उन्नेताunnetaa

द्रोणकलश

हारियोजन ग्रह

उन्नेता

टिप्पणी : यज्ञ के १६ मुख्य ऋत्विजों में उन्नेता यजुर्वेद के ४ ऋत्विजों में से एक है । चूंकि १६ ऋत्विजों को शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति की १६ कलाएं कहा गया है , अतः प्रत्येक ऋत्विज की प्रकृति को हृदयंगम करना आवश्यक है । उन्नेता ( उत् - नय )समझने के लिए पहले नय शब्द को समझना आवश्यक है । अभिधान राजेन्द्र कोश में नय का विस्तार से वर्णन किया गया है जो वैदिक साहित्य में केवल संकेत रूप में उपलब्ध है । इस वर्णन के अनुसार जो ज्ञान श्रुत द्वारा प्राप्त होता है, उसे स्मृति में लाना नय कहलाता है । अन्य शब्दों में , अनेकांशात्मक वस्तु के एक अंश को प्रतीति में लाना , व्यवहार में लाना नय है ।

ऐसा कहा जा सकता है कि श्रुत ज्ञान को प्राप्त होना एकान्तिक साधना का मार्ग है , जबकि नय को प्राप्त होना सार्वत्रिक साधना का । ऐसा हो सकता है कि श्रुत को प्राप्त करने में मनुष्य के पाप आदि बाधक न बनते हों , लेकिन नय को प्राप्त करने के लिए वैदिक ऋचाओं के अनुसार पापों का प्रक्षालन आवश्यक है ।

पुराणों में उन्नेता ऋत्विजों के रूप में अंगिरा , शांशपायन आदि नाम आए हैं । शांशपायन के उल्लेख के संदर्भ में प्रतीत होता है कि इस नाम में शंसन निहित है। शंसन का अर्थ है कि जो उपलब्धि श्रुत के स्तर की गई है, उसका स्मृति के स्तर तक विस्तार करना। वैदिक साहित्य में प्रत्यक्ष रूप में तो केवल ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१५.३ में ही चक्र व पिशंग नामक उन्नेता - द्वय का उल्लेख आया है । ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.४ में आध्यात्मिक रूप से ऊर्क को उन्नेता कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण १२.१.१.११ में प्राण को उन्नेता कहा गया है । जैमिनीय ब्राह्मण २.६८ में विष्णु को उन्नेता कहा गया है ।

अथर्ववेद ६.११९.१ के अनुसार साधक जो अपनी इन्द्रियों से जुआ खेल कर ऋण को प्राप्त होता है , वैश्वानर अग्नि उसका सुकृत के लोक को उन्नयन कर सकती है(हारियोजन ग्रह के संदर्भ में धान को ग्रह में पकाकर भक्षण करने के उल्लेख के संदर्भ में प्रतीत होता है कि हारियोजन की स्थिति ऋणात्मकता से धनात्मकता को प्राप्त करने की स्थिति है) । अथर्ववेद ३.१२०.१ के अनुसार जो माता व पिता आदि की हिंसा की गई है , गार्हपत्य अग्नि उससे सुकृत के लोक को उन्नयन करती है । इसी प्रकार अथर्ववेद ३.१२१.२ के अनुसार जो दारु के , रज्जु के , भूमि के , वाक् के बंधन हैं, गार्हपत्य अग्नि उनसे बचाकर सुकृत के लोक को उन्नयन करती है । ऋग्वेद ३.८.४ व ३.८.९ की सार्वत्रिक ऋचाओं में कविगण यूप रूपी ज्योतियों का उन्नयन करते हैं । अथर्ववेद १३.१.२३ के अनुसार जो रोहित का रोहिणी नामक सद: / निवास स्थान है , गन्धर्व व कश्यप उसका उन्नयन करते हैं । अथर्ववेद ८.७.६ में अरुन्धती ओषधि को उन्नयन करने वाली कहा गया है । अथर्ववेद २.९.१ में वनस्पति राक्षसों के बंधन से मुक्त करके जीवों के लोक को उन्नयन करती है । अथर्ववेद १३.२.४ के अनुसार अत्रि ने सूर्य का उन्नयन करके द्युलोक में स्थापित किया । अथर्ववेद ७.१०८.१/७.१०३.१ में क्षत्रिय रूपी क:/ प्रजापति द्रोह व निन्दा करने वालों से रक्षा करके उन्नयन करता है । अथर्ववेद ३.१९.३ में ब्रह्मत्व द्वारा अमित्रों का नाश करके स्व के उन्नयन का उल्लेख है । ऋग्वेद ६.७२.२ में इन्द्रासोमौ देवता - द्वय से सूर्य के उन्नयन की प्रार्थना की गई है । ऋग्वेद १.११६.८ व १.११६.२४ में अश्विनौ देवता - द्वय उन्नयन करते हैं । ऐसा लगता है कि उपरोक्त सब उल्लेख उन्नेता ऋत्विज के अप्रत्यक्ष रूप हैं ।

उन्नेता उन्नयन किस प्रकार करता है , उसका उत्तर हमें ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.४ से प्राप्त हो सकता है जहां ऊर्क को उन्नेता कहा गया है । वैदिक साहित्य में प्रायः कहा जाता है कि यह जो ओषधि - वनस्पतियां ऊपर की ओर बढती हैं, यह ऊर्जा के कारण है । पहले ऊपर से इष रूपी वर्षा होती है और उसके पश्चात् ऊर्ज का आरोहण होता है । प्रसंग की व्याख्या मात्र के लिए , केवल काल्पनिक रूप में , इष को समाधि से प्राप्त शक्ति मान सकते हैं जो वनस्पतियों के मूल को प्राप्त होती है । इस मूल से यह शक्ति वृक्ष रूप में , ऊर्जा के रूप में पल्लवित होती है , पुष्प , फल व बीज का रूप ग्रहण करती है , भक्ति के मार्ग में नृत्य का रूप ग्रहण करती है । तैत्तिरीय ब्राह्मण २.३.७.२ , जैमिनीय ब्राह्मण १.४० के अनुसार अग्निहोत्र में स्रुचा/स्रुवा का ४ बार उन्नयन किया जाता है । प्रथम बार के उन्नयन से दर्शपूर्ण मास के फल की , दूसरी बार से चातुर्मास की , तृतीय से इष्टिपशुबन्ध की व चौथी बार से वाजपेय , अश्वमेध आदि के फल की प्राप्ति होती है । यह यज्ञीय पल्लवन है । ऊर्ज की निरुक्ति भी , काल्पनिक रूप में ऊ से जायमान शक्ति के रूप में कर सकते हैं । तैत्तिरीय संहिता १.३.१३.२, शतपथ ब्राह्मण ३.९.३.२७ , मैत्रायणी संहिता ४.५.२ आदि में सार्वत्रिक रूप से समुद्र से अक्षित उन्नयन का उल्लेख आता है । यह महत्वपूर्ण है कि उन्नयन के लिए ऊर्जा प्राप्त करते समय यह ध्यान रखा जाए कि आनन्द समुद्र को कोई हानि न पंहुचे ।

गोपथ ब्राह्मण १.४.६ , कात्यायन श्रौत सूत्र १२.२.१६ , शतपथ ब्राह्मण १२.१.१.९ आदि के अनुसार उन्नेता ऋत्विज नेष्टा , आग्नीध्र , सुब्रह्मण्य व ग्रावस्तुत् ऋत्विजों को दीक्षा देता है , जबकि उन्नेता को दीक्षित करने के लिए ब्रह्मचारी , स्नातक आदि की आवश्यकता पडती है ।

ब्राह्मण और श्रौत ग्रन्थों ( शतपथ ब्राह्मण ४.३.५.९, १८,१९, ४.४.३.२, तैत्तिरीय संहिता ६.५.९.३ , द्राह्यायण श्रौत सूत्र ६.३.१८, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १३.१७.१, मैत्रायणी संहिता ४.७.४, आश्वलायन श्रौत सूत्र ६.१२.१) में उन्नेता ऋत्विज का प्रत्यक्ष उल्लेख प्रायः अग्निष्टोम यज्ञ के तृतीय सवन के अन्त में आदित्य और हारियोजन ग्रहों के वर्णन में आता है । हारियोजन ग्रह के संदर्भ में कहा गया है कि ऋक् और साम ही इन्द्र के २ हरी हैं जिन्हें उन्नेता धान और सोम के रूप में भक्षण प्रदान करता है । इस धान का भक्षण ऋत्विज गण भी करते हैं । इन्द्र के रथ में यह हरि - द्वय जुडने पर इन्द्र सोम पान के लिए आने को उत्सुक होता है । हारियोजन ग्रह का वास्तविक अर्थ स्पष्ट होने पर ही उन्नेता के विशिष्ट कार्यों को समझा जा सकता है । हारियोजन ग्रह के संदर्भ में ही उन्नेता को अतिरिक्त कहा गया है , जिस प्रकार द्रोण कलश व विष्णु अतिरिक्त हैं ।

वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से अग्निहोत्र के संदर्भ में गौ के दोहन का वर्णन आता है ( जैमिनीय ब्राह्मण १.२१, गोपथ ब्राह्मण १.३.१२, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.१.७.१, २.१.८.२, शतपथ ब्राह्मण ११.५.३.५, काठक संहिता ३४.१६) । दुग्ध के अधिश्रित होने के पश्चात् उसका उन्नयन किया जाता है । उन्नयन करते समय दुग्ध को प्रायः वैश्वदेव या त्वाष्ट्र देवता वाला कहा गया है जबकि उन्नीत दुग्ध को प्रायः सावित्र देवता का कहा गया है ।

First published : 1999 AD; published on internet : 14 - 1 - 2008 AD(Pausha shukla shashthee, Vikramee Samvat 2064)

संदर्भ :

१ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतमुन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥ - ऋग्वेद१.११६.८

२विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्यथुः सोममिव स्रुवेण ॥ - ऋ.१.११६.२४

३नीचा सन्तमुदनयः परावृजं प्रान्धं श्रोणं श्रवयन् त्सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.१२

४युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ - ऋ.३.८.४

५हंसा इव श्रेणिशो यतानाः शुक्रा वसानाः स्वरवो न आगुः। उन्नीयमानाः कविभिः पुरस्ताद् देवा देवानामपि यन्ति पाथः ॥ - ऋ.३.८.९

६पुरू सहस्रा नि शिशा अभि क्षामुत् तूर्वयाणं धृषता निनेथ ॥ - ऋ.६.१८.१३

७इन्द्रासोमा वासयथ उषासमुत् सूर्यं नयथो ज्योतिषा सह। उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि ॥ - ऋ.६.७२.२

८प्र सोमस्य पवमानस्योर्मय इन्द्रस्य यन्ति जठरं सुपेशसः। दध्ना यदीमुन्नीता यशसा गवां दानाय शूरमुदमन्दिषुः सुताः ॥ - ऋ.९.८१.१

९उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः। उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः ॥ - ऋ.१०.१३७.१

१०अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः। ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि। - अथर्ववेद१.१०.१

११दशवृक्ष मुञ्चेमं रक्षसो ग्राह्या अधि यैनं जग्राह पर्वसु। अथो एनं वनस्पते जीवानां लोकमुन्नय ॥ - अ.२.९.१

१२नीचैः पद्यन्तामधरे भवन्तु ये नः सूरिं मघवानं पृतन्यान्। क्षिणामि ब्रह्मणामित्रानुन्नयामि स्वानहम् ॥ - अ.३.१९.३

१३उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः। उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः ॥ - अ.४.१३.१

१४उदेनमुत्तरं नयाग्ने घृतेनाहुत। समेनं वर्चसा सृज प्रजया च बहुं कृधि ॥ - अ.६.५.१

१५यददीव्यन्नृणमहं कृणोम्यदास्यन्नग्न उत संगृणामि। वैश्वानरो नो अधिपा वसिष्ठ उदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम् ॥ - अ.६.११९.१

१६यदन्तरिक्षं पृथिवीमुत द्यां यन्मातरं पितरं वा जिहिंसिम। अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम् ॥ - अ.६.१२०.१

१७यद्दारुणि बध्यसे यच्च रज्ज्वां यद्भूम्यां बध्यसे यच्च वाचा। अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम् ॥ - अ.६.१२१.२

१८को अस्या नो द्रुहोऽवद्यवत्या उन्नेष्यति क्षत्रियो वस्य इच्छन्। को यज्ञकामः क उ पूर्तिकामः को देवेषु वनुते दीर्घमायुः ॥ - अ.७.१०८.१ह्न७.१०३.१

१९जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्। अरुन्धतीमुन्नयन्तीं पुष्पां मधुमतीमिह हुवेऽस्मा अरिष्टतातये। - अ.८.७.६

२०इदं सदो रोहिणी रोहितस्यासौ पन्थाः पृषती येन याति। तां गन्धर्वाः कश्यपा उन्नयन्ति तां रक्षन्ति कवयोऽप्रमादम्।। - अ.१३.१.२३

२१विपश्चितं तरणिं भ्राजमानं वहन्ति यं हरितः सप्त बह्वी। स्रुताद् यमत्त्रिर्दिवमुन्निनाय तं त्वा पश्यन्ति परियान्तमाजिम्। - अ.१३.२.४

२२अभितोऽग्निमंसावुन्नयति। योषा वै वेदिः, वृषाग्निः। परिगृह्य वै योषा वृषाणं शेते। मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते। तस्मादभितोऽग्निमंसा उन्नयति। - मा.श.१.२.५.१५

२३उपवसथ ब्राह्मणम् :अथाश्वमाक्रमयति। तमाक्रमय्य प्राञ्चमुन्नयति। तं पुनरावर्त्तयति। - - - मा.श.२.१.४.२३

२४अथ चतुरुद्रायति, चतुर्द्धा विहितं हीदं पयः। अथ समिधमादायोदाद्रवति। - - -स वै द्विरग्नौ जुहोति, द्विरुपमार्ष्टि, द्विः प्राश्नाति, चतुरुद्रायति, तद्दश। दशाक्षरा वै विराट्। विराड् वै यज्ञः। - मा.श.२.३.१.१७

२५अथ गृह्णाति। समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि। इति। आपो वै समुद्रः। अप्स्वेवैतदक्षितिं दधाति। तस्मादापऽएतावति भोगे भुज्यमाने न क्षीयन्ते। तदन्वेकधनानुन्नयन्ति। तदनु पान्नेजनान्। - मा.श.३.९.३.२७

२६दक्षिणादानम् : - - - - -अथाच्छावाकाय। अथोन्नेत्रे। अथ ग्रावस्तुते। अथ सुब्रह्मण्यायै प्रतिहर्त्रे उत्तमाय ददाति। - मा.श.४.३.४.२२

२७तृतीयसवनग्रहेषु आदित्यग्रहः : ते सम्प्रपद्यन्ते -अध्वर्युश्च, यजमानश्च, आग्नीध्रश्च, प्रतिप्रस्थाता च, उन्नेता। अथ योऽन्यः परिचरो भवति। उभे द्वारेऽअपिदधाति। - मा.श.४.३.५.९

२८स मेक्षयति। विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथः, तस्मिन्मत्स्व इति। अथोन्नेत्रऽउपांशुसवनं प्रयच्छति। अथाहोन्नेतारम् - आसृज ग्राव्णा इति। तानाधवनीये वा सृजति चमसे वा। राजानमुन्नीय। आदित्यानां वै तृतीयसवनम्, आदित्यान्वाऽअनु ग्रावाणः। तदेनान्त्स्वऽएव भागे प्रीणाति। अपोर्णुवन्ति द्वारे। - मा.श.४.३.५.१८

२९अथ पुनः प्रपद्याग्रयणमादत्ते। उदीचीनदशं पवित्रं वितन्वन्ति। प्रस्कन्दयत्यध्वर्युः आग्रयणस्य संप्रगृह्णाति प्रतिप्रस्थाता। संस्रवावानयत्युन्नेता चमसेन वोदञ्चनेन वा। - मा.श.४.३.५.२१

३०अथ सम्प्रेष्यति - अग्नीन्नेष्टुरुपस्थमासीद, नेष्टः पत्नीमुदानय। उद्गात्रा सङ्ख~यापय, उन्नेतर्होतुश्चमसमनून्नय, सोमं माऽतिरीरिच इति। यद्यग्निष्टोमः स्यात्। - मा.श.४.४.२.१७

३१हारियोजन ग्रहः : तस्योन्नेताऽऽश्रावयति। अतिरिक्तो वाऽउन्नेता - न ह्येषोऽन्यस्याश्रावयति। अतिरिक्त एष ग्रहः। तस्मादतिरिक्तऽएवैतदतिरिक्तं दधाति। तस्मादुन्नेताऽऽश्रावयति। मूर्धन्नभिनिधायाश्रावयति मूर्धा ह्यस्यैषः। अथाह - धानासोमेभ्योऽनुब्रूहीति। आश्राव्याह - धानासोमान्प्रस्थितान् प्रेष्येति। - - - -मा.श.४.४.३.८

३२पात्रावकाशमन्त्राः : वैश्वदेवौ वाऽअम्भृणौ अतो हि देवेभ्य उन्नयन्ति, अतो मनुष्येभ्यः, अतः पितृभ्यः। तस्माद्वैश्वदेवावम्भृणौ। - मा.श.४.५.६.३

३३गर्गत्रिरात्रमहीनम् : द्वौ वोन्नेतारौ कुर्वीत। तयोर्यतरो नाश्रावयेत् - तस्मा एनां दद्यात्। व्यृद्धो वाऽएष उन्नेता - य ऋत्विक्सन्नाश्रावयति। व्यृद्धोऽएषा विराट् या विवृढा। तद् व्यृद्धऽएवैतद् व्यृद्धं दधाति। - मा.श.४.५.८.१३

३४अथास्यै (उखायाः) सर्वतस्तीरमुन्नयति। - मा.श.६.५.२.३

३५तस्यै (उखायाः) स्तनानुन्नयति। ऊधसस्तत् स्तनानुन्नयति। चतुःस्तना भवति। -मा.श.६.५.२.१८

३६अथ क्षत्रियस्य - उदेषां बाहूऽअतिरमुद्वर्च्चोऽअथो बलम्। क्षिणोमि ब्रह्मणाऽमित्रानुन्नयामि स्वाँ अहम् इति। यथैव क्षिणुयादमित्रान्, उन्नयेत् स्वान्। - - - -अयं वाऽअग्निः - ब्रह्म च क्षत्रं च। - मा.श.६.६.३.१५

३७स होवाच - इडैव मे मानव्यग्निहोत्री। - - - -आश्विमुन्नीयमानम्। वैश्वदेवमुन्नीतम्। - मा.श.११.५.३.५

३८गवामयनब्राह्मणम् : अथाध्वर्यवे नेष्टारमुन्नेता दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ ब्रह्मण आग्नीध्रं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथोद्गात्रे सुब्रह्मण्यां दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। एतांश्चतुर उन्नेता दीक्षयति। - मा.श.१२.१.१.९

३९गवामयन ब्राह्मणम् : अथोन्नेतारं स्नातको वा ब्रह्मचारी वाऽन्यो वा दीक्षितो दीक्षयति। न पूतः पावयेत् इति ह्याहुः। सैषाऽनुपूर्वदीक्षा। - मा.श.१२.१.१.१०

४०तेषां वा उन्नेतोत्तमो दीक्षते। प्रथमोऽवभृथादुदायतामुदैति। प्राणो वा उन्नेता। प्राणमेवैष्वेतदुभयतो दधाति। - मा.श.१२.१.१.११

४१तदाहुः - यस्याग्निहोत्रं स्रुच्युन्नीतं स्कन्देत्। किं तत्र कर्म। का प्रायश्चित्तिरिति। स्कन्नप्रायश्चित्तेनाभिमृश्य अद्भिरुपनिनीय परिशिष्टेन जुहुयात्। - मा.श.१२.४.२.६

४२इत्थमेव कुर्यात्। तदेवोपविशेत्। यत् स्थाल्यां परिशिष्टं स्यात्। तदस्मा उन्नीयाहरेयुः।तद्धैक उपवल्हन्ते। हुतोच्छिष्टं वा एतत्। - - - - - - तस्माद्यत्स्थाल्यां परिशिष्टं स्यात्। तदस्मा उन्नीयाहरेयुः। यद्यु तत्र न स्यात्। यदन्यत् विंदेत्। तदग्नावधिश्रित्यावज्योत्यापः प्रत्यानीयोद्वास्य तददो हैवोन्नेष्यामीत्युक्तं भवति। अथात्र यथोन्नीतमेवास्मा उन्नीयाहरेयुः। तेन कामं जुहुयात्। - मा.श.१२.४.२.८

४३तदाहुः - यस्याग्निहोत्रं स्रुच्युन्नीतममेध्यमापद्येत। किं तत्र कर्म का प्रायश्चित्तिरिति। तद्धैके होतव्यं मन्यन्ते। - मा.श.१२.४.२.९

४४तदाहुः - यस्याग्निहोत्रं स्रुच्युन्नीतमुपरिष्टादववर्षेत्। किं तत्र कर्म का प्रायश्चित्तिरिति। तद्विद्यात्। उपरिष्टान्मा शुक्रमागन्नुप मां देवाः प्राभूवन् श्रेयान् भविष्यामि इति। तेन कामं जुहुयात्। - मा.श.१२.४.२.१०

४५(यदेष दीर्घसत्र्यग्निहोत्रं जुह्वत् प्रवसन् मि|येत) : नोन्नेष्यामीत्याह। न चतुरुद्रायति। यद्धोन्नेष्यामीति ब्रूयात्। यच्चतुरुद्रायेत्। देवत्रा कुर्यात्। सकृदेव तूष्णीं न्यक् पर्यस्यति। पितृदेवत्यमेवैनत् तत्करोति। - मा.श.१२.५.१.९

४६ज्योतिष्टोम प्रायश्चित्त ब्राह्मणम् : अथ यदि चमसेषून्नीतः किंचिदापद्येत। विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा - इति जुहुयात्। विश्वे हि स तर्हि देवा भवति। अप पाप्मानं हते। - मा.श.१२.६.१.२७

४७महावीरादि प्रवर्ग्यपात्र संभरणम् :- - - -मध्ये संगृहीतमिव हि शिरः। अथोपरिष्टात्त्र्यंगुलं मुखमुन्नयति। नासिकामेवास्मिन्नेतद्दधाति। - मा.श.१४.१.२.१७

४८गवाजपयोऽवसेचनं ब्राह्मणम् : अथोन्नयति - घर्माय दीष्व इति। एष वा अत्र घर्मो रसो भवति। यमेषा पिन्वते। - मा.श.१४.२.१.१०

४९अग्निहोत्रं वै प्रवर्ग्यः। - - -यदुन्नीतं, तद्रुचितः। (यद्रुचितः, तद्वायुः)। - मा.श.१४.३.२.२६

५०सोमो वै प्रवर्ग्यः। - - - यदुन्नीतः, तद् रुचितः। - मा.श.१४.३.२.३०

५१अभिषोतव्यस्य सोमस्य शकटादुपावरोहः : देवीरापो अपां नपाद्य ऊर्मिर्हविष्य इन्द्रियावान्मदिन्तमस्तं देवेभ्यो देवत्रा धत्त - - - - कार्षिरस्यपापां मृध्रँ समुद्रस्य वोऽक्षित्या उन्नये। - तै.सं.१.३.१३.२

५२प्राधान्येनाऽऽश्रावणादिमन्त्राः : अस्तु श्रौषडित्युपावास्राग्यजेत्युदनैषीद्ये यजामह इत्युपासदद्वषट्कारेण दोग्ध्येष वै सूनृतायै दोहो - - - - तै.सं.१.६.११.३

५३सोमोपस्थानमन्त्रोत्पादनम् : ग्रहं वा गृहीत्वा चमसं वोन्नीय स्तोत्रमुपाकुर्यात्प्रत्येव सोमँ स्थापयति प्रति स्तोमं - - -तै.सं.३.१.२.४

५४अग्निधारणाभिधानम् : उदेषां बाहू अतिरमुद्वर्च उदू बलम्। क्षिणोमि ब्रह्मणाऽमित्रानुन्नयामि स्वाँ अहम् (इति उत्तमे यजमानं वाचयंस्तूष्णीमौदुम्बर्यौ समिधावादधाति) ॥ - तै.सं.४.१.१०.३

५५यज्ञतन्वाख्येष्टकाभिधानम् : वैश्वदेव उन्नीतो- - - - तै.सं.४.४.९.१

५६अग्निप्रणयनाभिधानम् : उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाऽऽहुत। रायस्पोषेण सँसृज प्रजया च धनेन च (इति तिसृभिरौदुम्बरी समिधो घृतोषितास्तिस्र आधाय पशुबन्धवदग्निं प्रणयति)। - तै.सं.४.६.३.१

५७उदेनमुत्तरां नयेति समिध आ दधाति यथा जनं यतेऽवसं करोति तादृगेव तत्। - तै.सं.५.४.६.१

५८वेद्याभिधानम् : सुवर्गं वा एते लोकं यन्ति य उपसद उपयन्ति तेषां य उन्नयते हीयत एव स नोदनेषीति सून्नीयमिव यो वै स्वार्थेतां यताँ श्रान्तो हीयत उत स निष्ट्याय सह वसति तस्मात्सकृदुन्नीय नापरमुन्नयेत दध्नोन्नयेतैतद्वै पशूनाँ रूपं रूपैणैव पशूनवरुन्धे। - तै.सं.६.२.४.१

५९सोमोपावहरणकथनम् : समुद्रस्य वोऽक्षित्या उन्नय इत्याह तस्मादद्यमानाः पीयमाना आपो न क्षीयन्ते - तै.सं.६.४.३.४

६०हारियोजनग्रहकथनम् :- - - यदप्रहृत्य परिधीञ्जुहुयादन्तराधानाभ्याम् घासं प्र यच्छेत्प्रहृत्य परिधीञ्जुहोति निराधानाभ्यामेव घासं प्र यच्छत्युन्नेता जुहोति यातयामेव ह्येतर्ह्यध्वर्युः स्वगाकृतो - - - -उन्नेतर्युपहवमिच्छन्ते य एव तत्र सोमपीथस्तमेवाव रुन्धत - तै.सं.६.५.९.३

६१गर्गत्रिरात्राभिधानम् : अथाऽऽहुरुन्नेत्रे देयेत्यतिरिक्ता वा एषा सहस्रस्यातिरिक्त उन्नेतर्त्विजाम् - तै.सं.७.१.५.६

६२तं (यूपं) धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्त इति ये वा अनूचानास्ते कवयस्त एवैनं तदुन्नयन्ति। - ऐतरेय ब्राह्मण २.२

६३आ त्वा वहन्तु हरय इति प्रातःसवन उन्नीयमानभ्योऽन्वाह वृषण्वती पीतवती सुतवतीर्मद्वती रूपसमृद्धाः। - ऐ.ब्रा.६.९

६४असावि देवं गो,जीकमन्ध इति मध्यंदिन उन्नीयमानेभ्योऽन्वाह वृषण्वतीः पीतवतीः सुतवतीर्मद्वती रूपसमृद्धाः। - ऐ.ब्रा.६.११

६५इहोप यात शवसो नपात इति तृतीयसवन उन्नीयमानेभ्योऽन्वाह वृषण्वतीः पीतवतीः सुतवतीर्मद्वती रूपसमृद्धास्ता ऐन्द्रार्भव्यो भवन्ति। - ऐ.ब्रा.६.१२

६६तिस्रश्चैव कीकसा अर्धं च वैकर्तस्योन्नेतुः - ऐ.ब्रा.७.१

६७यस्याग्निहोत्रमधिश्रितममेध्यमापद्येत का तत्र प्रायश्चित्तिः- - - - - -स यद्येकस्मिन्नुन्नीते यदि द्वयोरेष एव कल्पस्तच्चेद्व्यपनयितुं शक्नुयान्निःषिच्यैतद्दुष्टमदुष्टमभिपर्यासिच्य तस्य यथोन्नीत्ती स्यात्तथा जुहुयात्सा तत्र प्रायश्चित्तिः - ऐ.ब्रा.७.५

६८तद्यत्रैतांश्चमसानुन्नयेयुस्तदेतं यजमानचमसमुन्नयेत्तस्मिन्द्वे दर्भतरुणके प्रास्ते स्यातां- - - - ऐ.ब्रा.७.३३

६९पितृलोके वा एतद्यजमानश्चरति। यत्पितृभ्यः करोति। स ईश्वर आर्तिमार्तोः। प्रजापतिस्त्वा वैनं तत उन्नेतुमर्हतीत्याहुः। यत्प्राजापत्ययर्चा पुनरैति। प्रजापतिरेवैनं तत उन्नयति। नाऽऽर्तिमार्छति यजमानः। - तैत्तिरीय ब्रा.१.३.१०.१०

७०यस्य प्रातःसवने सोमोऽतिरिच्यते। माध्यंदिनँ सवनं कामयमानोऽभ्यतिरिच्यते। गौर्धयति मरुतामिति धयद्वतीषु कुर्वन्ति - - - - मरुत्वतीषु कुर्वन्ति। तेनैव माध्यंदिनात्सवन्नान्नयन्ति। होतुश्चमसमनून्नयन्ते। होताऽनुशँसति। मध्यत एव यज्ञँ समादधाति। यस्य माध्यंदिने सवने सोमोऽतिरिच्यते। आदित्यं तृतीयसवनं कामयमानोऽभ्यतिरिच्यते। गौरिवीतँ साम भवति। अतिरिक्तं वै गौरिवीतम्। - - - - - होतुश्चमसमनून्नयन्ते होताऽनुशँसति मध्यत एव यज्ञँ समादधाति। यस्य तृतीयसवने सोमोऽतिरिच्यते। उक्थ्यं कुर्वीत - - - -होतुश्चमसमनून्नयन्ते। होताऽनुशँसति। मध्यत एव यज्ञँ समादधाति। - तै.ब्रा.१.४.५.१

७१रुक्मf होत्रे। आदित्यमेवास्मा उन्नयति। - तै.ब्रा.१.८.२.३

७२(निष्टप्तायां स्रुचि चतुर्वारं हविष्पूरणं स्रुवेण कुर्यादिति विधत्ते) :चतुरुद्रायति। चतुष्पादः पशवः। पशूनेवावरुन्धे। सर्वान्पूर्णानुन्नयति। सर्वे हि पुण्या राद्धाः। अनूच उन्नयति। प्रजाया अनूचीनत्वाय अनूच्येवास्य प्रजार्धुका भवति। - तै.ब्रा.२.१.३.५

७३ब्रह्मवादिनो वदन्ति। चतुरुद्रायति। द्विर्जुहोति। अथ क्व द्वे आहुती भवत् इति। अग्नौ वैश्वानर इति ब्रूयात्। - तै.ब्रा.२.१.४.४

७४अग्निहोत्र एवाहँ सायं प्रातर्वज्रं भ्रातृव्येभ्यः प्रहरामि। तस्मान्मत्पापीयाँसो भ्रातृव्या इति। चतुरुद्रायति। द्विर्जुहोति। समित्सप्तमी। सप्तपदा शक्वरी। शाक्वरो वज्रः। - तै.ब्रा.२.१.५.११

७५रौद्रं गवि। - - - -धातुरुद्वासितम्। बृहस्पतेरुन्नीतम्। सवितुः प्रक्रान्तम्। - तै.ब्रा.२.१.७.१

७६वायव्यं वा एतदुपसृष्टम्। - - - - - त्वाष्ट्रमुन्नीयमानम्। बृहस्पतेरुन्नीतम्। - तै.ब्रा.२.१.८.२

७७रेतो वा एतस्य हितं न प्रजायते। यस्याग्निहोत्रमहुतँ सूर्योऽभ्युदेति।यद्यन्ते स्यात्। उन्नीय प्राङुदाद्रवेत्। स उपसाद्याऽऽतमितोरासीत। स यदाऽऽताम्येत्। अथ भूः स्वाहेति जुहुयात्। प्रजापतिर्वै भूतः। तमेवोपासरत्। स एवैनं तत उन्नयति। - तै.ब्रा.२.१.९.२

७८(अग्निहोत्र एव चतुर्होतृúफलं दर्शयति) : चतुरुद्रायति। चतुर्होतारमेव तद्यज्ञक्रतुमाप्नोति दर्शपूर्णमासौ। - - - -चतुरुद्रायति समित्पञ्चमी पञ्चहोतारमेव तद्यज्ञक्रतुमाप्नोति चातुर्मास्यानि। - - - चतुरुद्रायति द्विर्जुहोति। षड्ढौतारमेव तद्यज्ञक्रतुमाप्नोति पशुबन्धम्। - - - - -चतुरुद्रायति। द्विर्जुहोति। समित्सप्तमी। सप्तहोतारमेव तद्यज्ञक्रतुमाप्नोति सौम्यमध्वरम्। - - - - चतुरुद्रायति। द्विर्जुहोति। द्विर्निमार्ष्टि। द्विः प्राश्नाति। दशहोतारमेव तद्यज्ञक्रतुमाप्नोति संवत्सरम्। - तै.ब्रा.२.३.७.२

७९प्राञ्चौ वेद्यंसावुन्नयति। आहवनीयस्य परिगृहीत्यै। प्रतीची श्रोणी। गार्हपत्यस्य परिगृहीत्यै। - तै.ब्रा.३.२.९१।९

८०(यूपाय परिवीयमाणायानुब्रूहीति प्रेषितेन होत्रा पठनीयामृचम्) : युवा सुवासाः परिवीत आगात्। स उ श्रेयान्भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति। स्वाधियो मनसा देवयन्तः। - तै.ब्रा.३.६.१.३

८१दशपेय : रुक्मोहोतुराग्नेयो होताथो अमुमेवास्मा आदित्यमुन्नयति। - ताण्ड~य ब्रा.१८.९.९

८२यः प्रतिप्रस्थाता सो अग्नीत्स उन्नेता - तां.ब्रा.२५.४.५

८३सर्प सत्रे ऋत्विजाः : चक्रपिशंगावुन्नेतारौ - तां.ब्रा.२५.१५.३

८४तपो गृहपतिः - - - ऊर्गुन्नेता - - - तां.ब्रा.२५.१८.४

८५आदित्यं हि तमो जग्राह। तदत्रिपनुनोद। तदत्रिरन्वपश्यत्। तदप्येतदृचोक्तम् --स्रुताद् यमत्रिर्दिवमुन्निनाय। दिवि त्वात्रिरधारयत् सूर्या मासाय कर्तवे। - गोपथ ब्राह्मण १.२.१७

८६किंदेवत्यं वत्समुन्नीयमानम् ? किंदेवत्यं वत्समुन्नीतम् ?- - - -किंदेवत्यम् (दुग्धं) उन्नीयमानम् ? किंदेवत्यमुन्नीतम् ? - गो.ब्रा.१.३.११

८७रौद्रं मे गवीडायां ,- - - वैराजं वत्समुन्नीयमानं, जागतमुन्नीतम्, - - - - - -धात्रमुद्वासितं, वैश्वदेवमुन्नीयमानं, सावित्रमुन्नीतं, - - - -गो.ब्रा.१.३.१२

८८तिस्रश्चैव कीकसा अर्धं चापानस्योन्नेतुः - गो.ब्रा.१.३.१८

८९अथाध्वर्यवे नेष्टारमुन्नेता दीक्षयति। स हैनमनु। अथ ब्रह्मण आग्नीध्रं दीक्षयति। अथोद्गात्रे सुब्रह्मण्यं दीक्षयति। अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्षयति। अथ तमन्यः स्नातको वा ब्रह्मचारी वा दीक्षयति। न पूतः पावयेदित्याहुः। - गो.ब्रा.१.४.६

९०अध्वर्युः प्रतिप्रस्थाता नेष्टोन्नेता निहितं पादमेकम्। समन्तरिक्षं यजुषा स्तुवन्तो वायुं पादं ब्रह्मणा धारयन्ति। - गो.ब्रा.१.५.२४

९१यथार्हामः स्रस्तमतिरेतदन्त्येतेष एवेश्वर उन्नेता। - गो.ब्रा.२.६.१४

९२रौद्रं गवि - - - -वैश्वदेवम् उन्नीतं - - - - जैमिनीय ब्रा.१.२१

९३अथाह उन्नेष्यामि इति। ओं मामहं स्वर्गं लोकम् अभि इति ब्रूयात्।- जै.ब्रा.१.३९

९४स यं प्रथमं स्रुवम् उन्नयति तद् वै दर्शपूर्णमासयो रूपम्। दर्शपूर्णमासाभ्याम् एवास्येष्टं भवति य एवं विद्वान् प्रथमं स्रुवम् उन्नयति। अथ यं द्वितीयं स्रुवम् उन्नयति तद् वै चातुर्मास्यानां रूपम्। चातुर्मास्यैर् एवास्येष्टं भवति य एवं विद्वान् द्वितीयं स्रुवम् उन्नयति। अथ यं तृतीयं स्रुवम् उन्नयति तद् वा इष्टिपशुबन्धानां रूपम्। इष्टिपशुबन्धैर् एवास्येष्टं भवति य एवं विद्वांस् तृतीयं स्रुवम् उन्नयति। अथ यं चतुर्थं स्रुवम् उन्नयति तद् वै त्र्यम्बकवाजपेयाश्वमेधानां रूपम्। त्र्यम्बकवाजपेयाश्वमेधैर् एवास्येष्टं भवति य एवं विद्वांश् चतुर्थं स्रुवम् उन्नयति। - जै.ब्रा.१.४०

९५यद्य् उ नीची स्रुक् स्याद् अपि वा भिद्येत किं तत्र कर्म का प्रायश्चित्तिर् इति। - -तद् उ हैके तत एव प्रत्येत्योन्नयन्ति तद् उ तथा न कुर्यात्। - - - अथास्मिन् स्थालीम् आहरेयुस् स्रुवं च स्रुचं च निर्णिज्य। तद् अद एवास्योन्नेष्यामीत्य् उक्तं भवति। अथ यथोन्नीतम् उन्नीय समिधम् आदाय प्राक् प्रेयात्। - जै.ब्रा.१.५४

९६उन्नेतर् उन् मा नयेत्य् आह। विष्णुर् वा उन्नेता। यज्ञो वै विष्णुः। यज्ञ एवैनं तत् सर्वस्मात् पाप्मनो विमुच्योन्नयति। - जै.ब्रा.२.६८

९७पुरोडाशः : ऊर्जे त्वाग्नेर्जिह्वासि सुपूर्देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने त्वा यजुषे यजुषे हविरसि वैश्वानरमुन्नीतशुष्मf - - - काठ. संहिता १.१०

९८ज्योतिरिकम् : देवीरापो अपां नपाद्य ऊर्मिर्हविष्य इन्द्रियावान् मदिन्तमस्तं - - - - कार्ष्यसि समुद्रस्य वोऽक्षित्या उन्नये। - काठ. सं.३.९

९९ग्रहाः : उन्नेतर्वस्योऽभ्युन्नया नः। - काठ. सं.४.१३

१००अग्निहोत्र ब्राह्मणम् :यद्यधिश्रितँ स्कन्देदन्यामभिदुह्याधिश्रित्योन्नीय जुहुयात् ,सैव तत्र प्रायश्चित्तिर्यद्युन्नीयमानं यद्युन्नीतं यदि पुर उपसन्नमहुते स्कन्देत् पुनरवनीयान्यां अभिदुह्याधिश्रित्योन्नीय जुहुयात् - काठ. सं.६.३

१०१समेवं जीर्यतः पूर्णमग्र उन्नयेदथ संमितमथ संमितमथ संमिततममुत्तममनुज्येष्ठमेवास्य पुत्रा ऋध्नुवन्ति संमितमग्र उन्नयेदथ भूयोऽथ भूयोऽथ पूर्णमुत्तमं भूयो भूय एवान्नाद्यमभ्युत्क्रामति कनिष्ठस्त्वस्य पुत्राणामर्धुको भवति सर्वान् समावदुन्नयेद्यः कामयेत - - - - -चतुरुद्रायति चतुष्पद एवास्मै पशून्न- - - काठ. सं.६.४

१०२यदि सायमहुतेऽग्निहोत्रे पूर्वोऽग्निरनुगच्छेदग्निहोत्रमधिश्रित्योन्नीयाग्निना पूर्वेणोद्द्रुत्याग्निहोत्रेणानूद्द्रवेदाहुत्यैवैनं च्यावयति - काठ. सं.६.६

१०३वाचं यच्छेदग्निहोत्र उन्नीयमाने - काठ. सं.६.७

१०४मारुतम् : यावद्ग्रहास्स्तोमाश्छन्दाँसि यावदेवास्ति तावतास्मै चिकित्सत्युद्धराम्युत्सृजाम्युन्नयामीति यथा वध्यमुद्धरत्युत्सृजत्युन्नयति एवमेवैनमेतदुद्धरत्युत्सृजत्युन्नयति - काठ. सं.११.८

१०५श्रीराजसूयम् : युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ - काठ. सं.१५.१२

१०६अग्निवीशिका : उदेषां बाहू अतिरमुद्वर्चो अथो बलम्। क्षिणोमि ब्रह्मणामित्रानुन्नयामि स्वाँ अहम्। - काठ. सं.१६.७

१०७चमाः : उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाहुतः। रायस्पोषेण संसृज प्रजया च बहुं कृधि। - काठ. सं.१८.३

१०८सावित्राः : उदेषां बाहू अतिरमुद्वर्चो अथो बलमित्याशिषमेवाशास्ते क्षिणोमि ब्रह्मणामित्रानुन्नयामि स्वाँ अहमिति यथायजु:। - काठ. सं.१९.१०

१०९आयुष्यम् : - - - - - - तस्मादयमतिरिक्तः प्रजापतिः प्रजा एवाभिवपते द्रोणकलशेनोन्नेता हारियोजनं जुहोत्यतिरिक्तं वा एतत् पात्राणां यद् द्रोणकलशोऽतिरिक्त एष ऋत्विजां यदुन्नेतातिरिक्त एष सोमानां यद्धारियोजनो ऽतिरिक्तेनैवातिरिक्तमाप्नोत्युन्नेतर्युपहवमिच्छन्ते - काठ. सं.२८.९

११०पुरोडाश ब्राह्मणम् : प्राञ्चौ बाहू उन्नयत्याहवनीयमेव परिगृह्णाति प्रतीची श्रोणी गार्हपत्यमेव परिगृह्णाति - काठ. सं.३१.८

१११एकादशिनी :- - -इन्द्रो ऽभिमातिहेन्द्रो वृत्रतूरुन्नीयमान आयुरुपाँश्वन्तर्यामयोर्यमोऽभिषुतः। - काठ. सं.३४.१५

११२निभूयपूराधवनीये सुपूतपू: पूतभृति - - - - वैश्वदेव उन्नीयमान ऐन्द्राग्न उन्नीतो - काठ. सं.३४.१६

११३हिरण्यमेवापोऽभ्यवनयेद्धिरण्यमभ्युन्नयेदमृतं वा आप आयुर्हिरण्यममृतादेवाध्यायुरात्मन् धत्ते - काठ. सं.३५.१६

११४चातुर्मास्यानि : अमुं वा एते लोकं निगच्छन्ति ये पितृयज्ञमुपयन्ति प्रजापतिस्त्वा एनानत उन्नेतुमर्हति - काठ. सं.३६.१३

११५ज्योतिष्टोमयागः :१६ ऋत्विजों के नाम - आश्वलायन श्रौत सूत्र ४.१.६

११६आहृतमुन्नेत्रा द्रोणकलशमिळामिव प्रतिगृह्योपहवमिष्ट्वाऽवेक्षेत। हरिवतस्ते हारियोजनस्य स्तुतस्तोमस्य शस्त्वोक्थस्येष्टयजुषो यो भक्षो गोसनिरश्वसनिस्तस्य त उपहूतस्योपहूतो भक्षयामीति प्राणभक्षं भक्षयित्वा - - - -आश्व.श्रौ.सू.६.१२.१

११७अवभृथम् :उन्नेतैनानुन्नयति। उन्नेतरुन्नोन्नयोन्नेतर्वस्वो अभ्युन्नया न इत्युन्नीयमाना जपन्ति। -आश्व.श्रौ.सू.६.१३.१३

११८राजसूये दक्षिणाः : वत्सतर्युन्नेतुस्त्रिवर्षः साण्डो ग्रावस्तुतः - आश्व.श्रौ.सू.९.४.२०

११९तिस्रश्चैव कीकसा अर्धं च वैकर्तस्योन्नेतुः। - आश्व.श्रौ.सू.१२.९.११

१२०सोमयागः : उन्नेतुः पात्रयोजनम्। खरोत्तरपूर्वार्द्ध उपाँश्वन्तर्यामयोः। दक्षिणमुपाँशोः। - - - - - - कात्यायन श्रौ.सू.९.२.१

१२१सोमयागः : ऐहि यजमानेत्याह हविर्धानं प्रविशन्त्यध्वर्युर्यजमानप्रतिप्रस्थात्रग्नीदुन्नेतारः। पत्नी चापरेण। अपिहितद्वार आदित्यपात्रमादाय सँस्रवांश्चोपरि पूतभृतस्तत आदित्यग्रहं गृह्णाति सँस्रवेभ्यः कदाचनेति। - का.श्रौ.सू.१०.४.१

१२२सोमयागः : उपाँशुसवनमुन्नेत्रे प्रयच्छत्यासृज ग्राव्ण इति चाह। आधवनीये चमसे वा सोमवति ग्राव्णोऽवधाय स्थाने निदधाति।- - - -का.श्रौ.सू.१०.४.७

१२३आग्रयणमादायासिञ्चति पवित्रेऽधिपूतभृतम्। प्रतिप्रस्थाता च संस्रवौ। आधवनीयादुन्नेतोदञ्चनेन चमसेन वा। तत आग्रयणं गृह्णाति।- का.श्रौ.सू.१०.५.१

१२४द्वादशाहः : अध्वर्युर्गृहपतिं दीक्षयति - - - - -नेष्ट्रादीनुन्नेता उन्नेतारं ब्रह्मचारी स्नातकोऽन्यो वा ब्राह्मणो ° न पूतः पावयेत् ° इति श्रुतेः।अनुपति पत्नीरुत्तर उत्तरः। त एवोन्नेतुः। - का.श्रौ.सू.१२.२.१५

१२५गवामयने अवभृथः : उन्नेतारौ वा कृत्वानाश्रावयते। दशदशाऽभेदेन दक्षिणा दद्यात्। - का.श्रौ.सू.१३.३.४७

१२६अग्निष्टोमसामादि : हारियोजन्यो नाम धाना द्रोणकलशे भवन्ति। तासामुद्गाता प्रथम आददानः समुपहूता भक्षयिष्याम इति ब्रूयात्। तथेतरौ। उन्नेतर्युपहवमिष्ट्वा हारियोजनस्य त इति तिरोह्न्यस्येत्यतिरात्र सर्वत्र वा यथाधीतं द्विरुपघ्राय पश्चादाहवनीयस्यान्तः परिधि निवपेयुः। - द्राह्यायण श्रौ.सू.६.३.१८

१२७अग्निष्टोम (माध्यन्दिन सवनम्) : आग्नीधः पोतुर्नेष्टुर्ग्रावस्तु उन्नेतुः - - - बौधायन श्रौ.सू.८.६

१२८अग्निष्टोम (यज्ञपुच्छम्) : - - - शंयुना प्रस्तरपरिधि संप्रकीर्य संप्रस्राव्य स्रुचौ विमुच्योन्नेतारमाहोन्नेतर्ग्रहस्ते प्रचरेति तच्छ्रुत्वोन्नेता द्रोणकलश आग्रयणतृतीयं ग्रहं गृह्णात्युपयाम गृहीतोऽसि हरिरसि हारियोजनो हर्यो स्थाता वज्रस्य भर्ता पृश्नेः प्रेता - - - -- - - - स यावन्त ऋत्विजस्तेभ्य उन्नेता धाना व्यावपति त उन्नेतर्युपहवमिष्ट्वैकैकामन्वस्यन्ते मनसा संबाधते। - बौ.श्रौ.सू.८.१६

१२९द्वादशाहे दीक्षणीयेष्टिः : - - - -आग्नीधः पोतुर्नेष्टुर्ग्रावस्तुत उन्नेतुः सुब्रह्मण्यस्य - - - - बौ.श्रौ.सू.१६.२

१३०परिधिषु प्रहृतेषून्नेता हारियोजनं गृहृणाति। उपयामगृहीतो ऽसि हरिरसीति द्रोणकलशेन सर्वमाग्रयणं गृहीत्वा न सादयति।- - - - - अपरेणोत्तरवेदिं द्रोणकलशं प्रतिष्ठाप्योन्नेतर्युपहवमिष्ट्वा सर्वे हारियोजनं भक्षयन्तीष्टयजुषस्ते देव सोमेति। - आप.श्रौ.सू.१३.१७.१

१३१गर्गत्रिरात्रम् : यास्तिस्रस्तिस्रस्त्रिंशत्यधि तास्वेनामुपसमाहृत्य तामग्नीधे ब्रह्मणे होत्र उद्गात्र उन्नेत्रे ऽध्वर्यवे वा दद्यात्। द्वौ वोन्नेतारौ वृत्वा यतरो नाश्रावयेत्तस्मै वा। - आप.श्रौ.सू.२२.१६.११

*ऐन्द्रं नेष्टा (आदत्ते)। सौर्यमुन्नेता। - आप. श्रौत सूत्र १३.८

*ऊर्ग् उन्नेता। - ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.४

*अतिरिक्त एष ऋत्विजां यद् उन्नेता। - काठक संहिता २८.९

*विष्णुर्वा उन्नेता। - जै.ब्रा. २.६८