sohrai festival(सोहराय पर्व या मरांग दई)

   सोहरायपर्व-   यह संथालो का सबसे बडा पर्व है।यह पूस महीने मे नये फसल के साथ मनाया जाता है,यह पर्व किसी खास
तारीक या तिथि को नहीं मनाया जाता है।इस पर्व को मनाने के लिए मंझी हाडाम द्वारा बैठक बुलाया जाता है,तथा गाँव में
सभी व्यक्ति के कुशल-मंगल होने पर ही पर्व मनाने का निर्नय लिया जाता है।
       गाँव में सभी के कुशल-मंगल होने पर सोहराय पर्व मनाने के लिए दिन तय किया जाता हैं।तब मंझी हाडाम,जोग मंझी को घर-घर जाकर सूचित करने का आदेश देते हैं,तब जोग मंझी घर-घऱ जाकर सूचित करते हैं कि इस दिन को सोहराय पर्व का ऊम(स्नान) है,सभी अपने-अपने रिश्तेदारों को सोहराय पर्व का न्योता दें -दें और पर्व के नाम पर मदिरा तैयार करें।
         यह पर्व मुख्य रूप से तीन दिन का होता है जिसमे  -
  1. पहला दिन को ऊम हीलोक्(स्नान या साफ-सफाई का दिन)
  2. दूसरा दिन को दाकाय हीलोक(खाने पीने का दिन)और
  3. तीसरा या अंतिम दिन को अडाक्को हीलोक
      तय किये गए दिन सभी मेहमान जमा होते है,इस पर्व में खासकर होपोन एरा(शादी-शुदा बेटियों)और मिसरा(शादी-शुदा
बहनो) को बुलाया जाता है,इसलिए यह खासकर इन्हीं(बेटी और बहनों) लोगों का पर्व है।इस पर्व में इनका खूब सेवा-सत्कार
किया जाता है।
        ऊम हीलोक् के पहले शाम गोडेत(नायके का सहायक) नायके को तीन मुर्गे सौंपते हैं,जिसमे दो पोण्ड सिम(साफेद- मर्गे) और एक हेडाक् सिम(एक प्रकार का मुर्गे का रंग) होता है। नायके तीनो मुर्गे को बाँधने के पश्चात कुछ नियम-धर्म का
पालन करते हैं। जैसे कि ऊस रात नायके(पुजारी) धरती पर चटाई बिछाकर सोते हैं।
        ऊम के दिन गोडेत घर-घर जाकर मुर्गा, चावल, नमक, हल्दी इतयादि एकत्रित करते हैं, और नायके एरा(पूजारिन)
स्नान करने के पश्चात अरवा चावल पीसती है। उसके पश्चात नायके,गोडेत और कुछ ग्रामिण एकत्रित मुर्गों को लेकर नदी के किनारे पूजा करने के लिए प्रस्थान करते हैं।
         स्नान करने के पश्चात नायके उत्तर दक्षिण दिशा में गोबर से लिपकर लम्बा-लम्बा एक -एक खोंण्ड(खण्ड) बनाते है,
और प्रत्येक खण्ड मे भिन्न-भिन्न स्थानों पर थोडा-थोडा चावल रखते जाते हैं। चावल रखने के बाद उसके किनारे-
किनारे तीन-तीन सिंदूर का टिका लगाते हैं ।उसके बाद ऊम के पहले दिन पकडे गए तीन मुर्गों में से हेडाक सिम पर जल छिडक कर,सर्वप्रथम उसके सिर पर, उसके बाद उसके डैने और पैर पर सिंदूर करते हैं।तब नायके एक अण्डा लेकर उसपर सिंदूर करते हैं और चावल पर स्थापित करते हैं तथा हेडाक सिम(मुर्गा) को चावल खिलाते हुए  इस बाखेंढ(मंत्र ) का उच्चारण करते हैं-      
जोहार तोबेखान -जाहेर एरा,ठकूर जी,सोहराय ञुतुम ते एमाम कान,चालाम कान........................................................डी रे,डण्डी रे,लाच् हासो बोहोक्
हासो,अलोपे बोलो ओचोया।पेडाको, गुतीको ,नय पारोम,गाडा पारोम नेवतावाकोत
-को ले,देवको,भगिन को,नति को,नतकार को,एनेच जोंङ,सुलंङ जोंङाको,जिनथी
अलो,पथरी अलो,नाश अलो,विनाश अलो,नेयाव अलो झोगडा अलो,रसका ते
एनेच जोंङ सुलंङ जोंङमाको,गोंसाइ ठकुर तीञ।
 
उसके बाद उस मुर्गे की बलि दी जाती है,तथा सभी खण्डों में अन्य मुर्गों की बलि दी जाती है।बलि से प्राप्त मुर्गों का सूड़े
(खिचडी) बनाया जाता है तथा गाँव के सभी पुरूष उसका भोग करते है और गोट हण्डी(मदिरा) पिया जाता है।
उसके बाद मंझी गाँव के लोगों से सब खैरियत हैं,का जायजा लेते हैं और उसके बाद यह उपदेश देते हैं।
      ठकूर के कृपा से सब-कुछ ठीक-ठाक होने के कारण ही हम आज सोहराय पर्व मना पा रहे हैं तथा मरांग दई(सोहराय-पर्व) हमारे पास आई है।सभी पाँच दिन पाँच रात नाच गान के जरिए खुशी मनाएँ,लडाई-झगडा,लोभ-लालच
न,इर्ष्या-द्वेश न करें,इतयादि।जो संथाली में उस प्रकार है-
  • [मोंडें सिंञ मोंडें ञिंदा एनेच जोंङ पे,सुलंङ जोंङ पे,बोयहा-बोकोयहा।
  • नेयाव अलो,झोगडा अलो,लोब अलो,लालोच अलो,
  • लालोच मेनाक् खान ञेल ठीक काते झंटी झींगा को हों गोद पे।
  • जात वानाक् दो अलो।
  • डोडोवाक् हों अलो।
  • जलियाक् को गोद पे।
  • आर ओका बहा को चारेच तेको बातावाक्,सुतम तेको तोल अकात् ओना दो अलोपे सित् कय ताबोना।
अदो मोंडें होड को रोड रूवाडा- गेल बार पाहा ते लुतूर बोन तेपेदा आर जहान लटू से कटीच कथा,बाबोन मेंत लुतुराआ।]

      उपदेश के समाप्त होने पर चरवाहो को गाय लाने के लिए कहा जाता है।तब नायके चरवाहों से डंडा मँगते हैं और सभी डंडा को पूजा खण्ड में रखकर तेल सिंदूर देते है।उसके बाद चरवाहों को पूजा खण्ड पर गाय खदेडने का आदेश दिया
जाता है,और जो गाय पूजा खण्ड में स्थापित अण्डा को सूंघती है, या पैर लगाती है,उस गाय का पैर धोया जाता है,तथा उसके सिंगों पर तेल लगाकर सिंदूर दिया जाता है।














       
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