शरीर के नहीं होने का भाव है, वह क्या है? दोस्तो, जैसा कि मैंने पहले बताया, इस तरह का स्वास्थ्य होमियोपैथी के अलावा अन्य किसी चिकित्सा पद्धति से नहीं लाया जा सकता, और इस बात को मैं अगले अध्यायों में पूरी तरह से साबित करने की कोशिश करूँगा, क्योंकि यह मेरे स्वयं के जीवन का भी अनुभव है और मेरे उन मित्रों के जीवन का भी जिनको होमियोपैथिक दवा देकर मैंने पूरी तरह से निरोग किया है। बहरहाल, निरोगी व्यक्ति का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसके लिए शरीर शून्य हो गया। यह जो परम अवस्था है, ऐसी अवस्था या ऐसा स्वास्थ्य जिस भी पद्धति या दवा से हमें मिल पाए वही परम स्वास्थ्य होगा। ऐसे व्यक्ति के शरीर की प्राकृतिक चीजें, जैसे नींद, भूख, स्वाद, एवं शरीर के उत्सर्जी तंत्र, सभी प्राकृतिक रूप से काम करेंगे। बीमारी की शुरुआत इन्हीं में गड़बड़ी से होती है।
अभी हमें बुखार आता है तो हम पैरासिटामोल लेते हैं। बुखार उतर जाता है। थर्मामीटर में आप देखेंगे कि अभी 102 बुखार है। आपने सेलीन और क्रोसिन ले लिया। आपका बुखार, आपके शरीर का तापमान 98 डिग्री हो गया। फिर भी मस्तिष्क में और शरीर में वो ताज़गी नहीं है जो बुखार होने के पहले थी। डॉक्टर आपको कहेगा कि आपको कोई बीमारी नहीं है, बुखार या टाइफाइड जो भी बीमारी थी, वो तो ठीक हो गई। परन्तु क्या मानसिक रूप से हम शरीर से शून्य हुए? मेरा ही नहीं अपितु ढेर सारे लोगों का अनुभव है कि एलोपैथी से जो बुखार ठीक किया जाता है या जो बीमारी ठीक की जाती है, उसमें दवा लेने के बाद हमें भूख नहीं लगती, शरीर ढीला-ढीला सा लगता है, और शरीर में ढेर सारी जटिलताएँ रहती है। ठीक है कि शरीर अब गर्म नहीं है, मगर हम स्वस्थ भी नहीं हैं। चार-पाँच दिन ऐलोपैथिक दवा खाते हैं और बीमारी के लक्षण चले जाते हैं, पर उसके बाद भी कई दिनों तक ठीक से खाना नहीं खा पाते और मन किसी काम में नहीं लगता है। दूसरी तरफ बुखार के लिए होमियोपैथिक दवा लेने के बाद शरीर पहले से ज्यादा स्वस्थ अनुभव करता है, ऐसा लगता है मानो शरीर पर कोई काला साया था और उसको स्कैन करके किसी ने निकाल दिया हो। यह सच्चा या पूर्ण स्वास्थ्य है जो होमियोपैथी से मिलता है। जो लोग एक अच्छे होमियोपैथ की देख-रेख में होमियोपैथी दवा प्रयोग करते हैं, उनको इस बात का अनुभव ज़रूर होगा। आइए इस बात को और अच्छी तरह समझने के लिए पहले यह जानें कि शरीर क्या है?
शरीर क्या है ?
ऊपर हमने कहा कि जब नकारात्मक भावों के विलोप सहित एक सुखद व स्वतःस्फूर्त आनंददायी एहसास के साथ शरीर के होने का विस्मरण हो जाए तभी सच्चा स्वास्थ्य है। तो अब सवाल उठता है कि शरीर से वस्तुतः हमारा अभिप्राय क्या है? शरीर यानी क्या? आप भी कहेंगे कि कमाल के आदमी हो यार, यह भी कोई पूछने की बात है! शरीर मतलब जो सब के पास है। हाथ-पैर, आँख कान; यही तो है शरीर में कहना चाहूँगा कि नहीं, मात्र यही शरीर नहीं है। यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दी हुई परिभाषा है जो कि सरासर अधूरी है, एक बड़ी बुनियादी गलती है। इसी अधूरी परिभाषा के कारण हमने अपने भौतिक शरीर को अपने स्थूल शरीर को ही अपना पूर्ण शरीर मान लिया है। इसके अलावा हमारी और कोई शारीरिक सत्ता ही नहीं है, ऐसा मान लिया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों से यदि आप पूछेंगे कि क्या भौतिक शरीर के अलावा भी कुछ है, तो वे हँसेंगे, सोचेंगे कि आप पागल हो। मगर मैं कहना चाहूँगा आपसे; मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ, कोई वैद्य नहीं हूँ, मैं एक छोटा सा व्यवसायी हूँ, मेरा एक छोटा-सा घर है, परिवार है; मगर मुझे लगता है कि शरीर और रोग के विज्ञान को समझने में हमसे कुछ बुनियादी गलतियाँ हुई हैं, जिन्हें समझा एवं सुधारा जाना अति आवश्यक है। इससे पूरी मनुष्य जाति का कल्याण हो सकता है। यद्यपि चिकित्सा के क्षेत्र में मेरे पास कोई डिग्री नहीं है, कोई उपकरण नहीं हैं, कोई जाँच सुविधा नहीं है, शोध के लिए कोई टीम नहीं है, कोई संसाधन नहीं हैं, तथापि अपनी इस पुस्तक के माध्यम से मैं चिकित्सा जगत एवं पूरे विश्व के लोगों का ध्यान इन बातों की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। यदि मेरी इन बातों पर खुले मन से गौर किया जाए तो एक क्रांति घटित हो सकती है और पूरे चिकित्सा जगत के तौर-तरीकों व मानकों में आमूलचूल बदलाव आ सकता है, यह मेरा दावा है।
तो आइए जानते हैं कि शरीर यानी क्या? यहाँ शरीर से मेरा मतलब मानव शरीर से है, न कि मैं किसी जानवर या पेड़-पौधे की बात कर रहा हूँ। मानव अस्तित्व के संदर्भ में भारत के ऋषि-मुनियों ने जो खोजें की हैं, आज चिकित्सा विज्ञान भी उन बातों को मानने को बेबस है। इन खोजों में से एक महत्वपूर्ण खोज यह भी है कि हमारे स्थूल शरीर की मौत हमारी पूर्ण मौत नहीं है। स्थूल शरीर के नष्ट होने के बाद भी हमारे अस्तित्व का काफी कुछ हिस्सा शेष रह जाता है। इस बात को अब पश्चिम के लोग भी मानने लगे हैं। सर माइकल न्यूटन ने अपनी तीन किताबों - Destiny of the Souls, Journey of the Souls, तथा Life between Lives में इस प्राचीन खोज के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। अमरीका के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एवं पूर्व जन्म प्रतिक्रमण चिकित्सा पद्धति (पास्ट लाइफ रिग्रेशन थैरेपी) के पुरोधा डॉ ब्रायन वाइज की अपने तथा अपने मरीजों के अनुभवों पर आधारित तमाम पुस्तकें (मैनी लाइब्ज मैनी मास्टर्स, आत्मा एक, शरीर अनेक दिव्यात्माओं के संदेश, ओनली लव इज़ रिअल; थ्रू टाइम इनटु हीलिंग, पूर्व जन्म चिकित्सा के चमत्कार) भी इसी तरह के प्रमाणों से भरी पड़ी हैं। पूरे विश्व में आज इस पर शोध चल रहे हैं। और जब तक हम पूर्ण शरीर के इस सच को नहीं जान लेंगे, तब तक पूर्ण उपचार की ओर नहीं बढ़ पाएँगे।
आपने वो कहानी तो ज़रूर सुनी होगी कि कुछ अंधे एक बार एक हाथी से टकरा जाते हैं और टटोलकर जानने की कोशिश करते हैं कि वह क्या है। चूँकि हाथी विशाल था, किसी के भी लिए उसे पूरा का पूरा छू पाना तो संभव नहीं था। इसलिए वे सभी हाथी के अलग-अलग अंगों को छूकर उसी के आधार पर यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि वह क्या चीज़ थी। उनमें से एक आदमी ने जब हाथी की पूँछ को छुआ तो उसे लगा कि यह तो रस्सी है। दूसरे ने कान को छुआ तो उसे लगा कि यह तो पंखा है। तीसरे अंधे ने पैर को छुआ और बोला कि तुम दोनों पागल हो क्या, यह तो खम्भा है। इसी तरह अलग-अलग अंघों ने हाथी के अलग-अलग अंगों को टटोलकर उसकी अलग-अलग चीजों के रूप में कल्पना की। काश! परमात्मा ने उनको आँख दी होती और वे पूरे हाथी को देख पाते तो जानते कि हाथी अलग-अलग अंग नहीं था जो उन्होंने छुए थे, बल्कि उन सभी का जोड़ था। मनुष्य के शरीर के विषय में भी चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों को यहीं से पहली बुनियादी कठिनाई शुरू हुई है कि उन्होंने मनुष्य के स्थूल शरीर को ही उसका सम्पूर्ण शरीर मान रखा है। यहीं से मनुष्य के दुर्भाग्य की कहानी शुरू होती है और चिकित्सा के नाम पर होने वाली गड़बड़ियों का मूल कारण भी यही है। इसमें सुधार की गुंजाइश है। हमें एक ऐसी विहंगम दृष्टि विकसित करनी होगी जिसमें पूँछ, सूंड, कान इत्यादि को अलग-अलग न मानकर पूरे तौर पर हाथी को देखा जा सके, तभी हमारी शरीर की विवेचना सही होगी, वरना हम केवल स्थूल शरीर पर ही अटके रह जाएँगे।
सात आयामी शरीर
तो आइए, थोड़ी और गहराई में जाकर जानने का प्रयास करते हैं कि वस्तुतः हमारा शरीर है क्या? जिन्होंने जाना है वे बताते हैं कि जो शरीर दिखता है, सिर्फ वही हमारा शरीर नहीं है। हमारे शरीर या अस्तित्व के छ तल और हैं।
या कह लें कि हमारे छः शरीर और हैं। इसे पानी में तैरते हिमखंड (आइसबर्ग) की तरह माना जा सकता है, जिसका सिर्फ 1/10 हिस्सा ही पानी के ऊपर नज़र आता है, बाकी पानी के नीचे छिपा हुआ रहता है। या फिर किसी धूमकेतु जैसा। जैसे धूमकेतु का अगला हिस्सा स्पष्ट दिखाई देता है परंतु पीछे की ओर बढ़ते हुए वह सूक्ष्म होता जाता है, और एक सीमा के बाद अदृश्य हो जाता है। ठीक इसी तरह हमारे अस्तित्व के ये सातों तल हैं जो आगे से पीछे की ओर सूक्ष्म होते जाते हैं। प्रथम तल हमारा स्थूल शरीर है जो हमें दृष्टिगोचर होता है, इसके बाद के शरीर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते चले जाने के कारण पूरी तरह दिखाई नहीं पड़ते। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जब कोई भवन बनता है तो पहले स्थल का चयन होता है, फिर नक्शे बनाए जाते हैं, फिर डिज़ाइन का काम करते हैं, फिर नींव भरी जाती है, और तब कहीं जाकर भवन का प्रारूप तैयार होता है। यानी यह कहा जा सकता है कि भवन जो बाहर से दिखता है, जिसमें संगमरमर लगा है और पेन्ट किया हुआ है, केवल वही भवन नहीं है बल्कि नक्शा, नींव, ईंटें, सीमेन्ट, प्लास्टर, डिज़ाइन आदि सभी कुछ भवन में समाहित है।
तो भारत के मनीषियों के लिए यह अनुभव की बात थी कि हमारे एक नहीं बल्कि कुल सात शरीर हैं और हमारा अस्तित्व इन सार्तो शरीरों से मिलकर बना है। ये सातों शरीर आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। जब हमारी मृत्यु होती है तो केवल पहला, यानी कि स्थूल शरीर नष्ट होता है, बाकी शरीर यथावत रहते हैं। भौतिक शरीर स्थूल होने के कारण दिखाई पड़ता है जबकि बाकी दिखाई नहीं पड़ते, जैसे कि हवा।
यदि आपका तार्किक मस्तिष्क अभी इस बात को स्वीकारने को राजी न हो पा रहा हो तो कुछ देर के लिए इसे एक परिकल्पना के तौर पर ही ले लीजिए। जैसे गणित में हम करते हैं न कि मान लिया कि A, B, C तीन त्रिभुज हैं, तो वैसे ही मान लीजिए कि हमारे इस स्थूल शरीर के अलावा छह शरीर और हैं, जिनमें रहस्यों का भंडार है। और इन्हीं छह शरीरों में हमारे स्वास्थ्य का रहस्य भी छिपा है, इन्हीं में हमारी बीमारियों का कारण भी छिपा है, और इन्हीं में हमारे पूर्ण स्वस्थ होने का विज्ञान एवं संभावना भी छिपी है।
सम्पूर्ण स्वास्थ्य के मार्ग में सबसे बड़ी बाया हमारी यही मान्यता है कि हमारे पास शरीर के नाम पर बस यही स्थूल शरीर है। और इसलिए हमने अब तक केवल इसी शरीर को पूर्ण रूप से उपचारित और स्वस्थ करने की कोशिश की है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए हमें अपने अंदर के सूक्ष्म शरीरों को भी स्वस्थ करना होगा। यहाँ पर मैं सर्दी-जुकाम जैसी छोटी-मोटी बीमारियों की बात नहीं कर रहा हूँ जो हम बाहरी वातावरण से अपने शरीर पर ले रहे हैं। रोगों से मेरा अभिप्राय ऐसे रोगों से है जिनमें स्थूल शरीर के साथ-साथ अंदर के सूक्ष्म शरीर भी रोगों से प्रभावित हुए रहते हैं। इसकी पूरी संरचना और सिस्टम को आने वाले अध्याय में देखेंगे। मगर एक बात हमें स्पष्ट रूप से साफ हो जानी चाहिए कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य स्थूल शरीर के साथ-साथ अंदर के सूक्ष्म शरीरों को रोगों के लक्षणों से मुक्त किए बिना संभव नहीं है, और विश्व में अभी तक उपचार की सारी विधियों में एक मात्र होमियो का विज्ञान ही इसे संभव कर सकता है।
इस पुस्तक में मैं आपको इन सभी शरीरों का संक्षिप्त परिचय देने की कोशिश करूँगा। हालाँकि पता नहीं मैं आपको किस हद तक समझा पाऊँगा, क्योंकि मैं कोई लेखक नहीं हूँ। लेकिन करीब पाँच-दस साल से मैं इन सब चीजों पर काम कर रहा हूँ और अब चाहता हूँ कि ये सारी बातें आप तक पहुँचे।
सात शरीरों के सात केंद्र चलिए, बात आगे बढ़ाते हैं। हमारे स्थूल शरीर से छह सूक्ष्म शरीर और जुड़े रहते हैं तथा इनमें से प्रत्येक शरीर के लिए एक ऊर्जा केंद्र की कल्पना की गई। है, जिसे अध्यात्म की भाषा में 'चक्र' कहा जाता है। सात शरीरों के लिए सात चक्र होते हैं। इनमें से प्रत्येक चक्र संबंधित शरीर से जुड़ा होने के साथ-साथ स्थूल शरीर के अंग विशेष को भी प्रभावित करता है। यानी हर शरीर का हमारे स्थूल शरीर पर एक अलग बिन्दु होता है। इन चक्रों के हमारे स्थूल शरीर में अलग-अलग बिन्दुओं पर अवस्थित होने की कल्पना की गई है। कल्पना इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यदि आप स्थूल शरीर को काटकर देखेंगे तो कहीं
कोई चक्र दिखाई नहीं पड़ेगा। यह सूक्ष्म बात है जो स्थूल रूप से नहीं पता
चलेगी, किसी स्कैनिंग सेंटर से नहीं पता चलेगी। भौतिक विज्ञान की पहुँच
अभी वहाँ तक नहीं है। इसे जानने के लिए भीतर के विज्ञान की आवश्यकता
होती है, जिसे आध्यात्मिक विज्ञान कहा जाता है। यहाँ पर विशेष रूप से यह
उल्लेख करना आवश्यक है कि ये जो सात शरीर हैं, वे क्रमशः एक के अंदर
एक हैं। हम सीधे तीसरे या चौथे शरीर पर नहीं पहुँच सकते। इसके लिए हमें
क्रमशः नीचे से या ऊपर से ही यात्रा करनी होगी।
बहरहाल, हर चक्र अपने से जुड़े शरीर का रिमोट कॅन्ट्रोल है, जिसके द्वारा उस शरीर को संचालित किया जा सकता है। हर चक्र का अपना अलग महत्व है। अलग-अलग मनुष्यों में अलग-अलग चक्र सक्रिय होते हैं और उसी हिसाब से उन मनुष्यों की शारीरिक मानसिक संरचना, व्यवहार, स्वभाव, व आदतें इत्यादि तय होती हैं। किसी कारण से अगर किसी चक्र पर कोई समस्या है तो उसका स्थूल शरीर पर बहुत सारी बीमारियों के रूप में प्रकटीकरण होता है। हमारा शरीर जब बीमार होता है तो केवल एक ही शरीर बीमार नहीं होता बल्कि एक शरीर से शुरू होकर बीमारी सभी शरीरों में प्रवेश कर जाती है और सभी को समान रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि सभी शरीर आपस में जुड़े हुए हैं। जो असाध्य या दुष्कर बीमारियाँ होती हैं वे प्रायः सूक्ष्म शरीरों से शुरू होकर होकर स्थूल शरीर तक आती हैं, इसलिए यदि सूक्ष्म शरीरों को उपचारित किया जा सके तो या तो स्थूल शरीर के बीमार पड़ने की नौबत ही नहीं आएगी या फिर वह अपने आप स्वस्थ हो जाएगा। चक्रों के विशेषज्ञ चक्र विशेष से संबंधित शरीर की त्रुटियों में सुधार कर सकते हैं, जिसे चक्र हीलिंग का नाम दिया जाता है।
एलोपैथी की जो दवाइयाँ हैं वे केवल अन्नमय कोष, यानी कि स्थूल शरीर पर काम करती हैं, इसलिए उन्हें लेने के बाद बीमारी के लक्षण तो चले जाते हैं किंतु व्यक्ति स्वस्थ महसूस नहीं करता। इसलिए नहीं करता क्योंकि अभी सूक्ष्म शरीरों में तो बीमारी बनी ही हुई है, वहाँ उनका जो स्त्रोत है वह तो जस का तस है। यहाँ हम सर्दी-जुकाम या आम मौसमी बीमारियों की बात नहीं कर रहे हैं। मगर होमियोपैथी से ज्यादातर लोगों में दूसरा, तीसरा और चौथा शरीर भी ठीक हो जाता है। जहाँ पर एलोपैथी की दवाएँ नहीं पहुँच पातीं, वहाँ पर होमियोपैथी की potency ही पहुँचती है और वहीं से बीमारियों का पूरी तरह ठीक होना शुरू होता है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य का रास्ता इन्हीं गलियों से होकर गुज़रता है। इसके अलावा और किसी पैथी में अभी तक कोई ज्ञात रास्ता नहीं है।
बहरहाल, चलिए चक्रों वाली बात को आगे बढ़ाते हैं। पहला जो चक्र है, जो कि स्थूल शरीर या अन्नमय कोष का नियामक या कंट्रोलर है, उसे अध्यात्म की भाषा में 'मूलाधार चक्र' बोलते हैं। इस मूलाधार चक्र की अवस्थिति काम केन्द्र, यानी कि जननेन्द्रिय के करीब-करीब चार इंच नीचे और पीछे की ओर टेल बोन के पास मानी गई है। यह हमारे स्थूल शरीर का चक्र है, जहाँ से चीजें शुरू होती हैं। जैसा कि इसके नाम से ही ज्ञात होता है कि यह जीवन की मूलभूत बातों को नियंत्रित करता है। इसी से हमें जन्म मिलता है, इसी चक्र से हमारा भरण-पोषण होता है, और इसी चक्र से शारीरिक विकास होता है। इसी चक्र से हम बड़े होते हैं और कामवासना भी इसी चक्र से संबंधित है। अपने अस्तित्व को बचाए रखने की प्रेरणा भी हमें इसी से हासिल होती है। इस चक्र की गड़बड़ी से बच्चों का शारीरिक विकास रुक जाता है और शरीर पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता। होमियोपैथी की Baryta-carb नामक दवा इसी चक्र पर काम करती है और इस दवा से यह चक्र सक्रिय होने के बाद बच्चों में मौजूद कई शारीरिक कमियाँ दूर हो जाती हैं। विभिन्न चक्रों और शरीरों पर होमियो दवाएँ कैसे काम करती हैं इसके बारे में मैं आपको अगले अध्यायों में विस्तार से बताऊँगा।
शरीर विज्ञान के बारे में गोस्वामी तुलसीदास जी की अंतर्दृष्टि बेहद प्रगाढ़ थी। उनकी एक प्रसिद्ध चौपाई है, जिसमें वो शरीर के बारे में कहते हैं छिती जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।
वह कहते हैं कि हमारा शरीर पाँच चीजों का जोड़ है धरती, जल, अग्नि, गगन एवं पवन। मतलब, हमारा शरीर केवल स्थूल नहीं है, इसमें आकाश तत्व भी है, जल तत्व भी है, अग्नि तत्व भी है, और वायु तत्व भी है। तो दोस्तो, के तीन तत्व और पाँचवा वायु तत्व भी समझ में आता है कि धरती, अग्नि, और जल से तो हम बने ही हैं और वायु या प्राण वायु से ही हमारे जीवन की डोर बँधी है। मगर यह आकाश तत्व क्या है? मैं आप सभी से यह अनुरोध करूँगा कि कृपया दो मिनट के लिए पुस्तक को नीचे रखकर आँखें बंद करें और चिंतन करें कि वायु और आकाश में क्या फर्क है? आप कहेंगे कि ये दोनों तो एक ही बात है। आकाश में वायु है या वायु में आकाश है। मगर मैं आपको कहता हूँ कि गोस्वामी तुलसीदास जैसे परम संत जब कुछ बोलते हैं तो यूँ ही नहीं बोलते। निश्चित रूप से वायु और आकाश, यानी गगन तत्व और वायु तत्व दोनों बिलकुल अलग-अलग चीजें हैं। कृपया आँखें बंद करें दो मिनट के लिए और अपने मन में उत्तर खोजें कि वायु और आकाश तत्वों का क्या मेद है या वायु आकाश से किस तरह से भिन्न है।
अब इस उत्तर से अपने उत्तर का मिलान करें। गोस्वामी जी का वायु तत्व से मतलब है वह प्राण वायु जो हम साँस के माध्यम से लेते हैं और वह वायु जो हमारे शरीर के विभिन्न अवयवों में रहती है। यह वायु हमारे शरीर के अंदर जाकर हमारे प्राणों को संचालित करती है और इसके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते। अब आप आकाश तत्व के रहस्य को समझें। आकाश तत्व का रहस्य सांकेतिक भाषा में है। असल में आकाश तत्व के माध्यम से तुलसीदास जी हमारे छह सूक्ष्म शरीरों की बात कर रहे हैं। वास्तव में ये सभी सूक्ष्म शरीर गगन यानी आकाश तत्व का हिस्सा हैं और आकाश तत्व से टूटकर ही बने हैं। भारत में जो मोक्ष की कल्पना है, वह यही है कि जब तक हमारा केवल स्थूल शरीर मरता रहता है और हमारे सूक्ष्म शरीरों की मौत नहीं होती, या यूँ कहें कि सूक्ष्म शरीरों की चेतना तमाम विकारों से मुक्त होकर जब त आकाशीय चेतना से पुनः एकाकार नहीं हो जाती तब तक जन्म, मृत्यु, फिर पुनर्जन्म का खेल जारी रहता है।
अगर हमने इन सूक्ष्म शरीरों को विकसित करने और इनका उपयोग करने की कला सीख ली तो इन शरीरों का प्रक्षेपण हम सुदूर अंतरिक्ष में करके एस्ट्रल ट्रैवल कर सकते हैं। इसका मतलब है कि हमारा स्थूल शरीर तो हमारे कमरे में सोया जैसा पड़ा रहेगा, लेकिन उसके अंदर के सूक्ष्म शरीरों को हम सुदूर अंतरिक्ष में या किसी भी मनचाहे स्थान पर भेज सकते हैं और उस स्थान की सभी चीज़ों का अनुभव स्थूल शरीर की तरह ले सकते हैं। वस्तुतः आकाश तत्व विराट आकाश या अंतरिक्ष जो हमारे सामने फैला है, उसका हिस्सा है। और ये छहों सूक्ष्म शरीर भी उसी के हिस्से हैं। तो गोस्वामी जी ने सबसे अंत में एक गूढ़ रहस्य के इशारे के रूप में इसे रखा है। मगर हम इसे समझने की बजाए बस तोते की तरह उनकी बात रटते भर रहते हैं।
तो अगर इन पाँचों चीज़ों या तत्वों को इस शरीर से निकाल दिया जाए तो हमारी मृत्यु तो बाद में होगी, हमारा निर्माण ही संभव नहीं हो पाएगा। इसलिए हमारी जीवन यात्रा का अभिप्राय स्थूल शरीर से इतर सूक्ष्म शरीरों को जाग्रत कर और उनके अनुभव में डूबकर ब्रह्मांडकीय चेतना से संयुक्त होने की यात्रा का नाम है। कृपया इस बात को अपने अंदर गहराई में जाने दें, तभी हम आगे बढ़ पाएँगे।
तो चलिए, अब वापस चक्रों पर आते हैं। इस पहले चक्र की ऊर्जा अन्य जीव-जंतुओं की ऊर्जा के समान होती है, जिसका सारा ज़ोर खुद को जिलाए रखने और प्रजनन के माध्यम से अपनी प्रजाति का अस्तित्व बचाए रखने पर होता है। चूँकि जीवित रहने की लालसा और अपने समान संतति को जन्म देने की इच्छा ही इस सृष्टि का आधार है और इसी से यह सृष्टि चल रही है, इसीलिए यह चक्र मूलाधार चक्र कहलाता है और मनुष्य सहित सभी जीव-जंतुओं में कॉमन होता है। संसार में मूलतः 90 प्रतिशत लोग इसी चक्र और इसी शरीर पर जीते हैं, उनके अन्य चक्र विकसित नहीं होते। जन्म के बाद पहले सात वर्षों में यह प्राकृतिक रूप से भौतिक शरीर के साथ विकसित होता है, जबकि बाकी सारे शरीर बीज रूप में अवस्थित रहते हैं। इसलिए पहले सात सालों में कोई बुद्धि, भावना या कामना विकसित नहीं होती। विकसित होता है तो सिर्फ भौतिक शरीर और बेसिक सरवाइवल इंस्टिक्ट, यानी किसी भी तरह खुद को जीवित रखने की अंतःप्रेरणा।
जो दूसरा चक्र है, उसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। यह दूसरे नंबर के शरीर, जिसे भाव शरीर या प्राणमय कोष या ईथरिक बॉडी कहते हैं, का रिमोट कन्ट्रोल है। इसकी स्थिति जननेन्द्रिय से लगभग चार इंच ऊपर मानी गई है। यह हमारे मन से थोड़ा थोड़ा प्रभावित होता है और इसके माध्यम से हमारी नकारात्मक भावनाएँ जैसे- भय, घृणा, क्रोय, व हिंसा; इन सबकी जो नकारात्मकता है वह इस चक्र से सम्पादित होती है। तो कभी-कभी मन की इन चीज़ों के माध्यम से हम पहले चक्र मूलाधार से दूसरे चक्र पर आ जाते हैं। 7-14 वर्ष तक प्राकृतिक रूप से इस शरीर का विकास होता है। इसलिए 14 वर्ष की उम्र में सैक्स मैच्योरिटी उपलब्ध होती है, क्योंकि सैक्स भाव का ही प्रगाढ़ रूप है। ज्यादातर लोग पहले चक्र तक और उससे थोड़े कम लोग दूसरे चक्र तक सिमटकर रह जाते हैं। ऐसे लोग समाज के मज़दूर और साधारण वर्ग के लोग होते हैं, जिनकी बुद्धि बहुत विकसित नहीं होती और जिन पर होमियो दवा बहुत ज़्यादा असर नहीं करती।
तीसरा चक्र जिसे कि 'मणिपुर चक्र' कहते हैं और जो तीसरे शरीर, यानी कि 'मनोमय कोष' या 'मेंटल बॉडी' को नियंत्रित करता है, इसे नाभि पर अवस्थित माना गया है। जिन लोगों का यह चक्र जाग्रत होता हैं, जो इस शरीर पर जीते वो वास्तव में संदेह और विचार के तल पर जीते हैं। उनको शारीरिक से ज्यादा मानसिक बीमारियाँ पकड़ती हैं। मैं आपको यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मनुष्य के स्वास्थ्य एवं बीमारी को ठीक तरह समझने के लिए शरीर को संपूर्णता में लेना होगा। अब जैसे मानसिक बीमारियों की बात करें तो आप बोलेंगे कि मस्तिष्क तो शरीर का ही हिस्सा है। ठीक बात है, मगर विचार तो शरीर का हिस्सा नहीं हैं, प्रेम, घृणा, व क्रोथ जैसी भावनाएँ तो शरीर का हिस्सा नहीं हैं। हाँ, उनके परिणाम अवश्य शरीर पर दिखते हैं। जैसे क्रोध में हो तो आँखें लाल हो जाती हैं और हम मार-पीट पर उतर आते हैं। या जैसे कोई दुर्घटना का समाचार मिला या जैसे डकैती हो गई या दीवाला पिट गया, तो हमारा हार्ट फेल हो जाता है। समाचार तो एक विचार था मस्तिष्क में, मगर प्रिंट उसके हमारे स्थूल शरीर पर आ जाते हैं।
14-21 वर्ष तक इस तीसरे सूक्ष्म शरीर का विकास होता है। दूसरे शरीर में जहाँ भाव का विकास होता है, वहीं तीसरे शरीर में तर्क, विचार और बुद्धि का विकास होता है। जिनका सिर्फ स्थूल शरीर विकसित होता हैं वे जानवरों के तल पर जीने वाले लोग होते हैं। इनमें आतंकवादी, हत्यारे, और अपराध जगत के शीर्ष के लोग होते हैं। इन पर होमियो दवा ज्यादा काम नहीं करेगी।
तीसरे शरीर का विकास शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का फल है। इस शरीर के विकसित होने से ही मैच्योरिटी आती है। प्राकृतिक रूप से अगर स्वच्छ और सही वातावरण मिले तो सामान्यतः इतना विकास प्रकृति करती है। भले ही सूक्ष्म और अचेतन रूप से हो, पर इसलिए दुनिया के सभी मुल्कों में 21 वर्ष के बाद मताधिकार के प्रयोग का अधिकार मिलता है। वैसे कुछ मुल्कों में यह सीमा अब 18 वर्ष कर दी गई है जो कि स्वाभाविक भी है, क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य और विकसित हो रहा है वैसे-वैसे प्रत्येक शरीर के विकास के लिए निर्धारित सात वर्ष की सीमा भी कम होती जा रही है। इसलिए बच्चियों में मासिक धर्म शुरू होने की उम्र जो पहले 14-15 वर्ष थी, अब घटकर 09-10 वर्ष पर आ गयी है।
ऊँची चेतना या बुद्धिमत्ता वाले लोगों के तीसरे और चौथे शरीर ज़्यादा विकसित होते हैं। या इसका उल्टा भी कह सकते हैं कि जिन लोगों के ये शरीर अधिक विकसित होते हैं, वे औरों से अधिक बुद्धिमान या चेतनावान होते हैं। चक्रों या सूक्ष्म शरीरों का विकास प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था है, लेकिन इन्हें साधना से भी विकसित किया जा सकता है। प्राकृतिक रूप से तो ये सूक्ष्म शरीर बीज रूप में सुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं और रोगों व उपचार में सहायक होते हैं, परन्तु उनका अन्य विकसित उपयोग करने हेतु साधना द्वारा विकास किया जा सकता है।
आपको लग सकता है कि यह फिजूल की चर्चा हो रही है। भला अध्यात्म और इन सूक्ष्म शरीरों का चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं रोग के विज्ञान से क्या मतलब! मैं कहना चाहता हूँ कि यहीं पर चूक हुई है और यहीं से बात बिगड़ी है। हमारी कुछ मान्यताएँ हैं जो मूल रूप से गलत हैं और उनमें सुधार की गुंजाइश है। यदि इन छूटे हुए बिंदुओं को समाहित कर लिया जाए तो हम चिकित्सा विज्ञान को एक व्यापक दृष्टि (Bird's view) से देख सकते हैं। अभी Bird's view नहीं है। अभी केवल अन्नमय कोष (स्थूल शरीर) को ही देखा जा रहा है। जब तक इसमें अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा ज्ञात सूक्ष्म शरीरों संबंधी ज्ञान को समाहित नहीं किया जाएगा, तब तक परम स्वास्थ्य एवं पूर्ण रूप से रोग मुक्ति का उपाय भी संभव नहीं होगा। स्वास्थ्य और बीमारी के विज्ञान को समझने के लिए जब तक हम शरीर को पूर्ण रूप से नहीं समझेंगे, तब तक काम नहीं बनेगा।
तो चलिए, आगे बढ़ते हैं। जैसी कि हम चर्चा कर रहे थे, विवेक, विचार, संदेह, एवं बुद्धिमत्ता जैसी बातें तीसरे शरीर यानी कि मनोमय कोष से प्रभावित होती हैं, जिसका रिमोट मणिपुर चक्र है। मणिपुर चक्र संदेह और श्रद्धा से भी संबंधित है। यह नाभि के आस-पास होता है; रीढ़ की हड्डी की तरफ, न कि सामने की ओर। किसी का मनोमय कोश, यानी कि मन, यदि बीमार हो गया तो उसका स्थूल शरीर कभी भी ठीक नहीं होगा, वो हमेशा बीमार ही रहेगा, लाख हम शरीर को दवा दे दें। उस स्तर तक दवा पहुँचाने का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास कोई उपाय नहीं है, यह काम केवल होमियोपैथी से संभव है।
जो चौथा शरीर है हमारा, उसको बोलते हैं विज्ञानमय कोष। इसको नियंत्रित करने वाला चक्र है अनाहत चक्र, जो हृदय में अवस्थित माना गया है। इस चक्र से कल्पना, रचनात्मकता, निःस्वार्थ प्रेम, संवेदना, स्वतःस्फूर्त प्रेरणा, इन्ट्यूशन जैसे गुणों का विकास होता है। जिस व्यक्ति का यह चक्र विकसित होता है वह चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति सभी का हितैषी, मानवता प्रेमी तथा सर्वप्रिय होता है। यह शरीर या यह चक्र अगर सक्रिय न हो पाए तो प्रेम का अनुभव हमें नहीं हो सकता। तब प्रेम हमारे लिए काम (सैक्स) बनकर रह जाता है। अध्यात्म में इसका तंत्र साधना इत्यादि में खूब खूब उपयोग हुआ है। मगर इसकी चर्चा अभी हम यहाँ नहीं करेंगे।
पाँचवा जो हमारा शरीर है, उसे आनंदमय कोष कहते हैं और इसे नियंत्रित करने वाले चक्र को नाम दिया गया है विशुद्ध चक्र, जो कि कण्ठ में अवस्थित माना गया है। यहाँ से अध्यात्म की यात्रा शुरू होती है, सत्-चित्त-आनंद की यात्रा इस शरीर को आत्म-शरीर भी कहते हैं। नीचे के जो चार चक्र हैं, चार शरीर हैं, उन तक तो हम आसानी से जा सकते हैं, वहाँ तक तो मनुष्य और मनुष्यता की बात है, और आप कह सकते हैं कि 95 प्रतिशत बीमारियाँ इन्हीं चार शरीरों से शुरू होती हैं या इन्हीं तक सीमित रहती हैं। इसीलिए फिलहाल इन चार चक्रों व शरीरों के बारे में जानने भर से भी हमारा काम हो जाएगा।
इसके ऊपर बहुत कम बीमारियों का प्रवेश है। इसलिए मैं बाकी तीन शरीरों व चक्रों के बारे में मुख्य रूप से कुछ बिंदु बता तो देता हूँ पर उन पर विस्तार से चर्चा हम अभी नहीं करेंगे। इन चक्रों से जो बीमारियाँ जुड़ी हैं वे पूर्व जन्मों संबंधी बीमारियाँ है, माईग्रेन या मिर्गी जैसी कुछ असाध्य बीमारियाँ हैं जो पिछले जन्मों से आती हैं और बहुत अंदर-अंदर की बीमारियाँ हैं। उनका भी उपचार होमियोपैथी से या अन्य विधियों से भी किया जा सकता है, लेकिन अभी हम उनकी बात नहीं करेंगे। अगर हमारे जीवन का ढंग सही हो, जीवन का विकास सही हो तो प्राकृतिक रूप से इस शरीर, जिसको हम आध्यात्मिक शरीर या स्प्रिचुअल बॉडी भी कहते हैं, का विकास 35 साल तक हो जाना चाहिए। यहाँ पर हमें अध्यात्म की भाषा में आत्मा का बोध या आत्मबोध घटित होता है।
इसी तरह से छठा शरीर है, जिसे ब्रह्म शरीर भी कहते हैं और तृतीय नेत्र भी। यह परमात्मा का शरीर है, कॉस्मिक बॉडी है, ब्रह्माण्डकीय चेतना या बुद्धिमत्ता का द्वार है। इससे जुड़े चक्र को आज्ञा चक्र बोलते हैं, जिसका स्थान दोनों भँवों के मध्य माना गया है। प्राकृतिक रूप से यह 42 वर्ष तक विकसित हो जाना चाहिए। हालाँकि ऐसा नहीं है कि ये सूक्ष्म शरीर अगर विकसित न हों तो विदा या विलुप्त हो जाएंगे और उनका रोग या स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव हमारे स्थूल शरीर पर प्रकट नहीं हो पाएगा। विकसित होने का अर्थ है कि हम उन शरीरों से जुड़ीं कुछ और साधना संबंधी या परामनोविज्ञान संबंधी रहस्यात्मक क्रियाएँ संपादित कर सकते हैं, कुछ अन्य सकारात्मक चीजें, जैसे डिवाइन हीलिंग भी हम कर सकते हैं, जिससे भारत में बैठा एक व्यक्ति अमेरिका में बैठे किसी व्यक्ति का उपचार कर सकता है। तो जैसे-जैसे हम इन अग्रेतर सूक्ष्म शरीरों को जागृत करते हैं, वैसे वैसे प्रकृति या अस्तित्व हमारे लिए इस तरह की कई रहस्यात्मक संभावनाओं के द्वार खोलता जाता है। अभी वह हमारा विषय नहीं है।
•तो जैसे पाँचवा शरीर परमानंद का केंद्र है, वैसे ही छठे शरीर में संकल्प का केन्द्र है। चौथे शरीर तक हम प्रेम में जीते हैं, पाँचवे शरीर पर आत्मा में रमण करते हैं, परंतु छठे शरीर पर हमारे होने का मतलब है कि हमारी चेतना पूरे ब्रह्माण्ड में विस्तारित हो जाती है, आत्मा का परमात्मा में लोप हो जाता है। इस शरीर के प्राकृतिक विकास की उम्र लगभग 42 वर्ष तक की है। सातवां चक्र सहस्त्रार चक्र है, जिसे खोपड़ी के सबसे ऊपर के हिस्से में अवस्थित माना गया है। यह वही हिस्सा है जहाँ नवजात बच्चों में आपने देखा होगा कि कुछ कंपन होते रहते हैं। इसे कपाल भी कहते हैं और यह बहुत मुलायम होता है। यह चक्र मुक्ति का चक्र है। आम संसारी लोग वहाँ तक जा ही नहीं सकते। इस शरीर का विकास 49 वर्ष तक हो जाना चाहिए। यह सातवां शरीर वस्तुतः सूक्ष्म शरीर जैसा भी नहीं है। यह बॉडीलेसनेस की हालत है। विदेह की स्थिति है। यह परम अवस्था है जहाँ शून्य ही शेष रहता है, जहाँ ब्रह्म भी शेष नहीं रहता। वहाँ कह सकते हैं कि निर्वाण घटित हुआ। हिन्दुओं की जो मोक्ष की परिकल्पना है, वह इसी तल से संबंधित है।
अज्ञान का परिणाम तो मित्रो, हमने जाना कि हमारा स्थूल शरीर ही हमारा कुल शरीर नहीं है बल्कि इसके साथ और छह शरीर जुड़े हुए हैं। भविष्य में कभी योग और विज्ञान का समन्वय हो सका तो सात की तो गारंटी मैं नहीं लेता, मगर चौथे शरीर तक हम जरूर पहुँच सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बुनियादी भूल यही हुई स्वास्थ्य के बारे में कि हमने सिर्फ स्थूल शरीर के स्वस्थ होने की फिक्र की, क्योंकि हमें स्थूल शरीर के अतिरिक्त किसी और शरीर का ज्ञान ही नहीं है। मजे की बात यह है कि एलोपैथी में जैसे-जैसे शोध होते गए, वैसे वैसे इस स्थूल शरीर के भी अलग-अलग अंगों के अलग-अलग विशेषज्ञ होते गए। माइक्रोस्कॉप या खून इत्यादि की मशीनी जाँच से, विभिन्न तरह की डाइग्नोसिस एवं पैथोलॉजिकल जाँच से वे स्थूल शरीर के अंदर झाँकने की ही प्रक्रिया करते रहे हैं। मगर दुर्भाग्य है कि वे पूरे शरीर में एक साथ नहीं झाँक सके बल्कि एक-एक अंग में झाँकने का प्रयास किया। अगर एलोपैथी इस बिंदु पर सही दिशा में जा पाती, यानी पूरे शरीर को एक मानकर किसी विधि द्वारा शरीर के अंदर के शरीरों में झाँकने में सफल हो जाती तो शायद मानव जाति के लिए यह वरदान साबित हो सकती थी। उस स्थिति में एलोपैथी का विज्ञान ज्यादा कुशल और प्रभावकारी हो सकता था। परन्तु हुआ इसका विपरीत और इसलिए एलोपैथी का विकास एल.के.जी. और निचली कक्षाओं तक सीमित रह गया। इस तरह से वे मिडिल स्कूल में ही रुके रहे। जबकि पूर्व के मनीषि अध्यात्म और साधना द्वारा शरीर एवं चेतना के उत्कर्ष पर पहुँच गए। और सबसे बड़ी बात यह हुई कि हमारे होमियोपैथी के जनक महान हैनीमैन साहब ने अचेतन या सचेतन रूप से इसका उपयोग कर लिया। यहाँ पर मैं सोचता हूँ कि अगर वह पूरब में पैदा हुए होते तो निश्चित ही सचेतन रूप से होमियो का यह पूरा विज्ञान दे देते। परन्तु चूँकि वह पश्चिम में पैदा हुए थे, जहाँ के मनीषियों में इन सूक्ष्म शरीरों की कोई अवधारणा नहीं थी, अतः यह सब उनके अचेतन मन के तल पर हुआ। उनकी विराट प्रतिभा ने अचेतन रूप से विराट अचेतन मन से संयुक्त होकर आकस्मिक रूप से इस विज्ञान का उपयोग कर लिया और रोगों से मुक्ति का एक अद्भुत विज्ञान देकर विश्व को उपकृत किया। यह कैसे किया, यह हम आगे की चर्चा में जानेंगे। तब तक कृपया धैर्य बनाए रखें। तो इसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ 100-200 साल पहले एलोपैथी में पूरे शरीर का एक डॉ. होता था, वहीं आज सैकड़ों हैं। घुटने का विशेषज्ञ अलग, पैर का अलग, हड्डी का अलग, आँख का अलग, हृदय का अलग, खोपड़ी का अलग, नाक का अलग है। पूरे शरीर की जो परमात्मा ने एक यूनिट बनाई थी, वहीं उन्होंने शरीर के हर अंग के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ बनाए। मूल रूप से यह तरीका ही मेरी समझ से गलत हो गया। क्योंकि किसी पेड़ की टहनी और पत्तों की अगर हम अलग-अलग परवाह करें, अगर हम अलग-अलग पत्तों और टहनियों के लिए अलग-अलग माली रखें तो भी पेड की रक्षा और उसके जीवन या जीवन्तता की वही माली देख-भाल कर सकता है जिसको पेड़ की जड़ों, खाद, पानी एवं मिट्टी की विशेषज्ञता का ज्ञान हो। वरना तो सारे माली मिलकर देख-भाल के नाम पर उसकी हत्या ही करेंगे। और में निवेदन करना चाहता हूँ कि एलोपैथी या मेडिकल साइंस ने पूरी मानव जाति के साथ यही किया है। पुस्तक के अंत में आप भी हाथ जोड़कर एलोपैथी से यही कहेंगे कि नहीं, अब और नहीं!
और नहीं बस और नहीं, गम के प्याले और नहीं।
दिल में जगह नहीं बाकी, रोक नज़र अपनी साकी। और नहीं, बस और नहीं।
मैंने एक चुटकुला सुना है कि अमेरिका में एक स्त्री डॉक्टर के पास गयी। उसे आँख में गड़बड़ी थी, इसलिए आँख वाले डॉक्टर के पास गयी। डॉक्टर ने अंदर बुलाया और कहा कि तकलीफ बताइए। उसकी दाहिनी आँख के अंदर रेटिना में कुछ गड़बड़ी थी, तो उसने बताया कि डॉक्टर साहब! यह वाहिनी आँख के रेटिना में कुछ दिक्कत है। सुनकर डॉक्टर हँसने लगा और बोला कि आप गलत जगह आ गई मोहतरमा! मैं बायीं आँख का डॉक्टर हूँ, और बायीं आँख के भी सफेद वाले हिस्से का डॉक्टर हूँ, काले वाले हिस्से का नहीं हूँ। आपको चाहिए कि अपने वकील या लीगल एक्सपर्ट से बात करके, बीमा कंपनी से बात करके दाहिनी आँख के रेटिना के काले वाले हिस्से के विशेषज्ञ के पास जाएँ, वही आप का इलाज करेंगे।
दोस्तो, इसमें कोई हँसने वाली बात नहीं है बल्कि यह पूरी मानव जाति के लिए अफसोस करने वाली बात है। क्या इसी को हम तरक्की कहते हैं? क्या इसी को हम विज्ञान और शोध और टेक्नोलॉजी का विकास कहेंगे? नहीं, इससे बढ़िया तो प्राचीन काल में एक वैद्य होता था जो हाथ की नाड़ी को छूकर बता देता था कि कहाँ गड़बड़ी है और कौन सी दवा दी जाए। और मजे की बात यह है कि उस दवा से रोगी ठीक भी हो जाता था, किसी तरह की मशीनी जाँच की जरूरत ही नहीं होती थी। क्या आपको नहीं लगता कि आज हम बड़े-बड़े अस्पतालों, बड़े-बड़े विशेषज्ञों, बड़ी-बड़ी जाँचों, महँगी-महँगी दवाइयों आदि के चक्रव्यूह में फँस गए हैं? और इससे मिल क्या रहा है? एक के बाद एक साइड इफैक्ट्स! अगर आपको घुटने में दर्द हो और आप एक-दो महीने दवाई खाएँ, सारे शरीर की जाँच करवाएँ, और आखिर में जाकर डॉक्टर को बोलें कि डॉक्टर साहब! दवा तो खा रहा हूँ मगर अब गैस की प्रॉब्लम हो गयी है, तो डॉक्टर कहेगा, "यह तो दवा का साइड इफैक्ट है। हम तो घुटने पर काम कर रहे हैं, पेट का तो हमको पता नहीं।" तो मजेदार बात यही है
कि एक लंबे और मुश्किल इलाज के बाद घुटना थोड़े दिन के लिए ठीक हो जाता है मगर पेट में गैस बनने लगती है, कन्धे में दर्द शुरू हो जाता है, या कुछ और तकलीफ शुरू हो जाती है। तब डॉक्टर तो अपना पल्ला झाड़ लेता है और कह देता है कि हम घुटने के डॉक्टर हैं, हमने आपका घुटना तो ठीक कर दिया, अब आप कन्ये और पेट वाले के पास जाइए। दोस्तो, वस्तुतः इस तरह कोई बीमारी ठीक नहीं होती। घुटने का दर्द भले थोड़े समय के लिए चला जाए, पर शरीर स्वस्थ नहीं होता। उल्टा कोई और तकलीफ गले पड़ जाती और दवा है। एक तरह से बीमारी ठीक हो गयी और एक तरह से हम ज़्यादा बीमार हो गए। अब हम किसी अन्य डॉक्टर के पास जाएँगे तो वो कुछ देगा। फिर उसके भी कुछ साइड इफैक्ट्स होंगे। साइड इफैक्ट्स नहीं भी होंगे तो हमेशा के लिए दवा पर निर्भरता हो जाएगी। जैसे यदि आप ब्लॅड प्रेशर के इलाज के लिए जाएँ तो डॉक्टर कहेगा कि यह दवा आपको खाना है, रोज खाना है। अगर आप पूछें कि कितनों दिनों तक खाना है तो डॉक्टर आपको ऐसे देखेगा जैसे आप किसी पागलखाने से आए हैं और बोलेगा, “कितनों दिनों का क्या मतलब है? अरे! रोज़ खाना है।" दोस्तो, मैं एलोपैथी की कमियाँ नहीं गिना रहा हूँ बल्कि आपका ध्यान एलोपैथी के उपचार से होने वाले नुकसान की ओर तथा एक मकड़जाल में उलझने की प्रक्रिया की ओर आकर्षित कर रहा हूँ। वस्तुतः मैं आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट कराना चाहता हूँ कि ऐलोपैथी से जो हम उपचार कराते हैं, उससे बीमारी ठीक नहीं होती बल्कि बीमारियों का स्थानांतरण मात्र होता है। किसी बीमार आदमी के शरीर के पार्ट- A में मान लो X बीमारी है तो A में X बीमारी तो ठीक हो जाएगी मगर शरीर के पार्ट-B में Y बीमारी हो जाएगी और मजे की बात यह है कि थोड़े दिनों के बाद, दवा छोड़ते ही, आप देखेंगे कि पार्ट- A की X बीमारी भी वापस आ जाएगी। इस तरह एक गोली, एक सिरप, एक इंजेक्शन से कहानी शुरू होती है और साल दो साल में आप पाते हैं कि अब बात चार-पाँच गोली, एक-दो सिरप तथा कई-कई इंजेक्शनों पर आ गयी। और यह सब जीवन भर चलता रहेगा, कभी बंद नहीं होगा। अब आप ही सोचिए कि यह क्या इलाज है? यह दवा की खुराक है या कि हम भोजन कर रहे हैं? यानी धीरे-धीरे ये एलोपैथी दवाइयाँ हमारे भोजन का हिस्सा बन जाती हैं। नाश्ते के साथ 2, दोपहर के खाने से पहले या बाद 2-3, फिर रात के खाने के बाद 2-4, और बीच-बीच में सुई, खून की जाँच, शुगर की जाँच, पैथोलॉजी, एक्स-रे एवं अन्य जाँचों का मकड़जाल, और जिसको वो बोलते हैं रूटीन चैक-अप। ऐसी दुर्गति तो पूरे संसार में मनुष्य को छोड़कर किसी अन्य जीव की नहीं है। इस प्रकार हम अपनी प्राकृतिक नैसर्गिक खुराक पर नहीं बल्कि दवा रूपी भोजन पर आश्रित होते जाते हैं और ढेर सारी बंदिशों के बीच जीते हैं कि यह खाना है और यह नहीं खाना है। क्या इसको उपचार कहेंगे? नहीं, वस्तुतः यह एक अभिशाप है। पूरी मानव जाति के साथ एलोपैथी यह बलात्कार एवं शोषण कर रही है। खैर, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ! मैं तो बस आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट कराके और पूरी मानव जाति को घर बैठे हँसते-खेलते नैसर्गिक उपचार एवं परम स्वास्थ्य के विज्ञान से परिचित कराकर उसके कष्ट दूर करना चाहता हूँ। भले ही इसके लिए मुझे भी हैनिमैन साहब की तरह शक्तिशाली लोग कारागार में डलवा दें।
उपचार का सही तरीका तो चलिए, आगे बढ़ते हैं। आप इसे ऐसे समझें कि आपके घर की नाली में कचरा फँस जाता है। आप क्या करते हैं? आप एक लम्बे बाँस के टुकड़े से उस कचड़े को साफ करते हैं। लेकिन आप पाते हैं कि चार-पाँच दिन के बाद फिर नाली जाम हो गयीं। अब आप क्या करते हैं? फिर उस बाँस से उसको साफ करते हैं। लेकिन यदि यही सिलसिला हर चौथे-पाँचवे दिन होने लगे, तब आप क्या करेंगे? क्या तब आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि आखिर नाली में कचरा आता क्यों है, और कहाँ से आता है? नाली की व्यवस्था में कहाँ गड़बड़ी हैं और कैसे उस गड़बड़ी को एक बार में ही हमेशा के लिए ठीक किया जा सकता है? मेरी समझ से बीमार व्यक्ति का इलाज भी ऐसा ही होना चाहिए, जैसा कि होमियोपैथी में हनीमैन साहब ने कहा भी है Single Drug is the Rule. और सिंगल डोज़ (एक ही खुराक) भी। यही वजह है कि होमियोपदी में आप एक बीमारी के लिए अगर जाते हैं तो एक साथ एलोपैथी दवाइयाँ हमारे भोजन का हिस्सा बन जाती है। नाश्ते के साथ 2, दोपहर के खाने से पहले या बाद में 2-3, फिर रात के खाने के बाद 2-4, और बीच-बीच में सुई, खून की जाँच, शुगर की जाँच, पैथोलॉजी, एक्स-रे एवं अन्य जाँचों का मकड़जाल, और जिसको वो बोलते हैं रूटीन चैक-अप ऐसी दुर्गति तो पूरे संसार में मनुष्य को छोड़कर किसी अन्य जीव की नहीं है। इस प्रकार हम अपनी प्राकृतिक नैसर्गिक खुराक पर नहीं बल्कि दवा रूपी भोजन पर आश्रित होते जाते हैं और ढेर सारी बंदिशों के बीच जीते हैं कि यह खाना है और यह नहीं खाना है। क्या इसको उपचार कहेंगे? नहीं, वस्तुतः यह एक अभिशाप है। पूरी मानव जाति के साथ एलोपैथी यह बलात्कार एवं शोषण कर रही है। खैर, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ! मैं तो बस आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट कराके और पूरी मानव जाति को घर बैठे हँसते-खेलते नैसर्गिक उपचार एवं परम स्वास्थ्य के विज्ञान से परिचित कराकर उसके कष्ट दूर करना चाहता हूँ। भले ही इसके लिए मुझे भी हैनिमैन साहब की तरह शक्तिशाली लोग कारागार में डलवा दें।
उपचार का सही तरीका तो चलिए आगे बढ़ते हैं। आप इसे ऐसे समझें कि आपके घर की नाली में कचरा फँस जाता है। आप क्या करते हैं? आप एक लम्बे बाँस के टुकड़े से उस कचड़े को साफ करते हैं। लेकिन आप पाते हैं कि चार-पाँच दिन के बाद फिर नाली जाम हो गयी। अब आप क्या करते हैं? फिर उस बॉस से उसको साफ करते हैं। लेकिन यदि यही सिलसिला हर चौथे पाँचवे दिन होने लगे, तब आप क्या करेंगे? क्या तब आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि आखिर नाली में कचरा आता क्यों हैं, और कहाँ से आता है? नाली की व्यवस्था में कहाँ गड़बड़ी है और कैसे उस गड़बड़ी को एक बार में ही हमेशा के लिए ठीक किया जा सकता है मेरी समझ से बीमार व्यक्ति का इलाज भी ऐसा ही होना चाहिए, जैसा कि होमियोपैथी में हैनीमैन साहब ने कहा भी है- Single Drug is the Rule. और सिंगल डोज़ (एक ही खुराक) भी। यही वजह है कि होमियोपैथी में आप एक बीमारी के लिए अगर जाते हैं तो एक साथ आपकी कई बीमारियों अपने आप ठीक होती हैं। जबकि ऐलोपैथी में एक बीमारी का इलाज कराने जाते हैं तो और कई बीमारियाँ शुरू हो जाती हैं। यही मौलिक भेद है इन दोनों उपचार पद्धतियों में एलोपैथी बीमारी का इलाज करती है जबकि होमियोपैथी बीमार का। इसीलिए एलोपैथी में इतनी तरह की जाँचें करवाते हैं, जबकि होमियोपैथी में इसकी ज़रूरत ही नहीं होती। एलोपैथी सिर्फ इस बात को पकड़कर चलती है कि 'क्या है', जबकि होमियोपैथी का ज़ोर 'क्यों है' पर होता है। ये जो पैथोलॉजिकल जाँचें होती हैं, उसको आप इस तरह से समझें कि एक स्वस्थ आदमी के 10 तरह के टेस्ट ले लिए, सेंपल ले लिए। फिर उससे एक औसत निकाल लिया कि स्वस्थ व्यक्ति के खून में हीमोग्लोबिन इतना होना चाहिए, एस्नोफिलिया इतना होना चाहिए। इस तरह एक पैमाना तैयार कर लिया। अब इसी आधार पर लोगों की जाँच होती है और देखा जाता है कि किसकी रिपोर्ट उस पैमाने से मेल खाती है और किसकी नहीं। जिसकी मेल खाती है उसे स्वस्थ कहा जाता है और जिसकी नहीं खाती, उसे बीमार फिर जो भी चीज़े कम-बढ़ पाई जाती हैं उनको ठीक करने की कोशिश करते हैं। जैसे- उन्होंने एक पैमाना बना रखा है कि स्वस्थ व्यक्ति के खून में हीमोग्लोबिन मान लो 15 होना चाहिए, और आप का 8 आ गया। तो वे कहेंगे कि हीमोग्लोबिन कम है, इसलिए आपको कमजोरी हो रही है। लेकिन मैं कहता हूँ कि आप पहले यह तो बताइए कि हीमोग्लोबिन क्यों कम है? आज से 10-15 दिन पहले मुझे कोई बीमारी नहीं थी, तब तो मेरा हीमोग्लोबिन ठीक था, या मेरा एस्नोफेलिया ठीक था। तो पहला मूल सवाल यह है कि यह क्यों हुआ? वो कहेंगे, white blood cell जो हैं वो लड़ नहीं पा रहे हैं। यह fungle या कुछ और infection है, इस कारण यह हो रहा है।" अब ये सारी बातें physical लेवल की हैं। स्थूल शरीर की बात है। मगर दो महीने पहले तो ऐसा कुछ नहीं था, फिर अभी ऐसा क्या हो गया? दो महीना पहले भी वही बॉयरस थे। दो महीना पहले भी मैं उसी माहौल में रहता था। पर तब तो मैं ठीक था। तो अभी क्या हो गया? अच्छा, वो उपाय भी यह देंगे कि आप ऐसा कुछ करिए जिससे white blood cell बढ़ जाएँ, खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाए। पर technically वो बात पचती नहीं है। वो सूट नहीं करती। शरीर उसको ले नहीं पाता। आपका शरीर जो है वह एलोपैथी के लिए नहीं बना है। एलोपैथी की तकनीक को हमारा शरीर हँसकर स्वीकार नहीं करता, बल्कि मैं कहना चाहता हूँ कि रोकर स्वीकार करता है। इसलिए मुझे क्षमा करें या सज़ा दें, जो आपकी मर्जी हो, मगर मैं कहना चाहता हूँ कि एलोपैथी मानव शरीर के साथ बलात्कार है जबकि होमियोपैथी मानव के साथ प्रेम लीला या लव अफेयर है, जिसे शरीर प्रेम के साथ सहर्ष स्वीकार करता है। तो इस प्रकार एलोपैथी के परिणाम भले स्थूल शरीर पर असर कर जाएँ मगर मैंने अभी जिन सूक्ष्म शरीरों की बात की है, उन तक पहुँचना नामुमकिन है। जबकि वस्तुतः बीमारी वहीं से स्थूल शरीर में आ रही होती है। वहाँ उस तल पर नहीं जाकर हम हवा में मिस फायर करते हैं, जिससे दुश्मन तो मरता नहीं वरन अपने मित्र तबाह होते हैं। दूसरी बात कि स्थूल शरीर पर जो परिणाम दिखते भी हैं वे स्थाई या टिकाऊ नहीं होते हैं। क्यों, इसकी भी हम चर्चा करेंगे। क्योंकि वस्तुतः यह उपचार है ही नहीं। अच्छा, अब देखिए कि होमियोपैथी में क्या करते हैं। होमियोपैथी में एक आदमी आता है। हम उसके लक्षण पहचानते हैं, हम उसका व्यवहार देखते हैं, उसकी चाल-ढाल देखते हैं, उसके बात करने का तरीका देखते हैं, और हम पता लगाते हैं कि यह बीमारी कैसे शुरू हुई। बचपन से लेकर अभी तक का इतिहास लेते हैं। हम कोई मशीनी जाँच नहीं करते। हम सिर्फ आपका व्यवहार और आपका सिस्टम देखते हैं। जैसे- मान लीजिए आपको बुखार है। तो ऐलोपैथी में आप दुनिया में कहीं भी चले जाइए, बुखार की एक ही दवा है पैरासिटामोल। मगर नहीं, होमियोपैथी में एक दवा नहीं है। किसी को 'बेलाडोना' दिया जा सकता है, किसी को 'हिपर' दिया जा सकता है। इस तरह बुखार के लिए कम से कम पचास दवाएँ हैं, कम से कम पचास potency हैं। और पचास ही क्यों, ज्यादा ही होंगी। हम हर किसी को एक ही दवा नहीं देते बल्कि बुखार के साथ अन्य लक्षणों एवं स्वभाव की विशेषताओं को भी ध्यान में रखकर व्यक्ति विशेष के लिए एक अलग दवा चुनते हैं। और यह दवा पूरे system को ठीक कर देती है। वस्तुतः होमियोपैथी बीमारी का इलाज नहीं करती वरन शरीर के बीमार हो गए system को correct करती है। बल्कि कहना चाहिए कि restore करती है, पूर्व की स्थिति में ले आती है। जो भी गलती और भूल-चूक हो गयी है, गड़बड़ी हो गयी है, उसको पूरी तरह से निकाल देती है। जैसे- कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज़ में आप देखते होंगे कि System Restore का ऑप्शन होता है। यदि विंडोस में कुछ वॉयरस आ गया, प्रोग्राम कुछ गड़बड़ हो गया तो पूर्व की तारीख पर कम्प्यूटर को ले जाकर, जिस समय कंप्यूटर सही था, उस समय पर ले जाकर छोड़ देते हैं और वहाँ से सारा कुछ गायब हो जाता है। मैं कहना चाहता हूँ कि होमियोपैथी की दवाएँ (जैसे एकोनाइट वगैरह) वस्तुतः हमारे शरीर के लिए विंडोज़ रीस्टोर का विकल्प हैं। इससे आपका विंडोज़ correct हो जाएगा और जो भी वॉयरस है वो बाहर आ जाएगा। इसलिए आपने देखा होगा कि होमियोपैथी दवाओं में कभी-कभी aggravation होता है। यानी दवा लेने के बाद बीमारी के लक्षण बढ़ जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि दवा के परिणामस्वरूप बीमारी को भीतर के तलों में संग्रह करने के बजाय शरीर उत्सर्जी मार्गों से बाहर निकाल दिया जाता है। यह ज्यादा बेहतर पद्धति है। जबकि एलोपैथी दवाएँ सप्रेस करती हैं, बीमारी को और भीतर की ओर धकेलती हैं। होमियोपैथी दवा बीमारी को और उसकी पूरी machanism को बाहर निकालने का system है। एक-दो बूँद दवा की एक खुराक, दो खुराक, और अब आप देखेंगे कि बीमारी जड़ से गायब हो गई। कोई रोज़-रोज़ नहीं खाना है, कोई जीवन भर नहीं खाना है, और मज़ा यह है कि परिणाम इसका सबसे बढ़िया है। मगर लोग एलोपैथी में फँसते जा रहे हैं। इसके कारणों पर मैं थोड़ा प्रकाश डालना चाहूँगा, इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि इतनी अच्छी पद्धति होने पर भी क्यों लोगों का होमियोपैथी में विश्वास और रुझान नहीं है।
असल में होमियोपैथी बहुत गूढ़ विज्ञान है और इसे ठीक तरह समझने व अमल में लाने के लिए उच्च कोटि की बुद्धिमत्ता चाहिए होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें एलोपैथी की तरह निश्चित बीमारियों के लिए निश्चित दवाएँ नहीं हैं कि कोई भी उनके नाम याद कर ले और प्रैक्टिस शुरू कर दे। होमियोपैथी में एक निश्चित सिस्टम नहीं है। इसके जो सिद्धांत हैं, वे लचीले हैं और उनको प्रयोग में लाने में स्वविवेक की बड़ी भूमिका होती है। और सबसे बड़ी बात यह कि किसी को भी इस बात का पता नहीं है कि आखिर होमियोपैथी काम कैसे करती है। इसलिए होमियोपैथिक इलाज के लिए आपके पास एक तीक्ष्ण मस्तिष्क, एक विहंगम दृष्टि, होमियोपैथी के विज्ञान की गहरी समझ, रोगों के मूल कारणों तक पहुँचने की क्षमता, पर्याप्त धैर्य, और थोड़ी सी इन्ट्यूटिव नोइंग या अंतःप्रेरणात्मक बोध की क्षमता भी होनी चाहिए। लेकिन ऐसे लोग एक तो वैसे ही कम होते हैं, ऊपर से चूँकि इस काम में पैसा भी अधिक नहीं है इसलिए भी प्रतिभाशाली लोग इससे दूर रहना ही पसंद करते हैं। यही वजह है कि दोयम दर्जे के दिमाग वाले लोग इसमें ज़्यादा लगे हैं और पैथी पर अच्छी व गहरी पकड़ वाले विद्वान डॉक्टर, जिन्हें होमियोपैथी के सिद्धांतों की, दवाओं की, system की पुख्ता जानकारी हो, बहुत कम उपलब्ध हैं। जो हैं भी, तो उन तक आम जन की पहुँच नहीं है। जो अल्पज्ञानी डॉक्टर हैं, वे थोड़ा-थोड़ा फायदा देते हैं। आज यह दवा दी, कल वो दी। महीनों इलाज चलता है मरीज़ का एक Recurring Deposit Account खुल जाता है। हर 10 दिन पर, हर 15 दिन पर। इसमें सेवा भाव कम और उगाही भाव ज्यादा रहता है।
दूसरी बात यह है कि बिना ताम-झाम के आजकल लोगों को किसी भी बात की प्रभावशीलता का यकीन ही नहीं होता। बड़े-बड़े जाँच घर, बड़े बड़े अस्पताल, बड़ी-बड़ी मशीनें, वहाँ जाकर मरीज़ थोड़े से सम्मोहन में पड़ जाते हैं कि अब मैं सही जगह आ गया, अब तो मेरी बीमारी ठीक हो ही जाएगी। उनको लगता है कि इतने बड़े डॉक्टर के इतने बड़े-से चेम्बर के बाहर बैठे हैं चार घंटे से, महीनों पहले नंबर लगाया था, इतनी मोटी फीस दे रहे हैं, तो फायदा तो होना ही चाहिए। दूसरी तरफ एक होमियोपैथिक डॉक्टर बैठा ही रहता है। उसको कोई काम ही नहीं। जब जिस समय चाहो, चले जाओ। एक छोटी-सी बोतल, उसमें कुछ सफेद चीनी की गोलियाँ और उसमें मात्र एक-दो बूँद दवा। मरीज़ को भरोसा ही नहीं होता है कि इससे कुछ फायदा भी होगा।
टेढ़ी उंगली से घी निकालना
इस संदर्भ में मैं अपना अनुभव आपसे शेयर करना चाहता हूँ। इस तरह के किसी मरीज़ को अगर मैं दवा देता हूँ और देखता हूँ कि वह इस पैथी और दवा के प्रति गंभीर नहीं है तो पहले तो मैं उसे जाड़े के दिनों में साईकिल पर तीन बजे सुबह अपने घर रोगों का इतिहास लेने के लिए बुलाता हूँ और उसको पहली बुराक रात के दो बजे का अलार्म लगाकर खाने की सलाह देता हूँ। इससे सोते समय से लेकर रात के 2 बजे तक उसका अचेतन मन दवा की प्रतीक्षा करता है और ग्रहणशील हो जाता है। और मेरे हिसाब से चूँकि होमियो दवा भी रात में ज़्यादा असर करती है (इन बिंदुओं पर आगे विस्तार से चर्चा है), तो इस वजह से पहली जो मौलिक खुराक है वह ज़्यादा असरदार हो जाती है। इसके बाद अगली दवा की खुराक तक मैं उस मरीज़ को 0 पॉवर की सेकलेक की गोलियाँ इस सख्त हिदायत के साथ देता हूँ कि इसमें से चार गोली सुबह उठने के साथ ही कुल्ला करके खाना है, उसके बाद दिन को घड़ी देखकर 11 बजे खाना है, फिर इसी तरह शाम 4 बजे, और आखिर में रात को सोते समय खानी है। और अगर आप हँसें नहीं तो मैं बताना चाहूँगा कि मेरे उस मरीज़ को दवा की पहली, यानी कि मौलिक खुराक से जितना फायदा नहीं होता उतना इन सेकलेक की गोलियों से हो जाता है! वह मरीज एक हफ्ते इन सेकलेक की गोलियों को खाने के बाद आकर कहता है कि बिनोद भाई! आपकी दवा में तो सचमुच का जादू है। उस समय ऊपर से तो मैं काफी सीरियस बना रहता हूँ परन्तु अंदर से मेरे पेट में हँसते-हँसते बल पड़ गए होते हैं। यकीन मानिए कि ऐसे समय में अपनी हँसी पर कंट्रोल करना मेरे लिए सर्वाधिक मुश्किल काम होता है। मगर इसका सीक्रेट भी मैं आपको बता देता हूँ। अगर उस समय आपने हँस दिया या मरीज़ को बता दिया कि यार! ये तो सिर्फ शक्कर की गोलियाँ थीं, तो यकीन जानिए उस मरीज को अगली बार आपकी किसी दवा फायदा नहीं होगा। इसलिए एक कुशल होमियोपैथ वही हो सकता है जो साइकोलॉजी का प्रकांड पंडित हो और जिसे मानव मस्तिष्क पढ़ने तथा उसकी गहराई में जाने की पूरी क्षमता उपलब्ध हो।
तो कृपया अपने किसी मरीज़ पर इस तरह का प्रयोग करते समय इस बात का खास ख्याल रखें और अगली बार जब वो दवा लेने आए तो उससे सबसे पहला प्रश्न यही पूछें कि जो समय पर दवाइयाँ लेने को मैंने कहा था, उसका नियमतः पालन हुआ कि नहीं? और अगर मरीज़ कहता है कि 'डॉक्टर साहब| एक-दो दिन एक-दो खुराक धूल गया,' तो उसको पहले तो खूब डॉट और संभव हो तो यह कहते हुए बाहर कर दें कि 'नहीं, अगर आप दवा समय से नहीं लेंगे तो मैं आपका इलाज नहीं करूँगा।' बेशक पाँच-दस मिनट बाद मुस्कुराकर उसे यह कहते हुए वापस बुला लें कि 'ठीक है, आईन्दा इसका ख्याल रखना।' इसके बाद फिर जो दवा आप देंगे, उसे उसका शरीर और उसका अचेतन मन निश्चित रूप से स्वीकार करेगा। तब यदि दवा कुछ कमज़ोर भी हुई तो भी फायदा अधिक हो सकेगा।
यह दुर्गुण हमें एलोपैथी की दवा के सिस्टम से विरासत में मिला है। दरअसल एलोपैथी ने मनुष्य जाति को रोग मुक्ति के नाम पर दवा खिला-खिला ने कर ड्रग एडिक्ट बना दिया है। लोगों के अचेतन में यह बात प्रवेश कर गई है कि रोज़ दो या तीन टाइम दवा खाए बिना रोगों से मुक्ति संभव ही नहीं है। इसलिए ऐसे मरीज़ से निपटने के लिए हम होमियोपैथी वालों को विशेष रूप से जागरूक होकर दवा देनी होगी। यहीं काम कई डॉक्टर नहीं कर पाते हैं और इसलिए कभी-कभी वे सही दवा देने के बावजूद सफल नहीं हो पाते। तो यहाँ पर मेरा एक लाइटर पार्ट में यह अनुरोध होगा कि अगर कोई सक्षम विज़नरी होमियोपैथ अपने इलाज की फीस मरीज की आर्थिक हैसियत के हिसाब से अधिकतम रखता है तो इससे दवा रोगी के अचेतन में गहरे जा सकती है। क्योंकि एलोपैथी में जिस मरीज ने अपनी बीमारी पर लाखों खर्च किए हैं और तब भी उपचार से कोई फायदा नहीं हुआ, वही मरीज़ जब आपके पास आया और आपने कुछ 100 या 1000 रुपये फीस लेकर उसको दवा दे दी, तो निश्चय ही उसका सचेतन मन दवा के परिणाम के प्रति विधायक नहीं हो पाएगा। ऐसे कुछ लोगों का मैंने इलाज किया है जिन्होंने एलोपैथी में लाखों गँवाकर भी बीमारी दूर नहीं करवाई। तो मैंने उनसे तगड़ी फीस ली और उस फीस का उपयोग धार्मिक एवं पुण्य के सभी कामों में किया। मुझे लगता है कि यह तरीका शायद मरीज़ और डॉक्टर दोनों के हित में है। असली चीज़ परम स्वास्थ्य है, उसके लिए अगर थोड़े-मोड़े इस तरह के कृत्रिम उपाय करने भी पड़े तो उसमें मेरी समझ से कोई हर्ज नहीं है।
तो चलिए, अगले अध्याय में एक नई चर्चा पर चलने से पहले थोड़ा हम लौटकर पीछे की ओर संक्षेप में देख लेते हैं।
हमने शरीर का मतलब जाना। हमने मोटे तौर पर स्वास्थ्य का मतलब जाना। स्वास्थ्य में हमने जाना कि सच्चा स्वास्थ्य क्या होता है। हमने जाना कि स्वास्थ्य के कई लेवल हैं और अंतिम तरह के स्वास्थ्य का मतलब शरीर का शून्य हो जाना है। शून्य हो जाने का अभिप्राय है कि शरीर वीणा के तार की तरह इतना सम्यक हो गया कि अब इस शरीर से प्रेम का और अच्छी-अच्छी चीजों का संगीत निकल सकता है। सामान्यतः सच्चे या पूर्ण स्वास्थ्य का मतलब है कि सभी नैसर्गिक क्रियाएँ सुचारू रूप से काम करती हों, जैसे सुबह उठकर पेट साफ हो जाता हो, समय पर तीन बार खुद व खुद भूख लगे, रात्रि में बिस्तर पर जाते ही हम सो जाएँ, दिन भर काम करते समय शरीर का हमें पता नहीं चले, और हम अपने काम जो भी हों दिन के और रात के, वे कुशलतापूर्वक कर सकें। इसका मतलब है स्वास्थ्य मुश्किल यह है कि आजकल ऐसे स्वास्थ्य की कुल अवधि बहुत कम रह गई है। आज से 100-200 साल पहले का जो मानव था, वह अगर 100 साल जीता था तो उसमें से 90 साल उसके ऐसे ही होते थे। अमूमन आम लोगों के कुछ अपवादों को छोड़कर। पर आज की स्थिति यह है कि यदि हम 60-70 साल जीते हैं तो उसमें से बमुश्किल युवावस्था के कुछ साल, 10 साल, 15 साल, 20 साल तक तो किसी तरह हम स्वस्थ शरीर का मज़ा ले पाते हैं, परन्तु उसके बाद हमारा शरीर बीमारियों के मकड़जाल में फँसता चला जाता है। शुरुआत कहाँ से होती है? शुरुआत होती है पेट साफ न होने से किसी किसी तरह से कुछ-कुछ देशी-विदेशी उपाय करके पेट साफ करने की दवा खाना शुरू कर देते हैं। फिर भी कभी होता है, तो कभी फिर गड़बड़ हो जाता है। उसके बाद भूख पर आघात होता है। ये सब बीमारी के पूर्व लक्षण हैं। हमारा शरीर चलता रहता है पर भूख नहीं लगती। मुझे लगता है कि 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग घड़ी देखकर खाना खाते हैं। बिना पेट की पुकार के। उन्हें पता ही नहीं कि कब भूख लगती है और कब कितना खाना है। बस एक रूटीन है कि दो बज गया,
लंच का समय हो गया, लंच बॉक्स निकालो। उन्हें भूख का भी विस्मरण हो गया है और स्वाद का भी, बस किसी तरह भूख लगने पर कचड़े के डब्बे की तरह कुछ भी पेट में डालकर भूख को मिटा लेते हैं।
पूना के मेरे एक मित्र हैं, उनको भयंकर कब्ज़ रहता था। पेट में अल्सर भी था, जिसके लिए डॉक्टर ने सर्जरी कराने की सलाह दी थी। वे भर्ती होने जा रहे थे। पर मैंने उन्हें थोड़े दिन रुककर मुझे होमियो दवा का प्रयोग करने देने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। मैंने तीन महीने अपने घर से बैठे-बैठे उन्हें दवा सुझाई। सबसे पहले उनकी कब्जियत ठीक हुई। सालों-साल से वह कब्ज के मरीज़ थे, पर तीन महीने में ही उनका पेट एकदम साफ रहने लगा। एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने मुझे आनंदित होकर फोन किया और बोले- “विनोद जी! आज तो चमत्कार हो गया।" उन्होंने बताया कि जो नाश्ता, ब्रेड-ऑमलेट, सालों-साल से खाते आ रहे थे वह कभी इतना स्वादिष्ट नहीं जान पड़ा था जितना उस दिन लग रहा था। बोले, “आज तो लग रहा है जैसे अमृत खा रहा हूँ! ऐसा स्वाद जीवन में कभी नहीं आया।" दरअसल मैंने उन्हें पेट साफ होने की दवा दी थी, जिसके चलते दो तीन दिन से उनका पेट बहुत ही अच्छी तरह साफ हो रहा था। समस्या यही है कि लोगों के पेट साफ होना बंद हो जाते हैं, भूख खत्म हो जाती है, उसके बाद अन्न का स्वाद चला जाता है, और फिर उसके बाद नींद गायब हो जाती है। शरीर के साथ प्रकृति ने हमें ये सारे system वरदान में दिए हैं। आदिमानव को जंगलों में या पहाड़ों पर रहते हुए ऐसी कोई समस्या नहीं थी। तो, यहाँ से रोग की कहानी शुरू होती है और इसके बाद हम रोगों के जाल में फंसते जाते हैं। छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज कराने जाते हैं और बड़ी-बड़ी बीमारियाँ लेकर आते हैं।