Maharishi Shivbrat Lal Burmam

राधास्वामी मत में कायस्थ और उनकी गुरु परंपरा (महर्षि शिवब्रत लाल बर्म्मन के संदर्भ में) : भारत भूषण

सब से पहले यह कह देना उचित होगा कि राधास्वामी मत की स्थापना स्वामी जी महाराज ने की थी जो सहजधारी सिख थे. उन्होंने सत्गुरु (सत्ज्ञान) देने का कार्य राय सालिग्राम को दिया दिया था जो कायस्थ थे और राधास्वामी मत का आज का जो स्वरूप है उसे आकार देने वाले वही हैं. पोथी सारवचन में स्वामी जी ने अपने आसपास के लोगों को हिदायत दी है कि राय सालिग्राम जो धर्म चला रहे हैं उसे चलने देना है. उनके वचन इस प्रकार हैं:-

(“वचन 12-- फिर सेठ प्रताप सिंह ने अर्ज़ किया कि मुझको भी अपने संग ले चलो. इस पर फरमाया कि तुम से अभी बहुत काम लेना है. बाग में रहोगे और सत्संग करोगे और कराओगे.

वचन 13-- फिर सुदर्शन सिंह ने पूछा कि जो कुछ पूछना होवे तो किस से पूछें? उस पर फरमाया कि जब किसी को पूछना होवे, वह सालिग्राम से पूछे.

वचन 14-- फिर सेठ प्रताप सिंह की तरफ मुतवज्जह होकर फरमाया कि मेरा मत तो सतनाम और अनामी का था और राधास्वामी सालिग्राम का चलाया हुआ है. इसको भी चलने देना और सत्संग जारी रहे और सत्संग आगे बढ़कर होगा.”)

इसी परंपरा में एक और महत्वपूर्ण नाम है शिवब्रत लाल बर्मन, एम.ए., एल.एल.डी. (सन् 1860 - 23 फरवरी 1939). इस आलेख में विशेष कर उन्हें, उनकी शिष्य परंपरा और उनके कार्य को रेखांकित किया गया है.

विकिपीडिया में लिखा है, शिव ब्रत लाल बर्मन का जन्म सन् 1860 ईस्वी में भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िला में हुआ था. वे दाता दयालऔर महर्षि जीके नाम से भी प्रसिद्ध हुए. वे स्नातकोत्तर (एम.ए., एल.एल.डी.) तक पढ़े थे और लेखक और आध्यात्मिक गुरु के रूप में ख्याति पाई. ऐसा माना जाता है कि उन्होंने विभिन्न विषयों यथा सामाजिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर लगभग 3000 पुस्तकें और पुस्तिकाएँ लिखीं. संत मत, राधास्वामी मत और सुरत शब्द योग आदि पर लिखी उनकी अनेक पुस्तकों के कारण उन्हें राधास्वामी मत का वेद व्यासभी कहा गया. उनकी प्रसिद्ध उक्ति है- पूरी तरह, हर तरह और हर बात में मनुष्य बनो.

राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन

उनके गुरु परम संत राय बहादुर सालिग्राम साहिब जी थे जिन्हें हुजूर महाराज जी भी कहा जाता है. उनका अपने गुरु में अटल विश्वास था और वे राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन के अनुयायी बन गए. सन् 1898 में अपने गुरु के निधन के बाद उन्होंने ने सन् 1898 से ले कर 1939 तक राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन की सेवा की.

शिवब्रत लाल - एक लेखक


एक उर्दू साप्ताहिक 'आर्य गज़ट' के संपादक के तौर पर कार्य करने के लिए वे लाहौर चले गए. 01 अगस्त 1907 को उन्होंने अपनी एक पत्रिका 'साधु' शुरू की. बहुत जल्द यह लोकप्रिय हो गई. एक लेखक के रूप में वे स्थापित हुए. उन्होंने अपने जीवन काल में लगभग 3000 पुस्तकों, पुस्तिकाओं और पत्रिकाओं का लेखन और संपादन किया. इनकी भाषा हिंदी के अतिरिक्त उर्दू और अंग्रेज़ी भी रही. वे फ़ारसी के भी अच्छे जानकार थे. उनके लेखन में विषयों की विविधता उनकी विशेष पहचान है. उनके गहन ज्ञान की झलक इनकी पुस्तकों में भरी जानकारी से हो जाती है जिनमें सामाजिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों का विषद विवरण है. इनकी पुस्तकें 'लाइट ऑन आनंद योग', 'दयाल योग' और 'शब्द योग' बहुत प्रसिद्ध हुईं.

दाता दयाल की राधास्वामी आध्यात्मिक आंदोलन पर लिखी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें हैं:

1) लाइट ऑन आनंद योग (अंग्रेजी)

2) दयाल योग

3) शब्द योग

4) राधास्वामी योग: 1-6 भाग

5) राधास्वामी मत प्रकाश

6) अद्भुत उपासना योग: 1-2 भाग

7) अनमोल विचार

8) दस अवतारों की कथा

9) कबीर परिचय आद्यज्ञान

10) कबीर योग: 1-13 भाग

11) कर्म रहस्य

12) नानक योग: 1-3 भाग

13) पंथ संदेश

14) सफलता के साधन

15) सहज योग

16) सप्त ऋषि वृत्तांत

17) शरणगति योग

18) सत्संग के आठ वचन

19) व्यवहार ज्ञान प्रकाश

20) विचारांजलि

महर्षि शिव ब्रत लाल का विश्व दौरा

विश्व में राधा स्वामी आध्यात्मिक आंदोलन फैलाने के लिए उन्होंने लाहौर से दुनिया की यात्रा शुरू की. 2 अगस्त 1911 को वे कोलकाता पहुँचे. 22 अक्टूबर 1911 को वे कोलकाता से रंगून की ओर समुद्र से रवाना हुए. 31 अक्तूबर को वे पेनांग पहुँचे और सिंगापुर और जावा होते हुए 22 नवंबर को हांगकांग पहुँचे. इन सभी स्थानों पर वे राधास्वामी आध्यात्मिक आंदोलन का संदेश फैला रहे थे. उसके बाद वे जापान और बाद में सैनफ्रांसिस्को, अमेरिका गये और सैनफ्रांसिस्को में व्याख्यान भी दिए.

आश्रम की स्थापना

सन् 1912 में शिवब्रत लाल जी ने गोपी गंज, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश, भारत में अपने आश्रम की स्थापना की. उनके प्रेरक प्रवचनों ने समस्त भारत और विदेशों में राधास्वामी आंदोलन के चाहने वालों को आकर्षित किया. 23 फरवरी 1939 को सत्तर वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. उनकी पवित्र समाधि गोपी गंज के निकट राधास्वामी धाम में है.


उनकी पुस्तकों में ये भी शामिल हैं:-

विकिपीडिया पर दी इस जानकारी अतिरिक्त और बहुत कुछ है जो दाता दयाल महर्षि के बारे में जानने योग्य है. वे कायस्थ थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत की दूसरी टाकी फिल्म शिवब्रतलाल जी ने बनाई थी जिसका नाम था शाही लकड़हारा जो इन्हीं के एक आध्यात्मिक उपन्यास पर आधारित थी. सुना है कि यह फिल्म इन्होंने अपने दामाद की सहायता करने के लिए बनाई थी.

इनकी एक मूर्ति मानवता मंदिर, होशियारपुर में स्थित है जिसकी पृष्ठ भूमि बहुत रोचक है. जिसका इस आलेख में आगे चल कर ज़िक्र किया जाएगा. इस मंदिर में दाता दयाल की कई पुस्तकों का संग्रह किया गया है. इस पुस्तकालय को फकीर लाईब्रेरी चैरीटेबल ट्रस्ट चलाता है. यहाँ इनकी हस्तलिखित पुस्तकें और अन्य साहित्य भी उपलब्ध है.

दाता दयाल की दूसरी मूर्ति मैंने हैदराबाद में देखी जो वेस्ट मार्रेडपल्ली में एओसी गेट के पास स्थित बी-मैन सोसाइटी द्वारा बनवाए एक मंदिर में स्थित है. इस मूर्ति की स्थापना दाता दयाल के शिष्य परम संत श्री नंदू भाई के शिष्य हुज़ूर आनंदराव जी महाराज ने की थी. उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने इसी स्थान पर दाता दयाल जी के चरण धो कर उनकी आरती उतारी थी और आगे चल कर उक्त सोसाइटी बना कर इस मंदिर का निर्माण किया था. इनके नाम से आंध्रप्रदेश में ही हनमकुंडा में सत्संग भवन बना हुआ है.

इनकी कबीर साखी की व्याख्या अपूर्व है. इन्होंने अपने गुरु की अपेक्षाओं के अनुरूप राधास्वामी मत की व्याख्या करते हुए हज़ारों पुस्तकों-पुस्तिकाओं की रचना की. लाहौर में रहते हुए इनका आर्यसमाज में काफी प्रभाव रहा. परंतु जैसे-जैसे राधास्वामी मत में इनके विश्वास की पहचान बनती गई इनका विरोध भी शुरू हो गया. समय आया कि इनका आश्रम उजाड़ दिया गया. मेरे एक टीचर डॉ. सरनदास भनोट जो लाहौर के डीएवी कॉलेज के विद्यार्थी रहे थे और कृष्ण काव्य के विशेषज्ञ थे, उनसे एक दिन यूँ ही पूछा कि क्या आपने शिवब्रतलाल जी का नाम सुना है तो वे तुरत बोले कि हाँ, हम उनके साहित्य को बहुत शौक से पढ़ते थे.

This desire of mine became more powerful, when His Holiness Hazur Data Dayal Ji named his Centre as Radhaswami Dham.  By coming in the fold of Radhaswami faith, Hazur Data Dayal Ji earned a bad name, suffered untold miseries and listened to the uncivilised language of the world, but he served this faith throughout his life.  Whatever His Holiness has done for the Radhaswami faith, which now I name as Manav-Matt, is not a secret for the followers of Radhaswami teachings. ” –Dyal Faqir (From- ‘Yogic philosophy of Saints’)

इनके साहित्य को देखें तो उसमें एक बात विशेष उभर कर आती है कि इन्होंने एक शिष्य बाबा फकीर चंद का बहुत बार उल्लेख किया है और एक पूरी पुस्तकफ़कीर शब्दावली लिखी है जिसमें एक गुरु द्वारा शिष्य के जीवन को ऊपर उठाने के लिए क्या-क्या किया और कहा गया है उसका एक अद्भुत उदाहरण मिलता है. पहले कभी सुनने में नहीं आता था कि किसी गुरु ने अपने शिष्य की प्रशंसा में पुस्तकें लिख दी हों. ऐसा करना गुरु गद्दी के लिए खतरा बन सकता था. दाता दयाल इन बातों से ऊपर थे और उन्होंने अपने शिष्य की दिल खोल कर तारीफ की है. इन्हें बाबा फकीर चंद के रूप में शिष्य भी ऐसा मिला जिसने गुरु का आदेश होने पर भी गुरुआई का कार्य तब तक नहीं किया जब तक कि गुरु का शरीर रहा. फकीर ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने अनुयायी भगत मुंशीराम की तारीफ में बुहत कुछ कहा और लिखा है और भगत मुंशीराम जी ने गुरु ऋण उतारने हेतु फकीर की मूल शिक्षा को संभाल कर रखने के लिए मानवता मंदिर का त्याग करना बेहतर समझा और मौन रह कर साहित्य के माध्यम से कार्य करते रहे. भगत मुंशीराम जी ने दाता दयाल जी की वाणी और शिक्षा की व्याख्या अपने साहित्य में की है बोलचाल की भाषा में की है.

गुरु द्वारा शिष्य की प्रशंसा की बनगी और शिष्य़ पर उसका संस्कार पड़ना एक महत्वपूर्ण घटना है जिसके दो उद्धरण नीचे दिए गए हैं ताकि शिवब्रत लाल जी के व्यक्तिव के प्रभाव को आँका जा सके.

1.      खन्ना साहब, इस संसार में सब कुछ मुमकिन है. पंडित फकीर चंद मेरा एक सत्संगी है जिसका मुझे अभिमान है. जिस वक्त वह सत्संग में आया मैंने उसे सख्त से सख्त इम्तेहान की हालत में रखा और ताकीद की कि अगर रुहानी स्कूल आकर लाभ उठाना चाहते हो तो सिर्फ़ हक़ हलाल की कमाई से संबंध रखो. बेचारे ने मेरे हुक्म की तामील में बहुत तकलीफें उठाईं. तन्खाह इस कदर काफी नहीं थी कि आसानी से अपने बाल-बच्चों की परवरिश और भाई की शिक्षा पर खर्च कर सके. वह स्टेशन मस्टर था. मैंने हुक्म दिया कि ड्यूटी के अलावा और वक्तों में मज़दूरी किया करो. उसने अपनी इज़्ज़त की परवाह न करते हुए मेरे हुकम की पूरी-पूरी तामील की. जब मैं उसकी हालत सुनता तो मेरी आँखों में खुशी के आँसू आ जाते थे.

उसने स्टेशन के स्टाफ को सख्ती से हुक्म दे रखा था कि कोई नाजायज़ रक़म न ले. दुनिया दुनिया ही है. लोगों ने उसे सताने के लिए उसके विरुद्ध एक झूठा मुकद्दमा खड़ा कर दिया. फकीर मुसीबतें झेलता हुआ भी खुश था. उसने मुझे तमाम हालात लिखे. मैंने उसे जवाब दिया कि तू फकीर है. दुनिया में बेखौफी तेरी शान है. जब आला अफसर तहकिकात को आएँ तो साफ़ लफ़्ज़ों में कह दो कि इस मुकद्दमे का फैसला शिकायत करने वालों के बयान पर किया जाए. ऐसा ही हुआ. जब रेलवे के बड़े अफसर ने स्टेशन पर आकर फकीर से मुकद्दमे के बारे में पूछा फकीर ने कहा कि शिकायत करने वालों ने जो बयान दिया है उसी के आधार पर फैसला किया जाए. अफसर हैरान हो गए कि बावला फकीर क्या कह रहा है. आखिर उन्होंने शिकायत करने वालों के बयान लेने शुरू किए. उस समय लोगों ने मालिक की दया का दृश्य खुली आँखों से देखा. सब ने वही बयान दिया कि शिकायत बिलकुल निराधार है. पंडित फकीर चंद जी बिलकुल बेकसूर हैं. मामला पलट गया और लेने के देने पड़ गए, मगर फकीर की सिफारिश पर मामला दाख़िल-दफ़्तर हो गया. उस वक्त से फकीर की मस्ती में बहुत वृद्धि होती गई और रेलवे के महकमे में फकीर की धाक बँध गई.

      पिछली जर्मनी की लड़ाई के दिनों में रेलवे के अफसरों ने फकीर से बग़दाद जाने के बारे में पूछा. फकीर ने मुझे लिखा. मैंने हुक्म दिया कि मालिक की ज़ात पर भरोसा रख कर जहाँ तुम्हारा जी चाहे बेखौफी से चले जाओ. गुरु की दया हमेशा तुम्हारे साथ है. फकीर हुक्म पाते ही बग़दाद चला गया. सात-आठ महीने तक कोई ख़बर न मिली. मुझे तो तसल्ली थी परंतु घर वाले काफी परेशान थे. बार-बार मेरे पास आए, आखिर मैंने पंजाब गवर्नमेंट को लिख कर तहकीकात करवाई. फकीर का पत्र आने पर घर वालों की जान में जान आई. वहाँ फकीर के कैंप के आसपास दुश्मन की तोप के गोले गिरते थे मगर फकीर बिलकुल बेखौफ़ और बपरवाह था. एक बार वह मुसलमानों के समूह में घिर गया. वे उसे सूफ़ी कहते थे और उसके खाने-पीने और आराम का ख़ास ख़्याल रखते थे और उसकी बहुत इज़्ज़त करते थे. वे फकीर की फकीराना बातों और सलूक को देख कर बहुत खुश होते थे.

      फकीर की गुरुभक्ति के बेशुमार वाक्यात हैं, मगर मैं इस वक्त ज्यादा गुफ्तगू नहीं करना चाहता. प्रकृति में यह सच्चा फकीर है और आध्यात्मिक गुरु बन कर आया. वक्त आएगा जब बेशुमार लोग इस फकीर से लाभ उठाएँगे. मैं निहायत ज़ोरदार शब्दों में कहता हूँ कि मुझे इस फकीर का ख़ास अभिमान है. (फकीर शताब्दी स्मारक ग्रंथ से, पृष्ठ 137-138)

 

2.      मैं राधास्वामी मत की पुस्तकें अध्ययन करके इस पंथ में नहीं आया वरन् ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने के कारण मुझको रामायण, महाभारत आदि पुस्तकें पढ़ने के संस्कारों ने तथा उस परम तत्त्व राम से मिलने की अभिलाषा ने प्रभावित किया और एक दिन रात्रि के समय सिलनावाली रेलवे स्टेशन से जंगल की ओर चल पड़ा. वहाँ मुझे एक सफेद दाढ़ी वाले महापुरुष ने कहा कि तेरा राम मनुष्य रूप में संसार में आया हुआ है. वह तुमको मिल जाएगा. मैं रातों रोता रहा और मेरा एक स्वप्न था जिसने मुझे विश्वास दिलाया कि मेरा राम महर्षि शिवब्रतलाल जी के रूप में आया हुआ है. मैंने लगातार दस माह तक महर्षि महाराज की खोज में उनके नाम पत्र व्यवहार किया. दस माह के पश्चात मुझे लाहौर से उत्तर मिला कि फकीर मैंने यह सच्चाई और शांति राधास्वामी मत से प्राप्त की है यदि तुमको कोई संकोच न हो तो तुम मुझ से लाहौर आकर मिल सकते हो. मैं लाहौर पहुँचा वहाँ मुझको राधास्वामी मत के अनुसार दीक्षित किया गया और पुस्तक सार-वचन मुझे अध्ययन के लिए दी गई. पुस्तक अध्ययन करने से मेरे मन को धक्का पहुँचा क्योंकि इसमें सनातन धर्म आदि का खंडन था.

      चूँकि मैं स्वप्न द्वारा इस पंथ में सम्मिलित हुआ था मेरे कान इस खंडन को कब सहन कर सकते थे इस कारण मैंने प्रण किया कि मैं भी इस मार्ग पर चल कर देखूँ कि इस पुस्तक में सब को काल मत में बतलाया है और दयाल मत को उनसे पृथक रखा है. इसमें सच्चाई क्या है. मैं इसी धुन में लग गया और सुरत-शब्द योग द्वारा अपने आंतरिक दृष्यों को देखता हुआ आगे बढ़ता रहा. जो कुछ नियम दाता दयाल जी महाराज ने बतलाए उन पर चलता रहा. उनकी आज्ञा पालन करते हुए मोह, माया, छल, कपट को छोड़ता हुआ आगे बढ़ता गया और आज मेरी आयु 72 वर्ष की है परंतु मैं किंचित मात्र भी अपने मार्ग से नहीं हटा. (बाबा फकीर चंद जी के एक सत्संग से जो उन्होंने 05-02-1957 में हनमकुंडा, आंध्रप्रदेश में दिया था.)  

3.      इसी अनोखी परंपरा में बाबा फकीर चंद जी ने भगत मुंशीराम जी की प्रशंसा में कहा है कि भगत मुंशीराम की रहनी मेरी रहनी से हज़ार दर्जा बेहतर है. उन्होंने भगत जी से मानवता का ध्वज-गीत लिखवाया और चिंतल बस्ती, हैदराबाद में स्वयं उसकी व्याख्या की जो सत्संग रूप में मानव-मंदिर पत्रिका में छपी. मानवता मंदिर, होशियारपुर में बैसाखी के दिन मानवता के ध्वजारोहण के समय यही गीत गाया जाता है. इसकी परंपरा स्वयं फकीर ने शुरू की. (पुस्तक संत सत्गुरु वक़्त का वसीयतनामा से लिए अंश)

दाता दयाल जी के जीवन के बारे में मैंने स्वयं परम दयाल फकीर चंद जी से सुना है कि जब दाता दयाल महर्षि जी जब बहुत बूढ़े हो चुके थे तब भी देश के दूरदराज़ के शहरों गाँव में जाकर राधास्वामी मत का कार्य करते थे. स्वास्थ्य बहुत गिर चुका था. एक बार फकीर ने कहा कि दाता आप इस उम्र में क्यों इतना कष्ट उठाते हैं, अब आप इतनी यात्रा न किया करें तो उन्होंने कहा, फकीर, मेरे गाँव के लोग बहुत गरीब हैं. मैं जाता हूँ तो उनके लिए चार पैसे ले आता हूँ. इस पैसे से वे अपने गाँव में एक आश्रम चलते थे जहाँ लोगों को रोज़गार और भोजन मिल जाता था. कमाई के लिए सारी-सारी रात लिखते थे और दान देने में कोई कमी न थी. शिष्यों के दान और चढ़ावे में से अपने लिए कुछ इस्तेमाल नहीं करते थे. फकीर ने भारत और इराक में अपनी की हुई कमाई का बहुत-सा हिस्सा इन्हें भेजा. दाता दयाल जानते थे कि फकीर की कमाई पर उसके परिवार का हक़ है. जब कई वर्ष बाद फकीर घर लौटे तो उनकी पत्नी ने शिकायत की कि ये घर में पैसे नहीं देते हैं तो दाता दयाल ने कहा कि किसने कहा है फकीर ने तुम्हारे लिए पैसा नहीं रखा. और उन्होंने बैंक से निकलवा कर 20000/- रुपए फकीर की पत्नी को दिए. फकीर के भेजे पैसे को वे बैंक में जमा कराते रहे थे. यह सन् 1939 से पहले की बात है.

फकीर ने अपनी पुस्तक गरुड़ पुराण रहस्य में लिखा है-

दाता दयाल ने उसकी हर तरह से संभाल की। एक बार अढ़ाई हज़ार रुपया प्रसाद के रूप में उसको वापस किया35 वर्ष के बाद बीस हज़ार रुपया मेरी स्त्री को दे गएकिसी समय दाता दयाल के संकेत के अनुसार मुझे कई जगह दान देने की आवश्यकता पड़ीइसने पहले बैंक से रुपया निकलवा कर भेजने को कहा मगर चूँकि  वह रुपया दाता दयाल ने उसको दिया हुआ था और कहा था फकीर!  अपना कमाओ और खाओयह रुपया भागवती की सन्तान के लिए है(ओह दाता दयाल!  तेरी याद आती है तो आँसू आ जाते हैं) मैंने उसे स्वीकार नहीं किया.

फकीर ने अपने एक सत्संग में बताया कि वे किसी कारण से वे एक बार अपने घर में बहुत कष्टपूर्ण स्थिति में थे और ध्यान दाता दयाल की दया पर लगा था. तब दाता दयाल किसी अन्य शहर में सत्संग करा रहे थे. अचानक उन्होंने सत्संग समाप्त करते हुए कहा कि चलो भाई मेरा फकीर मुसीबत में है. इतनी संवेदनशीलता कम लोगों में ही देखने को मिलती है.

दाता दयाल शिवब्रतलाल जी की दूरदर्शिता इस बात से झलकती है कि उन्होंने फकीर को आदेश दिया था कि फकीर चोला छोड़ने से पहले शिक्षा को बदल जाना क्योंकि आने वाले समय में लोग हमारे बात कहने के तरीके को पसंद नहीं करेंगे. घटनाक्रम ऐसा बना कि फकीर को दिए उनके संस्कार ने अपना स्वरूप ग्रहण करना आरंभ कर दिया. इराक में युद्ध के दौरान एक बार फकीर और उनके साथी शत्रु की फौजों से घिर गए. बचने की कोई उम्मीद नहीं थी क्योंकि गोला-बारूद कुछ ही बचा था. जैसा कि साधक करते आए हैं फकीर ने दाता दयाल जी का ध्यान किया और दाता दयाल का रूप प्रकट हुआ जिसने कुछ हिदायतें दीं कि विरोधी सेनाओं को उनके मृत फौजियों की लाशें ले जाने दो, वे तुम पर हमला नहीं करेंगे. फकीर ने यह बात सब को बताई. उस बात का पालन किया गया. वे सभी सुरक्षित रहे. जब वे इराक से लौटते हुए लाहौर स्टेशन पर आए तो फकीर के कुछ शिष्यों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि, हम युद्ध की मुसीबतों में फँस गए थे और आपका ध्यान किया और आपने हमारी मदद की.

फकीर सोच में पड़े कि मैं तो स्वयं मुसीबत में था और दाता दयाल का ध्यान कर रहा था. मैं तो इनकी मदद के लिए गया नहीं. और ये लोग कह रहे हैं कि मेरा रूप इनकी मदद के लिए वहाँ प्रकट हुआ था. यह माजरा क्या है. इस घटना ने उनकी आँखें खोल दीं और दाता दयाल की वह बात कि सत्संगियों के रूप में तुम्हें सत्गुरु (सच्चे ज्ञान) के दर्शन होंगे चरितार्थ होने लगी. वे जान चुके थे कि कोई गुरु, ईश्वर, अल्लाह बाहर से नहीं आता. वे सब व्यक्ति के भीतर के संस्कार हैं जो किसी परिस्थिति में रूप बना कर प्रकट होते दिखते हैं. तब के बाद से फकीर दाता दयाल की सही प्रकार से क़द्र कर पाए. डॉ. डेविड सी. लेन ने इस पर एक फिल्म बनाई है जिसे इस लिंक पर देखा जा सकता है- Inner Visions and Running Trains.

हैदराबाद के संत श्री पी. आनंद राव जी जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है उन्होंने दाता दयाल के बारे में एक कथा सुनाई थी कि एक बार एक स्त्री उनके पास अपने छह माह के शिशु को ले आई जिसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. उस स्त्री को विश्वास था कि दाता दयाल उसे ज़िंदा कर सकते हैं. दाता दयाल ने उसे डॉक्टर की सलाह मानने के लिए कहा लेकिन वह नहीं मानी और शिशु को उनके आश्रम में छोड़ कर चली गई. कहते हैं कि दाता दयाल सारी रात उस शिशु के पास सुरत-शब्द अभ्यास (साधन) करते रहे. प्रातः जब वह स्त्री लौटी उस समय शिशु खेल रहा था. ऐसे कई चमत्कार उनके जीवन से जुड़े हैं जिनके बारे में दाता दयाल ने कभी कोई श्रेय नहीं लिया. उन्हें स्वाभाविक घटनाएँ मानते और कहते रहे.

जीवन में इतना कार्य करने वाले और जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने वाले शिवब्रत लाल जी के जीवन का आखिरी पड़ाव बहुत निर्धनता में बीता. खाना भी ठीक से नहीं मिलता था. फकीर ने कहीं लिखा है कि दाता दयाल में फकीरी की अवस्था का बहुत गहरा ख़्याल होने के कारण ऐसा होना स्वाभाविक था. उन्होंने मकाँ जब छुट गया तो क्यों ख़्याले ला मकाँ रखना जैसे शब्दों की रचना की थी.

यहाँ तक शिवब्रत लाल जी की शिष्य परंपरा का प्रश्न है एक बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने विदेश के अतिरिक्त भारत में भी खूब भ्रमण किया. इसी सिलसिले में उन्होंने कितने शिष्य बनाए इसका सही पता लगाना कठिन है. दूसरे एक कठिनाई यह भी आई कि दाता दयाल जी के चोला छोड़ने के बाद उनके गाँव में उनकी समाधि बना दी गई. वहाँ सत्संग का सिलसिला जारी रखने वाले का चयन बहुत कठिन था. एक तो किसी महात्मा की मृत्यु के बाद उनकी छोड़ी परंपरा में सब से पहले लोग उसकी संपत्ति देखते हैं. उनकी शिक्षा को जायदाद मानने वाले बिरले ही होते हैं. ऐसे लोगों में एक बाबा फकीर चंद निस्संदेह प्रमुख थे लेकिन वे वहाँ गोपी गंज जाना नहीं चाहते थे. उन्होंने समय-समय पर कुछ लोगों को वहाँ आचार्य का कार्य करने के लिए नियुक्त किया. पहले उन्होंने एक सज्जन श्री कुबेरनाथ श्रीवास्तव को वहाँ आचार्य का काम करने के लिए कहा. लेकिन दाता दयाल के संबंधियों ने उनका विरोध किया. उसके बाद फकीर चंद जी ने अध्यात्म के क्षेत्र में बहुत ही व्यावहारिक व्यक्ति श्री प्रेमानंद जी को उक्त कार्य दिया लेकिन उन्हें भी कार्य नहीं करने दिया गया और धीरे-धीरे वह स्थान दाता दयाल के संबंधियों के हाथों में चला गया.

डेरों का इतिहास ऐसा ही है. जब तक कोई पवित्र विभूति वहाँ कार्य करती है तब तक वहाँ शांति के इच्छुक मनवाँछित चीज़ पा सकते हैं. बाद में वहाँ वह बात नहीं रह जाती यद्यपि लोगों की मनोकामनाएँ अपने विश्वास के कारण पूरी होती रहती हैं.

दाता दयाल जी की वाणी की व्याख्या फकीर और भगत मुंशीराम ने खूब की है. वर्तमान में मानवता मंदिर में गुरु का कार्य कर रहे दयाल कमल भी अपने सत्संग में दाता दयाल की वाणी की व्याख्या करते हैं.

दाता दयाल जी के एक अन्य शिष्य श्री मामराज शर्मा ने दाता दयाल जी की जीवनी लिखी है जिसका प्रकाशन मानवता मंदिर, होशियारपुर के ट्रस्ट ने किया था और उसे निःशुल्क वितरित किया था.

दाता दयाल की समाधि इनके गाँव में बनवा दी गई है जिस पर एक बहुत बड़े स्तंभ का निर्माण किया जा रहा है.

राधास्वामी मत से जुड़े अन्य कायस्थ सज्जन

राय सालिग्राम जी महाराज (कायस्थ)

संत कुबेरनाथ, एडवोकेट (कायस्थ)

संत प्रेमानंद जी (कायस्थ)  f/o Shri A.N. Roy

संत शब्दानंद जी महाराज (कायस्थ)

अगम प्रसाद माथुर (कायस्थ)

    

शिवब्रत लाल जी की परंपरा :-

राय सालिग्राम जी इनके गुरु थे.

संत सत्गुरु वक़्त बाबा फकीर चंद जी महाराज (शिष्य)

संत सत्गुरु भगत मुंशीराम जी महाराज (फकीर चंद जी की परंपरा में सत्गुरु)

डॉ आई. सी. शर्मा (फकीर चंद जी की परंपरा में गुरु)

दयाल कमल (श्री बी.आर. कमल) (फकीर चंद जी की परंपरा में गुरु)

राम सिंह अरमान (दाता दयाल के शिष्य. इनकी परंपरा में एक प्रखर संत ताराचंद हुए हैं जो फकीर चंद जी से भी जुड़े हैं जिनमें फकीर का रूप प्रकट हुआ था.)



MEGHnet ब्लॉग के संक्षिप्त आलेख पर आई टिप्पणियाँ :-

16 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

मुझे इनकी भ्रमण वाली बात अच्छी लगी।

3:13 PM, September 13, 2011
रेखा said...

आपके पोस्ट के माध्यम से मेरा काफी ज्ञानवर्धन हुआ ......आभार

6:00 PM, September 13, 2011
यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही ज्ञान वर्धक पोस्ट लिखी है सर।
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कल 14/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

6:26 PM, September 13, 2011
Vijai Mathur said...

आदरणीय भूषण जी,
आपके निर्देशानुसार इस पोस्ट का अवलोकन किया। विस्तृत वर्णन प्राप्त हुआ। आपने जिन सालिग्राम जी का जिक्र किया है वह डा आगम प्रसाद माथुर साहब के बाबाजी के बाबाजी थे (Grand Father Of the grand father of Agam Prasad Mathur)।
अगम प्रसाद माथुर साहब हमारी चाची (श्रीमती संतोष माथुर पत्नी डा नरेंद्र राज बली माथुर)के मामा जी होने के नाते हमारे नाना जी हुये। चाची 10 वर्ष की उम्र से विवाह होने तक उन्हीं के पास आगरा मे रहीं एवं पढ़ीं ।
आगरा मे हम 34 वर्ष रहे है और राधास्वामी मत के तीन गुटों के केन्द्रों का अवलोकन किया है-अगम प्रसाद जी का हजूरी भवन,स्वामी बाग का समाधि भवन,दयाल बाग का सत्संग भवन । बलकेशवर स्थित सत्संग भवन जो व्यास (पंजाब )से संबन्धित है का अवलोकन नहीं कर सके हैं।
पूर्व राष्ट्रपति वेंकट रमन जी अवकाश लेने से पूर्व डायल बाग वाले सत्संग भवन मे पधारे थे।

7:45 PM, September 13, 2011
Vijai Mathur said...

त्रुटि सुधार--
पिछली टिप्पणी की अंतिम पंक्ति मे कृपया 'डायल बाग' को दयाल बाग पढ़ें।

7:48 PM, September 13, 2011
mahendra verma said...

राधास्वामी मत के संस्थापक संत के संबंध में विस्तृत जानकारी से ज्ञानवर्धन हुआ।
ऐसे त्यागी संत अब कहां ?

9:15 AM, September 14, 2011
सतीश सक्सेना said...

अच्छी और नयी जानकारी है मेरे लिए !
आभार !

9:41 AM, September 14, 2011
ZEAL said...

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आदरणीय भूषण जी ,

श्री शिव व्रत लाल जी के बारे में अपने आलेख पर आपकी टिप्पणी द्वारा ही जाना था। स्वामी जी ने देश के लिए और अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए जो किया , इन्हीं महती कार्यों से आज हमारी भाषा जीवित है। नमन है देश के इन सच्चे सपूतों को ।

आपके आलेखों से जो ज्ञानवर्धन होता है , उसके लिए आपकी ऋणी हूँ। अभिवादन स्वीकार कीजिये।

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11:16 AM, September 14, 2011
ZEAL said...

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आदरणीय विजय माथुर जी और पूनम जी मेरे माता-पिता समान हैं और यशवंत जो मुझे "बुआ" कहता है , मेरा प्यारा सा भतीजा है। इस नाते अगम प्रसाद माथुर जी मेरे भी माता-पिता सामान हुए। बहुत अच्छा लग रहा है इतनी बड़ी हस्तियों की संतान कहलाते हुए।

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11:21 AM, September 14, 2011
Bhushan said...

@ संदीप जी,
@ रेखा जी,
@ महेंद्र वर्मा जी,
@ सतीश सक्सेना जी,
लंबी पोस्ट पढ़ने के लिए आप सभी का आभार :) मैं समझता हूँ इसे दो किस्तों में छापना बेहतर होता.

12:47 PM, September 14, 2011
Bhushan said...

@ यशवंत माथुर जी,
@ विजय माथुर जी,
@ डॉ. दिव्या जी,
आप तीनों को इस पोस्ट पर देख रहा हूँ और अपनी किस्मत को सराह रहा हूँ.

12:49 PM, September 14, 2011
Sunil Kumar said...

बहुत अच्छी पोस्ट जानकारी से भरी वैसे मैंने ए ओ सी हैदराबाद के मंदिर को देखा मगर यह सब मालूम नहीं था और खुद भी कायस्थ होने के नाते गर्व अनुभव कर रहा हूँ | आपका बहुत बहुत आभार

5:52 PM, September 14, 2011
Amrita Tanmay said...

मेरे लिए नयी जानकारी है |

7:00 PM, September 14, 2011
Acupressureindia said...

सार्थक पोस्ट. हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ.

7:18 PM, September 14, 2011
Patali-The-Village said...

आपके आलेखों से जो ज्ञानवर्धन होता है , उसके लिए धन्यवाद|

10:13 PM, September 14, 2011
Dr Varsha Singh said...

भारत की दूसरी टॉकी फिल्म शिवब्रतलाल जी ने बनाई थी जिसका नाम था ‘शाही लकड़हारा’ जो इन्हीं के एक आध्यात्मिक उपन्यास पर आधारित थी.

यह जानकारी वाकई दुर्लभ है.हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ.

10:19 PM, September 14, 2011

 

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