Vedic wisdom

स्वाध्याय

posted Feb 28, 2010, 9:04 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Aug 8, 2010, 10:49 PM ]

 

About Bhram

posted Feb 10, 2010, 7:52 PM by Surinder Shanker Anand Artist

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥

One who knows, knows-not. One who knows-not knows.

Difference between Man and Animal

posted Jan 23, 2010, 5:14 AM by Surinder Shanker Anand Artist

आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च समानमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
 
Food, sleep, fear and mating, these acts of humans are similar to animals' |
of them (humans), dharma (right conduct) is the only special thing, without dharma humans are also animals ||

ओ3म्

posted Jan 8, 2010, 1:39 AM by Surinder Shanker Anand Artist


सर्वज्ञम, सर्वव्यापकम, अनादि-अनन्तम,
 नित्यम, निराकारम, निर्विकारम,
एकम, अखंण्डम, पूर्णम,
कूटस्थम, अतीतम, अजन्मा,
सत-चित्त-आनन्द स्वरूपम,
सर्वाधारम, सृष्टा, अधिष्ठाता, नियन्ता,
सर्वशक्तिशाली, सर्वकल्याणकारी 

धर्म-लक्षण-अवस्था-परिणाम

posted Dec 5, 2009, 11:32 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Dec 9, 2009, 9:53 PM ]

संहत्यकारी सिद्धांत के अनुसार अनेक तत्वों के संयोग से बना पदार्थ स्वयं के लिए नहीं होता अपितु दूसरे के प्रयोजन के लिए बनी होती है जैसे वस्त्र, पुस्तक, शरीर, कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ और चित्त आदि। सत्कार्यवाद सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कार्य (पदार्थ) अपने कारण में अव्यक्त अथवा व्यक्त रूप से विद्यमान रहता है, जैसे कारण-जल में कार्य-बर्फ का अव्यक्त रूप से विद्यमान रहना। कोई भी पदार्थ पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता है, जैसे जल से बर्फ और बर्फ से जल का प्रकट होना। कारण से कार्य की अभिव्यक्ति कार्य का उत्पन्न होना है, जैसे कारण-जल से कार्य-बर्फ की अभिव्यक्ति। कार्य का कारण में लय होना कार्य का अभाव है, जैसे कार्य-बर्फ का कारण-जल में लय होना।
 
धर्मि का धर्म से परिणाम, धर्म का लक्षण से परिणाम और लक्षण का अवस्था से परिणाम क्रम होता रहता है। परिणाम अर्थात् एक धर्म को छोड कर दूसरे धर्म धारण करना, जो दो प्रकार का है –
  1. सरुप-परिणाम (साम्य-परिणाम) जैसे दूध का दूध बने रहने का परिणाम
  2. विरुप-परिणाम (विषम-परिणाम) जैसे दूध से दही बनने का परिणाम, जो प्रत्यक्ष होता है। प्रत्यक्ष विरुप-परिणाम से सरुप-परिणाम का अनुमान किया जाता है।
स्वरूप के उपर रूप आरोपित होता है। परिणाम निम्न तीन प्रकार का होता है –
  1. धर्म-परिणाम – पूर्व धर्म की निवृत्ति और नये धर्म की प्राप्ति की संभावना जैसे माटी से घडा, बर्तन, ईंट आदि बनने की संभावना
  2. लक्षण-परिणाम तीन प्रकार का है –
    1. अनागत-लक्षण-परिणाम अर्थात् धर्म का वर्तमान में प्रकट होने से पहले भविष्य में छिपा रहना जैसे घङे का माटी में छिपे रहना
    2. वर्तमान-लक्षण-परिणाम अर्थात् धर्म का भविष्य को छोड़ कर वर्तमान में प्रकट होना जैसे माटी से घङा बनना
    3. अतीत-लक्षण-परिणाम अर्थात् धर्म का वर्तमान को छोड़ कर भूतकाल में छिप जाना जैसे घङे का माटी में वापिस मिल जाना
  3. अवस्था-परिणाम दो प्रकार का है –
    1. धर्म के अनागत-लक्षण-परिणाम से वर्तमान-लक्षण-परिणाम अर्थात् प्रतिक्षण दृढ होना जैसे माटी से घङा बनना
    2. वर्तमान-लक्षण-परिणाम से अतीत-लक्षण-परिणाम अर्थात् क्षण-प्रतिक्षण दुर्बल होना जैसे घङे का माटी में वापिस मिल जाना
 

ईश्वर, जीव और प्रकृति

posted Dec 5, 2009, 11:27 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Dec 9, 2009, 9:59 PM ]

जो धारण किया जाए वह धर्म है। धर्म को धारण करने वाला धर्मि होता है। धर्म धर्मि का स्वरूप (स्वभाव) है, जो बदला नहीं जा सकता जैसे अग्नि का धर्म ताप देना और प्रकाश करना है। दुःख पर विचार करने पर तीन मुख्य तत्त्व उपस्थित होतें हैं। यदि जीव का दुःख स्वाभाविक धर्म होता तो जीव दुःख से बचने का प्रयत्न नहीं करता। इससे यह प्रतीत हुआ कि जीव दो तत्त्वों का मिश्रण है, एक परिणामी जडतत्त्व जिसका स्वाभाविक धर्म दुःख है, और दूसरा अपरिणामी चेतनतत्त्व जो जिसका दुःख स्वाभाविक धर्म नही है। शुद्ध-चेतनतत्त्व तीसरा तत्व है, जो इन दोनो तत्वों का नियन्ता और अधिष्ठाता है। अतः शुद्ध-चेतनतत्त्व, अचेतन जडतत्त्व (प्रकृति) और जीव (जडतत्त्व में प्रतिबिम्बत चेतनतत्त्व), यह तीन मुख्य तत्त्व हैं।

ईश्वर (पुरुष-विशेष अथवा चेतनतत्व + समष्टि कारण जगत का अधिष्ठाता), पुरुष (जीव), मूल-प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण), मन, पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), पाँच स्थूल भूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी), यह योगशास्त्र के 26 तत्त्व है।

चेतन, अखण्ड, नित्य, सर्वज्ञ ईश्वर सृष्टि का निमित्त-कारण अर्थात् सामग्री जिससे वस्तु का निमार्ण होता है। ईश्वर की सन्निधि मात्र से अनादि, नित्य और अचेतन प्रकृति में परिणाम होता है। प्रकृति सत्त्व अर्थात् प्रकाश, रजस अर्थात् क्रिया और तमस अर्थात् स्थिती से निर्मित है। सत्त्व, रजस और तमस क्रमानुसार सुख, दुःख और मोह का कारण है। प्रकृति की समस्त वस्तुओं में कोई एक गुण प्रधान और बाकी दो गुण गौण रूप में विद्यमान रहते हैं। प्रकृति का प्रयोजन पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये है। सृष्टि में लय और प्रलय गुणों की अवस्था विशेष है। पुरुष चेतन का अचेतन-प्रकृति में प्रतिबिम्ब हैं। अविद्या के कारण पुरुष अपने निज स्वरूप को भूल कर प्रकृति की जङता और उस से उत्पन्न दुःख को अपना स्वरूप समझने लगता है।
 
 
 
 

चित्त की भूमियाँ

posted Dec 5, 2009, 11:21 PM by Surinder Shanker Anand Artist

परिणामी सत्त्व, रजस और तमस से निर्मित चित्त इन्द्रियों द्वारा बाह्या और आभ्यंतर विषयों में आकर्षित होकर उन जैसे आकारों में परिणत (चित्त की गतिशीलता) होता रहता है, जिसे वृत्ति कहते हैं। चित्त कारण है, और वृत्ति चित्त का कार्य है। चित्त को बहिमुर्ख वृत्तियों को अंतर्मुख करके चित्त में लय करना योग है। चित्त की भूमियाँ अर्थात् रूप अथवा अवस्था –
  1. क्षिप्त अर्थात् अत्यन्त चंचल चित्त जिसमें तम प्रधान, रज और सत्त्व गौणरूप से रहते हैं। यह अवस्था काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि के कारण होती है, जिससे मनुष्य की प्रवृति अज्ञान, अधर्म, अवैरागय और अनैश्र्वय में होती है, जो नीच मनुष्यों के लक्षण हैं। यह चित्त का अस्वाभाविक धर्म है, जिसमें में प्रबल प्रवृत्तियों अर्थात् काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि द्वारा क्षिप्त चित्त में भी कभी कभी क्षणिक समाधि हो सकती है।
  2. मूढ अर्थात् निद्र और आल्स्य वाला चित्त जिसमें रज प्रधान, तम और सत्त्व गौणरूप से रहते हैं। यह अवस्था राग और द्वेष के कारण होती है, जिससे मनुष्य की प्रवृति ज्ञान-अज्ञान, धर्म-अधर्म, वैरागय-अवैरागय और ऐश्र्वय-अनैश्र्वय में होती है, जो साधारण मनुष्यों के लक्षण हैं। जब तम सत्त्व को दबा लेता है, तब अज्ञान, अधर्म आदि में, और जब सत्त्व तम को दबा लेता है, तब ज्ञान, धर्म आदि में  प्रवृति होती है। यह चित्त का अस्वाभाविक धर्म है, जिसमें में इन्द्रियाँ-विषय मुग्ध होने से मूढ चित्त में भी कभी कभी क्षणिक समाधि हो सकती है।
  3. विक्षिप्त अर्थात् कभी स्थिर और कभी चंचल चित्त जिसमें सत्त्व प्रधान, तम और रज गौणरूप से रहते हैं। यह अवस्था अनासक्ति और निषकाम कर्म आदि के कारण होती है, जिससे मनुष्य की प्रवृति ज्ञान, धर्म, वैरागय और ऐश्र्वय् में होती है, जो जिज्ञासुओं के लक्षण हैं। यह चित्त का अस्वाभाविक धर्म है, जिसमें शास्त्र आदि के श्रवण-मनन से विक्षिप्त चित्त में भी कभी कभी क्षणिक समाधि हो सकती है।
  4. एकाग्र अर्थात् एक-अग्र चित्त जिसमें सत्त्व प्रधान, तम और रज वृत्ति-मात्र से रहते हैं। यह अवस्था अपर-वैराग्य के कारण होती है जिससे मनुष्य को वस्तु का यथार्त ज्ञान होता है, जो योगियों के लक्षण हैं। यह चित्त का स्वाभाविक धर्म है, जिसमें अनुरुप वृत्तियों का प्रवाह से सम्प्रज्ञात-समाधि अर्थात् अपने को भूले हुए  चित्त को इच्छित सात्विक-विषय पर और दीर्घ समय तक सिथर रखा जा सकता है। वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता सम्प्रज्ञात-समाधि के चार आवंतर भेद है। विवेकख्याति एकाग्र चित्त की अंतिम अवस्था है, जिसमें पुरुष और प्रकृति (चित्त) के भेद का साक्षात ज्ञान होता है। समाधि एक सात्त्विक वृत्ति है, जो आवरण (तमस) और विक्षेप (रजस) को निवृत करती है।
  5. निरूद्ध अर्थात् गुणों का बाहर से परिणाम बन्द और निरोध परिणाम संस्कार शेष रह जाते हैं। यह अवस्था पर-वैराग्य के कारण होती है, जिससे मनुष्य स्वरूप में स्थित हो जाता है, जो उँचे योगियों के लक्षण हैं। इस शेष-अवस्था में चित्त का विलीन होना अर्थात् चित्त का सर्ववृत्ति रहित होना असम्प्रज्ञात समाधि है। सर्ववृत्ति के निरोध होने पर पुरुष सवरूप में स्थित हो जाता है।
क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त भूमियों में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का वेग, साधन में विघ्न है। एकाग्र और निरूद्ध भूमियाँ योग का साधन है, जिनका फल -
  1. वस्तु का सत्यरुप प्रकट करना
  2. कर्म बन्धन शैथिल्य करना
  3. निम्न पाँच क्लेशों का क्षय करना –
    1. अविद्या अर्थात् अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख, अनात्म को आत्म समझना
    2. अस्मिता अर्थात् पुरुष की दृक और प्रकृति की दर्शन शक्तियों का एक सा भान होना
    3. राग अर्थात् सुख भोग के पीछे सुख भोगने की इच्छा
    4. द्वेष अर्थात् दुःख भोग के पीछे दुःख न भोगने की इच्छा
    5. अभिनिवेश अर्थात् मरने का भय
  4. निरोध अवस्था की प्राप्ति

योगशास्त्र

posted Dec 5, 2009, 11:14 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Dec 9, 2009, 9:55 PM ]

प्रत्येक प्राणि प्रतिक्षण निम्न तीन प्रकार के दुःख से निवृति का यत्न करता रहता है -
  1. अध्यात्मिक दुःख अर्थात् अपने से सम्बन्ध रखने वाले जैसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, अहंकार आदि
  2. अधिभोतिक् दुःख अर्थात् अन्य प्राणियों से सम्बन्ध रखने वाले जैसे पशु, पक्षी आदि
  3. अधिदैविक् दुःख अर्थात् दिव्य शक्तियों से सम्बन्ध रखने वाले जैसे पृथ्वी, सूर्य आदि

सुख में भी अर्जन, रक्षण, क्षय, संग  और हिंसा का दुःख है। इसलिये भारतीय दर्शनशास्त्रों में निम्न चार विषयों पर इस प्रकार गहन चिंतन किया है –

  • प्रश्र्न – हेय अर्थात् त्यागने योग्य क्या है?
  • उत्तर – आने वाला दुःख हेय है।
       
  • प्रश्र्न – हेयहेतु अर्थात्  हेय का कारण क्या है?
  • उत्तर – द्रष्टा (पुरुष) और दृश्य (प्रकृति) का अविवेकपूर्ण संयोग हेयहेतु है।
     
  • प्रश्र्न – हान अर्थात् दुःख का नितांत अभाव क्या है?
  • उत्तर – अविद्या अर्थात् अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख, अनात्म को आत्म समझना का अभाव हान है।
     
  • प्रश्र्न – हानोपाय अर्थात् हान का उपाय क्या है?
  • उत्तर – विवेकख्याति अर्थात् पुरुष और प्रकृति के भेद का साक्षत ज्ञान हानोपाय है। योग की सहायता से पुरुष विवेकख्याति से अविद्या का नाश कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है, जिसे कैवल्य (मोक्ष) कहते हैं।
इन प्रश्र्नों और उन के उत्तर को समझाने के लिये दर्शनशास्त्रों (षड्दर्शन) का निर्माण किया, जो वेदों पर आधारित है। वेद ईश्वरीय ज्ञान, जो सृष्टि के आरम्भ में ऋषियों को समाधि द्वारा होता है। अपने को भूले हुए चित्त को इच्छित सात्विक विषय पर और दीर्घ समय तक सिथर रखा जाना समाधि है। ऋग्वेद का उपवेद अर्थवेद, यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद, सामवेद का उपवेद गान्धर्वेद और अथर्वेद का उपवेद आयुर्वेद है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष वेदों के अंग है। ईश, केश, कठ, प्रश्र्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्र्वेताश्र्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक मुख्य उपनिषद है जो ब्रह्म विद्या की व्याख्या करते हैं। छः दर्शनशास्त्र निम्न हैं –
  • मीमांसा और वेदांत –
    • मीमांसा (पूर्व-मीमांसा) दर्शनशास्त्र के वक्ता महर्षि जैमिनि है
    • वेदांत (उत्तर-मीमांसा) दर्शनशास्त्र के वक्ता महर्षि वेदव्यास है
  • न्याय और वैशेषिक –
    • न्याय दर्शनशास्त्र के वक्ता मुनि गोतम है
    • वैशेषिक दर्शनशास्त्र के वक्ता मुनि कणाद है
  • सांख्य और योग –
    • सांख्य दर्शनशास्त्र के वक्ता महर्षि कपिल है
    • योग दर्शनशास्त्र के वक्ता महर्षि पातञ्जल  है
सांख्य दर्शन और योग दर्शन एक दूसरे के पूरक हैं। यदि  सांख्य दर्शन बाहरी जगत अर्थात् प्रकृति और पुरुष के तात्त्विक स्वरूप का विवेचन करता है, तो  योगशास्त्र भीतरी जगत अर्थात् चित्त और उसकी वृत्तियों का वर्णन करता है। वास्तव में योग, सांख्य का क्रियात्मक रूप ही है।
 
योगशास्त्र में चार पादों में कुल 195 सूत्र है। समाधिपाद, साधनापाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद में क्रमानुसार 51, 55, 55 और 34 सूत्र हैं। योग के तीन अंतर्विभाग हैं –  उपासना-योग अर्थात् चित्त को एक लक्ष्य पर ठहराना, कर्मयोग अर्थात् निष्काम कर्म और ज्ञान-योग। समाधिपाद में, क्रम अनुसार, समाहित-चित्त और विक्षिप्त चित्त वालों के लिये समाधि के उपाय बतलाए गए हैं। विभूतिपाद में अश्रद्धालु को श्रद्धापूर्वक योग में प्रवृत करने के लिये योग की विभूतियाँ बतलाई गई हैं। कैवल्यपाद में उपयोगी-चित्त तथा चित्त के सम्बन्ध में शंकाओं का निवारण किया गया है।
योगशास्त्र में बताए हुए साधनों का पुनः पुनः श्रद्धापूर्वक श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से साधक को शीघ्र ही अपनी योग्यता अनुसार आध्यात्मिक लक्ष्य की उपलब्धि हो जाती है। योग पक्षपात और वाद-विवाद रहित कौशल है जो स्वयं को अनुभव द्वारा ही प्राप्त होता है। 
 
हिरण्यागर्भ योग के पूर्व वक्ता हैं और महर्षि पातञ्जल ने हिरण्यागर्भ उस योग के आधार पर योग सूत्रों की रचना की है। अनुबन्ध-चतुष्टय के अनुसार शास्त्रकार अपने शास्त्र के आरंभ में निम्न चार बातों का वर्णन कर दिया कर देते हैं –
  • प्रश्र्न – शास्त्र का विषय क्या है?
  • उत्तर – योग शास्त्र का विषय योग है।

  • प्रश्र्न – शास्त्र का प्रयोजन क्या है?
  • उत्तर – योग शास्त्र का प्रयोजन अपवर्ग अर्थात् स्वरूप-स्थिति है।

  • प्रश्र्न – शास्त्र का अधिकारी कौन है?
  • उत्तर – योग शास्त्र का अधिकारी जिज्ञासु अथवा मुमुक्षु है।

  • प्रश्र्न – शास्त्र का सम्बन्ध क्या है?
  • उत्तर – यहाँ योग साधन है और स्वरूप-स्थिति साध्य है।
 

We are not Mind

posted Dec 5, 2009, 10:51 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Dec 5, 2009, 11:01 PM ]

Mind is a tool attached on to us and helps us to operate in the material World which is made of time, space and unit. As a general rule, a utility item (mind) is always for someone to use and not for itself. Mind may or may not be there, but we are always there. Mind is basically a series of thoughts, which are linear in nature, wherein each through emerges, stays for some time and then merges back in the substratum of consciousness. We can observe gaps between two thoughts where mind does not exist, known as no-mind.
 
 
 
Mind can not simultaniously observe a thought with another thought. The one who is watching the thought simultaniously is different from mind. We can also feel the absence of mind in the deep sleep i.e. dreamless sleep. In deep sleep, mind along with senses becomes dormant and non-functional. Even when mind is dormant in deep-sleep, consciousness can still experiences the "absense" of mind. Also we should note that our likes and dislikes i.e. mind itself, keep on changing with the passage of time and environment around us. So we can say mind is relative and dependent upon absolute existence.

Mind and its pattern

posted Dec 5, 2009, 10:34 PM by Surinder Shanker Anand Artist   [ updated Jun 13, 2010, 9:45 PM ]

 
Typical worldly mind runs on pre-defined grooves and have a set pattern to follow. Throughout the life, consciously or unconsciously, mind is striving hard to attain happiness and avoid non-happiness. By definition happiness and non-happiness is conducive and non-conducive environment respectively, which varies from mind to mind i.e. past conditioning.
 
We are endowed with body, senses, mind, intellect and memory, which make us capable of interacting with Worldly objects, ideas and situations etc. The proximity of an object generates knowledge about the object. Then mind starts contemplation and identifying itself with the object by projecting a complete future (happiness or conducive environment), which is the seed of the desire. Further desire manifests and mind decides to attain the desired object. In order to attain the object, mind exerts its influence on the gross equipment (body) and forces it to take series of action to attain the desired object. The result of this action is a mix of conducive or non-conducive environment in varying ratio.
 
Now the achieved happiness (conduciveness) will either consolidates predefined likes, or creates new liking for the attained object. Likes give rise to attachment to the object along with fear of losing it, which further gives rise to the greed i.e. to have more. When mind repeatedly moves on the new pattern, it becomes a habit, wherin mind  unconsciously flows in the pre-defined groves.
 
Any obstruction in achieving the desired conducive environment or facilitation on the way to non-conducive environment is dealt with worry and anger, which leads to distortion of knowledge and loss of focus. In this state, mind losses its power to discriminate, which leads to downfall and non-fulfillment of the objective. This outcome further amplifies the non-conducive environment and mind gets trapped in the vicious circle, leading to greater pain and misery.
 
To analyse and understand the above is known as self-study (Swadhya).
 
 

1-10 of 27