।। राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम ।।
विघ्न हरन गणनायक के
पद रज को शीस चढाते हैं ।
आर्य-धर्म में ये ही सबसे
पहले पूजे जाते हैं ।।
वागेश्वरी माँ सरस्वती को
सादर शीस झुकाते हैं ।
इनकी कृपा से हम सब
विद्या अरु बुद्धी पाते हैं ।।
वन्दन करके शिव पार्वती को
सादर शीस नवाते हैं ।
मनचीता अरु राम-भक्ति
सब शिव कृपा से पाते हैं ।।
भगवान विष्णु माँ लक्ष्मी को
सादर विनय सुनाते हैं ।
दीन-मलीनों को दे आदर
खुश हो गले लगाते हैं ।।
पवनतनय रिपुहन माँ सीता
भरत लखन को मनाते हैं ।
इनकी कृपा से ही जन
राम-शरन पा जाते हैं ।।
तुलसी, मानस राम नाम
श्रीराम चरन चित लाते हैं ।
जनदुखहारी , पावनकारी
श्रीराम कथा अब गाते हैं ।।
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जय रमा रमन सुख शील सदन अग-जग तुमही उपजाते हो ।
सुर नर मुनि गो जन बसुधा के तुमही भार हटाते हो ।।
देवन के देव हे परमदेव वो जानें जिसको जनाते हो ।
हम दीन हीन क्या जानें प्रभुजी दीनों को अपनाते हो ।
अगम अगोचर सरल सबल उजरे को सदा बसाते हो ।
निर्बल के बल सम्बल अवलम्ब संतोष गले से लगाते हो ।।
घट-घट के जाननहार सब जानो, फिर भी जनाते हैं ।
दयाभवन अग-जग के स्वामी ! दर-दर ठोकर खाते हैं ।।
दीन सहायक तुम सब लायक, जो शरन तुम्हारी आते हैं ।
उनका करते प्रतिपाल सदा, प्रभु वेद भी ऐसा गाते हैं ।।
तजि मान प्रभू अब आये हम, चरणों में शीस झुकाते हैं ।
चित करो नाथ बहु देर भई, संतोष बहुत घबराते हैं ।।
राम नाम की महिमा न्यारी संत-ग्रन्थ सब गाते हैं ।
राम नाम को भजने वाले भव सागर तर जाते हैं ।।
कोई भी हो कैसा भी हो संत-भक्त बतलाते हैं ।
जो भी राम को भजने वाले राम प्रभू अपनाते हैं ।।
उल्टा-सीधा जब भी जैसे, राम भजे फल मिलता है ।
पर जिह्वा बक-बक की आदी, राम नहीं निकलता है ।।
लाख सुनाओ या समझाओ भाए सो तूँ करता है ।
याते ही सुख-दुःख पाटों से भव चक्की में पिसता है ।।
जब-जब पाता हँसता-गाता, पाने को और तरसता है ।
जब-जब खोता रोता-धोता, खोना बहुत अखरता है ।।
जो पाना-खोना था न पाया-खोया, पल-पल पे तूँ फिसलता है ।
मानव से दुर्लभ जीवन का हर पल योंही सरकता है ।।
सरल सुगम है राम नाम सा दूजा कोई नाम नहीं ।
भजने में कुछ भी न जाता लगता कोई दाम नहीं ।।
संतोष भजे तूँ राम-राम बिनु राम कहीं आराम नहीं ।
मूरख ! राम भजे बिनु लगता चौरासी में विराम नहीं ।।
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अधर्म-पाप जब-जब धरती पे बहुत अधिक बढ़ जाते हैं ।
तब-तब धर्म की रक्षा को भगवान धरा पे आते हैं ।।
भगवान धरापे आकरके कुछ और नहीं दिखलाते हैं ।
इनके आने के पहले भी, जो धर्म उसीको बचाते हैं ।।
राक्षसत्व मिटाके धरती से सबको शुभ राह दिखाते हैं ।
कुछ और नहीं यह आर्य-धर्म जिसकी हम गाथा गाते हैं ।।
आर्य-धर्म है वही जिसे हम कहते धर्म सनातन है ।
युग-युग से ही चलता आये शाश्वत बड़ा पुरातन है ।।
वेद-पुरान, शास्त्र, रामायण; उपनिषद में जिसका वर्णन है ।
जो समझ सके कुछ तथ्यों को बस जाता उसका ही मन है ।।
परहित, दया, सत्य, अहिंसा को धर्म-पुण्य बतलाता है ।
परपीड़ा, निंदा, झूठ, हिंसा को अधर्म-पाप बताता है ।।
मानव जीवन का उद्देश्य है क्या सबको यह समझाता है ।
जीवन है क्या राम बिना सबको सदराह दिखाता है ।
इर्ष्या, स्वार्थ, अहम, क्रोधादिक से जग नेह लगाता है ।
राम बिना आराम कहाँ जग खोजै पर न पाता है ।।
(बाल काण्ड से ।)
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तन मन की मोहि सब आस फीकी है ।
विरद, गुन, शील आस रघुनाथ जी की है ।।
कुगति मन सीख गति ज्यों आग घी की है ।
ठाँउ न निबाह मोर कहुँ त्रिलोकी है ।।
रीझ-खीझ देंय गति सोइ गति मोकी है ।
जानत करुनानिधान संतोष जी की है ।।
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मन मेरे जो राम नाम गुन गायेगा ।
छाड़ि कुचाल जो रामजी को ध्यायेगा ।।
राम दयाधाम के मन तूँ भी भाएगा ।
अभी पतियाये तो न कभी पछतायेगा ।।
माने मेरी बात ऐसा एक दिन आएगा ।
सुनेंगे दीनानाथ तेरी रोज जो सुनाएगा ।।
संतोष राम राम भज, राम धाम पायेगा ।
तारे दोष-कोष तोसे तूँ भी तर जाएगा ।।
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