मेघमाला- भूमिका


मेघमाला

           लेखक: भगत मुंशीराम                                    

भूमिका





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मनुष्य इस संसार में आता हैउसके अन्दर स्वाभाविक ही यह जानने की इच्छा पैदा होती है कि वो क्या हैकहाँ से आया हैकहाँ जाएगाइसी तरह हर व्यक्ति जो किसी भी जातिधर्मसमाजसम्प्रदायदेश का होवो भी यह जानने के लिए विवश है कि मेरी जातिधर्मसम्प्रदाय क्या हैकैसे बनीअपने आप को जानने से पहले इन बातों का ज्ञान आवश्यक है. इन बातों के ज्ञान के लिए प्रकट रूप में पता लगता है कि मुझे माता-पिता ने उत्पन्न किया और मेरा यह नाम हैयह जाति हैयह धर्म है. तो यह माता पिता बताते हैंतेरा क्या नाम हैतू हमारा लड़का-लड़की हैकिस जाति का है.। इसी क्रम में मुझे भी जीवन के प्रारम्भिक समय में ये ख्यालात आते थे कि मैं कौन हूँमाता-पिता ने जितना हो सका बता दिया. मेरा नाम रखा. अब जो भी इस नाम से मुझे पुकारता हैमुझे यकीन हो गया है कि मैं मुन्शीराम हूँ. जाति का अपने माता-पिता सेसमाज के लागों से यकीन हो गया कि मैं मेघ जाति का हूँ. इसके बाद वास्तव में मनुष्य क्या हैयह गुरु बताता है. गुरु की दया से यह पता चला जाता है कि इन्सान शरीर है या मन है या आत्मा है या इससे परे भी कोई हमारा अपना आप है. उसको जान लेने के बाद अपने आप का पूरा विश्वास हो जाता है. इस विश्वास के हो जाने के बाद गुरु की दयामाता-पिता की दया शेष रह जाती है या इनके ऋण सिर पर रहते हैं. उसे चुकाना बहुत ज़रूरी समझा जाता है. माता-पिता ने तो यह संसार दिखायाइस शरीर में उत्पन्न किया. अपने असली रूप को जानने के लिए शरीर में आना ज़रूरी है. अपने आप का पूर्ण ज्ञान तभी हो सकता हैजब इन्सानी चोला मिलता है जिसमें अपने आप को जानने की यह सारी व्यवस्था होती है.

फिर वो मालिकपरम तत्त्व आधारजब मनुष्य के शरीर में आता हैतो उसकी दया से इन्सान स्वाभाविक ही उसकी तरफ खिंचा जाता है. जैसी किसी की इच्छा होती हैवैसा ही प्रकृति व्यवस्था प्रदान कर देती है इसलिए माता-पिता की भी दया है या उनका भी ऋण सिर पर होता है और उसे भी चुकाना ज़रूरी होता है. गुरु का ऋण उसकी आज्ञा मानने सेसंसार के जीवों को यह बताने से कि तुम वास्तव में कौन होगुरु का ऋण चुकाया जा सकता है. इसी तरह अपनी जाति और समाज के लोगों को इस बात के बताने से कि तुम कौन होमातृ और पितृ ऋण चुकाना है. मेघ जाति में जन्म लेने के कारण इस जाति के लोगों को यह बता देना कि तुम कौन होमातृ और पितृ ऋण चुकाना है क्योंकि मेघ जाति के अन्दर पता नहीं कब से यह प्रश्न चल रहा है कि मेघ जाति क्या है. इसको बताने के लिए जो समझ में आयामैंने अपने माता-पिता या गुरु से ग्रहण कियाउसके मुताबिक यह मेघ माला नाम की पुस्तक लिखी गई. इसको जो भी ध्यान से पढ़ेगाअपने शारीरिक मानसिकआत्मिक और इससे भी आगे का पता लगेगा और अपने कर्मों और मालिक की दया से शांति हासिल करेगा.

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मनुष्य जाति के सब लोगों के लिए अब धर्मसम्प्रदायघर वालों कीअपने समाजजाति और देश के लोगों की सेवा करना ज़रूरी और लाभदायक बताया गया है. घर-घर मिला कर जातिसमाजदेश बन जाते हैंइसलिए सारे संसार के लोगों की सेवा करना तो किसी-किसी के भाग्य में आता है मगर अपने परिवार और जाति की सेवा अधिकतर लोग कर सकते हैं. मेरे दिल में भी यही ख्याल आया कि मैं भी अपनी जाति के भाइयों के लिए कोई सेवा करूँ. सारी आयु नौकरी पर रहा. घर से बहुत दूर रहा. अपने भाइयों और जाति वालों से मिलने का उतना समय नहीं मिला. अवकाश प्राप्त करके होशियारपुर में अपने गुरु महाराज के चरणों में रहा. थोड़े आदमियों की सेवा ज़रूर की. उनको काम दिलाया. मगर ऐसा काम करने का अवसर नहीं मिला जिससे सारी जाति बल्कि सारी मानव जाति की सेवा कर सकूँ. इसलिए इस पुस्तक के लिखने की आवश्यकता मस्तिष्क में आई. क्योंकि गुरु ऋणमातृ और पितृ ऋण सिर पर हैइसलिए यह पुस्तक उन्हीं के चरणों में भेंट करता हूँ. उनसे जो ज्ञान प्राप्त हुआवही इसमें लिखा है. गुरु महाराज या माता-पिता तो इस समय हैं नहींइसलिए संसार के समझदार लोगों और अपनी जाति को यह पुस्तक भेंट करता हूँ.

किसी बात को सिद्ध करने के लिए यह वस्तु क्या हैकिसी न किसी प्रमाण की आवश्यकता होती है. प्रमाण से यह सिद्ध हो जाता है कि जैसे और चीज़ बनीमिसाल दी जाती है कि जिस तरह की वो वस्तु है यह भी उसी तरह है. प्रमाण के तीन भाग है. एक अनुमानदूसरे प्रत्यक्षतीसरे पुस्तकीय या लिखित रूप में किसी चीज़ का नाम-रूप बताना कि यह फ़लाँ पुस्तक में लिखी हुई है. इस ‘मेघ-माला’ पुस्तक में अनुमान और किताबों के हवाले का प्रयोग नहीं किया गया है. इसमें सिद्ध किया गया है कि किताबें लिखने वालों ने अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नीचाअयोग्य बनाया और अपने को ऊँचे और योग्य बनाया और अपने बल से झूठी कहानियाँ बनाकर किसी देशप्रांत या गाँव को अपना बना लिया या और छोटी-छोटी चीजों के स्वामी बन गए. इस पुस्तक में एक कुल्लुवाल गाँव की सच्ची कहानी लिखी गई है. इसे पढ़ें. इसी तरह जम्मू-कश्मीर या और प्रान्तों में भी सत्ता हथियाने के लिए महकमा माल के काग़ज़ों में भी वही बातें लिखाईं जिससे उनका स्वार्थ सिद्ध होता था. बड़े-बड़े सन्तों ने किताबों में लिखी बातों को प्रमाणित नहीं माना. इसलिए इस किताब में न अनुमान और न पुस्तकों का प्रमाण देकर यह सिद्ध किया गया है कि मेघ जाति कहाँ से बनी. मेघ जाति क्या हैप्रकृति के योग सेनाना प्रकार के तत्त्वों के मेल से जो कैमीकल एक्शन होता हैउसके लिहाज़ से यह बताया गया है कि मेघ जाति कैसे बनी. प्रकृति द्वारा देश काल और वस्तु में परिवर्तन आता रहता है और उन्हीं संस्कारों के अनुसार देशप्रान्त जातियाँवृत्तियाँ बनते रहते हैं. ये वृत्तियाँ ही हैंप्रकृति जिन्हें रूप देती है और वे वत्तियाँ तरह-तरह के काम करती हैं. इनके भी पाँच कार्य हैं (1) प्रमाण (2) विपर्य्य (मिथ्या ज्ञान) (3) विकल्प (जिसमें ज्ञेय वस्तु कुछ न होकेवल शब्दों के उच्चारण से व्यवहार होता है) (4) निद्रा (5) स्मृति. ये पाँचों वृत्तियों के ही रूप होते हैं. वृत्तियाँ उठती रहती हैं और ख़त्म होती रहती हैं. पीछे उनकी स्मृतियाँ (याद) रह जाती है और लेनदेन का सिलसिला शुरु हो जाता है इन्सान के अन्दर ऐसी शक्तियाँ हैं जो ले सकती हैं और बाहर में प्रकृति के अन्दर वो शक्तियाँ हैं जो ली जा सकती हैं. इस तरह लेने-देने के सिलसिले में प्रकृति इन्सान को अलग-अलग प्रभाव में बाँट देती हैं. देश और जातियाँ बन जाती हैं. इस पुस्तक में इसीलिए प्राकृतिक सत्ता और उसके कार्य के मुताबिक मेघ जाति जो ब्रह्म रूप थीआकाशवायुअग्निजल और पृथ्वी तत्त्वों से मेघ का रूप धारण किया और आख़िर में सब तत्त्वों को छोड़ कर फिर मेघ के मेघ अर्थात ईश्वर और ब्रह्म बन गया. इसमें साबित किया गया है कि क्या राम या कृष्णक्या देवी-देवताईश्वर और ब्रह्म से ही प्राकृतिक रूप में आते हैं. मेघ जाति में इनका संस्कार है. जैसे जिस प्रान्त में मेघ ज़्यादा बरसते होंवहाँ के रहने वाले मेघों के संस्कार से किसी भी रूप में नहीं बच सकते. मेघ जाति के पूर्वज जम्मू प्रान्त के ऊँचे पहाड़ों में रहे और वहाँ से मेघों का संस्कार लिया. प्राकृतिक संस्कारों से ही देशप्रान्त और जातियों के नाम रखे गए जैसे आर्यवर्त्तमेघालयपंजाब (पाँच) नदियों की भूमि इसी तरह उन ऋषियोंसच्चे ब्राह्मणों और उस जगह की जलवायु के अनुसार जाति का नाम पड़ गया. जो इन्सान पहले वहाँ रहे वे अपने वास्तविक रूप कोवास्तव में जो इन्सान हैउसे जानने के लिए वहाँ तप किया करते थे. क्योंकि उन महापुरुषों के आश्रम समाधियाँ और स्मृतियाँ पहाड़ों में मौजूद हैं इसलिए शारीरिक रूप में हम उन्हीं की सन्तान हैं. यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि जाति तब तक रहती हैजब तक शरीर है. शरीर समाप्त होने पर इसको जला दिया जाता है. उसके साथ ही शरीर से संबंधित देश जातिप्रान्त या और शरीरिक संबंध खत्म हो जाता है. मगर प्रत्यक्ष प्रमाणित संस्कार साथ जाते हैं और हमारा भावी जन्म होता है. भावी जन्म की जाति तब बनेगी जब प्राकृतिक संस्कार फिर नाम-रूप धारण करेगा. वो लोग तप करके अपने असली रूप को जानकर ब्रह्म और परब्रह्म में रमण करते थे. शरीर मनआत्मा को छोड़ कर निर्वाण अवस्था में जानाप्रकाश और शब्द में रहना ही ब्रह्म में रमण करना है. उन सच्चे ब्राह्मणों की सन्तान बाद में मेघ जाति के नाम से जाति के रूप में परिणत हो गई. इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध हो गया कि मेघ जाति सच्चे ब्राह्मणों की सन्तान है. सच्चे ब्राह्मण ही आदि मेघ थे. इन सब बातों को प्रत्यक्ष प्रमाण के अनुसार सिद्ध किया गया. अनुमान और किताबी ज्ञान का सहारा नहीं लिया गया. इससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता.

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इसके बाद कई और तब्दीलियाँ इस जाति में आईं. मेघ बने. मेघ शब्द से हम यह संस्कार ग्रहण करके इस संसार में जीवन गुजारने का सबसे अच्छा ढंग अपना सकते हैं. मेघ दूसरों की सेवा के लिए तप करते हैंजिस तरह यह बाहर का मेघ समुद्र से खारा पानी लेकर बनता है और  अपनी संगत से प्राकृतिक तत्त्वों द्वारा उसका खारापन दूर करके पृथ्वी पर मीठा जल बरसाता है. मेघ जाति के लोगों को प्राणी मात्र की इसी प्रकार सेवा करनी चाहिए ताकि यह नाम जब भी किसी को याद आएसुने या पढ़े तो इसकी सभ्यता द्वारा वो सुसंस्कृत हो जाए और यह नाम सुनते ही प्रेमभाव शरीर मन और आत्मा में समा जाए. केवल मेघ नहीं बनना बल्कि मेघ का काम भी करना है.

 

भगत बनें

भगत बनना क्या हैसबसे प्रेम रखने वाला ही भगत कहलाता है.

फिर आर्य बने. भद्र पुरुष बनना और दूसरों को भद्र समझना ही आर्य बनना है और इसके पश्चात्‌ अनुसूचित जातियों में इनका नाम भी आ गया. ध्यान रखा जाए कि अनुसूचित जाति अछूत नहीं होतीकेवल आर्थिक रूप में पिछड़ी हुई जातियाँ अनुसूचित के नाम से पुकारी गईं. इस पुस्तक में यह भी सिद्ध किया गया है कि कोई जाति या समाज या व्यक्तित जन्म से नीच या अछूत नहीं होता. विचारों से कर्म बनते हैं. जिसके विचार गन्दे हैं वही कर्म का गन्दा होता है. सफाई या चमड़े के काम से कोई अछूत नहीं हो जाता. ये कर्म सेवा में आते है. आर्य समाज या वैदिक धर्म ने भी यही प्रचार किया था कि जन्म से कोई अछूत नहीं होताबल्कि बुरे कर्म या बुरे विचार से होता है.

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पाकिस्तान में हमारे गाँव के पास एक ढल्लेवाली गाँव था. वहाँ के ब्राह्मणोंहिन्दु जाटों और महाजनों ने चमारों और हरिजनों या सफाई करने वालों को तंग कियाऔर गाँव से निकल जाने के लिए कहा. उन्होंने स्यालकोट शहर में जाकर जिला के डिप्टी कमिश्नर को निवेदन किया. उसने अंग्रेज़ एस. पी. और पुलिस भेजी. वे गाँव से न निकले मगर अपना काम बन्द कर दिया. विवश होकर उन बड़ी जाति वालों को अपने मरे हुए पशु स्वयं उठाने पड़े और अपने घरों की सफाई आप ही करनी पड़ीं. यह काम करने पर भी वे बड़ी जातियों के बने रहे. कोई नीच या अछूत नहीं बन गए. ये सब स्वार्थ के झगड़े हैं. दूसरों कोदूसरी जातियों को आर्थिक या सामाजिक दशा का संस्कार दे देना और उनको दबाए रखनाअपने काम निकालना यह समय के मुताबिक रीति-रिवाज़ बना रहा. अब अपना राज्य हैप्रजातन्त्र है. हर एक व्यक्ति जातिसमाज या देशवासी को यथासम्भव उन्नति करने का अधिकार है. रहने का अच्छा स्तररोटीकपड़ा और मकान प्राप्त करना सब के लिए ज़रूरी है. अभिप्राय यह है कि अपना जीवन अच्छा बनाने के लिए रोटीकपड़े और मकान के लिएआर्थिक दशा सुधारने के लिएअनुसूचित जाति में आने के लिए कई जातियाँ मजबूर थीं. जो लोग उनको नीच या अछूत कहते हैं यह उनकी अज्ञानता है. सबको प्रेमभाव से रहना चाहिए.

इसी भाव को लेकरइस पुस्तक के अन्त में लिखा है कि जो भी आप चाहे बनेंकिसी भी देश के होंसम्प्रदाय और धर्म के होंकिसी भी जाति के होंसबको मनुष्य बन कर रहना चाहिए.  संसार में हर देश से साम्प्रदायिक झगड़ेदेशों और सूबों के झगड़े तभी खत्म होंगे जब मानव जाति के सभी व्यक्ति मानवता के मार्ग पर चलेंमनुष्य बनो की शिक्षा के मुताबिक चलते हुएजिसे थोड़े शब्दों में इस मेघमाला पुस्तक में लिखा हैउसको समझ कर वे मानवता को एक प्लेटफार्म पर लाएँ. इस संसार में आज केवल एक ही शांति का मार्ग है और वो है इन्सानियत. जब तक इस पर नहीं चला जाएगाशांति कठिन है. यह इस युग के लिए जरूरी शिक्षा है. मेरे सत्गुरु हुजूर परमदयाल फकीचन्द जी महाराज ने अपने जीवन के अनुभव के पश्चात सांसारिकआध्यात्मिक और अन्त में उस अवस्था का अनुभव करके जहाँ से हम सब आते हैंयहाँ आकर भिन्न-भिन्न नाम रूप रख लेते हैंझगड़े करते हैंआप भी अशान्त और दूसरों को भी अशान्त करते हैं उसे समझते हुए 'मनुष्य बनोकी आवाज उठाई. वो तो यहाँ तक भी फरमा गए कि अगर मानव जाति मनुष्य बनो के मार्ग पर न चलीतो कर्म के नियम के मुताबिक संसार के लोगों पर कष्टआपदाएँ आएँगीफिर लोग इन्सान बनो के मार्ग पर चलने के लिए विवश होंगे. इसलिए सबके हित में है कि अभी से इस शिक्षा को समझा जाए और मानवता के भले के लिए काम किया जाए और अपना जीवन खुशी से गुजार दें.

मेघ जाति के लोग भी वास्तव में ‘इन्सान’ हैं. मेघ शब्द का वास्तविक अर्थ इन्सान ही है. दूसरी जातियों के लोग भी इस पुस्तक को पढ़ कर मेघमाला का अध्ययन करें और अपने आपको मेघ के रंग में रंग सकते हैं अर्थात ‘इन्सान’ बन सकते हैं यह मेघ माला का जपना है.

मालिक सब को शान्ति दे.