राजस्थान के चित्तौड़गढ़ किला में खड़ा यह विशाल दुर्ग, जिसे हम सब "गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया" की उक्ति से जानते हैं, उसकी असली शक्ति उसके सातों दरवाजों में छिपी रही है।
यह किला 700 एकड़ में फैला है और धरती से 508 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जब हम इस किले की ओर चढ़ाई करते हैं, तो एक-एक दरवाजा पार करने पर हमें एहसास होता है कि इन पोलों को महज पत्थर से नहीं,
बल्कि रणनीति, धर्म और वीरता की भावना से बनाया गया था। इन दरवाजों पर रियासत काल में चौबीसों घंटे द्वारपाल और पहरेदार तैनात रहते थे, तथा रात्रि को दरवाजों के ऊपर तेल के बड़े दीप जलाकर रोशनी की जाती थी।
यहाँ हमने जो देखा और जाना, वो इतिहास के पन्नों में आज भी जीवित है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में पहुँचने के लिए एक-एक करके पाडनपोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल नामक सात दरवाजे पार करने होते हैं।
स्थिति: किले का सर्वप्रथम एवं प्रमुख प्रवेश द्वार।
निर्माण काल: पाडन पोल का दरवाजा सातवीं शताब्दी का होना अनुमानित है और इसे पट्ट पोल की संज्ञा दी गई थी।
युद्धकालीन भूमिका: यह पोल शत्रुओं की सेना के सामने सबसे पहली दीवार थी, क्योंकि इसे पार किए बिना आगे की चढ़ाई संभव नहीं थी।
विशेषता: प्रथम द्वार पर नंगाड़े और बड़े घंटे थे, जिन्हें बजाकर दरवाजे खोले और बंद किए जाते थे। यह घंटानाद पूरे किले में एक संदेश की तरह गूंजता था, हालाँकि उस संदेश की भाषा केवल किले के सैनिक ही समझते थे।
हम जब पाडन पोल के नीचे खड़े हुए, तो उस विशाल पत्थर की छत और मोटी दीवारें देखकर लगा कि सदियों पहले यहाँ खड़े सैनिकों को कितनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
स्थिति: पाडन पोल से थोड़ी आगे, चढ़ाई के दूसरे क्रम में।
नामकरण: यह पोल भगवान भैरव के नाम पर रखी गई है, जो शक्ति और संहार के देवता माने जाते हैं।
ऐतिहासिक घटना: प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह ने मेवाड़ का राज्य चिन्ह धारण कर महाराणा विक्रमादित्य का प्रतिनिधित्व किया तथा लड़ता हुआ इसी दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुए, और उसी वीर की स्मृति में यहाँ स्मारक बनाया गया है।
सांस्कृतिक महत्त्व: भैरव पोल के निकट आज भी एक प्राचीन छतरी देखी जा सकती है, जो राजपूती बलिदान परंपरा की याद दिलाती है।
हमने सुना कि इस पोल के पास ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ राजपूत वीर शत्रु पर टूट पड़ते थे, किंतु अपने किले को कभी सहजता से नहीं सौंपते थे।
स्थिति: चढ़ाई के दूसरे क्रम का आरंभ बिंदु।
धार्मिक महत्त्व: यहाँ पूर्व की ओर हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है और यहाँ से मार्ग दक्षिण की ओर मुड़ता है। सेना यहाँ से आगे बढ़ने से पहले हनुमानजी का आशीर्वाद लेती थी।
सामरिक रणनीति: मार्ग का यह अचानक मुड़ना भी एक चालाकी थी, क्योंकि शत्रु की घुड़सवार सेना तेज गति से इस मोड़ को नहीं पार कर सकती थी।
ऐतिहासिक संदर्भ: जयमल और कल्लाजी की छतरी हनुमान पोल के निकट ही है। ये दोनों सेनापति ई.1567 में अकबर की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे, जयमल की छतरी 16 खंभों की है तथा कल्लाजी की छतरी 4 खंभों की है।
स्थिति: हनुमान पोल के बाद, पहाड़ी चढ़ाई के मध्य में।
निर्माण शैली: यह द्वार पत्थर की बड़ी चौकियों को काटकर जमाया गया है और इस द्वार के बाद सड़क पूर्व की ओर घूमती है, यहाँ सुदृढ़ किलेबंदी की गई है।
धार्मिक आधार: इसी द्वार के पूर्वी भाग से जुड़ा हुआ एक अगरा द्वार है और यहाँ गणेशजी का मंदिर स्थित है। गणेशजी को विघ्नहर्ता मानते हुए इस द्वार पर उनकी स्थापना की गई थी, ताकि किले में प्रवेश करने वाला कोई भी शत्रु स्वयं बाधाओं में उलझ जाए।
रक्षात्मक संरचना: सड़क का पूर्व दिशा में मुड़ना यहाँ भी दोहरी सुरक्षा का काम करता था, क्योंकि आक्रमणकारियों को हर बार नई दिशा में ढलना पड़ता था।
स्थिति: गणेश पोल और लक्ष्मण पोल के बीच।
नामकरण का कारण: लक्ष्मण पोल से जुड़ा हुआ होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहते हैं। यह दोनों पोल एक-दूसरे से इस तरह जुड़े थे जैसे दो पहरेदार कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों।
सामरिक विशेषता: इस पोल की ऊंचाई, घुमाव तथा संकरापन उल्लेखनीय है और यहाँ से एक साथ बड़ी संख्या में सैनिक नहीं निकल सकते थे। यही संकरापन शत्रु की भीड़ को तितर-बितर करने का सबसे बड़ा हथियार था।
निर्माण काल: इस किलेबंदी का निर्माण महाराणा कुंभा के समय करवाया गया था और यहाँ की दीवारों में कुछ मूर्तियाँ भी लगी हुई हैं।
हम जब जोड़ला पोल की संकरी गली से गुजरे, तो महसूस हुआ कि यदि यहाँ कभी कोई आक्रमणकारी आया होगा, तो इस तंग रास्ते ने उसकी सेना को बिखेर दिया होगा।
स्थिति: जोड़ला पोल से आगे, राम पोल से पहले।
नाम का महत्त्व: भगवान लक्ष्मण के नाम पर स्थापित यह पोल सूर्यवंशी राजपूतों की वंश परंपरा और उनकी धार्मिक आस्था को दर्शाता है।
युद्धकालीन स्थिति: यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते शत्रु की सेना पहले से ही छह दरवाजों की मार खाकर अत्यंत कमजोर पड़ जाती थी, लेकिन फिर भी यह पोल पूरी तरह सुरक्षित रहता था।
स्थापत्य: इस पोल के दोनों ओर ऊँची प्राचीर बनाई गई थी, जिससे किले के सैनिक ऊपर से तीर और पत्थर बरसा सकते थे।
स्थिति: अंतिम और सर्वोच्च प्रवेश द्वार।
विशेष महत्त्व: यह दरवाजा किले का सातवाँ तथा अंतिम प्रवेश द्वार है और इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है।
धार्मिक आस्था: इसके निकट ही महाराणाओं के पूर्वज माने जाने वाले सूर्यवंशी भगवान श्री रामचंद्र जी का मंदिर है, जो भारतीय स्थापत्य कला एवं हिंदू संस्कृति का उत्कृष्ट प्रतीक है।
आंतरिक संरचना: दरवाजे से प्रवेश करने के बाद उत्तर वाले मार्ग की ओर बस्ती है तथा दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग से किले के कई दर्शनीय स्थल दिखते हैं।