हे परमसर्जक ! मैंने स्वयं रचा
, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए..
 

















          ..और मैं और अधिक करुण हो जाता हूँ

 

पर किसी भी मन्दिर में, मैं जैसे ही रामझाँकी से, रामहिंडोले से, उसके झूलन-दोलन से, राम-सीता के ऐसे सुख-समाज से, ऐसी मधुरोपासना से और ऐसे वैभव-विलास से साक्षात होता हूँ, मेरी कल्पना से सारी यथावत् चित्रावली धूल-धूल हो जाती है। तब मुझे एक ओर अशोक-वन की विरह-व्यथित-तन्वी, क्षरित-मेघ-नयनी, मलिन मुखी, खिन्न सीता की सुधि आती है और दूसरी ओर वन-वन भटकते, लता-विटप से, खग-मृग से, भ्रमर-निकर से खोई जानकी का अता-पता पूछ्ते, रह-रहकर बिलखते अधीर राम की या फिर उस निरीह, निर्वासित, आपद्सत्वा वैदेही की, जो घोर-घनान्ध विपिन में निस्सहाय, अकेली, सिसकती विलप रही हों और उस श्लथ-शुष्क-तन, स्थिर-सुदूर-नयन, विकल मन, मौन बैठे यज्ञरत कौशलेय की, जिनके वाम भाग में कोई दूसरी परिणीता नहीं, स्वर्ण-प्रतिमूर्ति- सीता ही स्थान पाती हों| जन्मभूमि से लेकर गुप्तारघाट तक के बस यही आर्द्र चरित्र मेरी स्मृति में बार-बार आने लगते हैं। आ-आकर आँखों के सामने उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, चित्त में पैठने-समाने लगते हैं। तब सावन मेले की सारी चहक-चमक फीकी लगने लगती है। मन उचटकर एकांत चाहने लगता है। भीड़ काटने लगती है। और बने-ठने मठाधीशों की, रामनामी ओढ़े रामभक्तों की विभवशालिनी मुस्कराहट जहर-सी लगती है, मुझे फाड़ खाती है।

     तब मैं राम के, सीता के, लक्ष्मण के, उनके वेदना-विह्वल क्षणों के, उनकी व्यथा-विक्षत गाथा के और अधिक सन्निकट हो जाता हूँ। उनकी पीड़ा, उनकी पीड़ायुक्त अंतर्भुक्ति, उनके आँसू ही भोगना चाहता हूँ , उनके सुख, उनके सुख-निनाद नहीं, उनके वियोग, उनके वन, उनके वनवास को ही, उनके संताप को ही। तब मेरी रामनामी, मेरी हृद-रामनामी, मेरे अन्तस् की पीड़ा-पिछौरी और अधिक सत्व-संपुष्ट, और अधिक तंतु-संहृत, और अधिक रंगीन हो जाती है। और मैं और अधिक करुण हो जाता हूँ।


                                       -- 'मेरी रामनामी', से संतलाल करुण