गीता से आत्मोन्नति
 

गीता से आत्मोन्नति

 

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को जो उपदेश दिया था, वह आज हमारे लिए धर्म ग्रंथ है। और इस ग्रंथ में उन सभी महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख है, जो मनुष्य के चारों पुरुषार्थो-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दिशा निर्देशित करता है। इसके अलावा, इसमें भक्ति और कर्म की महत्ता का भी समन्वय किया गया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि गीता में ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप की व्याख्या जिस रूप में की गई है, उसे साधारण ज्ञान वाले व्यक्ति भी आसानी से समझ सकते है। यही वजह है कि कुछ विद्वान इसे कर्म-प्रधान धर्म ग्रन्थ कहते हैं, तो कुछ इसे ज्ञान प्रधान या भक्ति मार्ग का अद्भुत धर्म ग्रंथ बताते है।

वास्तव में, इसमें तीनों मार्गो को समाहित किया गया है। 'जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' वाली बात इस महान धर्म ग्रंथ के हर श्लोक में दिखाई पड़ती है। ध्यान दें कि गीता के कर्म मार्ग का उपदेश समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित करता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते है कि हे अर्जुन, यह जीवन हमारे किए गए कर्मो पर ही आधारित है, इसलिए कर्म करना प्रत्येक मानव का धर्म है। हमें सारी चिंताओं को त्यागकर अपने कर्तव्य-पालन में लग जाना चाहिए। दरअसल, कर्म मार्ग से ही वह ऊर्जा मिल सकती है, जो मनुष्य की सारी समस्याओं और कामनाओं को हल कर सकती है। श्रीकृष्ण कहते है बिना कर्म किए कोई भी व्यक्ति मुक्ति, यानी आवागमन से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकता है। गीता में कहा गया है-

न कर्मणामनारम्भान्नैष्क‌र्म्य पुरुषौश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धि समधिगच्छति। अर्थात मनुष्य कभी भी कर्म से छुटकारा नहीं पा सकता है और न कर्म को त्यागकर उसे पूर्णता, यानी सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है।

श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म को केवल मनुष्य का धर्म नहीं माना है, बल्कि इसे 'योग' भी कहा है। कहने का तात्पर्य यही है कि भगवत प्राप्ति के लिए कर्म एक साधना के समान है। जो लोग इसे साधना मानकर अपनाते है, वे न कभी भ्रमित होते है और न ही निराश होते है। अब प्रश्न यह उठता है कि कर्म करने के बाद हमें फल पाने की इच्छा जागृत हो जाती है, तो इस इच्छा से किस तरह से छुटकारा पाया जाए? इसका समाधान भी गीता में उपलब्ध है। फल की इच्छा कर्म के बाद जगना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है, लेकिन एक सच यह भी है कि यह इच्छा ही इनसान को बंधन में डालती है और किसी भी चीज के प्रति आसक्ति पैदा करती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते है-यदि आवागमन से छुटकारा चाहते हो, तो आसक्ति का त्याग कर दो। आगे वे कहते है कि चूंकि यह मानव शरीर बड़े भाग्य से मिला है, इसलिए इसे यज्ञ-मार्ग पर लगाना चाहिए, क्योंकि इससे न केवल तुम्हारी आसक्ति मिटेगी, बल्कि समाज का कल्याण भी होगा। साथ ही, आपकी आत्मा की उन्नति भी होगी। दरअसल, आत्म-उन्नति करना एक साधना और तप है और इससे ही हम परमात्मा से नजदीकी का अनुभव प्राप्त कर सकते है। सच तो यह है कि कर्म-मार्ग वह अनुपम रास्ता है, जो आत्मा और परमात्मा को जोड़ने का कार्य करता है। कहने का तात्पर्य यही है कि मोक्ष प्राप्ति का सरल और सहज रास्ता कर्म मार्ग में ही निहित है। इसलिए कर्म करते वक्त हम आत्म-केंद्रित रहें, न कि इन्द्रियों के वश में। गीता के अनुसार, जो व्यक्ति इंद्रियों से वशीभूत होकर कर्म करता है, वह भगवत मार्ग का पथिक कभी भी नहीं बन सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि अपनी आजीविका के लिए उसने जो कर्म चुना है, उसे पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करे! दरअसल, मन की चंचलता को संयमित करके कर्म करने वालों को समाज में न केवल आदर-सम्मान मिलता है, बल्कि उसका जीवन भी सार्थक कहलाता है।