HOME: S. K. PANDEY-एस. के. पाण्डेय ।। पतितपावन राम नाम सो न दूसरो । सुमिर सुभूमि भयो तुलसी सो ऊसरो ।।


 । आरत आरति भंजन रामु, गरीबनेवाज न दूसरों ऐसो ।।



पाहि  कहत दुःख दीन जभी  करुनाकर ! टारत भार तभी 

चित करौ मोर रघुनाथ कभी । नहि और मेरा तुम नाथ सभी 



नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगम सीतासमारोपित वामभागम्

पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ।।



लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं 

कारुण्य रूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ।।




मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं ।

वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ।।

 





            ।।  राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम  ।।

 

 

राजीवनयन धरे धनु सायक । भगत विपति भंजन सुखदायक ।।

 

जो  माया  सब  जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ।।

 

सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ।।

 

सोइ सच्चिदानंद  घन रामा । अज बिग्यान रूप बल धामा ।।

 

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ।।

 

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ।।

 

निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ।।

 

प्रकृति  पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।।

 

इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रवि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ।।

 

राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तँह मोह   निसा  लवलेसा ।।

 

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस  ज्ञान गुन धामू । ।


जासु अंस उपजहिं गुनखानी  अगनित लच्छि उमा ब्रम्हानी ।।


भृकुटि बिलास जासु जग होई राम बाम दिसि सीता सोई ।। 


जगदात्मा महेश पुरारी । जगत जनक सबके हितकारी ।।

 

शंकरु जगतवंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ।।

 

बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू 


प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना  जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ।।


बंदउँ लछिमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुखदाता  


रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी 


महावीर विनवउँ हनुमाना  राम जासु जस आप बखाना  


पवन तनय बल पवन समाना । वुद्धि विवेक विज्ञान  निधाना ।।

 

हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ रामचरन अनुरागी 


गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार-बार प्रभु निज मुख गाई 


          

                               -गोस्वामीतुलसीदासजी (श्रीरामचरितमानस से ) 

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कहाँ जाँउ, कासों  कहौं, कौन सुनै दीनकी ।

 

त्रिभुवन तुही गति सब अंगहीनकी ।।

 


जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं ।

 

निराधार के अधार गुनगन तेरे हैं ।।

 


गजराज-काज खगराज तजि धायो को ।

 

मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय जायो को ।।

 


मोसे कूर कायर कुपूत कौड़ी आध के ।

 

किये बहुमोल तैं करैया गीध-श्राधके ।।

 


तुलसी की तेरे ही बनाये, बलि बनैगी ।


प्रभुकी बिलम्ब-अंब  दोष-दुख जनैगी ।।

 

 

                                 -गोस्वामीतुलसीदासजी ( विनयपत्रिका से ) 

 

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                                  (1)

 

 

बालि-सो बीरू बिदारि सुकंठु, थप्यो, हरषे सुर बाजने बाजे 

 

पल में दल्यो दासरथीं दसकंधरूलंक बिभीषनु राज बिराजे ।।

 

राम सुभाउ सुनें ‘तुलसी’ हुलसै अलसी हम-से गलगाजे 

 

कायर कूर कपूतनकी हदतेउ गरीबनेवाज नेवाजे ।।

 

 

 

                                             (2)




प्रभु सत्य करी प्रहलाद गिराप्रगटे  नरकेहरि खंभ महाँ ।

 

 झषराज ग्रस्यो गजराजुकृपा तत्काल बिलंबु कियो न तहाँ ।।

 

 सुर साखि दै राखी है पांडुबधू पट लूटतकोटिक भूप जहाँ ।

 

 तुलसी ! भजु सोच-विमोचन कोजनको पनु राम न राख्यो कहाँ ।।

 

 

 

                                  (3)




जड पंच मिलै जेहिं देह करीकरनी  लखु धौं धरनीधरकी ।

 

 जनकी कहुक्यों करिहै न संभारजो सार करै सचराचर की ।।

 

 तुलसी ! कहु राम समान को आन हैसेवकि जासु रमा घरकी ।

 

 जगमें गति जाहि जगत्पतिकी परवाह है ताहि कहा नरकी  ।।

 

 

 

                 (4)

 

काननभूधरबारिबयारिमहाबिषुब्याधिदवा-अरि घेरे ।

 

 संकट कोटि जहाँ ‘तुलसी’, सुमातुपिताहितबन्धु न नेरे ।।

 

 राखिहैं रामु कृपालु तहाँहनुमानु-से सेवक हैं जेहि केरे ।

 

 नाकरसातलभूतल में रघुनायकु एकु सहायकु मेरे ।।

 

 




                                   (5)

 

नरनारि उघारि सभा महुं होत दियो पटुसोचु हरयो मनको ।

 

 प्रहलाद बिषाद-निवारनबारन-तारनमीत अकारनको ।।

 

 जो कहावत दीनदयाल सहीजेहि भारू सदा अपने पनको

 तुलसी’ तजि आन भरोस भजेंभगवानु भलो करिहैं जनको ।।

 

                           (6)


सोक समुद्र निमज्जत काढि कपीसु कियो, जगु जानत जैसो

 नीच निसाचर बैरि को बंधु बिभीषनु कीन्ह पुरंदर कैसो ।।

 नाम लिएँ अपनाइ लियो तुलसी-सो, कहौं जग कौन अनैसो

 आरत आरति भंजन रामु, गरीबनेवाज न दूसरों ऐसो ।।

 

                      

                   -गोस्वामीतुलसीदासजी (कवितावली से ) 

  

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                        (1)


             


               

               दूजा नहीं को हमारे

                  




दूजा नहीं को हमारे

रहौं रामजी के सहारे

 

दीन-मलीन के राम सहायक

यक गति राम हमारे रहौं रामजी के सहारे


धीर धरम धुर धारी सियावर

द्रवहिं दीन पुकारे रहौं रामजी के सहारे


जब-जब दीन प्रभु राम पुकारे

प्रभुजी धीर न धारे रहौं रामजी के सहारे


आरतपाल बड़े कृपाल

दुखियों के सब दुःख  टारे रहौं रामजी के सहारे 


जनहित कारन राम दयानिधि

नाना वपु जग धारे रहौं रामजी के सहारे


सरल सबल प्रभु रीझत थोरे

बारक राम उचारे रहौं रामजी के सहारे


सुमुख सुलोचन सोच विमोचन

पतितन कोटि उधारे रहौं रामजी के सहारे


करुनासागर जनहित आगर

गुनगन जग उजियारे रहौं रामजी के सहारे


एक अवलंब तुम्ही जग स्वामी

फिर क्यों मोहि बिसारे रहौं रामजी के सहारे


साधनहीन संतोष रघुनायक

तुम बिनु कौन निहारे रहौं रामजी के सहारे




                                     (2)

                                         


                         जग में करो एक काम 





जग में करो एक काम

                            

                           भज लो राम प्रभू का नाम 

 

शिवजी भजते, गौरा भजतीं

                            

                           भजते मुनि निष्काम ।  भज लो राम ।।

 

सहज सलोना नाम है सोना

                              

                            सकल लोक अभिराम ।  भज लो राम ।।

 

पतित उधारे दीन को तारे

                                 

                             नाम बड़ा सुखधाम ।  भज लो राम ।।

 

भव से तारे पार उतारे

                        

                          मिल जाये राम का धाम ।  भज लो राम ।।

 

लोक बने परलोक बनाये

                          

                               नाम भजो अविराम ।  भज लो राम ।।

 

काम बनाये राम रिझाये

                          

                                 नाम है पूरनकाम    भज लो राम ।।

 

पाप मिटे दुःख दोष नसाये

                           

                                दूजा नहीं ऐसा नाम    भज लो राम ।।

 

दीन दुखी का साचा साथी

                            

                                 कह गये राम गुलाम ।  भज लो राम ।।

 

संतोष सकल सुखदायक

                           

                                 राम नाम तरु काम     भज लो राम ।।

 

                       

                                         (3)


                          राम जी का लागा दरबार 



राम जी का लागा दरबार 

 तिहुँपुर होए जय-जयकार ।


भरत, लखन, रिपुसूदन

 कर जोरे पवनकुमार । तिहुँपुर होए  ।।


बैठे सिया संग रम्य सिंघासन 

वर मुद्रा प्रभु धार  । तिहुँपुर होए  ।।


शोभा अनुपम अमित बिराजे 

 देखत मिटे मद मार । तिहुँपुर होए  ।।


शारद, शेष, निगम गुन गावत 

 महिमा अमित अपार । तिहुँपुर होए  ।।


शिव, अज, नारद सकल विशारद 

 पावत कोई न पार । तिहुँपुर होए  ।।


बानर, भालू, गीध, निसाचर 

सबकी पहुँच दरबार । तिहुँपुर होए  ।।


सरल, सबल  प्रभु सा नहि कोई

 सियावर  परम उदार  । तिहुँपुर होए  ।।


करुनासागर सब गुन आगर

 निराधार  अधार । तिहुँपुर होए  ।।


दरबार नहीं कोई कहीं ऐसा 

खोजहु बार हजार । तिहुँपुर होए  ।।


कहाँ लगि कहौं अमित प्रभुताई 

जीवन होत निसार । तिहुँपुर होए  ।।


असरन-सरन दीन जन  गाहक

संतोष  खड़ा है दुवार । तिहुँपुर होए  जय  जयकार।।

 


                                                        


                                                              -एस. के. पाण्डेय (मंगलगीत से) 

 

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                                     (1)



केहि विधि मोर बने रघुराई ।

 

 

साधनहीन दीन मैं स्वामी जानत नहि चतुराई ।।

 

 

साधनयुत  के हर कोई गाहक कोटिक मिलैं  सहाई

 

 

मोरे एक तुम्ही रघुनायक जानौं सब न झुठाई ।।

 

 

असहाय सहायक राम प्रभू तुम रीति सदा चलि आई

 

 

संतोष की बने प्रभु तोहिं बनाये और नहीं को उपाई ।।

 

             

                            

                                  (2)    



 राम दयाधाम को सुनाएँ ।  


कासे कहें क्या हम कहाँ लगि गाएँ ?


दूजा कौन सुनै तो क्या बन जाए ?


जानें रघुनाथ मेरे बिना ही जनाए ।


करुना, क्षमा सागर रखें कब तक भुलाए ।।


दयासागर को ही मुझपे दया जो न आए ।


दीन-हीन जाएँ कहाँ हँसे सब हँसाएँ ।।


कहें रघुवीर से तो आँखें भरि आएँ ।


करुनामय को करुना कभी आ ही जाए ।।


संतोष बने केवल राम के बनाये ।


राम दयाधाम को सुनाएँ ।।

 

 

            (3)


राम दयाधाम सुनो हम जो बताते

जथा मति नाथ मोरे गुनगन गाते ।।


पाहन फोरि प्रहलाद न बचाते ।

कण-कण में बसे काहे कहे जाते ।।


गज के पुकारे वाहन छोडि जो न धाते ।

बिपति पड़े जन काहे को बुलाते ।।


अम्बरीष के खातिर जो चक्र न पठाते ।

अभय की आस जन काहे को लगाते ।।


शबरी के बेर बिदुर साग जो न खाते ।

प्रेम के ही भूंखे राम काहे कहलाते ।।


द्रुपदसुता की जो चीर न बढाते

कहते क्यों लोग जन लाज हो बचाते ।।


सुग्रीव, बिभीषण आदिक गले न लगाते

असरन-सरन दीनानाथ क्यों कहाते ।।


केवट से जो निज पाँव न धुलाते

चरणों के रज की आस न लगाते ।।


वन-वन खोजि जन ठाँव जो न जाते ।

कहते क्यों लोग राम  जन सुधिलाते ।।


बानर-भालु को जो सखा न बनाते ।

कहते क्यों लोग राम गिरों को उठाते ।।


गीध को तात शबरी मातु न बुलाते

कहते क्यों लोग सादर दीन अपनाते ।।


भक्तों के अपने जो मान न बढाते

परमसरल सेवकपाल क्यों कहाते ।।


अहल्यादि को जो पुनीत न बनाते

पतितपावन जन नाम क्यों धराते ।।


पाहन को ज्यों जलजान न तराते

कहते क्यों लोग गुनी गुनहीन को बनाते ।।


दीन दाहिने जो न उजरे बसाते ।

कहते क्यों लोग राम हारे को जिताते ।।


गहि बांह दीनों की जो नेह न निभाते ।

दीनबंधु दीनों के सनेही क्यों कहाते ।।


पतितों से जो तू मुंह फेर जाते ।

मोसे दोष-कोष अघी कहीं न समाते ।।


सुनते न दीनों की जो उन्हें ठुकराते ।

मोसे दीन-मतिहीन किसको सुनाते ।।


 गुनगन नाथ जेते कहे न सिराते ।

तुम सम तुम जानि जन पुलकाते 



सब बिधि हीन दीन विरद बल पाते 

संतोष चित करो नाथ ! वेगि बहु नाते ।। 






                   (४)


दोषों का खजाना बहुत पापी मैं माना


पतितों को पावन करने का वाना


गुनगन उजियारे नाथ ! कौन नहीं जाना ?


चरन तजि मुझे स्वामी नहीं एक ठिकाना


होके सोच विमोचन मम हित सोच ठाना


रामदयाधाम दया अब तो दिखाना


संतोष कहे नाथ मत देर लगाओ  


मैं तो खुद भूला स्वामी मुझे न भुलाओ   


        

            

              (५)



प्रभु तुमको ही ध्याये सारा जग गुन गाए


स्वामी विरद लुभाये हमें पास बुलाये


चरन तजि ठौर नहीं कहाँ हम जाएँ ?


सबकी बनत बनय तेरे ही बनाये


मति गुन नाथ नहीं कहाँ लगि सुनाएँ ?


जानों रघुनाथ क्या मेंरे ही जनाए ?


आस लिए देखूँ नाथ ! बाल जिम माएँ




संतोष की भलाई नहीं नाथ तव भुलाए

              

                        (६)

 

राम प्रभूजी चरण तुम्हारे पकड़ चुके हैं हम


कृपा करके हरलो भगवन जीवन में जो तम ।।


तेरे सहारे रहूँ मैं स्वामी भूलके सारे गम ।


अपने दोषों को सोचूँ तो आये मुझे शरम ।।


फिरभी मुझको ठुकरा दोगे ऐसा नहीं भरम ।


पतितपावन है नाम तुम्हारा तुम कितने अनुपम ।।


गुनगन को सब गाते हैं शारद, शेष, निगम ।


करुनासागर रखि ही लेते हो कोई मुझसा ही अधम ।।


दीनदयाल दयानिधि स्वामी ! हम हैं बड़े अक्षम ।


करुनामय की करुना से कुछ भी नहीं अगम ।।


सभी दशाएँ सम हो जाएँ चाहे बड़ी विषम ।


संतोष कहे प्रभु राम कृपा से होता सब अधिगम ।।

 

            (७)


रे मन मूरख भूला फिरे

               जब समय चुके पुनि का पछिताने


सोवत, जोड़त, पालत पेट

                इसको ही क्या जीवन जाने ?


सूकर, कूकर सोवत-खात

                  घूमत, लड़त ते आहिं अयाने  ।


जानि अजान बना केहि कारन

                   तू नहि पशु है मनुज सयाने ।।


सत्कर्म करे सत्मार्ग चले

                  संग राम भजे तो जीवन जाने ।


अहम, स्वार्थ सब दूर करे 

                  परहित-दया गुर धरम बखाने ।।


जो न बनाय सके केहु कै

                   तो बिगाडन को भी न तू ठाने ।


संतोष जग-जीवन लाभ लहै

                   क्या जीवन जो रघुनाथ भुलाने ?                                  



                                                             -एस. के. पाण्डेय (विनयावली से) 

 

 

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