कल्पेश्वर मंदिर

धाम माना जाता है जो एक पावन धार्मिक स्थल है. कल्पेश्वर महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों मे से एक है जो उत्तराखंड के असीम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने मे समाए हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के मध्य में स्थित है. कल्पेश्वर सनातन हिन्दू संस्कृति के शाश्वत संदेश के प्रतीक रूप मे स्थित है यह केदारनाथ के प्रमुख चार पीठों समेत पंच केदार के नाम से प्रसिद्ध हैं. 


कल्पेश्वर मंदिर काफी ऊंचाई पर स्थित है यह मुख्य मंदिर अनादिनाथ कल्पेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्द है. इस मंदिर के समीप एक कलेवर कुंड है, इस कुंड का पानी सदैव स्वच्छ रहता है और यात्री लोग यहां से जल ग्रहण करते हैं. 

तथा इस पवित्र जल को पी कर अनेक व्याधियों से मुक्ति पाते हैं यहां साधु लोग भगवान शिव को अर्घ्य देने के लिए इस पवित्र जल का उपयोग करते हैं तथा पूर्व प्रण के अनुसार तपस्या भी करते हैं. तीर्थ यात्री पहाड़ पर स्थित इस मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं कल्पेश्वर का रास्ता एक गुफा से होकर जाता है. मंदिर तक पहुंचने के लिए गुफा के अंदर लगभग एक किलोमीटर तक का रास्ता तय करना पड़ता है जहां पहुँचकर तीर्थयात्री भगवान शिव की जटाओं की पूजा करते हैं.

कल्पेश्वर धर्म स्थल कथा

कल्पेश्वर मे भगवान शंकर का भव्य मंदिर बना है. कल्पेश्वर के बारे में पौराणिक ग्रंथों में विस्तार पूर्वक उल्लेख किया गया है इस पावन भूमि के संदर्भ में कुछ रोचक कथाएं प्रचलित हैं जो इसके महत्व को विस्तार पूर्वक दर्शाती हैं. कहते हैं यह वह स्थान है. 

जहां महाभारत युद्ध के पश्चात विजयश्री पांडवों नें युध्द में मारे गए अपने ही संबंधियों की हत्या करने की आत्मग्लानि से पीड़ित होकर इस क्षोभ एवं पाप से मुक्ति पाने हेतु वेदव्यास जी से प्रायश्चित करने के विधान को जानना चाहा व्यास जी ने कहा की कुलघाती का कल्याण नहीं होता है परंतु इस पाप से मुक्ति चाहते हो तो केदार जाकर भगवान शिव की पूजा एवं दर्शन करो व्यास जी से निर्देश और उपदेश ग्रहण कर पाण्डव भगवान शिव के दर्शन हेतु यात्रा पर निकल पड़े.

पाण्डव सर्वप्रथम काशी पहुँचे शिव के आशीर्वाद की कामना की परंतु भगवान शिव इस कार्य हेतु इच्छुक न थे गोत्र हत्या का दोषी मानकर शिव पांच पाण्डवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे. पाण्डव निराश होकर व्यास जी द्वारा निर्देशित केदार की ओर मुड़ गये पांड्वों को आते देख भगवान शंकर गुप्तकाशी में अन्तर्धान हो गये उसके बाद कुछ दूर जाकर महादेव जी ने दर्शन न देने की इच्छा से महिष यानि भैसें का रुप धारण किया व अन्य पशुओं के साथ विचरण करने लगे पाण्डवों को इसका ज्ञान आकाशवाणी के द्वारा प्राप्त हुआ

अत: भीम ने विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया जिसके निचे से अन्य पशु तो निकल गए पर शिव रूपी महिष पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए भीम बलपूर्वक भैंसे पर झपट पडे लेकिन बैल दलदली भूमि में अंतध्र्यान होने लगा तब भीम ने बैल की पीठ को पकड़ लिया भगवान शंकर की भैंसे की पीठ की आकृति के पिंड रूप में केदारनाथ में पूजे जाते हैं..

कहते हैं कि जब भगवान शिव भैंसे के रूप में पृथ्वी के गर्भ में अंतध्र्यान हुए तो उनके धड का ऊपरी भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ जहां पर पशुपतिनाथ का मंदिर है, शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, नाभि मध्यमेश्वर में, मुख रुद्रनाथ में तथा जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए यह चार स्थल पंचकेदार के नाम से विख्यात हैं व इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार भी कहा जाता है.

कल्पेश्वर पुराण कथा

शिव पुराण के अनुसार यह स्थान ऋषि दुर्वासा जिन्होंने वरदान देने वाले कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी तब से यह कल्पेश्वर कहलाने लगा तथा. केदार खंड पुराण में भी ऐसा ही उल्लेख है कि इस स्थल में दुर्वासा ऋषि ने कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर घोर तपस्या की थी तभी से यह स्थान कल्पेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध हो गया. इसके अतिरिक्त अन्य कथा अनुसार देवताओं ने असुरों के अत्याचारों से त्रस्त होकर कल्पस्थल मे नारायणस्तुति की और भगवान शिव के दर्शन कर अभय का वरदान प्राप्त किया था.

कल्पेश्वर कल्पगंगा घाटी में स्थित है. कल्पगंगा को प्राचीन काल में नाम हिरण्यवती नाम से पुकारा जाता था इसके दाहिने स्थान पर स्थित तट की भूमि दुरबसा भूमि कही जाती है इस जगह पर ध्यान बद्री का मंदिर है कल्पेश्वर चट्टान के पाद में एक प्राचीन गुहा है. जिसके भीतर गर्भ में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान हैं कल्पेश्वर चट्टान दिखने मे जटा जैसी प्रतीत होती है. देवग्राम के केदार मंदिर के स्थान पर पहले कल्पवृक्ष था कहते हैं कि यहाँ पर देवताओं के राजा इंद्र ने दुर्वासा ऋषि के शाप से मुक्ति पाने हेतु शिव-आराधना कर कल्पतरु प्राप्त किया था.

कल्पेश्वर दो मार्गों से पहुँचा जा सकता है पहले मंडल से अनुसूया देवी से आगे रुद्रनाथ होकर जाता है तथा दूसरा मार्ग हेलंग से सँकरे सामान्य ढलान वाले मार्ग से पैदल या सवारी के द्वारा तय कर उर्गम वन क्षेत्र के निकट से पहुँचा जा सकता है इस रास्ते पर एक खुबसूरत जल प्रपात भी आता है जो प्रकृति का मनोहर नजारा है.

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