In our heavenly land of Uttarakhand !
Himalayan peaks are like the Brahmi Kamal
A symbol of spiritual and religious sanctity.

The Himalayan mountains laden with dense Deodar forests
The peaks of Badri and Kedar
The rivers Ganga and Jamuna,
And Gaumukh the source of river Ganga
Adorn our beautiful land

Simple people,
The abode of Sadhus
This land has been purified thus.
Pilgrims from various lands
Throng to the Himalayan shrines
The multi coloured flowers in the meadows

The snow on the high peaks
Shimmering like gold
With the suns rays
Make this land heavenly !

The fog creeps up the hill side
playing hide and seek with the Deodar trees
The monsoon rain covers the hillside with wild flowers

This Himalayan land is beautiful !
As beautiful as the Brahmi Kamal
The Lotus amongst lotuses.

The Rhododendron trees laden with flowers
Decorate the mountains,
Like jewels studded in a crown !

The fruit is ripe
Come dear friend - Let us go to the forest
To eat the fruit of the bush
The leaves of the Oak tree have turned green
There is water in the roots of the Oak
Come, quench your thirst !

Pluck the Rhododendron flowers
But do not break its branches
Cut the dry branches of the Oak
But do not cut it from roots !
Cut grass, but not the branches
of the Deodar trees.
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Mera Dandi Kanthiyoon ka Muluk Jailyu

Mera dandi kanthiyoon ka muluk jailyu, Basant ritu ma jaiyi -2

Haira ban ma buraans ka phool, jab banaag lagana hola
Beeta pakhon tein fyolin ka phool, pingla rang ma rangyana hola
Laiyan paiyaan gweeraal phoolu na, holi dharti saji dekhi aai…
Basant ritu ma jaiyi…
Mera dandi....


Rangeela phagun holyeroon ki toli, dandi kanthiyo rangyani holi,
Kaika rang ma rangyun holu kwiyi, kwi mani-man ma rangshyani holi
Kirmichi kesari rang ki baar, prem ka rangon ma bheeji ayee
Basant ritu ma jaiyi….
Mera dandi....


Binsiri deylion ma khilda phool, raati gaon-gaon giterun ka geet,
Chaita ka bol, aujiyon ka dhol, mera rountela mulukey ki reet,
Mast bigraila baikhun ka thumka, -2
Bandhoon ka lasaka dekhi aiyee,
Basant ritu ma jaiyi...
Mera dandi....


Saina damala ar chaitai bayar, ghasyari geeton na gunjdi daandi
Khelyun ma rang-mat gwer chhora, atkada gor ghamdandi ghandi,
Ukhi phundey holu khatyun meru bhi bachpan, -2
Ukri sakli te ukri ki laiyi
Basant ritu ma jaiyi
Mera dandi kanthiyon ka muluk jailyu, Basant ritu ma jaiyi

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हिमालय की गोद में - देवभूमि उत्तराखंड

 

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड (उत्तरांचल) की संस्कृति, लोककला एवं लोकगीतों के बारे में इस वीडियो में जानकारी दे रहे हैं काकेश।

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मुट्ट बोटीकि रख

 

नरेंद्र सिंह नेगी ने 1994 में उत्तरकाशी में जब यह पंक्तियां लिखीं, तब सामने अलग राज्य का संघर्ष था। आज अलग राज्य तो है, लेकिन आम आदमी का संघर्ष वही है। ऐसे में उनका यह गीत आज मुझ जैसे न जाने कितने लोगों को संबल देता है।

 

द्वी दिनू की हौरि छ अब खैरि मुट्ट बोटीकि रख
तेरि हिकमत आजमाणू बैरि
मुट्ट बोटीक रख।

घणा डाळों बीच छिर्की आलु ये मुल्क बी
सेक्कि पाळै द्वी घड़ी छि हौरि,
मुट्ट बोटीक रख

सच्चू छै तू सच्चु तेरू ब्रह्म लड़ै सच्ची तेरी
झूठा द्यब्तौकि किलकार्यूंन ना डैरि
मुट्ट बोटीक रख।
हर्चणा छन गौं-मुठ्यार रीत-रिवाज बोलि भासा
यू बचाण ही पछ्याण अब तेरि
मुट्ट बोटीक रख।

सन् इक्यावन बिचि ठगौणा छिन ये त्वे सुपिन्या दिखैकी
ऐंसू भी आला चुनौमा फेरि
मुट्ट बोटीक रख।

गर्जणा बादल चमकणी चाल बर्खा हवेकि राली
ह्वेकि राली डांड़ि-कांठी हैरि
मुट्ट बोटीक रख।

 

घुघुती ना बासा, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।

तेर घुरु घुरू सुनी मै लागू उदासा
स्वामी मेरो परदेसा, बर्फीलो लदाखा, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।

रीतू आगी घनी घनी, गर्मी चैते की
याद मुकू भोत ऐगे अपुना पति की, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।

तेर जैस मै ले हुनो, उड़ी बेर ज्यूनो
स्वामी की मुखडी के मैं जी भरी देखुनो, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।

उडी जा ओ घुघुती, नेह जा लदाखा
हल मेर बते दिये, मेरा स्वामी पासा, घुघुती ना बासा
घुघुती ना बासा ssss, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा।

 

जन्म: 20 मई 1900
निधन: 28 दिसम्बर 1977

जन्म स्थान ग्राम कौसनी, अल्मोड़ा 

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ग्राम श्री

फैली खेतों में दूर तलक
मख़मल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिस से रवि की किरणें
चाँदी की-सी उजली जाली !

रोमाँचित-सी लगती वसुधा
आयी जौ-गेहूँ में बाली
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली
उड़ती भीनी तैलाक्त गन्ध
फूली सरसों पीली-पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली,
रँग-रँग के फूलों में रिलमिल
हँस रही संखिया मटर खड़ी,
मख़मली पेटियों-सी लटकी
छीमियाँ, छिपाये बीज लड़ी !

अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से
लद गयी आम्र-तरु की डाली,
झर रहे ढाँक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली !
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आड़ू, नीबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैगन, मूली !

पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल-लाल चित्तियाँ पड़ीं
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ीं !
लहलह पालक,महमह धनिया,
लौकी औ' सेम फली,फैलीं !
मख़मली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली !
गंजी को मार गया पाला,
अरहर के फूलों को झुलसा,
हाँका करती दिन-भर बन्दर
अब मालिन की लड़की तुलसा !
बालाएँ गजरा काट-काट,
कुछ कह गुपचुप हँसतीं किन-किन
चाँदी की-सी घण्टियाँ तरल
बजती रहती रह-रह खिन-खिन!

बगिया के छोटे पेड़ों पर
सुन्दर लगते छोटे छाजन,
सुन्दर गेहूँ, की बालों पर
मोती के दानों से हिमकन !
प्रात: ओझल हो जाता जग,
भू पर आता ज्यों उतर गगन,
सुन्दर लगते फिर कुहरे से
उठते-से खेत, बाग़, गॄह वन !

लटके तरुओं पर विहग नीड़
वनचर लड़कों को हुए ज्ञात,
रेखा-छवि विरल टहनियों की
ठूँठे तरुओं के नग्न गात !
आँगन में दौड़ रहे पत्ते,
धूमती भँवर-सी शिशिर-वात,
बदली छँटने पर लगती प्रिय
ऋतुमती धरित्री सद्य-स्नात !

हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से-खोये,-
मरकत डिब्बे-सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ-आच्छादन-
निरुपम हिमान्त में स्निग्ध-शान्त
निज शोभा से हरता न-मनज !

Peace
by Swami Vivekananda

(The following poetry is a selection from works of Swami Vivekananda and was composed by him at Ridgely Manor, New York, on 21st September, 1899.)

Behold, it comes in might,
The power that is not power,
The light that is in darkness,
The shade in dazzling light.

It is joy that never spoke,
And grief unfelt, profound,
Immortal life unlived,
Eternal death unmourned.

It is not joy nor sorrow,
But that which is between,
It is not night nor morrow,
But that which joins them in.

 

THOU BLESSED DREAM
by Swami Vivekananda

If things go ill or well-
If joy rebounding spreads the face,
Or sea of sorrows swells-
It is a dream, a play.

A play- we each have a part
Each one to weep or laugh as may;
Each one his dress to don-
Alternate shine or rain.

Thou dream, O blessed dream!
Spread far and near thy veil of haze,
Tone down the lines so sharp,
Make smooth what roughness seems.

No magic but in thee!
Thy touch makes desert bloom to life,
Harsh thunder, sweetest song,
Fell death, the sweet release.

 

कही एक मासूम नाजुक सी लडकी
 
कही एक मासूम नाजुक सी लडकी
बहुत खुबसुरत मगर सांवली सी
 
मुझे अपने ख्वाबों की बाहों में पाकर
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में कसमसा-कसमसाकर
सरहाने से तकिये गिराती तो होगी
 
वही ख्वाब दिन के मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन में लुभाते तो होंगे
कई साझ सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसख्ता धीमें धीमें सुरों में
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी
 
चलो खत लिखें जी में आता तो होगा
मगर उंगलियाँ कंपकपाती तो होगी
कलम हाथ से छुट जाता तो होगा
उमंगे कलम फिर उठाती तो होंगी
मेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकर
वो दातों में उंगली दबाती तो होगी
 
जुबाँ से कभी अगर उफ् निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे सुलगता तो होगा
कहीं के कहीं पाँव पडते तो होंगे
जमीं पर दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो

जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को

 

क्यूँ डराती है ये हवा
रईस अहमद 'फ़िगार

अक्स मेरा न तू दिखा मुझको

मेरी नज़रों से मत गिरा मुझको ।

 

मुझको रहने दे मेरे जैसा ही

अपने जैसा न तू बना मुझको ।

 

एक सूखा हुआ शज़र हूँ मैं

इतना ज़्यादा भी मत झुका मुझको ।

 

एक पैसा फकीर ने लेकर

बख़्श दी ढेर सी दुआ मुझको ।

 

भूल जाऊँ न मैं उड़ान अपनी

छोड़ कुछ देर तो खुला मुझको ।

 

टिमटिमाता चिराग़ हूँ मैं जब

क्यूँ डराती है ये हवा मुझको ।

 

बेरुखी बेहिसी और ख़ुदग़र्जी

शहर में आके ये मिला मुझको ।

 

मैं हूँ खुश्बू मुझे बिखरना है

ऐ हवा दूर तक उड़ा मुझको ।

 

कैसे कर लूँ ज़मीर का सौदा

रोकती है 'फ़िगार' अना मुझको ।

 

रईस अहमद 'फ़िगार'

56, जवाहर कॉलोनी, बल्लूपुर रोड

देहरादून, उत्तराखंड

Amir Khusro

Amir Khusro was born in 1253 in Patiyali (Etah district in U.P.). He compiled his first divan of poetry Tuhfatus-Sighr in 1250. He wrote the famous ‘Tughlaq Nama’ in 1321 and died in 1325.

Khusro is regarded as the first poet (Adikavi) of Hindi. His works are in a language which is a mixture of Braj, Hariyanvi, Khadi Boli, Farsi and sometimes Sanskrit. He himself called it Hindavi. The various styles of poetry used by him are:

 

1.      Dohe (दोहे) – These are generally composed of two lines and are very brief.

खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

 

2.     Keh-mukarni (कह-मुकरनी) – They are used to point to the ‘lover’ but they finally turn out to be some very mundane thing.

लिपट-लिपट के वाके सोई, छाती से छाती लगाके रोई।

दांत से दांत बजे तो ताड़ा, ऐ सखी साजन ? ना सखी जाड़ा।

 

3.     Dosukhne (दोसुखने) – In these two questions have the same answer and there is a pun.

समोसा क्यूं न खाया ? जूता क्यूं न पहना ? तला न था।

सितार क्यूं न बजा ? औरत क्यूं न नहाई ? परदा न था।

 

4. Paheliyaan (पहेलियाँ) – These are interesting riddles.

एक परख है सुंदर मूरत, जो देखे वो उसी की सूरत।

फिक्र पहेली पायी ना, बोझन लागा आयी ना।।

 

तुम इक गोरख धन्दा हो!!

कभी यहाँ तुम्हें ढूँढा, कभी वहाँ पहुँचा
तुम्हारी दीद की ख़ातिर कहाँ\-कहाँ पहुँचा
ग़रीब मिट गए, पामाल हो गए लेकिन
किसी तलक न तेरा आज तक निशां पहुँचा

हो भी नहीं और, हर जा हो
हो भी नहीं और, हर जा हो
तुम इक गोरख धन्दा हो!

हर ज़र्रे में किस शान से तू जल्वा\-नुमा है
हैरां है मगर अक़्ल के कैसा है तू, क्या है?
तुम इक गोरख धन्दा हो!

तुझे दैर\-ओ\-हरम में मैंने ढूँढा तू नहीं मिलता
मगर तशरीग\-फ़र्मा तुझे अपने दिल में देखा है!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

ढूँढे नहीं मिले हो, न ढूँढे से कहीं तुम
और फिर ये तमाशा है जहाँ हम हैं वहीं तुम!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

जब बजुज़ तेरे कोई दूसरा मौजूद नहीं
फिर समझ में नहीं आता तेरा पर्दा करना!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

जो उल्फ़त में तुम्हारी खो गया है
उसी खोए हुए को कुछ मिला है
नहीं है तू तो फिर इनकार कैसा?
नफ़ी भी तेरे होने का पता है

मैं जिसको कह रहा हूँ अपनी हस्ती
अगर वो तू नहीं तो और क्या है?
नहीं आया खयालों में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू खुदा है?
तुम इक गोरख धन्दा हो!

हैरां हूँ इस बात पे तुम कौन हो क्या हो?
हाथ आओ तो बुत, हाथ न आओ तो ख़ुदा हो!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

अक़्ल में जो घिर गया ल\-इन्तहा क्योंकर हुआ?
जो समझ में आ गया फिर वो ख़ुदा क्योंकर हुआ?
तुम इक गोरख धन्दा हो!

छुपते नहीं हो सामने आते नहीं हो तुम
जल्वा दिखाके जल्वा दिखाते नहीं हो तुम

दैर\-ओ\-हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम
जो अस्ल बात है वो बताते नहीं हो तुम
हैरां हूँ मेरे दिल में समाए हो किस तरह?
हालांके दो जहाँ में समाते नहीं हो तुम!

ये माबाद\-ओ\-हरम, ये कलीसा, वो दैर क्यों?
हर्जाई हो तभी तो बताते नहीं हो तुम!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

दिल पे हैरत ने अजब रँग जमा रखा है!
एक उलझी हुई तसवीर बना रखा है!
कुछ समझ में नहीं आता के ये चक्कर क्या है?
खेल क्या तुमने अज़ल से ये रचा रखा है!

रूह को जिस्म के पिंजरे का बनाकर कैदी
उसपे फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है!
ये बुराई, वो भलाई, ये जहन्नुम, वो बहिश्त
इस उलट\-फेर में फ़र्माओ तो क्या रखा है?
अपनी पहचान की खातिर है बनाया सबको
सबकी नज़रों से मगर खुद को छुपा रखा है!
तुम इक गोरख धन्दा हो!

राह\-ए\-तहक़ीक़ में हर ग़ाम पे उलझन देखूँ
वही हालात\-ओ\-खयालात में अनबन देखूँ

बनके रह जाता हूँ तसवीर परेशानी की
ग़ौर से जब भी कभी दुनिया का दर्पन देखूँ
एक ही ख़ाक़ पे फ़ित्रत के तजादात इतने!
इतने हिस्सों में बँटा एक ही आँगन देखूँ!

कहीं ज़हमत की सुलग़ती हुई पत्झड़ का समा
कहीं रहमत के बरसते हुए सावन देखूँ

कहीं फुँकारते दरिया, कहीं खामोश पहाड़!
कहीं जंगल, कहीं सहरा, कहीं गुलशन देखूँ
ख़ून रुलाता है ये तक़्सीम का अन्दाज़ मुझे
कोई धनवान यहाँ पर कोई निर्धन देखूँ

दिन के हाथों में फ़क़त एक सुलग़ता सूरज
रात की माँग सितारों से मुज़ईय्यन देखूँ

कहीं मुरझाए हुए फूल हैं सच्चाई के
और कहीं झूठ के काँटों पे भी जोबन देखूँ!

रात क्या शय है, सवेरा क्या है?
ये उजाला, ये अंधेरा क्या है?

मैं भी नायिब हूँ तुम्हारा आख़िर
क्यों ये कहते हो के "तेरा क्या है?"
तुम इक गोरख धन्दा हो!

जो कहता हूँ माना तुम्हें लगता है बुरा सा
फिर भी है मुझे तुमसे बहर\-हाल ग़िला सा
हर ज़ुल्म की तौफ़ीक़ है ज़ालिम की विरासत
मज़लूम के हिस्से में तसल्ली न दिलासा

कल ताज सजा देखा था जिस शक़्स के सर पर
है आज उसी शक़्स के हाथों में ही कासा!
यह क्या है अगर पूछूँ तो कहते हो जवाबन
इस राज़ से हो सकता नहीं कोई शनासा!

तुम इक गोरख धन्दा हो!!

 

6 Reasons to Drink Wine

by Debra Gordon

Why a little glass each day may do you good.

The list of wine’s benefits is long—and getting more surprising all the time. Already well-known as heart-healthy, wine in moderation might help you lose weight, reduce forgetfulness, boost your immunity, and help prevent bone loss.

With America likely to edge out France and Italy in total wine consumption in the near future, according to one analyst, and with women buying more than 6 out of every 10 bottles sold in this country, we’re happy to report that wine may do all of the following:

1. Feed your head
Wine could preserve your memory. When researchers gave memory quizzes to women in their 70s, those who drank one drink or more every day scored much better than those who drank less or not at all. Wine helps prevent clots and reduce blood vessel inflammation, both of which have been linked to cognitive decline, as well as heart disease, explains Tedd Goldfinger, DO, of University of Arizona School of Medicine. Alcohol also seems to raise HDL, the good cholesterol, which helps unclog your arteries.

2. Keep the scale in your corner
Studies find that people who drink wine daily have lower body mass than those who indulge occasionally; moderate wine drinkers have narrower waists and less abdominal fat than people who drink liquor. Alcohol may encourage your body to burn extra calories for as long as 90 minutes after you down a glass. Beer seems to have a similar effect.

3. Boost your body’s defenses
In one British study, those who drank roughly a glass of wine a day reduced by 11 percent their risk of infection by Helicobacter pylori bacteria, a major cause of gastritis, ulcers, and stomach cancers. As little as half a glass may also guard against food poisoning caused by germs like salmonella when people are exposed to contaminated food, according to a Spanish study.

4. Guard against ovarian woes
When Australian researchers recently compared women with ovarian cancer and cancer-free women, they found that roughly one glass of wine a day seemed to reduce the risk of the disease by as much as 50 percent. Earlier research at the
University of Hawaii produced similar findings. Experts suspect this may be due to antioxidants or phytoestrogens, which have high anticancer properties, in the wine. And in a recent University of Michigan study, a red wine compound helped kill ovarian cancer cells in a test tube.

5. Build better bones
On average, women who drink moderately seem to have higher bone mass than abstainers. Alcohol appears to boost estrogen levels; the hormone seems to slow the body’s destruction of old bone more than it slows the production of new bone.

6. Prevent blood-sugar trouble
Premenopausal women who drink one or two glasses of wine a day are 40 percent less likely than women who don’t drink to develop type 2 diabetes, according to a 10-year study by
Harvard Medical School. While the reasons aren’t clear, wine seems to reduce insulin resistance in diabetic patients.

Freelance writer Debra Gordon, a pinot noir fan, specializes in health reporting.

 

कटोरा भर याद में डूबी टिहरी
मोहन थपलियाल(संस्मरण)

बचपन की धुँधली यादों में टिहरी मेरे दिमाग़ में तब से उभरता है, जब पाँच वर्ष का होने पर पीले कपड़ों में मेरा मुंडन कराया जा रहा था। हमारा घर, जहाँ मैं पैदा हुआ था, दयाराबाग में था, यानी भिलंगना नदी के दाहिने किनारे, मदननेगी-प्रतापनगर जाने वाली सड़क के पहले पड़ाव पर। नीचे कंडल गाँव था, जहाँ की सिंचित ज़मीन बहुत उपजाऊ मानी जाती थी। टिहरी के घंटाघर की तरफ़ से चलें तो भादू की मगरी तक सीधा रास्ता था। फिर भिलंगना की घाटी में नीचे उतरना पड़ता था, जहाँ एक पुल था और फिर पुल के पार दयाराबाग का किनारा छूते हुए खड़ी चढ़ाई पर यह सड़क प्रतापनगर तक जाती थी, जहाँ टिहरी के महाराजा ने अपने ग्रीष्मावकाश के लिए एक महल बनाया हुआ था।

साल के ज़्यादातर दिनों में दयाराबाग होकर मदननेगी-प्रतापनगर जाने वाली सड़क सुनसान ही रहती थी। सिर्फ़ सामान ढोते खच्चरों के गले पर बँधे खांकरों की खन-खन और उनके पीछे-पीछे चलते प्रजापत (हाँकने वाला)  के गले से उठती-लंबी हूक ही यदा-कदा इस सन्नाटे को तोड़ती थी। गर्मियाँ शुरू होने पर किसी एक दिन चार-पाँच जीपों का काफ़िला मदननेगी की चढ़ाई पर प्रतापनगर की ओर कूच करता था। इन जीपों में महारानी की सेविकाएँ रहती थीं, जिन्हें स्थानीय लोग 'छोरियाँ' कहते थे। पर्दा लगी जीप में आख़िर में राजा-रानी होते थे। राजा-रानी की एक मोटर स्टेशन वैगननुमा भी थी, जो टिहरी के दरबार से सिमजारू की तरफ़ जाते हुए कभी-कभी दिख जाया करती थी- इसका रंग गाढ़ा बादामी था।

प्रतापनगर का महल मैंने देखा था, लेकिन जैसा कि पिताजी बताया करते थे, इसमें जो कालीन बिछे थे, उन्हें राजा ने स्विटजरलैंड से मँगाया था। बिजली की व्यवस्था के लिए जनरेटर अलग से था। इसी तरह टिहरी कस्बे में भी डायनमो से चलने वाली बिजली की व्यवस्था थी।

भिलंगना पर मोटर पुल नहीं था। प्रतापनगर तक जाने वाली जीप की सड़क कामचलाऊ थी। सिर्फ़ जब राजा-रानी को जाना होता था, उन्हीं दिनों यह सड़क जीप की सड़क चलने लायक बना दी जाती थी। मोटर पुल भागीरथी पर भी नहीं था- इसलिए टिहरी शहर में चलने वाली राजा की जीप व मोटरों को तोड़कर ही फिर जोड़ा जाता था। भिलंगना नदी के पुल पर राजा की जीपों के काफ़िले को उस पार कराने में टी.जी.एस.एफ.(टिहरी गढ़वाल स्टेट फोर्स) की मदद ली जाती थी। एक बांस को बेड़ा बना कर उस पर जीप चढ़ा दी जाती थी और फि रस्सों के सहारे बेड़े को आर-पार बाँध कर- जीप उस पार करा दी जाती थी। एक बार भिलंगना नदी पार करते हुए राजा-रानी की जीप डूबते-डूबते बचा ली गई थी। उस शाम पूरी टिहरी में लड्डू बाँटे गए थे।

टिहरी के राज परिवार में जब कोई बड़ा जश्न होता था, तो पूरी टिहरी में रोशनी की जाती थी। रात भर पूरी टिहरी जगमगाती थी। भादू की मगरी, सिमलासू, चणौखेत, घंटाघर, नया दरबार, पुराना दरबार - हर कहीं रोशनी रहती थी। यह रोशनी बिजली या मोमबत्ती का कम ज़मीन में गाड़े गए चीड़ के छिलकों की अधिक होती थी। ऐसे एक जश्न की रोशनी की याद मेरी स्मृति में है, लेकिन वह जश्न किस खुशी में मनाया गया था, यह मुझे याद नहीं है। संभव है उस रोज़ मानवेंद्र शाह का कॉरोनेशन (राजगद्दी) समारोह रहा हो। यह 46-47 की बात है- नरेंद्र शाह तब जीवित थे। उनकी मृत्यु कुछ समय बाद एक कार दुर्घटना में नरेंद्र नगर से टिहरी आते हुए कुमार खेड़ा के मोड़ पर हुई थी- उस दिन मैं नरेंद्र नगर में ही था।

टिहरी से जुड़ी पुरानी यादों में उस दिन की भीड़ भी मेरे दिमाग़ में है, जब शायद कॉमरेड नागेंद्र दत्त सकलानी की पुलिस की गोली से मौत होने पर, उनकी लाश को लेकर आगे बढ़ता जुलूस टिहरी शहर की ओर. . .आ रहा था।

पिताजी का दफ़्तर चणौखेत में था। शहतूत पकने के दिनों में दफ़्तर से घर लौटते हुए उनकी जेबों में हमारे लिए शहतूत भरे होते थे। दयाराबाग आने वाली सड़क पर जो शहतूत के पेड़ होते थे, उनकी टहनियों को छड़ी की सहायता से लपक कर पिताजी शहतूत इकठ्ठा कर लेते थे। इसके अलावा जाड़े के दिनों में कभी मूँगफल्ली और कभी चना उनकी जेबों में होते थे, लेकिन किसी ऐसे दिन जब वे राजा की ख़ास दावत में शामिल होकर लौटा करते, तब उनकी हर जेब काजू-पिस्ता व बादामों से भरी होती थी। ऐसे दिन पिताजी काली अचकन, सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा और पगड़ी पहन कर ही 'दरबार' के लिए निकला करते थे। राजा के लिए वह 'सरकार' संबोधन का प्रयोग किया करते थे- मसलन आज सरकार विलायत से आ रहे हैं या कल सरकार दिल्ली जा रहे हैं।

कभी-कभी पिताजी मुझे बाज़ार भी ले जाते थे। मैं उनकी अंगुली पकड़े रहता और घंटाघर से नीचे की उतराई पर सँभल-सँभल कर कदम रखता था। एक दिन एक किताब की दुकान में भी वह मुझे लेकर गए थे। इस दुकान में जो पहली किताब उन्होंने मेरे लिए ख़रीदी थी वह अंग्रेज़ी की 'न्यू मैथड रीडर' थी। घर पहुँच कर उन्होंने उसी दिन से पहला सबक खोल कर मुझे रटने को दे दिया था। इस पहले सबक का एक वाक्य, जो मुझे आज भी याद है- 'ऐन आस्स' (एक गधा) था। असल में स्पेलिंग रटने की कसरत में जब कई बार मुझसे चूक हो जाती तो यही शब्द दोहराते हुए पिताजी मेरी मुड़ी झिमड़ाने को आगे बढ़ आते थे। अंग्रेज़ी पढ़ाने का उनका तरीका यद्यपि बहुत नीरस था, जिसका नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज़ी में मेरी दिलचस्पी कभी नहीं बढ़ी (आज भी ख़ास नहीं है)। लेकिन बुनियाद थोड़ा मज़बूत हो जाने के कारण इसका फ़ायदा यह हुआ कि बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के मैं स्कूली कक्षाओं में अंग्रेज़ी में खूब नंबर पा जाता था- कभी-कभी पूरे क्लास में सर्वाधिक नंबर मेरे ही होते थे।

दयाराबाग के दिनों में पिताजी- जंगलात विभाग की नौकरी में थे, इसलिए जिन दिनों घुमंतू गूजर अपनी भैसों को लेकर प्रतापनगर की तरफ़ जाते थे, हमारे घर में दूध, घी और मक्खन की आमद ज़रूरत से ज़्यादा हो जाती थी। पीतल के बड़े-बड़े बंठों में गुजर दूध दे जाते थे या फिर जिस-जिस घर में पिताजी कह देते, वहाँ दूध-मक्खन पहुँच जाता था।

दयाराबाग के इर्द-गिर्द उस वक्त कुछ बगीचे और झाड़ियाँ थीं। एक बहुत बड़ा आम का बगीचा किन्हीं मियाँ जी का था। उनकी कोठी भी बड़ी थी। दयाराबाग की झाड़ियों में मैंने अपने जीवन में पहली और आख़िरी बार रत्ती की झाड़ियाँ भी देखी थीं। इन झाड़ियों पर लाल-काली रत्तियों को देखना और फिर तोड़ कर उन्हें मुठी में भर लाना, तब मेरे लिए कितना सुखद और चमत्कारी अनुभव होता, इसकी व्याख्या करना आज काफ़ी मुश्किल है। 1947 में ही हमारा परिवार टिहरी छोड़कर अपने पैतृक गाँव (पौड़ी गढ़वाल) चला आया था। हालाँकि पिताजी रियासत मर्ज़ होने के बाद 1949 में उत्तर प्रदेश सरकार की पेंशन लेकर ही घर लौटे।

आई.टी.बी.पी. में भर्ती होने पर लगभग 19 वर्ष बाद मैं फिर 1966 के अप्रैल महीने में वायरलेस ऑपरेटर बन कर टिहरी पहुँचा। हमारी पाँचवी बटालियन का हेडक्वार्टर सिमलासू में बनाया गया था, जहाँ राजा के बनाए हुए काफ़ी कोठी-बंगले थे, जिनमें से एक कोठी के बारे में यह कहा जाता था कि गवर्नर हेली के आने पर उसका निर्माण दिन रात कार्य चलाकर एक हफ्ते में पूरा कराया गया था। इससे पता चलता है कि बेगारी उस समय कितनी सख़्ती से ली जाती थी। यह कोठी १९६६ में पी.डब्लू.डी. का इंस्पेक्शन हाउस हुआ करती थी। बाकी कोठी और बंगलों पर आई.टी.बी.पी. ने कब्जा कर लिया था। इन्हीं में गोल कोठी नाम से वह इमारत भी थी, जिसमें कभी स्वामी रामतीर्थ रहा करते थे। स्वामी रामतीर्थ टिहरी राजा के प्रश्रय में लंबे समय तक रहे थे और टिहरी प्रवास के दौरान ही राजा ने उनकी जापान आदि विदेश यात्राओं का प्रबंध कराया था। सिमलासू के नीचे भिलंगना नदी के तट पर ही रोज़ स्वामी रामतीर्थ स्नान के लिए आते थे और तट के समीप स्थित एक छोटी-सी गुफ़ा में तप साधना भी किया करते थे। दीवाली के दिन ही नहाते समय उनकी मौत भिलंगना नदी में डूबने से हो गई थी। स्वामी के भक्तों के अनुसार वे डूबे नहीं थे, बल्कि उन्होंने स्वयं ही जलसमाधि ले ली थी।

उन दिनों मैं अपने एक दार्शनिक रुचि के मित्र श्री प्रेम बल्लभ जोशी के साथ घंटों इस गुफ़ा में बैठ कर साहित्य व दर्शन पर मिलीजुली चर्चाएँ करता रहता था। डॉ. राधाकृष्णन का दर्शन जोशी जी का प्रिय विषय था और उनकी किताबें पढ़ कर वह चर्चा करने बैठ जाते थे। स्वामी रामतीर्थ के ऊपर एक किताब मैंने भी उन्हीं दिनों पैन्युली बुकसेलर की दुकान से ख़रीदी थी। इसी किताब से मुझे यह पता चला था कि हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार सरदार पूर्णसिंह ('मजदूरी और प्रेम' शीर्षक निबंध के लेखक) स्वामी रामतीर्थ के सेक्रेटरी थे। कुछ समय बाद सिमलासू के ऊपर मोटर सड़क के किनारे स्वामी रामतीर्थ की मूर्ति का अनावरण भी हुआ था और गोल कोठी पर भी एक शिला लेख इस आशय का लगाया गया था कि वहाँ कभी स्वामी रामतीर्थ ठहरे थे। बहरहाल, उन दिनों गोल कोठी में आई.टी.बी.पी. का शस्त्रागार था, जिस पर चौबीसों घंटे कड़ा पहरा रहता था।

1966-67 के इन्हीं दिनों में टिहरी में भागीरथी पर बांध बाँध जाने और सुरंग बनाने का काम शुरू हुआ। कुछ बड़ी और विशालकाय मशीनों की आमद के साथ-साथ उड़ीसा प्रांत से आए कुछ मजदूर चेहरों का आगमन भी शुरू हो चुका था, लेकिन बांध निर्माण की इस प्रक्रिया में तब सिर्फ़ हलचल ही नज़र आती थी, समर्थन या प्रतिरोध जैसी कोई बात नहीं थी। हर किसी सरकारी निर्माण योजना की तरह पूरा काम खामोश या हस्बमामूल ढंग से चलता रहता था। हाँ, उड़ीसा से आए दिहाड़ी मजदूरों के ख़िलाफ़ स्थानीय मजदूरों के चेहरों पर चढ़ती चिढ़ साफ़ देखी जा सकती थी।

बचपन की स्मृतियों से अलग टिहरी अब काफ़ी बदली हुई-सी लगती थी। बाज़ार में यहाँ भी पंजाबी शरणार्थियों की काफ़ी दुकानें फैल गई थीं। अब यहाँ से सिमलासू होते हुए मोटर सड़क घुंटी धनसाली और पौखाल-डांग चौरा-श्रीनगर तक भी जाती थीं। अब भागीरथी पर पक्का मोटर पुल था और जो मोटर अड्डा कभी अठूर की तरफ़ हुआ करता था, वह अब पुराने दरबार के नीचे आ गया था। हाँ, प्रतापनगर जाने वाली सड़क की हालत, जिसपर कभी राजा की जीपें गुज़रती थीं और भी खस्ता हो गई थी। इस पर कोई वाहन नहीं चल सकता था।

सिमलासू में राजा के जो आम के बगीचे थे, वे अब उद्यान विभाग की देख-रेख में आ गए थे और बाकी के खाली पड़े मैदान में आई.टी.बी.पी. के तंबू तन गए थे। 1966 से 71 तक मैं सिमलासू के अलावा ऋषिकेश, मातली, हुडोली (पुरोला) और महीडांडा नामक और भी स्थानों में भी रहा, लेकिन इन पाँच-छः वर्षों में कई बार तीन-तीन, चार-चार महीनों तक सिमलासू में भी ठिकाना बना रहा, क्योंकि बटालियन हेडक्वार्टर होने के नाते यहाँ आना ज़रूरी हो जाता था। टिहरी बाज़ार में धनराज एंड सन्स की जनरल मर्चेंट की ख़ासी बड़ी दुकान थी, जिससे हम अपनी ज़रूरत का छोटा-मोटा सामान ख़रीदा करते थे। भिलंगना और भागीरथी के संगम तक हम लोग घूमने जाया करते थे और कभी-कभी घंटों संगम के किनारे बैठे रहा करते थे।

सिमलासू में मैंने उन दिनों टिहरी की सुमन लाइब्रेरी से लेकर दॉस्तोयवस्की का प्रसिद्ध उपन्यास 'अपराध और दंड' ('क्राइम एंड पनिशमेंट का हिंदी अनुवाद') भी पढ़ा था। फ़ुर्सत के वक्त अपने एक दोस्त ( एस.पी. दुबे) के साथ तंबू से बाहर निकल कर हम दोनों किसी आम के पेड़ के नीचे आकर बैठ जाते और फिर उपन्यास पढ़ना शुरू कर देते थे। मैं जब पढ़ते-पढ़ते थकने लगता, तब दुबे पढ़ना शुरू कर देता। शायद तीन-चार रोज़ में हमने पूरा उपन्यास पढ़ डालाथा और बीच-बीच में बहसें भी की थीं। ऐसा लगता था जैसे उपन्यास का प्रमुख पात्र रासकोल्नी कोव भी हमारे साथ ही घूम फिर रहा है।

टिहरी की मिठाइयों में सिंगोरी का बड़ा नाम था। यह मालू के पत्ते पर चिलम के आकार में लपेट कर बनाई गई खोये की मिठाई हुआ करती थी, जिसका स्वाद तो खालिस खोये की मिठाइयों जैसा ही होता था, लेकिन पत्ते पर लिपटी होने की वजह से बहुत अधिक आदिम और अनोखी दिखती थी।

और कोई अनूठी याद टिहरी कस्बे की मेरे जेहन में नहीं है। कटोरे की तरह का यह कस्बा जो कुदरती तौर पर पहाड़ियों के बीच खुद-ब-खुद डूबा हुआ था, बांध बन जाने के बाद सचमुच एकदिन पानी के भीतर विलीन हो जाएगा, तब ऐसा ख़याल कहाँ से आता?

टिहरी जहाँ था, वहाँ कुछ ही समय बाद पानी की हिलोरें होंगी, झील का फैला हुआ ठंडा-नीला विस्तार होगा- इस झील का सौंदर्य चाहे कितना मनोहारी क्यों न हो, पहली नज़र में उसका नज़ारा मेरे लिए रुलाने वाला ही होगा- उस तरल द्रव्य में, जो झील के अलावा मेरी आँखों में भी भर आया होगा और मैं सिर्फ़ दयाराबाग ढूँढ़ने की ही कोशिश कर रहा होऊँगा।


 

गीता से आत्मोन्नति

 

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को जो उपदेश दिया था, वह आज हमारे लिए धर्म ग्रंथ है। और इस ग्रंथ में उन सभी महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख है, जो मनुष्य के चारों पुरुषार्थो-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दिशा निर्देशित करता है। इसके अलावा, इसमें भक्ति और कर्म की महत्ता का भी समन्वय किया गया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि गीता में ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप की व्याख्या जिस रूप में की गई है, उसे साधारण ज्ञान वाले व्यक्ति भी आसानी से समझ सकते है। यही वजह है कि कुछ विद्वान इसे कर्म-प्रधान धर्म ग्रन्थ कहते हैं, तो कुछ इसे ज्ञान प्रधान या भक्ति मार्ग का अद्भुत धर्म ग्रंथ बताते है।

वास्तव में, इसमें तीनों मार्गो को समाहित किया गया है। 'जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' वाली बात इस महान धर्म ग्रंथ के हर श्लोक में दिखाई पड़ती है। ध्यान दें कि गीता के कर्म मार्ग का उपदेश समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित करता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते है कि हे अर्जुन, यह जीवन हमारे किए गए कर्मो पर ही आधारित है, इसलिए कर्म करना प्रत्येक मानव का धर्म है। हमें सारी चिंताओं को त्यागकर अपने कर्तव्य-पालन में लग जाना चाहिए। दरअसल, कर्म मार्ग से ही वह ऊर्जा मिल सकती है, जो मनुष्य की सारी समस्याओं और कामनाओं को हल कर सकती है। श्रीकृष्ण कहते है बिना कर्म किए कोई भी व्यक्ति मुक्ति, यानी आवागमन से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकता है। गीता में कहा गया है-

न कर्मणामनारम्भान्नैष्क‌र्म्य पुरुषौश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धि समधिगच्छति। अर्थात मनुष्य कभी भी कर्म से छुटकारा नहीं पा सकता है और न कर्म को त्यागकर उसे पूर्णता, यानी सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है।

श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म को केवल मनुष्य का धर्म नहीं माना है, बल्कि इसे 'योग' भी कहा है। कहने का तात्पर्य यही है कि भगवत प्राप्ति के लिए कर्म एक साधना के समान है। जो लोग इसे साधना मानकर अपनाते है, वे न कभी भ्रमित होते है और न ही निराश होते है। अब प्रश्न यह उठता है कि कर्म करने के बाद हमें फल पाने की इच्छा जागृत हो जाती है, तो इस इच्छा से किस तरह से छुटकारा पाया जाए? इसका समाधान भी गीता में उपलब्ध है। फल की इच्छा कर्म के बाद जगना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है, लेकिन एक सच यह भी है कि यह इच्छा ही इनसान को बंधन में डालती है और किसी भी चीज के प्रति आसक्ति पैदा करती है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते है-यदि आवागमन से छुटकारा चाहते हो, तो आसक्ति का त्याग कर दो। आगे वे कहते है कि चूंकि यह मानव शरीर बड़े भाग्य से मिला है, इसलिए इसे यज्ञ-मार्ग पर लगाना चाहिए, क्योंकि इससे न केवल तुम्हारी आसक्ति मिटेगी, बल्कि समाज का कल्याण भी होगा। साथ ही, आपकी आत्मा की उन्नति भी होगी। दरअसल, आत्म-उन्नति करना एक साधना और तप है और इससे ही हम परमात्मा से नजदीकी का अनुभव प्राप्त कर सकते है। सच तो यह है कि कर्म-मार्ग वह अनुपम रास्ता है, जो आत्मा और परमात्मा को जोड़ने का कार्य करता है। कहने का तात्पर्य यही है कि मोक्ष प्राप्ति का सरल और सहज रास्ता कर्म मार्ग में ही निहित है। इसलिए कर्म करते वक्त हम आत्म-केंद्रित रहें, न कि इन्द्रियों के वश में। गीता के अनुसार, जो व्यक्ति इंद्रियों से वशीभूत होकर कर्म करता है, वह भगवत मार्ग का पथिक कभी भी नहीं बन सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि अपनी आजीविका के लिए उसने जो कर्म चुना है, उसे पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करे! दरअसल, मन की चंचलता को संयमित करके कर्म करने वालों को समाज में न केवल आदर-सम्मान मिलता है, बल्कि उसका जीवन भी सार्थक कहलाता है।