आइए, अब हम विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं कि यह एंटी वाइटल फोर्स या किलिंग फोर्स क्या है? पूरे अस्तित्व में बिना विपरीत ताकतों के चीजें संभव ही नहीं हैं। रात के साथ दिन, रोग के साथ स्वास्थ्य, Even Matter के साथ Anti Matter, तथा और भी जितनी चीजें आप देखेंगे सब की सब विपरीत ताकतों के कारण ही संभव हैं। विद्युत ऊर्जा में जब तक Negative Energy न हो, तब तक विद्युत ऊर्जा यानी कि Positive Energy का कुछ नहीं होता। तो अभी यह मान लेते हैं, मेरे अनुरोध पर, कि ये दोनों ऊर्जाएँ हमारे शरीर में समान रूप से प्रभावी रहती हैं। मतलब, हमारे भीतर वाइटल फोर्स यानी कि 'जीवन रक्षक ऊर्जा' भी है और किलिंग फोर्स यानी कि 'मारक ऊर्जा' भी है। ये दोनों जन्म के साथ ही हमें मिलती हैं और एक ही शरीर में साथ-साथ मौजूद रहती हैं। क्यों? क्योंकि मैंने पहले ही आपको बताया कि इस जगत में द्वैत जैसी कोई चीज नहीं है और विपरीत मालूम होने वाली चीजें वस्तुतः एक ही चीज़ के दो सिरे मात्र होते हैं। चलिए, इन दोनों की कुछ चारित्रिक विशेषताएँ में आपको बता देता हूँ :
वाइटल फोर्स बनाम किलिंग फोर्स
1) ये जीवन भर साथ-साथ रहती हैं और स्थूल शरीर की मृत्यु अगले जीवन की शुरुआत में फिर से साथ-साथ पैदा होती और मरती हैं। और आवागमन का यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कि सातों शरीरों का खात्मा नहीं हो जाता। आध्यात्मिक भाषा में इस पूरी के बाद प्रक्रिया को मोक्ष या निर्वाण कहते हैं। निर्वाण शब्द का शाब्दिक अर्थ
दिये का बुझ जाना है। यहाँ दिये से अभिप्राय हमारे स्थूल शरीर और
सूक्ष्म शरीरों की चेतना से है। 2) इनमें से किसी भी फोर्स को किसी तरह से नष्ट नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा हुआ, यानी कि कोई फोर्स नष्ट कर दी गई तो जीवन भी नष्ट हो जाएगा। दोनों एक-दूसरे को सहारा देते रेल की पटरी की तरह जीवन चक्र पूरा होने तक साथ-साथ चलती हैं और परस्पर विपरीत लक्षणों को शरीर में पैदा करने की कोशिश करती हैं। इन दोनों रेल की पटरियों पर हमारे सातों शरीर और जीवन गति करता है। किसी भी एक पटरी में गड़बड़ी से हमारा जीवन प्रभावित होने लगता है, जिसे सामान्य भाषा में या ऐलोपैथी की भाषा में 'रोग' जबकि होमियोपैथी की भाषा में 'असामान्य लक्षण या व्यवहार' कहते हैं। इस गड़बड़ी को होमियोपैथी से ज्यादा कारगर तरीके से ठीक किया जा सकता है। वाइटल फोर्स जहाँ हमारे जन्म के लिए उत्तरदायी है (यानी इसमें किन्हीं कारणों से गड़बड़ी हो तो या तो हम जन्म ही नहीं ले सकते या जन्म से पहले ही हम टूटकर बिखर जाते हैं। कई बार प्रसव से पहले गर्भपात या प्रसव के समय मरा हुआ बच्चा पैदा होना इसी वाइटल फोर्स की गड़बड़ी के कारण होता है।), वहीं किलिंग फोर्स या शिव ऊर्जा बीमारियों एवं मौत की ऊर्जा है और उसे प्रकृति या परमात्मा ने इस तरह डिज़ाइन किया है कि वह हर हाल में जीतेगी ही जीतेगी। इसलिए एक निश्चित अवधि के बाद समय आने पर वह हमें मार ही देती है। उसके मारने के समय को सुलभ रूप से सिर्फ होमियो दबा द्वारा आगे किया जा सकता है।
3) स्वास्थ्य का जो मार्ग है, उसके लिए वाइटल फोर्स जवाबदेह है। यह उसका काम है, उसका विभाग है। जबकि बीमारी का जो मार्ग या विभाग है, वो किलिंग फोर्स का है। यह उसका काम है कि शरीर में बीमारी पैदा करके एक दिन हमारे शरीर को मार दिया जाए। दोनों प्रकृति से बराबर-बराबर ऊर्जा लेकर आती है और इनकी ऊर्जा एक-दूसरे में जोड़ी या घटाई जा सकती है। इनकी कुल ऊर्जा को अगर हम 100 यूनिट मानें तो इसमें से ज्यादा से ज़्यादा यूनिट प्राप्त करने के लिए दोनों जीवन भर आपस में प्रतिस्पर्धा करती रहती हैं। इसलिए अगर एक की ताकत बढ़ती है तो दूसरे की अनिवार्य रूप से घटती है। अलग से, कृत्रिम तरीके से किसी तरह की कोई ऊर्जा के.एफ. या वी.एफ. को देकर उनकी कुल ऊर्जा को 100 से 101 नहीं किया जा सकता। इसी तरह उनकी कुल ऊर्जा को 100 से 99 भी नहीं किया जा सकता। ये दोनों प्रकृति से जो ऊर्जा लेकर आती हैं, उसी के अधिकाधिक हिस्से को पाने के लिए जीवन भर आपस में छीना-झपटी करती रहती हैं। इनके इस व्यवहार एवं विज्ञान के बारे में जानना रोगों के उपचार हेतु सबसे बड़ी ज़रूरत है। और यह भविष्य में मानव स्वास्थ्य विज्ञान का मुख्य विषय बनने वाला है, इसकी मैं अभी पूर्व घोषणा कर रहा हूँ।
4) ये दोनों परस्पर विपरीत अनुपात में रहती हैं। मतलब, शुरू में जब हमारी उम्र कम होती है तब हमारी वाइटल फोर्स बहुत ज्यादा मजबूत और किलिंग फोर्स बहुत कमजोर होती है। यदि 100 प्रतिशत हमारी ऊर्जा है तो बचपन में, शुरू के एक-दो साल में उसका 90 प्रतिशत वाइटल फोर्स होती है और 10 प्रतिशत किलिंग फोर्स।
असल में जीवन का शुरुआती समय वह दौर होता है जब हमारे शरीर, मन और बुद्धि का अधिकतम विकास होना होता है, और चूंकि इस विकास में वी.एफ. की महती भूमिका होती है, इसलिए प्रकृति उसे जीवन के शुरुआती दौर में काफी मजबूत और सक्रिय करके भेजती है। उस समय हमारी के.एफ. चौथे-पाँचवे शरीरों में स्थित अपने मुख्यालयों में बीज रूप में विश्राम करती रहती है और अपनी पैनी नज़र वी.एफ. तथा उसके कार्यकलापों पर रखती है। उस समय यह ज़्यादा आक्रामक नहीं हो पाती क्योंकि उसे पता होता है कि अभी वह वी.एफ. पर विजय प्राप्त नहीं कर पाएगी। और प्रकृति मी ऐसा नहीं चाहती। इसलिए उसने ऐसी कुछ तकनीक हमारे शरीर में रखी हुई है कि जिससे वह बचपन से ही समय-समय पर छोटे-मोटे उत्पात हमारे शरीर में चालू कर देती है, जिसके लिए होमियो की छोटी-मोटी दवाओं का प्रयोग श्रेयस्कर होता है।
लेकिन जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे यह अनुपात बदलने लगता है; मारक ऊर्जा बढ़ने लगती है और रक्षक ऊर्जा घटने लगती है। जब मारक ऊर्जा का प्रतिशत 90 से ऊपर चला जाए तो हम आई.सी.यू. में जाने लायक रोगी हो जाते हैं और उस समय हमारी रक्षक ऊर्जा मात्र 10 प्रतिशत होती है, जिससे साँस भर चल पाती है। मारक ऊर्जा या के. एफ का 100 प्रतिशत होना हमारे जीवन का अंत होना हो जाता है। रक्षक ऊर्जा जब शून्य हो जाए तो मारक ऊर्जा 100 प्रतिशत हो जाती है। हमारे सातों शरीर और जीवन का होना इन्हीं दोनों ऊर्जाओं के विपरीत प्रतिशत के बीच में झूलता रहता है।
अब आप पूछ सकते हैं कि तो फिर छोटे बच्चों की मृत्यु कैसे हो जाती है? बेशक बचपन में हमारी वाइटल फोर्स ज्यादा सक्रिय होती है बनिस्बत किलिंग फोर्स के, मगर कम सक्रिय होते हुए भी किलिंग फोर्स निष्क्रिय नहीं होती। अगर उसको मौका मिले तो जो उसका काम और लक्ष्य ही हैं कि हमको कैसे मृत्यु की ओर ले जाए, तो वो अल्पायु में या असमय एवं आकस्मिक भी हमें मृत्यु दे देती है। इसलिए कभी-कभी आप देखते हैं कि आदमी सोया रहता है, कभी कोई बीमारी नहीं थी, लेकिन अचानक नींद में ही हार्ट अटैक हुआ और वह मर गया।
डॉक्टर से पूछें तो बोलेगा कि हार्ट अटैक हुआ और मर गया। लेकिन पूछता हूँ कि पहले क्यों नहीं हुआ, आज ही क्यों हुआ? इतने दिन से तो कोई बीमारी नहीं थी। तो यह जो किलिंग फोर्स है न, जैसे रेलवे में लिखा होता है कि 'सतर्कता हटी, दुर्घटना घटी', वैसे ही जहाँ भी वाइटल फोर्स थोड़ी कमज़ोर हुई, किसी भी वजह से, वहीं किलिंग फोर्स अपना आधिपत्य जमाकर अपना प्रिंट छोड़ देती है और वस्तुतः हम रोगी या मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
5) किलिंग फोर्स की एक खास खूबी यह है कि यह स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद पोटली के रूप में कुछ उच्च घातक बीमारियों के अणुओं को अगले जन्म के लिए लेकर जा सकती है, जिससे अगले जन्म में मनचाही उम्र में उनका इस्तेमाल हो सकेगा। परंतु वाइटल फोर्स के साथ प्रकृति ने यह सुविधा नहीं दी है। वह कोई extra वाइटल फोर्स अगले जन्म में लेकर नहीं जा सकती। यह जो घातक बीमारियों की पोटली बाँधकर अगले जन्म में ले जाने वाली विशेष योग्यता है किलिंग फोर्स की, उसको आधुनिक भाषा में हम 'आनुवंशिक बीमारियाँ' कहते हैं। यानी किलिंग फोर्स ने हमारे जन्म से पहले ही हमें मारने का फूल प्रूफ इंतजाम करके रखा हुआ है।
माइकल न्यूटन की किताबों Journey of the Soul, Destiny of the Soul तथा Life Between Lives में मैंने कई ऐसे उदाहरण पढ़े हैं कि अगर बंदूक की गोली से किसी की मृत्यु हुई किसी जन्म में, तो अगले जन्म में उसके शरीर के उसी स्थान पर गोली लगने जैसा चिह होगा। माइकल न्यूटन जी ने अपने कई माध्यमों को गहरे अवचेतन में ले जाकर पूर्व जन्म में उनकी मृत्यु के उपरांत होने वाली सारी घटनाओं का सजीव चित्रण इन पुस्तकों में किया है और इस तरह उन्होंने पाया है कि कई बार वहाँ जीवन भर उस व्यक्ति को दर्द भी होगा, जबकि कोई कारण नहीं है उसके शरीर में ऐसा कुछ होने का। यह उसी मारक ऊर्जा या किलिंग फोर्स का कमाल है जो बीमारियों को लेकर अगले जन्म के लिए सफर करती है। हमारे अगले शरीर में यह इन बीमारियों को दूसरे से लेकर पाँचवे शरीर में संग्रह करके रखती है।
डायबिटीज़ भी ऐसी ही एक आनुवंशिक बीमारी है। जैसा कि मैंने बताया कि किलिंग फोर्स का लक्ष्य है पूरे स्थूल शरीर का नाश, चाहे एक बार में हो या क्रमिक रूप से तो जहाँ एक बार में मारने के लिए वह हार्ट अटैक देती है, वहीं क्रमिक रूप से मारने के लिए लीवर, किडनी, या पैनक्रियाज़ को फेल करती है। इनमें से हमारे लिए सबसे अधिक घातक है पैनक्रियाज के फेल होने के बाद डायबिटीज़ के रोगी के रूप में एक घातक एवं कष्टप्रद जीवन जीना। पूरा विश्व आज इस बीमारी से परेशान है। डायबिटीज़ के साथ धीरे-धीरे एक और समस्या हो रही है। पहले जहाँ यह साठ की उम्र के बाद होती थी, वहीं अब स्कूली बच्चों में भी होने लगी है। और यह डायबिटीज जो बीमारी है, के. एफ. की जो संरचना है, उसने अगर एक बार अपने प्रिंट स्थूल शरीर पर दे दिए तो फिर हम जीवन में कभी उससे मुक्त नहीं हो सकते। वह हमको रोज धीरे-धीरे क्रमिक रूप से मौत की तरफ ले जाने लगती है। जैसा कि आपने सुना होगा कि सुकरात को जब कोनियम नाम का विष दिया गया मारने हेतु, तो उन्होंने उस विष के अपने शरीर पर होने वाले क्रमिक प्रभावों तथा क्रमशः करीब आती मृत्यु के लक्षणों का बड़ा ही स्पष्ट वर्णन किया था। उनके मुताबिक, पहले उनके तलवे शून्य हुए, फिर पैर, फिर पिंडलियाँ, फिर घुटने, और फिर इसी तरह एक-एक करके सभी ऊपरी अंग। ऐसे ही जब के. एफ. एक बार चीनी की बीमारी हमारे स्थूल शरीर पर भेज देती है, तो इसी तरह से हम क्रमश: मरने लगते हैं। मुझे ताज्जुब होता है कि पिछले 200-300 सालों में इसके लिए होमियों में नौसोड दवा क्यों नहीं बनाई गई ! यदि ऐसा कर लिया जाए तो इस लाइलाज बीमारी पर भी आसानी से विजय पाई जा सकती है। इस विषय पर कुछ और चर्चा नौसोड अध्याय में और पुस्तक के अंत में करेंगे। 6) वाइटल फोर्स को बढ़ाने के लिए सारी दुनिया में दवाएँ हैं, उपाय हैं,
परंतु चूँकि हमें अभी तक किलिंग फोर्स के अस्तित्व का ही पता नहीं है तो इसलिए इस पर कार्य करने या इस पर कोई प्रभाव छोड़ने का कोई उपाय किसी अन्य पैथी में नहीं है। इसे घटाने के लिए मेरी समझ से अभी तक वर्तमान में सिर्फ होमियोपैथी के पास ही दवाएँ या हथियार हैं। हाँ, भारत के मनीषियों ने इस हेतु कई कारगर उपाय खोजे थे, जिनको इस पुस्तक में मैं कहीं-कहीं संदर्भ के रूप में बताना चाहूँगा। परन्तु वो इस पुस्तक के मुख्य विषय नहीं हैं, इसलिए यदि संयोग बना तो उन पर किसी और किताब के माध्यम से चर्चा करेंगे।
7) उम्र के शुरुआती दौर में Killing Force अंदर के शरीरों में, जहाँ उसका मुख्यालय होता है, वहाँ सोयी-सोयी सी रहती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसकी क्षमता सूक्ष्म शरीरों से होते हुए पूरी ताकत के साथ स्थूल शरीर में प्रकट होती जाती है। हमारे शरीर के या जीवन के अंतिम चरण में या मौत से पहले जहाँ वाइटल फोर्स करीब-करीब शून्य हो जाती है, वहीं किलिंग फोर्स अपनी पूरी क्षमता में प्रकट होती है और अंततः हमारे शरीर का विनाश करके मृत्यु की ओर ले जाती है। यहाँ यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि जब के एफ. तीसरे-चौथे शरीर में अवस्थित होती है तब उसकी मारक ऊर्जा, उसकी तीव्रता कुछ कम होती है। परन्तु स्थूल शरीर तक आते-आते उसकी तीव्रता अधिकतम स्तर पर पहुँच जाती है। इसी तरह से हमारे वी.एफ. का अधिकतम सक्रिय रूप स्थूल शरीर पर होता है और सूक्ष्म शरीरों में इसकी तीव्रता कम हो जाती है। हालांकि ये चीजें इतनी सूक्ष्म हैं कि इनमें स्पष्ट सीमा-रेखा खींचना थोड़ा मुश्किल है। 8) किलिंग फोर्स या मारक ऊर्जाों को किसी भी तरीके से शरीर से बाहर
नहीं किया जा सकता। अगर इसे बाहर कर भी दिया जाता है तो हमारी वाइटल फोर्स भी शून्य हो जाएगी। 9) ये दोनों ऊर्जाए जन्म के साथ हमें मिलती हैं और मृत्युपर्यंत भी मौजूद रहती हैं। जी हाँ, स्थूल शरीर के साथ ये दोनों विदा नहीं होतीं बल्कि
बाकी के छह शरीरों में मौजूद रहती है और जब हम अगला शरीर धारण करते हैं तो पुनः सक्रिय हो उठती हैं। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मृत्यु हैं। से सिर्फ शरीर मरता है, बाकी के छह शरीर बच जाते
10) वैसे तो ये दोनों ऊर्जाएँ पूरे शरीर में मौजूद रहती हैं, परंतु इनके कुछ विशेष corresponding points भी होते हैं, जैसे कि सात शरीरों के सात चक्र। सातों चक्रों पर वाइटल फोर्स के साथ ही किलिंग फोर्स
भी अवस्थित रहती है।
11) यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि के.एफ. की ज़्यादातर ऊर्जा हमारे चौथे शरीर में अवस्थित होती है, जबकि वाइटल फोर्स का बड़ा हिस्सा स्थूल शरीर में सक्रिय होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि के. एफ. अपने सारे लक्षणों को बीमारी के रूप में स्थूल शरीर पर भी प्रकट करता है, इसलिए वाइटल फोर्स की ज्यादा ताकत उससे लड़ने के लिए इसी तल पर चाहिए होती है। हम कह सकते हैं कि के. एफ. का मुख्यालय मुख्य रूप से हमारे चौथे सूक्ष्म शरीर में है, जबकि वाइटल फोर्स का हमारे स्थूल शरीर में यहाँ से दोनों अपनी-अपनी संरचना एवं परिणाम देने में जीवन भर लगे रहते हैं।
लेकिन मेरी समझ से मारक ऊर्जा के दो और केन्द्र भी होते हैं। यानी कुल मिलाकर इसके तीन मुख्यालय होते हैं, शरीर में तीन मुख्य जगहों पर इसका ठिकाना होता है। पहला ठिकाना है हमारा नर्वस सिस्टम। दूसरा है हमारा हृदय और तीसरा है हमारा पेट। ये तीनों इसके corresponding points हुए। यहीं निष्क्रिय अवस्था में रहकर यह मौके की तलाश में रहती है और मौका मिलते ही शरीर को बीमारी देने से नहीं चूकती। नर्वस सिस्टम का मतलब है हमारा मस्तिष्क, हमारा सहस्त्रार चक्र, हमारा सातवां शरीर हृदय का अर्थ है हमारा अनाहत चक्र, हमारा चौथा शरीर। पेट मतलब हमारा नाभि चक्र, हमारा तीसरा शरीर। यहाँ यह flexible होकर हमारे पेट की अंतड़ियों में घूमती रहती है। लोग कहते हैं कि इतनी बड़ी आंत का क्या काम है। वे नहीं जानते कि वहीं से हमारी ऊर्जा का creation होता है। जो अन्न हम खाते हैं, वह वहीं पचता है और वहीं जीवन ऊर्जा बनती है। तो वहाँ भी मारक ऊर्जा छिपी बैठी है, वहाँ भी यह मौके की तलाश में होती
11) वाइटल फोर्स जहाँ पुलिस के रूप में कार्य करती है, वहीं किलिंग फोर्स चोर के रूप में। इसने भी अपना एक बहुत उच्च तकनीक का सिस्टम और संरचना का जाल बनाया हुआ है, जिसे वह समय के साथ रोज़-रोज़ उन्नत करती जाती है। छोटी बीमारियों को बड़ी बीमारियों में विकसित होने का मौका देने में इसकी सेना लगातार छिपकर काम करती रहती है। हम जानते हैं कि जब हमारे शरीर में जीवाणुओं या विषाणुओं का हमला होता है तो श्वेत रक्त कणिकाएँ, यानी कि व्हाईट ब्लैड सेल्स उन्हें घेर लेती हैं और उन्हें मारकर शरीर को उनसे मुक्त करने की कोशिश करती हैं। ये श्वेत रक्त कणिकाएँ वाइटल फोर्स के सैनिक हैं जबकि जीवाणु एवं विषाणु किलिंग फोर्स की गैंग के चोर, और यह चोर सिपाही का खेल इनके बीच जीवन भर चलता रहता है। यह जो किलिंग फोर्स है यह इतनी ज़्यादा चालाक है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते। मुश्किल यह है कि अभी तक हमने किलिंग फोर्स को जाना ही नहीं है, तो उसके प्रभावों को कम करने का उपाय कैसे खोजा जाएगा। मगर अब अगर विश्व जनमानस उसके अस्तित्व को स्वीकार कर ले तो उसके शमन हेतु व्यापक उपाय भी किए जा सकते हैं। पुस्तक के अंतिम हिस्सों में इस तरह के कुछ उपाय देने की चेष्टा की है।
12) इन दोनों विपरीत ऊर्जाओं की एक विशेषता यह होती है कि ये आपस में तो खूब लड़ लेती हैं, लेकिन कोई तीसरा यदि इन्हें परेशान करे तो ये एक होकर उसका मुकाबला करती हैं और ऐसे वक्त में मारक ऊर्जा अपनी पूरी क्षमता रक्षक ऊर्जा को दे देती है। यह बड़ी अद्भुत बात है जो मैंने अनुभव से जानी है कि आपात स्थिति में शरीर की ये दोनों ऊर्जाएँ संयुक्त हो जाती है। आपने भी अनुभव किया होगा कि अगर आपके पीछे कोई पागल कुत्ता पड़ जाए तो अचानक आप इतनी तेज़ भागने लगते हैं कि अगर ओलंपिक में दौड़ें तो मैडल पा जाएँ। उस समय अचानक से इतनी तेजी, इतनी ऊर्जा कहाँ से आ जाती है आपके शरीर में? यह दोनों ऊर्जाओं के संयुक्त होने, मारक ऊर्जा के रक्षक ऊर्जा में बदलने का ही परिणाम होता है। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जब वाइटल फोर्स ऐसे आपात क्षणों में पूरी तरह चुक जाता है, जैसे शेर पीछे पड़ा है और हम दौड़ रहे हैं, तो ऐसे में वाइटल फोर्स के पूरी तरह चुकने के बाद किलिंग फोर्स पूरी तरह इससे संयुक्त हो जाती है और तभी हम ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ देते हैं। सामान्यतः दौड़ने या व्यायाम करने से भी किलिंग फोर्स वाइटल फोर्स को अपनी कुछ ऊर्जा देती है, पर वह अधिकतम नहीं होती। योग, प्राणायाम तथा मुद्रा चिकित्सा जैसी कुछ विधियाँ भी किलिंग फोर्स को सीधे न्यूनतम करके वाइटल फोर्स को बढ़ाती हैं। वस्तुतः इन प्रक्रियाओं से पूरब के मनीषियों ने बिना किसी बाहरी मदद के प्राकृतिक तरीके से ही किलिंग फोर्स को नियंत्रण में रखने की विधि खोजी थी। इसलिए सारी दुनिया में परिश्रम या व्यायाम या खेल-कूद को इतना ज़रूरी माना गया है। जब शरीर विषम परिस्थिति में होता है, दौड़ रहा होता है, कुछ वजन उठा रहा होता है, तो उस स्थिति में हमारी किलिंग फोर्स अपनी killer instinct या अपना राक्षसी रूप छोड़कर दैवीय रूप में परिवर्तित हो जाती है और वाइटल फोर्स से संयुक्त होकर काम करने लगती है। इसलिए दौड़ से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ होता है।
ऐसा क्यों होता है? वस्तुतः मारक ऊर्जा अपने जैसी किसी अन्य बाहरी ताकत को शरीर को मारने का श्रेय नहीं देना चाहती। वह काम यह अपने लिए सुरक्षित रखती है। उसे यह बर्दाश्त नहीं है कि प्रकृति ने जिस काम के लिए इसे बनाया है, उसका श्रेय कोई और ले जाए। इसीलिए ऐसे समय में वह रक्षक ऊर्जा से संयुक्त हो जाती है। यह इसका एक विशिष्ट गुण है। 13) मानव शरीर में किलिंग फोर्स और वाइटल फोर्स को किसी भी तरह से खोजा जाए तो मैं नहीं समझता कि वैज्ञानिक उपकरणों से उनको पाया। जा सकता है या सिद्ध किया जा सकता है। अभी तो जो एक शरीर के भीतर सात शरीर हैं, वैज्ञानिक रूप से उन्हीं की खोज नहीं की जा सकी है, तो यह तो उससे और गहरी बात है। मगर यह जो किलिंग फोर्स है, यह हमारे चौथे शरीर में अवस्थित रहती है। इससे और भीतर के शरीरों में, कुछ विशेष अपवादों जैसे माइग्रेन एवं इसी तरह की अन्य बीमारियों के मामलों को छोड़कर, मेरी समझ से उसका प्रवेश नहीं है।
14) किलिंग फोर्स की एक और विस्मयकारी बात जान लें, जिससे सम्पूर्ण विश्व अभी तक अंजान है। जैसा कि मैंने बताया, हमें जन्म से लेकर मृत्यु तक जो भी बीमारियाँ होती हैं, यह के एफ, उन सभी के ब्लू । प्रिंट स्थूल शरीर के साथ-साथ सभी सूक्ष्म शरीरों में भी रखती है। इसलिए सूक्ष्म शरीरों को ठीक किए बगैर स्थूल शरीर से वे बीमारियाँ कभी विदा नहीं होंगी। यह तो ऐसा ही है कि बीमारी रूपी किसी पेड़ की एक शाखा को काट दिया जाए तो वहाँ पर ठीक वैसी ही शाखा तो पेड़ नहीं बनाता परन्तु वहाँ पर दूसरी टहनियाँ अवश्य उग आती हैं। ऐलोपैथी में बीमारियों का शमन नहीं होता बल्कि बीमारियों का रूपांतरण होता रहता है। और सबसे मजे की बात आप जान लें कि किसी भी बीमारी में, जैसे आपको निमोनिया हो गया और आपने किसी प्रकार से स्थूल शरीर से इसके लक्षणों को शांत कर दिया, तो इससे के.एफ. बहुत आनंदित होता है। क्योंकि शेष चार सूक्ष्म शरीरों में मौजूद निमोनिया उसके लिए एक कमांडो फोर्स या एक बड़े पुल या एक उत्प्रेरक या कैटेलिस्ट का काम करेगा और वो भविष्य में इसको और बड़ी बीमारी के रूप में परिवर्तित कर देगा। मान लें कि अगली बार आपको टाइफाइड हुआ, तो उस टाइफाइड में उस पहले वाली निमोनिया नामक बीमारी के मारक तत्व भी छिपे रहेंगे। इस तरह से अगर छोटी-मोटी बीमारियों का भी जड़ समेत नाश न हो तो ये छोटी-मोटी बीमारियां अंततः एक बड़ी बीमारी के रूप में उभरकर आपकी मृत्यु का कारण बन जाएँगी। बचपन में जो बुखार आपको एक सामान्य बीमारी लगता था और उस समय बिना किसी दवा के या वैद्य जी की एक जड़ी बूटी से ठीक हो जाता था, वही बुखार अगर 70 साल की उम्र में आपको पकड़ ले तो हो सकता है कि वह आपको मृत्यु के दरवाज़े पर ले जाकर खड़ा कर दे। क्योंकि अब यह सामान्य बुखार नहीं होगा बल्कि इसमें जन्म से लेकर अभी तक की सभी बीमारियों के घातक वॉयरस सूक्ष्म रूप से मौजूद होंगे। क्यों होंगे? क्योंकि उन सभी बीमारियों के वॉयरसों को सभी सूक्ष्म शरीरों से नहीं निकाला जा सका था। तो इस प्रकार यह किलिंग फोर्स छोटी-मोटी बीमारियाँ ही इस तरह से देती है कि भविष्य में उन संरचनाओं को एक साथ जोड़कर सम्मिलित रूप से आपकी जान लेने में इस्तेमाल कर सके।
दूसरी तरफ जब हम होमियो दवा से किसी बीमारी का इलाज करते हैं तो वह दवा स्थूल शरीर सहित सभी सूक्ष्म शरीरों से बीमारियों का नाश कर देती है। तो अगली बार अगर आपको घातक से घातक बीमारी भी हो गई, तब भी के.एफ. उसके माध्यम से आपका ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी क्योंकि उसमें पुरानी बीमारियों के वॉयरस रूपी वूस्टर नहीं होंगे। इसलिए अगर हमें कभी कोई बीमारी हो तो सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिहाज़ से उपचार के लिए सर्वाधिक उपयुक्त पैथी वही होगी जो स्थूल शरीर सहित सूक्ष्म शरीर के भी सारे रोगों के लक्षणों का शमन कर दे। और मैं आपको बता दूँ कि विश्व में अभी तक ज्ञात सर्वाधिक सस्ती और सुलभ विधियों में एक मात्र होमियोपैथी ही ऐसी विधि है जो ऐसा कर सकती है। अभी तक इसने इसको अंजाने में किया है, परन्तु इस पुस्तक के माध्यम से होमियोपैथी रहस्य के उद्घाटित होने के बाद वैज्ञानिक रूप से सारी तकनीक को समझते हुए इस तरह का सम्पूर्ण स्वास्थ्य हम होमियोपैथी से प्राप्त कर सकते हैं। यह कैसे होगा या होमियोपैथी और इसकी दवाएँ ऐसा कैसे करती हैं, इसके विज्ञान को हम अगले अध्याय में समझने की कोशिश करेंगे।
होमियोपैथी में हम मरीजों के लक्षणों का विवरण लेते समय जन्म से लेकर अब तक हुए, यहाँ तक कि उनके माता-पिता व पूर्वजों को हुए तमाम रोगों के लक्षणों का जो इतिहास लेते हैं वह इसीलिए लेते हैं। मुझे पता नहीं कि महान हैनीमैन साहब को के. एफ. की इन वैज्ञानिक क्षमताओं का आभास था या नहीं था। उनकी दृष्टि में क्या था, यह मुझे नहीं पता। मगर कहीं न कहीं सचेतन या अचेतन रूप से उन्हें इस के.एफ. की संरचना का ज़रूर ज्ञान रहा होगा, तभी उन्होंने सैकड़ों साल पहले रोगों के इलाज के क्रम में हमारे माता-पिता तक के रोगों का अध्ययन भी सम्मिलित करवाया था।
और मैं आपको बताता हूँ, तथा ऐसा आप सभी का भी अनुभव होगा कि जैसे किसी को बचपन में चेचक या मलेरिया या कोई बड़ी बीमारी हुई थी और वो उस समय ऐलोपैथी के उपचार से ठीक जैसी हो गई थी (ठीक तो मैं नहीं कह सकता, क्योंकि उसके बीजाणु और जीवाणु सूक्ष्म शरीरों में तो रह ही गए थे) तो अगर उन मरीजों को यह मानकर कि वह बीमारी अभी भी उनके शरीर में मौजूद है, मैं उन बीमारियों की नीसोड देता हूँ तो रोगी का शरीर उस दवा के प्रत्युत्तर में सूचना देता है। वह सूचना दस्त, सर्दी-जुकाम, बुखार इत्यादि के रूप में स्थूल शरीर पर प्रकट होती है और मैंने उपचारित लोगों से फीडबैक लेकर जाना है कि ऐसा होने पर उनका शरीर निर्भार और अधि कितम स्वस्थ महसूस करता है। यह ऐसा स्वास्थ्य होता है जिसका उस मरीज़ ने अपने पूरे जीवन में अनुभव नहीं किया होता। यह पूरी प्रक्रिया होमियोपैथी और होमियो दवा कैसे सम्पादित करती है, इसके अंदर झाँकने की हम अगले अध्यायों में कोशिश करेंगे।
किलिंग फोर्स की कार्यप्रणाली
किलिंग फोर्स चौथे शरीर से पहले के शरीरों में रोगों का जो सम्प्रेषण करती है, उसका एक सिस्टम है। चौथे शरीर से जब कोई रोग चलता है तो यह एकदम बीज रूप में, एकदम सूक्ष्म रूप होता है। उसको कितना सूक्ष्म कहा जाए, मुझे नहीं मालूम। चौथे शरीर से जब तीसरे शरीर में आता है तब तक थोड़ा और बड़ा हो जाता है, और स्थूल शरीर तक आते-आते तो कई बार पूरी ताकत से शरीर में बीमारी पैदा कर देता है। तो ऐसा समझे कि अगर आज हमें कैंसर हुआ है तो हो सकता है कि मारक ऊर्जा ने छह महीने पहले ही इसे चौथे शरीर में बीज रूप में तैयार करके नीचे के शरीरों की ओर भेजना शुरू कर दिया हो और वह अब जाकर स्थूल शरीर में पहुँचा हो; उसे बीज से वृक्ष बनने में छह महीने का समय लगा हो। यह मैं कोई काल्पनिक बात नहीं कर रहा हूँ। अब जो ऑरा फोटोग्राफी होने लगी है उससे इस बात की पुष्टि हुई है कि कोई भी बीमारी स्थूल शरीर में प्रकट होने से लगभग छह महीने पहले सूक्ष्म शरीरों में आ जाती है। सूक्ष्म शरीरों के ज्ञान एवं ऑरा फोटोग्राफी तकनीक की मदद से कैंसर समेत तमाम बड़ी बीमारियों के होने की समय रहते भविष्यवाणी की जा सकती है और होमियोपैथी के नोसोड तथा कुछ खास दवाएँ उस कैंसर को बीज रूप में ही मार सकती हैं, जो कि स्थूल शरीर में कैंसर का प्रभाव आ जाने के बाद संभव नहीं है। महान हैनीमैन ने इसे 'मियाज्म में परिवर्तन' का नाम दिया था। इसके विज्ञान को हम आगे समझने की कोशिश करेंगे।
तो एक तो मारक ऊर्जा भीतर से बीमारी पैदा करती है, दूसरा उसका शरीर में जो सिस्टम है, mechanism है, वह बाहर की बीमारियों के लिए शरीर को खुला रखता है, शरीर को उत्सुक और ग्रहणशील बनाता है, इस योग्य करता है कि उसमें जितनी ज्यादा बीमारियाँ लाई जा सकें उतना अच्छा। जैसे वॉयरल डिसीज़। आप कहते हैं न कि किसी को सर्दी हुई तो उसके संपर्क में आने से हमें भी सर्दी लग गई, या किसी को डेंगू हुआ तो उसके संपर्क में आने से हमें भी डेंगू हो गया तो यह जो वॉयरस और वॉयरल को फैलाने का काम है, यह वाइटल फोर्स नहीं करती है, कर ही नहीं सकती है, यह इसका विभाग ही नहीं है। यह काम करती है किलिंग फोर्स। वही बाहर से बीमारियों को बुलाती है। मान लीजिए कि घाव हो गया, चीरा लग गया, उंगली कट गयी। अब यदि आप इसे ऐसे ही छोड़ दें तो बाहर की जितनी भी नकारात्मक ऊर्जाएँ है, किलिंग फोर्स उनको भी धाव पर खींचेगी। साथ ही भीतर से इसके पास जो नकारात्मकता है या बीमारी है, उसे भी खींचके वहीं भेज देगी और घाव को और बड़ा बना देगी, ताकि उसका अंतिम लक्ष्य पूरा हो सके, ताकि ऐसी कोशिश हो कि वो अंग काटना पड़े। काटना पड़ता है कभी-कभी। किलिंग फोर्स शरीर में कमज़ोर हिस्सों को ढूँढती है। और यदि कुछ भी न मिले तो अंत में उन जगहों को निशाना बनाती है जो स्थूल शरीर में " इसके मुख्यालय हैं, मतलब - मस्तिष्क में कपाल के पास स्थित नर्वस सिस्टम, हृदय, तथा पेट की आँतों में तो अंत में किलिंग फोर्स एक दिन आपका हृदय धड़काना बंद कर देगी, ब्रेन हैमरेज हो जाएगा, पूरे शरीर को लकवा मार जाएगा, या पेट में कोई आनुवंशिक बीमारी हो जाएगी। यह ब्रह्मास्त्र है उसका। हालाँकि इन तीनों जगहों पर वाइटल फोर्स ने भी अपनी सेना की एक-एक टुकड़ी तैनात करके रखी है, क्योंकि उसे भी पता है कि ये हमारे शरीर रूपी देश के तीन सबसे बड़े महानगर हैं और इनको हर हाल में सुरक्षित रखना है। ये हमारे दिल्ली, मुंबई और चेन्नई हैं। ये तीन शहर हमारे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, अगर ये नष्ट हो जाएँगे तो भारत नष्ट हो जाएगा। लेकिन फिर भी आप देखते हैं कि हार्ट अटैक होता है। वाइटल फोर्स की सेना तैनात रहते हुए भी किलिंग फोर्स अपना काम दिखा देती है। हालाँकि अगर आप 5-10 सेकेण्ड भी सर्वाइव कर गए तो वाइटल फोर्स फिर से छाती पर कब्ज़ा कर लेती है और आपकी जान बचा लेती है। इस तरह सामान्यतः दो-तीन हार्ट अटैक वाइटल फोर्स के कारण बच जाते हैं। लेकिन तीसरी-चौथी बार में किलिंग फोर्स पूरी ताकत से प्रभावी हमला करती है और तब वाइटल फोर्स भी हमारे जीवन को बचा नहीं पाती है। पहले हार्ट अटैक से जान लेने में नाकाम रहने के बाद किलिंग फोर्स को भी पता होता है कि उसने जो विध्वंसक ताकत हार्ट में भेजी थी, उस पर वाइटल फोर्स की सृजनात्मक शक्ति हावी हो गई और उसने उसके वार को निष्क्रिय कर दिया। तो दूसरा जो हार्ट अटैक होता है, वह पहले से ज्यादा प्रभावकारी होता है। डॉक्टर बोलते हैं (मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ, लेकिन डॉक्टरों के संसर्ग में रहा हूँ) कि दूसरे हार्ट अटैक में बच पाना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो अब किलिंग फोर्स दुगनी ताकत से हमला करती है, और दूसरी तरफ वाइटल फोर्स रूपी पुलिस के हौसले पहले बार से पस्त हो गए रहते हैं। तो दूसरे वार में भी वाइटल फोर्स बचाने की कोशिश तो करती है, मगर पहले की तरह ताकत नहीं लगा पाती है। इसलिए कई बार दूसरे हार्ट अटैक में लोग मारे जाते हैं। हालांकि कभी-कभी वाइटल फोर्स बचा भी लेती है। दुश्मन की सेना कुछ थोड़ा-सा नुकसान करके भाग जाती है, हमारा स्वास्थ्य रूपी धन लेकर भाग जाती है,
कुछ रोग देकर चली जाती है। मगर तीसरी बार तो वो इतनी ताकत से हमला करती है कि बच पाना नामुमकिन जैसा होता है। इसलिए कहते हैं कि तीसरे से चौथा हार्ट अटैक नहीं होता।
मोटे तौर पर यहाँ यह बात और नोट करें कि परम स्वास्थ्य हमें तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक हम अपने पूर्वजों द्वारा सम्प्रेषित की गई बीमारियों एवं बचपन से अभी तक के.एफ. द्वारा उत्पन्न सारी बीमारियों के पेड़ को उसकी जड़ एवं शाखाओं सहित उखाड़कर नदी में प्रवाहित नहीं कर देते, यानी जब तक उन सभी बीमारियों को उनके तमाम लक्षणों सहित स्थूल शरीर एवं सभी सूक्ष्म शरीरों से नष्ट नहीं कर देते, किसी टॉप क्वॉलिटी के वॉयरस स्कैनर से स्कैन कर के बाहर निकाल नहीं निकाल देते।
वस्तुतः मेरे देखे रोग और उपचार जैसी कोई चीज़ नहीं है। हम यह कह सकते हैं कि के. एफ. ने कुछ वॉयरस हमारे माता-पिता और हम में डाल रखे थे, जिनके कारण हमारे शरीर को कुछ कष्ट हो रहा था। तो रोगोपचार की भाषा में न सोचकर अगर हम वॉयरस स्कैन की दिशा में सोचें तो यह ज्यादा सटीक होगा। इसलिए होमियोपैथी रोगों का उपचार नहीं करती वरन शरीर का 'करेक्शन' करती है। 'करेक्शन' शब्द मुझे ज्यादा श्रेयस्कर लगता है। एक कुशल होमियोपैथ ऐसा कुछ चमत्कार कर सकता है।
यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है। जब भी होमियो दवाएँ किलिंग फोर्स पर वार करके रोगों की संरचना को तबाह करती हैं, वैसे ही तत्काल वाइटल फोर्स अपना काम शुरू कर देती है, टेक ओवर कर लेती है। यह मामला कुछ ऐसा ही है कि जैसे आपके मकान पर किसी ने कब्जा कर लिया हो और स्पेशल कमांडो फोर्स (होमियोपैथिक दवा) आकर उसको खाली करवा दे। फिर आप आराम से अपने घर में रह सकते हैं।
ॐ शनिदेवाये नमः
आइए, अब चर्चा को और थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। पहले थोड़ी-सी बात शनि देवता की, जो हमारे यहाँ एक विघ्न कारक ग्रह माने जाते हैं। उनकी पूजा, उनकी प्रार्थना पहले करते हैं। शुभ देवता या कहें कि अच्छे लोग तो हमारे मित्र हैं ही, इसलिए बुद्धिमान लोग शुभ कार्य से पहले विघ्न डालने वालों की चिंता ज़्यादा करते हैं। दूसरी बात यह कि बुरे से बुरे आदमी में भी कुछ अच्छाई होती है, इसलिए पूर्व के देशों में ऐसी परंपरा रही है कि शत्रुओं का भी सम्मान हो, उनकी भी पूजा हो, ताकि बेवजह हमें परेशानी का सामना न करना पड़े। तो यह जो किलिंग फोर्स है, यह भी शनि देवता की तरह है। तो आइए, इस शनि देवता के बारे में कुछ और रहस्य अनावृत किए जाएँ।
1) जैसा कि मैंने आपको बताया, किलिंग फोर्स हमारे सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर में अपने पूरे सिस्टम के साथ विद्यमान है। इस सिस्टम के माध्यम से यह हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करके हमें ऐसी प्रेरणाएँ देती है, खान-पान से लेकर आचार-विचार एवं जीने के ढंग तक हर मामले में, जिनसे रोगों के अधिकाधिक लक्षण हमारे शरीर में प्रकट हो सकें। मिसाल के लिए, बच्चों में शुरुआती दौर में मीठा खाने की इच्छा और हम सबमें आलस्य, प्रमाद, अतिनिद्रा एवं आरामतलबी इत्यादि की प्रेरणा मी K.F. ही पैदा करती है। मधुमेह के रोगियों के मन में मीठा खाने की इच्छा यह K.F. ही पैदा करती है, V.F. का बस चले तो उन्हें मीठे को हाथ भी न लगाने दे।
2) मैंने एक बार Discovery चैनल पर देखा था कि एक कोई वॉयरस जो किसी एक प्राणी में रहता है, उस वॉयरस के प्रति आकर्षित होकर कोई दूसरा प्राणी उसके पास पहुँच जाता है और उसका शिकार बन जाता है। इस तरह से K.F. का पूरा सिस्टम बाहर प्रकृति में भी विद्यमान है।
जो संक्रामक बीमारियाँ हैं, वे इसी तरह फैलती हैं। एक शरीर में मौजूद किलिंग फोर्स का सिस्टम दूसरे शरीरों एवं दूसरे प्राणियों को भी बीमार करना चाहता है। तो जहाँ एक शरीर का सिस्टम अपने भीतर से किलिंग फोर्स को वातावरण में बाहर निकालता रहता है, वहीं दूसरे शरीर, दूसरे प्राणी का के एफ. उसको अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। इसी को हम संक्रामक या छुआ-छूत की बीमारी बोलते हैं। किलिंग फोर्स सूक्ष्म शरीरों में मौजूद मिसाइल्स को समय-समय पर दाग-दागकर न केवल हमारे स्थूल शरीर में बीमारियों के लक्षण पैदा करती है वरन हमारे शरीर के माध्यम से आसपास मौजूद सारे जीवों को रोगी बनाने की कोशिश भी करती रहती है। इसी कारण हमारे छींकने या खाँसने या हमारे शरीर द्वारा उत्सर्जित किए गए सारे अवयवों में किलिंग फोर्स के मिसाइल्स विद्यमान रहते हैं। वस्तुतः इस प्रक्रिया में हमारी वाइटल फोर्स भी किलिंग फोर्स की सहायता करती है, ताकि शरीर को किलिंग फोर्स और उसके हथियारों से मुक्त किया जा सके। इसी से मनुष्यों से मनुष्यों, जानवरों से जानवरों, या पशु-पक्षियों से मनुष्यों में रोगों का संचरण चालू रह पाता है। स्वाईन फ्लू, बर्ड्स फ्लू, इनसेफलाइटिस, एचआईवी एड्स, हैपेटाइटिस इत्यादि प्रकार के जो संक्रामक रोग हैं वे किलिंग फोर्स के इसी सिस्टम के कारण होते हैं। एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान ने इसके लिए विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगों के टीकों की ईजाद की। तो इसका फायदा यह हुआ कि हैजा या मलेरिया जैसे सिस्टमों का प्रभाव तो उस व्यक्ति के शरीर पर नहीं आया, हैजा या मलेरिया तो उसको नहीं हुआ, परन्तु संक्रमण के चलते किलिंग फोर्स का आदान-प्रदान तो हो गया, बीमार व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में हैजा या मलेरिया उत्पन्न करने वाले किलिंग फोर्स के कारण तो प्रविष्ट हो ही गए। अब हैजा या मलेरिया छोड़के उस फोर्स ने हमारे शरीर में और जटिल बीमारियों के लक्षण पैदा कर दिए। परिणामस्वरूप पुराने समय की बीमारियाँ, महामारियाँ तो विदा हो गई परन्तु किलिंग फोर्स की वह नकारात्मक ऊर्जा जो हमारे शरीर में विद्यमान रही, उसने सारी मानव जाति को और जटिल रोगों में उलझा दिया। मेरा बस चले तो में टीकों का प्रयोग बंद कराकर नौसोड के प्रयोग को अनिवार्य कर दूं। उपचार का सही तरीका यही है कि किसी तकनीक या दवा की मदद से शरीर में मौजूद किलिंग फोर्स की उन ताकतों को शरीर A में ही शांत कर दिया जाए। इससे शरीर A भी सुखी हो जाएगा और शरीर B में भी किलिंग फोर्स के उस प्रभाव को जाने से बचाया जा सकता है। अंगूर शरीर में वह खत्म हो जाए तो शरीर B में जाने का उपाय ही नहीं है। नोसोड यही काम करती हैं। इसीलिए महान हैनीमैन ने मियाज्य की कल्पना की थी। सिफलेटिक मियाज़्म इन्हीं संक्रमणों के विज्ञान पर अचेतन रूप से आधारित था। पर इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
3) जैसा कि मैंने आपको बताया कि किलिंग फोर्स और वाइटल फोर्स का खेल दिन और रात की तरह जीवन भर चलता रहता है। और यदि आप विहंगम दृष्टि से देखेंगे तो पाएँगे कि पूरी सृष्टि में यही खेल चल रहा है। जो चीज़ बनी है, उसका अंत निश्चित है। (परमात्म शक्ति को छोड़कर।) बड़े-बड़े ग्रह-उपग्रह तक समय के साथ नष्ट हो जाते हैं। प्रकृति ने सिस्टम ही ऐसा बनाया है। एक बार मैं नेपाल के जंगलों में गया था। वहाँ मुझे कुछ जंगली पेड़ दिखे। यूँ तो मुझे वनस्पति विज्ञान का कुछ भी पता नहीं है, मगर एक विलक्षणता ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने देखा कि उन ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के साथ जड़ से लेकर शाखाओं तक अमर बेल की तरह एक जंगली बेल लिपटी हुई थी। मैंने गाईड से पूछा कि यह क्या चीज़ है? उसने बताया कि यह एक जंगली बेल है और इसकी खासियत यह है कि एक निश्चित समय के बाद, 50 साल, 70 साल, 100 साल के बाद यह बेल पूरे पेड़ को सुखा देती है। मजे की बात है कि यह पेड़ के साथ ही बढ़ती है, उसी की जड़ों से ऊर्जा लेती है, और आखिर में उसी पेड़ को सुखा देती है। प्रकृति की इस अद्भुत माया पर मैं बहुत हैरान हुआ। मगर फिर मुझे समझ में आया कि यह खेल तो हर जगह जारी है, हमारे अपने शरीरों में भी। बीमारियों का जो उद्गम है वह हमारी जननेन्द्रिय है, जहाँ से हमारा जन्म होता है। पुराने जमाने में ज्यादातर बीमारियाँ जननेन्द्रिय से ही संबंधित होती थीं। इसीलिए हैनीमैन ने जो सबसे पहला मियाज्म दिया, वह Syphilitic मियाज्म था। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहाँ से हम जन्म लेते हैं, जो हमारे जन्म का बिंदु है, वहीं से हमारे मरने की भी प्रक्रिया शुरू होती है। ऋषियों का विज्ञान, जिसे अध्यात्म विज्ञान कहा जाता है, यह कहता है कि संसार में अधिकतर लोगों के प्राण निचले तलों से, यानी कि मल द्वार से या जननेन्द्रिय से निकलते हैं। इसलिए आपने देखा होगा कि मरने के बाद अधिकांश लोगों के कपड़े खराब हो जाते हैं या पेशाब से खून निकल जाता है। यह बात हर चीज़ पर लागू होती दिखती है। किसी भी फल को यदि अपने आप पकने और फिर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए तो आप देखेंगे कि वह डंठल की तरफ से, जहाँ से उसका जन्म हुआ था, वहीं से सड़ना शुरू होता है। तो शुरुआती दौर में जननेन्द्रिय से उत्पन्न होने वाले रोग ही होते थे और उन्हीं से लोगों की जान चली जाती थी। किलिंग फोर्स की ऊर्जा उसी से अपना काम कर लेती थी। मगर हमने क्या किया कि एलोपैथी के माध्यम से उन बीमारियों को गहरे तलों में दबाना शुरू कर दिया, भाप को बाहर निकालने की बजाए ढक्कन पर पत्थर रखना शुरू कर दिया, चोर को पकड़ने या मारने की बजाए चौकीदार के पीछे ही डंडा लेकर पड़ना शुरू कर दिया, जिसका परिणाम यह निकला कि किलिंग फोर्स ने ऐसी-ऐसी भयानक बीमारियों ईजाद कर लीं जिनके आगे मेडिकल साइंस निहत्या हो गया। होमियो दवा इसलिए कई बार बीमारी के लक्षणों को और बढ़ा देती है, क्योंकि शरीर के उन गहरे तलों से के.एफ. के दुष्प्रभावों को निकाले बिना हमारा शरीर कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता। होमियो दवा को वाइटल फोर्स रूपी चौकीदार से कोई सरोकार नहीं है, वो तो के.एफ. के वॉयरसों और उसकी संरचनाओं को, जो कि रोगों के मुख्य कारण हैं, खोज-खोजकर स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों से बाहर निकाल देती है। चूंकि के. एफ. के वॉयरस और उसकी। संरचनाएँ पेट की आंतों में भी छुपी रहती हैं, तो होमियो दवा जब उन पर वार करती है तो हमें दस्त होते हैं। इससे मुझे समझ में आ जाता है कि होमियो दवा ने पक्का काम कर दिया। एलोपैथी से हम दो सौ, तीन सौ सालों तक जो उपचार करते रहे उससे किलिंग फोर्स और उसके सिस्टम को छू भी नहीं पाए। हम बस वाइटल फोर्स पर काम करते रहे, anubiotic से व्हाईट सेल्स को बढ़ाते रहे, हीमोग्लोबिन बढ़ाते रहे। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि दुश्मन तो और उदंड हो गया। दुश्मन, यानी कि किलिंग फोर्स पर डायरेक्ट अटैक का कोई
सिस्टम हम विकसित नहीं कर पाए। 4) वस्तुतः किलिंग फोर्स की संरचना और उसकी कार्यप्रणाली पर जब मैं विचार करता हूँ, तो विमुग्ध हो जाता हूँ। आप ऐसा न सोचें कि हमारे सूक्ष्म शरीरों में जो के.एफ. रूपी मारक ऊर्जा बैठी है वह अकेले हमें रोगयुक्त करके मार देती है। वास्तव में प्रकृति ने सम्पूर्ण अस्तित्व में इसका एक पूरा का पूरा सिस्टम डेवलप कर के रखा है। इस ब्रह्मांड में किलिंग फोर्स के जितने भी रूप हैं, आश्चर्यजनक रूप से वे सब एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए ज्योतिष शास्त्र को ही लें। मुख्य रूप से मेरे देखे ज्योतिष शास्त्र का कुल उपयोग आकाशीय ग्रहों-उपग्रहों का हमारी के.एफ. और वी. एफ. की ऊर्जा व संरचना पर प्रभाव का अध्ययन करना है, भले ज्योतिष शास्त्रियों को यह बात ज्ञात हो या न हो। मुझे ताज्जुब होता है कि जब सुदूर बैठे ग्रहों की दशा और दिशा से हमारी कुंडली में विपरीत योग निर्मित होते हैं या मारकेश इत्यादि की दशा आती है, तो उसी समय हमारी के. एफ. हमारे शरीर में ऐसी भयंकर बीमारियाँ कैसे उत्पन्न कर देती है जिनसे हमें अतिशय पीड़ा भोगनी पड़ती है, या हम कैसे अचानक से दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं, कैसे अचानक हमें साँप काट लेता है, और कैसे हमें एकाएक हार्ट अटैक आ जाता है। इनके बीच के संबंधों पर हमें और विचार करने की ज़रूरत है। यह हमारे भविष्य के शोध का विषय होना चाहिए।
इसी तरह से प्रकृति में मौजूद वी.एफ. के विभिन्न रूप भी आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जैसे कि ब्रह्म मुहूर्त का समय और हमारे शरीर की वी.एफ.। ब्रह्म मुहूर्त का अर्थ है वह समय जब रात विदा होने को होती है और सूर्य आने को होता है। इस समय प्रकृति में वी.एफ. अपने चरम पर होता है, और इसलिए यह एक-दो घंटे का समय हमारे शरीर में मौजूद वी.एफ. को रिचार्ज करने का सर्वाधिक उपयुक्त समय होता है। इस समय योग या प्राणायाम या भ्रमण करने से हमारी वी.एफ. कुशलतापूर्वक रिचार्ज हो जाती है। इसकी जड़ें हमारे अचेतन में भी छिपी हैं। हमारे आदिमानव पूर्वज सुबह होने का इंतज़ार करते थे और तड़के ही उठकर शिकार या खेती को निकल जाते थे। आज भी हमारे सामूहिक अचेतन में ये चीजें सुरक्षित हैं। इसीलिए सारे पशु-पक्षी भी ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते हैं। लेकिन हम धीरे-धीरे प्रकृति से कटते जा रहे हैं और उसका खामियाजा भी भुगत रहे हैं।
किलिंग फोर्स के होने का प्रमाण
जैसा कि हमने जाना, Killing Force चौथे, तीसरे, एवं दूसरे सूक्ष्म शरीरों में बने अपने मुख्यालयों से स्थूल शरीर को नष्ट करने का प्रयास करती है और दूसरी तरफ अपनी मारक क्षमताओं को शरीर से बाहर वायुमंडल में छोड़कर अन्य जीवों को भी नष्ट करने का प्रयास करती है। आनुवंशिक बीमारियाँ, महामारियाँ, संक्रामक, या यौन रोग इसी खेल के कारण पैदा होते हैं। परमात्मा के भक्तगण मुझे माफ करें। धार्मिक लोग मुझे माफ करें। मैं जानता हूँ कि सभी धर्म के लोग मेरा मखौल उड़ाएँगे, मगर मैं क्या करूँ, मुझे जो दिखता है मैं वही आपसे कहना चाहता हूँ। यह जो किलिंग फोर्स है, यह पूरे ब्रह्माण्ड और पूरी प्रकृति में व्याप्त है।
तो इस पर सदियों से विवाद रहा है कि अगर परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की है तो यहाँ मारक चीजें, विषैली चीजें, तरह-तरह के साँप, अजगर, शेर, चीते, मच्छर, मक्खी, मलेरिया और डेंगू और तरह-तरह के वॉयरस, तरह-तरह के रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया, बिच्छु, तथा मनुष्य के स्थूल
शरीर पर अवांछित रोग देने वाले अन्य तरह-तरह के जीवों को क्यों पैदा किया है? इसलिए क्योंकि यह जरूरी था। तरह-तरह की प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, जंगल में आग लग जाती है, समुद्र में सुनामी आ जाती है, धरती पर भूकंप आ जाता है, ग्रह-नक्षत्र टूटते हैं, तारे टूटते हैं, उल्का पिंड टूटते हैं। जहाँ भी देखेंगे, यही पाएँगे कि जिस चीज़ का भी निर्माण हुआ है, निर्माण के साथ ही अघोषित रूप से प्रकृति उसके विध्वंस की कार्रवाई भी शुरू कर देती है। क्योंकि अगर निर्माण ही निर्माण हो तो पृथ्वी पर चलना मुश्किल हो जाएगा। एक इंच जगह नहीं बचेगी। प्रकृति ऐसे ही तो संतुलन साधती है। जंगल में हरिण ज्यादा संख्या में पैदा होते हैं, शेर कम संख्या में अगर शेर की तरह हरिण पैदा हो जाए और हरिण की तरह शेर, तो प्रकृति का खेल चलना मुश्कि हो जाएगा। एक सूक्ष्म संतुलन चल रहा है पूरी प्रकृति में। चीजें पैदा होती हैं, फिर बच्चे से जवान होती हैं, फिर जवान से बूढ़ी होती हैं, और एक दिन मृत हो जाती हैं, उनका विनाश हो जाता है। निर्माण में और रख-रखाव में विधायक ऊर्जा के रूप में वाइटल फोर्स हर जगह काम करती है। जैसे- सूर्य की रौशनी है, ऑक्सीजन है, हवा है, आकाश है, अग्नि है। लेकिन जो अग्नि हमारे पेट में रहती है और अन्न को पचाती है, वही एक दिन हमारे मकान को जला देती है, जंगलों को जला देती है। जो वायु हमें जीवन ऊर्जा देती है, वही एक दिन तेज़ आंधी बनकर शहर के शहर, गाँव के गाँव में कहर बरपा देती है। थोड़ी सी सूक्ष्म दृष्टि से देखें, अच्छे और बुरे का ख्याल हम मिटा दें, तो पाएंगे कि सृष्टि में निर्माण और विध्वंस की एक अनवरत प्रक्रिया चल रही है और सभी चीजें अद्यतन होती जा रही हैं। मनुष्य को छोड़कर पूरी पृथ्वी पर कोई पक्षी, कोई जानवर, कोई पशु दवा पर आश्रित नहीं है। किसी भी जानवर या चिड़िया या कीड़े-मकोड़ों को प्रसव के लिए डॉक्टर की जरूरत नहीं होती, और जच्चा या बच्चा कोई नहीं मरता प्रसव में। किसी भी अंडे देने वाले प्राणी को अपने अंडे सेने के लिए ऊर्जा देने वाली मशीन की जरूरत नहीं होती। क्यों? क्योंकि उन सभी को किलिंग फोर्स और वाइटल फोर्स के खेल का पता है। लेकिन हमें नहीं पता। इसलिए हमने महामारियाँ पैदा कर ली। लेकिन अभी भी वक्त है। कहते हैं न कि जब आँख खुली तभी सवेरा मानना चाहिए। अभी भी उपाय है। मैं आपसे कहना चाहूँगा कि किलिंग फोर्स के अस्तित्व को स्वीकार करें। यह अब कोई मानने की बात नहीं रही। इतनी चर्चा के बाद बेहतर है कि हम इसके अस्तित्व को स्वीकार कर लें। उसकी महत्ता को, उसकी कार्यशैली को, कार्यप्रणाली को समझें, उसे प्रशंसा की दृष्टि से देखें और कोई निषेध भाव इसके प्रति मन में नहीं लाएँ। दिन का अगर अपना मजा है, तो रात का भी अपना मजा है। अगर बीमारी नहीं हो, बीमारी के लक्षण नहीं हो तो स्वास्थ्य का मजा नहीं होगा, स्वास्थ्य की महत्ता को हम लोग नहीं समझ पाएँगे।
होमियोपैथी एवं कुछ अन्य तकनीकों, जिन पर चर्चा करना मैं अभी उचित नहीं समझता, से इस किलिंग फोर्स नाम के जंगली मगरमच्छ को पालतू बनाकर काबू में रखा जा सकता है। होमियोपैथी के विज्ञान को अगर ठीक से समझकर दवा और किलिंग फोर्स पर उसके प्रभावों पर विस्तृत और गहन शोष किए जाएँ और आज की बीमारियों के परिप्रेक्ष्य में सैकड़ों नई दवाएँ मटेरिया मेडिका में अगर जोड़ी जाएँ, तो इसका अधिकांश भाग कार्य रूप में संभव हो सकेगा। हाँ, यह बात ज़रूर है कि कुछ विशेष लक्षणों में के.एफ. पर कुछ और विशेष अस्त्रों का प्रयोग हमें करना पड़ेगा, जिसके बारे में हमारे पूर्वजों को पता था, एवं आज के समय में कुछ अन्य विशिष्ट उपाय भी किए जा सकते हैं।
मुख्य रूप से मेरे कहने का भाव यह है कि अभी तक हम लोगों ने इस किलिंग फोर्स के अस्तित्व को ही नहीं जाना था, इसलिए इतनी गड़बड़ियाँ पैदा हुई, विसंगतियाँ पैदा हुईं। और आप एक गलती कर दें तो उसका सुधार दूसरे गलत कदम से नहीं हो सकता। उस शृंखला में दूसरा कदम भी गलत होगा, तीसरा कदम और ज्यादा गलत होगा। इसी तरह से सम्पूर्ण शरीर को एक इकाई नहीं मान के शरीर को टुकड़ों टुकड़ों में लेना, एक एक अंग का अलग विशेषज्ञ होना, यह सबसे ज्यादा दुर्भाग्यजनक कदम साबित हुआ। और इसका सबसे बड़ा रोल मानव जाति को उपचारित नहीं बल्कि बीमार करने में हुआ, ऐसा मेरा मानना है।
तो चलिए और आगे बढ़ते हैं, धीरे-धीरे और कदम बढ़ाते हैं। आपको लगता होगा कि यह कोई किस्सा-कहानी है, कुछ कथा चल रही है, या कोई प्रवचन चल रहा है और इसमें विज्ञान तो है ही नहीं, इसमें कोई technology, कोई research तो है ही नहीं में हाथ जोड़कर कहना चाहता हूँ कि जिन महान हैनीमैन ने होमियोपैथी को जन्म दिया था, पूरे विश्व को उनके विजन को, उनकी दृष्टि को आज सलाम करना चाहिए। अचेतन रूप से भले ही उन्हें technology का ज्ञान नहीं था और इस के एफ. के बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया, पर हम कसे कह सकते हैं कि उन्हें इसका पता नहीं था? हो सकता है कि उन्होंने चर्चा करना ठीक नहीं समझा हो। मगर उन्होंने मानव जाति का जो भला किया, लोगों की बीमारियों का चामत्कारिक रूप से जो इलाज कर के दिया, वह अतुलनीय है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इसके लिए उन्हें जेल में रहना पड़ा। राजा की बीमार बेटी को उन्होंने ठीक किया, तब जाकर उनकी जान बची। ऐसा ही होता है। कोई भी रहस्यदर्शी या कोई भी इस तरह का मसीहा जब इस धरती पर आता है, तब उसकी नई-नवेली बातों से लोग आक्रोशित होते हैं और उग्रवाद से प्रभावित लोग तो उसके दुश्मन ही बन जाते हैं और उसका बहुत दुखद अंत होता है। अतीत में आप झाँककर देखें, इस तरह की अंतर्दृष्टि वाले लोगों के साथ समाज ने यही किया है।
मैं हैनीमन साहब की तरह असाधारण व्यक्ति नहीं हूँ। मैं एकदम आपकी तरह साधारण आदमी हूँ। आप अगर कहें कि इन चीजों को प्रमाणित करिए तो मेरे पास कोई उपाय नहीं है, कोई उपकरण नहीं है। मैं बस हाथ जोड़कर मुस्कुरा दूंगा और कहना चाहूँगा कि मेरी बातें मुझे वापस कर दें।
मैं कहूँगा कि के.एफ. का सबसे बड़ा प्रमाण, इसके अस्तित्व का सबसे
बड़ा प्रमाण हैनीमैन साहब की यह होमियोपैथी है। हालांकि कई और प्रमाण दिए जा सकते हैं, मगर में उसके विस्तार में न जाकर होमियोपैथी की विशेषताओं एवं अन्य सकारात्मक चीजों पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। आप कहेंगे, कोई सात शरीर नहीं हैं। मैं कहना चाहूँगा कि ठीक है, मैं मान लेता हूँ आपकी बात, कोई सात शरीर नहीं हैं, केवल स्थूल शरीर ही है। लेकिन यह तो आपको मानना पड़ेगा कि विद्युत दो ऊर्जाओं से मिलकर ही बनती है- एक बनात्मक और एक ऋणात्मका सिर्फ चनात्मक तार से विद्युत का कोई उपकरण नहीं चल सकता। इसी तरह हमारे शरीर में जो विद्युत है, जो प्राण ऊर्जा है, वह भी दो तरह के तारों से मिलकर बनी है यनात्मक तार यानी कि बाइटल फोर्स और ऋणात्मक तार यानी कि किलिंग फोर्स। हमारा काम केवल वाइटल फार्म से नहीं चल सकता, किलिंग फोर्स का होना भी जरूरी है। क्या 'परम स्वास्थ्य' संभव है ? तो जैसा कि मैंने आपको बताया कि किलिंग फोर्स को शून्य नहीं किया जा सकता। इसलिए 'सुपर हेल्थ' या परम स्वास्थ्य की कल्पना करना बेकार है, यह संभव नहीं है। शरीर में कुछ न कुछ सर्दी-जुकाम, कुछ न कुछ पीड़ा तकलीफ रहेगी ही रहेगी। इसलिए मुझे याद है कि बचपन में जब मुझे बुखार होता था तो एक-एक सप्ताह बुजुर्ग लोग दवा नहीं लेने देते थे और कहते थे कि नहीं, शरीर का अपना सुरक्षा तंत्र काम करेगा। कहने का अर्थ यह कि जैसे वाइटल फोर्स को कुछ-कुछ काम करते रहना चाहिए, वैसे ही किलिंग फोर्स को भी कुछ-कुछ प्रिंट शरीर पर देते रहना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए परम आवश्यक है। यही वजह है कि हम आज तक सर्दी-जुकाम की दवा नहीं खोज पाए, खाँसी की दवा नहीं खोज पाए। जब-जब किलिंग फोर्स को कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए, बैठे-बैठे बेकार हो गए, तो सर्दी-जुकाम और खाँसी जैसी कुछ बीमारियों का सिस्टम वो स्थूल शरीर में भेज देती है और संतुष्ट हो जाती है। मेरा मानना है कि हमें उसे ऐसी छोटी-मोटी चीज़ों में ही संतुष्ट बने रहने देना चाहिए ताकि कुछ बड़ा उपद्रव उसे न सूझे। मेरा सुझाव है कि हमें 'चिर स्वास्थ्य' की कल्पना नहीं करनी चाहिए। जैसे जब मक्खी-मच्छर आ जाते हैं तो हम क्या करते हैं? हम अपना काम-थाम छोड़कर उनसे लड़ाई करने थोड़ी बैठ जाते हैं। मगर आज का मनुष्य परम स्वास्थ्य की चाह में इतना उलझावपूर्ण हो गया है कि थोड़ा-सा जुकाम हुआ नहीं कि तुरंत दवाई ली, थोड़ी-सी खाँसी हुई नहीं कि तुरंत दवाई ली। यह system गलत है।
कुछ लोग आजकल ड्रग एडिक्ट हो गए हैं, दवा मैनिएक हो गए हैं। उनको अपने स्वास्थ्य, अपने बौवन, और छरहरी काया को बरकरार रखने के लिए लगातार दवा खाते रहने की बीमारी होती हैं। उनको एक पिंपल भी हो जाए तो ऐसे रिएक्ट करते हैं मानो कोट हो गया हो, और उसको तत्काल मिटाने के लिए न जाने कहाँ कहाँ की क्रीम लगाते हैं, दवाइयों खाते हैं। यही हाल वजन और लंबाई कम या ज्यादा करने को लेकर होता है। ऊपर से मीडिया, विज्ञापन जगत तथा फिल्मी सितारों इत्यादि ने उनका दिमाग और खराब करके रखा होता है। यह जो मानसिक बीमारी है, इससे जितनी जल्दी हम और हमारा युवा वर्ग मुक्ति पा ले, उतना अच्छा है। मैं तो कहूँगा कि हमें आयोजन करके किलिंग फोर्स को नकारात्मक रूप में न लें, यह शरीर विद्युत का negative तार है जो 24 घंटे हमको alert करता है। अतः परम स्वास्थ्य की परिकल्पना या आग्रह कृपया छोड़ दें। छोटी-मोटी बीमारी अगर नहीं आती है तो कृपया उसका आयोजन करें। आपने देखा होगा कि एक विशेष प्रकार की खून चूसने वाली जोंक को शरीर में घुसाकर खून निकालते हैं और हमारी कई बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि यह हमारे खून में जो के.एफ. की ऊर्जा संग्रहित होती है, उसे खून के माध्यम से निकालने की कोशिश है। इस प्रकार की और भी कई तकनीकें हैं जिन पर हम फिर बाद में चर्चा परिचर्चा कर लेंगे। जैसे मैंने मुद्रा विज्ञान, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, तथा योग की कुछ विधियाँ बताई, उसी तरह के कुछ जीव अस्तित्व में हैं जिन्हें यदि हमारे शरीर में प्रवेश कराया जाए तो वे खून के द्वारा किलिंग फोर्स की नकारात्मकता को अपने अंदर खींच लेते हैं। इससे उनके शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन हमारा शरीर ठीक हो जाता है। तो कृपया इस तरह के आयोजन करके सर्दी-खाँसी, जुकाम, बुखार जैसी छोटी-मोटी बीमारियों और कभी-कभार कुछ अपेक्षाकृत बड़ी बीमारियों को साल दो साल में दो-तीन मौके दें ताकि आपके शरीर का के एफ. निष्क्रिय होकर हार्ट अटैक जैसे एक ही बार में काम तमाम करने वाले रोगों का आक्रमण न कर सके। छोटी-मोटी बीमारियों के माध्यम से के.एफ. के हमारे शरीर पर आक्रमण से उसकी ऊर्जा खर्च होती रहती है और वह बड़ा आयोजन नहीं कर पाती। साथ ही वाइटल फोर्स भी चुस्त व चौकन्नी बनी रहती हैं। इसके बाद भी अगर बड़ी बीमारियाँ आएँ तो उनके लक्षणों पर होमियो दवा या कोई अन्य पद्धति जो किलिंग फोर्स पर काम करे, उसके द्वारा उस पर वार करें, उसका शमन करें। यह ज्यादा बेहतर तकनीक होगी। अपने अतीत की बीमारियों की खोज या यूँ कहें कि अलग-अलग मेगा स्ट्रक्चर, मेगा पुल, मेगा टनल जो किलिंग फोर्स ने बनाके रखे हैं, उनको होमियो दवा के मिसाइल से मार गिराया जाए। यह ज्यादा श्रेयस्कर होगा।
चलिए, अब अगले अध्याय की ओर चलते हैं, जहां में आपका परिचय रोगोपचार से सही तौर-तरीकों से करवाना चाहता हूँ।