एक थी गुलाब

ऐतिहासिक उपन्यास (अप्रकाशित)
 
जोधपुर के राठौड़ महाराजा विजयसिंह तथा पासवान गुलाब राय की प्रेमगाथा
तथा
अठारहवीं शती में राजपूत राजाओं के मराठों से हुए संघर्ष की महागाथा
 
 
उपन्यास का संक्षिप्त परिचय-
 
थार मरूस्थल के पूर्वी छोर पर स्थित मारवाड़ रियासत पर ईसा की पन्द्रहवीं शताब्दी से, रणबांकुरे राठौड़ों का शासन चला आ रहा था। 1753 ए डी से 1794 ए डी तक इस रियासत पर राठौड़ महाराजा विजयसिंह ने शासन किया। उस शताब्दी में राजपूताने में 41 साल की दीर्घ अवधि तक शासन करने वाला दूसरा राजा और कोई नहीं हुआ। वह एक प्रतापी और धर्मशील शासक था। मेवाड़ के महाराणाओं की व्यक्तिगत सुरक्षा करने के लिये उसकी सेना उदयपुर में तैनात रहती थी किंतु उसके शासन के समय में राजपूताना मराठा शक्ति के आक्रमण से बुरी तरह प्रभावित रहा। पेशवा बालाजी बाजीराव, उसका छोटा भाई रघुनाथ राव, पेशवा का प्रधानमंत्री नाना फड़नवीस, जयप्पा सिंधिया, मल्हारराव होलकर, महादजी शिंदे, तुकोजी राव होलकर, लकवा दादा और अम्बाजी इंगले आदि मराठा सरदार उस समय उत्तर भारत में सक्रिय थे।

महाराजा विजयसिंह ने पूरे 41 साल तक इन मराठा सरदारों से युध्द किया। उसने मराठाें के विरुध्द काबुल के बादशाह तैमूरशाह, दिल्ली के बादशाह अली गौहर, बीकानेर, किशनगढ़ एवं जयपुर के महाराजाओं तथा अन्य रियासतों के शासकों, सामंतों, सरदारों, नवाबों तथा अमीरों को भी तैयार किया। महाराजा विजयसिंह कभी मराठों से हारा तो कभी जीता किंतु न तो मराठे उसे पूरी तरह जीत पाये न वह मराठों को राजपूताने से बाहर धकेल सका। उसने जयप्पा सिंधिया की छल से हत्या करवाई और महादजी शिंदे को तुंगा के मैदान में कड़ी पराजय का स्वाद चखाया किंतु अंत में महाराजा विजयसिंह, डांगावास के मैदान में मराठों से हारकर बुरी तरह टूट गया।

महाराजा विजयसिंह की एक पासवान थी गुलाबराय। उसे इतिहासकारों ने मारवाड़ की नूरजहां कहकर पुकारा है। वह इतनी सुंदर थी कि महाराजा विजयसिंह ने उसे एक साधारण नर्तकी से अपनी पासवान बनाया तथा उसे महारानी का दर्जा प्रदान किया। मारवाड़ रियासत के राठौड़ सरदारों ने इस नर्तकी को राज्य की महारानी मानने से मना कर दिया। फिर भी गुलाबराय का जादू जोधपुर रियासत के सिर चढ़कर बोला। उसने जोधपुर राज्य में मांस बेचने व खाने, शराब बेचने व पीने, शिकार खेलने व पशु वध करने आदि पर रोक लगा दी तथा कसाईयों को राज्य से बाहर निकाल दिया। जिन जागीदरों तथा सरदारों ने महाराजा के इस आदेश को नहीं माना, महाराजा ने भरे दरबार में उनकी हत्याएं करवाईं और ताकतवर सामंतों को छल से कैद करके मरवाया।

महाराजा विजयसिंह भगवान कृष्ण के बाल रूप का बड़ा भक्त था। गुलाबराय भी भगवान कृष्ण की भक्त थी। इसी कारण महाराजा विजयसिंह गुलाब की तरफ आसक्त (आकर्षित) हुआ था और दोनों का प्रेम दिनों दिन बढ़ता ही चला गया था। यदि किसी व्यक्ति ने गुलाबराय का अहित करने का प्रयास किया तो महाराजा ने उसे दण्डित किया किंतु सत्ता के मद में गुलाबराय दिनों दिन घमण्डी होती चली गई। उसने राज्य की सत्ता को अपने नियंत्रण में कर लिया। बहुत से सरदार उसके समर्थक हो गये और बहुत से सरदार उसके विरोध में उठ खड़े हुए। गुलाब ने इन सामंतों से हार नहीं मानी। वह इनसे लोहा लेती रही और आगे बढ़ती रही।

पासवान गुलाबराय ने महाराजा विजयसिंह के उत्ताराधिकारी के रूप में पहले तो अपने औरस पुत्र तेजकरणसिंह का, फिर दत्ताक पुत्र राजकुमार शेरसिंह का और अंत में मातृ-पितृ विहीन राजकुमार मानसिंह का चयन किया। इस कारण्ा जोधपुर रियासत का राजदरबार और महाराजा का रनिवास अनेक भयानक षड़यंत्रों से भर गया और कई सामंतों तथा राजकुमारों की हत्याएं हुईं। अंत में जोधपुर रियासत के सामंत महाराजा विजयसिंह से नाराज होकर जोधपुर दुर्ग से बाहर चले गये। जब महाराजा उन सरदारों को मनाने के लिये दुर्ग से बाहर निकला तो पीछे से उसके पौत्र राजकुमार भीमसिंह ने मेहरानगढ़ दुर्ग तथा राजधानी जोधपुर पर अधिकार जमा लिया। इस कारण महाराजा को लम्बे समय तक दुर्ग तथा राजधानी से बाहर रहना पड़ा। उधर राजकुमार भीमसिंह तथा उसके साथी सामंतों ने मिलकर गुलाबराय की हत्या कर दी। जब कई महीनों बाद महाराजा पुन: अपनी राजधानी में लौटा तो उसे गुलाब की हत्या के बारे में जानकारी हुई। उसने भीमसिंह को पकड़कर लाने के आदेश दिये किंतु भीमसिंह अपने साथी सामंतों के साथ राजधानी से दूर भाग गया। अपनी प्रेयसी गुलाब के शोक से दुखी होकर कुछ ही दिनों में महाराजा विजयसिंह ने भी प्राण त्याग दिये।

प्रस्तुत उपन्यास महाराजा विजयसिंह के काल में मारवाड़ रियासत में हुई घटनाओं तक सीमित है। इसका तानाबाना उत्तर भारत की राजनीति में महाराजा विजयसिंह की गतिविधियों तथा पासवान गुलाबराय के प्रति उसके अनन्य प्रेम को केन्द्र में रखकर बुना गया है। अठारहवीं शती में महाराजा विजयसिंह तथा गुलाबराय का एक साथ उपस्थित होना, भारतीय इतिहास की एक अनुपम मिसाल है किंतु महान व्यक्तित्वों के साथ अपवाद भी लगे ही रहते हैं। इन दोनों ऐतिहासिक चरित्रों के साथ भी ऐसा ही हुआ है।

राजस्थान के प्रथम इतिहासकार तथा राजपूताना के एजेंट टू दी गवर्नर जनरल कर्नल टॉड ने गुलाबराय के बारे में लिखा है कि गुलाब ने कई बार राजा विजयसिंह को जूतियों से मारा। नि:संदेह टॉड बरसों तक राजपूताना की रियासतों में घूमा था किंतु उसे राजपूत रियासतों की उज्जवल परम्पराओं एवं मर्यादाओं की पूरी जानकारी नहीं थी। सामंती परिवेश में यह संभव नहीं था कि कोई पासवान, अपने समय के सबसे महान, सबसे शक्तिशाली और सबसे प्रभावशाली महाराजा को जूतियों से मारे और फिर भी राजा उस पासवान को महारानी का दर्जा दिलवाने के लिये आतुर रहे। हैरानी यह देखकर होती है कि टॉड के बाद किसी इतिहासकार या लेखक ने टॉड के कथन का खण्डन करने का प्रयास नहीं किया।

प्रस्तुत उपन्यास में इन दोनों ऐतिहासिक चरित्रों के बारे में वास्तविक तथ्यों की शोध करके पूरा घटनाक्रम रोचक विधि से तैयार किया गया है। ताकि इस उपन्यास के माध्यम से इन दोनों का महान और उज्जवल चरित्र पाठकों के समक्ष आये और पाठक उस युग की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में महाराजा विजयसिंह और गुलाबराय की वास्तविकता को समझ सकें।

यह रोचक शैली में लिखा गया उपन्यास है जिसमें कथानक को आगे बढ़ाने के लिये चुटीले संवादों का सहारा लिया गया है तथा ऐतिहासिक तथ्यों की पूरी तरह से रक्षा की गई है।
 
 
उपन्यास के कुछ अंश
 
 
नव कोटि मारवाड़ के धणी

थार मरूस्थल के पूर्वी छोर पर ईसा की पन्द्रहवीं शताब्दी से, रणबांकुरे राठौड़ों का शासन चला आ रहा था। 1678 इस्वी में जमरूद के मोर्चे पर मारवाड़ रियासत के पन्द्रहवें राठौड़ राजा जसवंतसिंह के निधन के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ रियासत को खालसा कर लिया अर्थात् प्रत्यक्षत: अपनी जागीर में सम्मिलित कर लिया। जब स्वर्गीय महाराजा की गर्भवती रानियाँ जमरूद से मारवाड़ को लौट रही थीं तब मार्ग में दोनों रानियों ने एक-एक पुत्र को जन्म दिया। उनमें से एक पुत्र दलथंभन तो मार्ग में ही काल का ग्रास बन गया किंतु दूसरा शिशु अजीतसिंह जीवित रहा जिसे राठौड़ सरदारों ने अपना राजा घोषित किया। औरंगजेब ने इस शिशुराजा तथा उसकी माताओं को छल से दिल्ली बुलाकर बंदी बना लिया। जब औरंगजेब ने शिशु-राजा की सुन्नत करके उसे मुसलमान बनाना चाहा तब दिवंगत महाराजा के विश्वस्त सिपाही मरने मारने पर उतारू हो गये।

राठौड़ दुर्गादास, खीची मुकुंदास आदि सामंतों ने शिशु-राजा को किसी तरह औरंगजेब की कैद से छुड़वा लिया। जसवंतसिंह की विधवा रानियों ने मर्दाना वेश पहनकर मुगल सिपाहियों का सामना किया और रणखेत रहीं। राठौड़ सैनिकों ने अपने दिवंगत महाराजा की महारानियों के पार्थिव शरीर यमुनाजी में बहाये और किसी तरह लड़ते भिड़ते दिल्ली से बाहर आ गये। राठौड़ों ने शिशु-राजा को मारवाड़ रियासत के दक्षिण में स्थित छोटी सी सिरोही रियासत की पहाड़ियों में छिपा दिया। औरंगजेब जीवन भर राठौड़ों के इस राजा को ढूंढता रहा किंतु राजा को पकड़ना तो दूर उसकी छाया तक को न छू सका।
अपने राजा को फिर से मारवाड़ की राजगद्दी दिलवाने के लिये राठौड़ सरदार उन्तीस बरस तक घोड़ों की पीठों पर बैठे रहे और मुगल थाने उजाड़ते रहे। मारवाड़ का चप्पा-चप्पा उनके घोड़ों की टापों से गूंजता रहा। औरंगजेब की मृत्यु होने पर यही अजीतसिंह जोधपुर के राजा हुए। जब फर्रूखसीयर मुगलों का बादशाह हुआ तो उसने महाराजा अजीतसिंह को विवश करके उनकी पुत्री इंद्रकुंवरी के साथ विवाह किया। महाराजा अजीतसिंह ने बेटी तो दे दी किंतु मन नहीं दिया। अवसर मिलते ही उन्होंने दिल्ली के लाल किले में फर्रूखसीयर की हत्या करवाई और इंद्रकुंवरी को जोधपुर लाकर शुध्दिकरण करके उसका दूसरा विवाह किया।

मुगल सान्निध्य के प्रभाव से, जयपुर नरेश के षड़यंत्र से और मारवाड़ के दुर्भाग्य से 23 जुलाई 1724 को अजीतसिंह के पुत्र बखतसिंह ने अपने बड़े भाई अभयसिंह के उकसाने पर, नींद में सोते हुए अपने पिता और उनकी पड़दायत गंगा की हत्या कर दी। महाराजा अजीतसिंह की मृत देह के साथ 6 रानियाँ, 20 दासियाँ, 9 उड़दा बेगणियाँ, 20 गायनें तथा 2 हुजूरी बेगमें सती हुईं। पिता की हत्या के बाद अभयसिंह और बखतसिंह ने मारवाड़ आपस में बाँट लिया। अभयसिंह जोधपुर का राजा हुआ और अभयसिंह नागौर का। जुलाई 1749 ईस्वी में महाराजा अभयसिंह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र रामसिंह जोधपुर की गद्दी पर बैठा।

रामसिंह प्रतिभा-सम्पन्न राजा नहीं था तथा राठौड़ सरदारों के साथ बुरा बर्ताव करता था। इसलिये राठौड़ सरदारों के उकसाने पर रामसिंह के चाचा बखतसिंह ने मेड़ता के युध्द में उसे हराकर जून 1751 में जोधपुर की राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। रामसिंह मराठों की शरण में पहुँचा किंतु मराठे उसे जोधपुर नहीं दिलवा सके। सितम्बर 1752 में महाराजा बखतसिंह की भी मृत्यु हो गई। माना जाता है कि किशनगढ़ रियासत की राठौड़ राजकुमारी एजनकंवर जो कि जयपुर नरेश माधोसिंह को ब्याही गई थी, ने एक विषबुझी पोषाक उपहार के रूप में महाराजा बखतसिंह को भेजी। 21 सितम्बर 1752 के दिन, इस विषबुझी पोषाक को पहनने से महाराजा बखतसिंह की मृत्यु हो गई। उस समय महाराजा का पुत्र विजयसिंह मारोठ के सैनिक शिविर में था।
 
 
मदमत्त मरहठे
 
1526 इस्वी के बाद दिल्ली की जिन गलियों में मुगलों के रौब-दाब और शानोशौकत के डंके बजते थे और जिनकी धूम दक्खिन में भी पूरी बुलंदी के साथ सुनी जाती थी, उन डंकों की आवाजें 1680 ईस्वी के पश्चात् धीमी पड़नी लगी थीं। छत्रपति शिवाजी तथा मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के हाथों बुरी तरह से पिटे हुए, बददिमाग, बूढ़े और अशक्त औरंगजेब ने मराठों को दिल्ली की तरफ बढ़ने से रोकने के लिये मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह, ढूंढाड़ के राजा सवाई जयसिंह और बीकाणा के राजा कर्णसिंह को मराठों के विरुध्द झौंका। इस प्रकार मराठा शक्ति के साथ राजपूत शासकों का पहला परिचय मुगल सेनापतियों की हैसियत से युध्द के मैदानों में हुआ।

इन राजपूत राजाओं ने अपने लाखों सिपाही युध्द के मैदानों में कटवा डाले फिर भी वे, मराठों की टिड्डी सेनाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने से नहीं रोक सके। 1706 ईस्वी में मराठों ने दक्षिणी गुजरात में पहली बार मुगल सेना को परास्त किया। इस प्रकार औरंगजेब ने अपने जीवन के आखिरी सालों में अपनी ऑंखों से मराठों को दिल्ली की ओर बढ़ते हुए देखा।

अठारहवीं सदी के आरंभ में छत्रपति के स्थान पर पेशवा का प्रभुत्व बढ़ना आरंभ हुआ और उसके द्वारा नियुक्त सिन्धिया, होलकर, गायकवाड़ तथा भौंसले, मुगलों के पराभव से उत्पन्न हुई रिक्तता को भरने के लिये आगे आये किंतु उनकी इन आकांक्षाओं को पूरा करने में राजपूताना की मारवाड़, बीकाणा, ढूंढाड़ और कोटा रियासतें अब भी आड़े आ रही थीं।

1711 ईस्वी में मराठे प्रथम बार मेवाड़ में प्रविष्ठ हुए। मराठों के वेग को रोकने के लिये 1713 ईस्वी में मुगल बादशाह फर्रुखसीयर ने जयपुर के शासक सवाई जयसिंह को गुजरात का सूबेदार बनाया किंतु जब महाराजा जयसिंह मराठों के समक्ष असफल हो गया तब फर्रुखसीयर ने जोधपुर के शासक अजीतसिंह को गुजरात की सूबेदारी सौंपी। महाराजा अजीतसिंह के लिये भी यह संभव नहीं था कि वे मराठों को आगे बढ़ने से रोक सकें। मराठे उसी गति से आगे बढ़ते रहे। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह ने जोधपुर के अगले शासक महाराजा अभयसिंह को गुजरात की सूबेदारी सौंपी ताकि वे मराठों को गुजरात में ही रोक सकें किंतु अपने पिता अजीतसिंह की तरह महाराजा अभयसिंह को भी इस कार्य में सफलता नहीं मिली और मराठे आगे बढ़ते ही चले गये।

1735 इस्वी में राजपूताने की समस्त बड़ी रियासतों ने पेशवा को चौथ देना स्वीकार कर लिया। इनमें जोधपुर रियासत भी सम्मिलित थी। यही वह समय था जब राजपूताना की रियासतों में मराठों के प्रतिनिधि स्थाई रूप से रहने लगे और रियासत की गतिविधियों की राई-रत्ताी और तिल-तिल की सूचना मराठों तक पहुँचाने लगे। इसके बाद के पच्चीस सालों में मराठे लगातार दिल्ली की ओर बढ़ते रहे और मुगल सत्ताा शनै:-शनै: अस्ताचल की ओर लुढ़कती रही।

1739 ईस्वी में जब नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया तो मुगलों की दुर्दशा की कलई पूरे देश के समक्ष खुल गई। मराठों ने इसे उचित समय समझकर दिल्ली को और तेज झटके दिये जिससे विवश होकर बादशाह ने दक्खिन के छ: प्रांतों की चौथ वसूली के अधिकार मराठों को दे दिये।

1761 ईस्वी में जब अहमदशाह अब्दाली ने हिन्दुस्थान की भूमि पर खून की होली खेली, तब तक मुगल साम्राज्य की ऐसी दुर्दशा हो चुकी थी कि बादशाह आलमगीर, अहमदशाह अब्दाली के विरुध्द छोटी-मोटी सेना भी नहीं भेज सका। इसलिये मराठों ने उसकी ओर से पानीपत के मैदान में मोर्चा संभाला। मराठे अब्दाली की सेनाओं को गाजर मूली समझते थे, इसलिये युध्द के मैदान में अपनी पत्नियों, रखैलों और दासियों को साथ लेकर पहुंचे। अब्दाली ने एक लाख मदमत्त मरहठों को बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतारा। पूरा भारत विधवा मराठनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा। इसके बाद अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया।

अब्दाली ने आलमगीर की बादशाहत को लालकिले की एक साधारण कोठरी तक सीमित कर दिया। उससे तख्ते ताउस छीनकर, लकड़ी का एक साधारण पाट पकड़ा दिया। अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह आलमगीर की औरतों और बेटियों को लाल किले के महलों में नंगी करके उनके साथ दिन दहाड़े बलात्कार किये और आलमगीर, अब्दाली के विरुध्द कुछ नहीं कर सका। जब अब्दाली लौट गया तब मुगल शाहजादियां पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में मारी-मारी फिरने लगीं। वेतन नहीं मिलने के कारण मुगल सिपाहियों और लाल किले के नौकरों ने दिल्ली की गलियों में फिरने वाली कुतियाओं के नाम मुगल शहजादियों के नाम पर रख दिये।

पानीपत के मैदान में एक लाख मराठों को काट डालने के पश्चात् उत्तर भारत में यह आशा जगी थी कि अब मराठों के आतंक से मुक्ति मिल जायेगी किंतु यह आशा शीघ्र ही निराशा में बदल गई जब मराठे, शीघ्र ही फिर से टिड्डी दलों की भांति उत्तर भारत के मैदानों में छा गये और बलपूर्वक चौथ वसूलने लगे।

आरंभ में तो सिन्धिया, होलकर और पेशवा, राजपूताने की रियासतों में चौथ वसूली करने तक सीमित रहे किंतु वे इतने बड़े लुटेरे और धन के इतने बड़े लालची थे कि शीघ्र ही चौथ की राशि प्राप्त करने की सीमित इच्छा के दायरे से बाहर निकलकर, राजपूत रियासतों के साथ विवेकहीन अनुबंध करके उनके माध्यम से अपरिमित धन ऐंठने लगे। उन्होंने राजपूताना रियासतों में चल रही अन्तर्कलहों से लाभ उठाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया।

मराठों के उत्तर भारत में सक्रिय होने से पहले राजपूताना की रियासतों में परम्परागत सामंतों का ही शासन में वर्चस्व था किंतु मराठों ने उत्तर भारत में नौकरशाही की व्यवस्था को नया स्वरूप दिया। उनके वकील प्रत्येक रियासत में नियुक्त रहते थे जो सामान्यत: कुलीन ब्राह्मण वर्ग से थे। इन वकीलों की नियुक्ति के बदले राजपूताना की रियासतों को भी मराठा सरदारों के पास अपने वकील रखने पड़ते थे जो मराठा सरदारों के सम्पर्क में रहकर अपनी रियासत के हितों का संरक्षण करते थे।

मारवाड़ रियासत में भी सामंतशाही के साथ-साथ नौकरशाही, काफी मजबूत हो गई थी। ये लोग मुत्सद्दी तथा मुसाहिब कहलाते थे। ये भी सामंतों के समान, राजा के साथ बैठकर भोजन करते थे। अंतर केवल इतना था कि राजा के सामंत, राजा के समान असली हड्डियाँ चबाते थे जबकि मुत्सद्दी, शाकाहारी ओसवाल महाजन होने से चांदी की हड्डियाँ दाल में डलवाते थे और जब राजा असली हड्डी चूसता था तब ये मुत्सद्दी, चांदी की नकली हड्डियाँ मुँह में लेकर राजा के प्रति स्वामिभक्ति और आदर प्रकट करते थे।

राज्य के सामंत प्राय: अपनी जागीर में रहते थे तथा युध्द के समय राजा के द्वारा बुलाये जाने पर अथवा अवसर विशेष पर परम्पराओं के निर्वहन के लिये राजदरबार में उपस्थित होते थे, जबकि मुत्सद्दी और मुसाहिब हर समय राजा के निकट बने रहते थे। इस कारण सामंतों के स्थान पर वे राजा के अधिक निकट माने जाते थे। यही कारण था कि राज्य का मुत्सद्दी वर्ग, परम्परागत सामंतों के विरुध्द खुलकर मोर्चा लेने लगा था। यहाँ तक कि राज्य के उत्ताराधिकार के प्रश्न को भी प्राय: यही मुत्सद्दी वर्ग हल करता था।
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