छुआछूत : कब और क्यों

                 छुआछूत....कब और क्यों

 

भेंट

मैंने दैनिक ट्रिब्यून में श्री जगदीश मुनि जी महाराज जो संत मण्डल आश्रम हरिद्वार के सदस्य हैंका लेख पढ़ा जिसमें यह लिखा था कि छुआछूत वैदिकरामायण और महाभारत काल में नहीं थी और ख्याल आया कि यह छुआछूत की कुरीति हिन्दू समाज में कब और क्यों आई. यह ख्याल इसलिए आया कि मेरा अपना जन्म साधारण हिन्दू जाति जो उत्तरी भारत में मेघ जाति के नाम से प्रसिद्ध है और वर्णाश्रम धर्म और सरकारी जातिकोष के अनुसार जिनकी गणना शूद्र जातियों में आती हैमें हुआ. मैं उनकी भावनाओं को जानता हूँ. ये सभी जातियाँ हिन्दू समाज का अटूट अंग हैं. इनमें हिन्दू धर्म का बहुत आदर है. हिन्दू समाज पर जब-जब संकट आए और इन्हें अपना धर्म छोड़ने पर विवश कर दिया गया तो अधिकतर उन लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़ा जो ऊँची जाति के थे. जिन्हें शूद्र कहा जाता था वो अपने धर्म पर अटल रहे और अपने धर्म को नहीं छोड़ा.

यह अछूतपने की कुरीति हिन्दू धर्म में अज्ञान से आई. हिन्दू धर्म को समझा नहीं गया और उस नासमझी से या अज्ञानता से हममें यह भेदभाव आ गया और यह छुआछूत चल पड़ी. वास्तव में हिन्दू धर्म प्राकृतिक या मानव धर्म हैकिसी व्यक्ति विशेष की बुद्धि की उपज नहीं है.

जब हम धर्म का आचरण करते हैं अर्थात यह जो हमारा जीवन बन गया हैइसे सफल बनाना चाहते हैंभवसागर से निकलना चाहते हैंमन के विचारों से छुटकारा चाहते हैं या चिन्ता रहितअडोल और भय रहित अवस्था में जाना चाहते हैंउसके लिए जिन नियमों का हम पालन करते हैं वही धर्म है और वह प्राकृतिक है.

सामाजिक धर्म उन नियमों का पालन करना है जिससे सभी समाज के लोग प्रेमसहानुभूति और एकता में रहते हुए जीयो और जीने दो के नियम पर चलते हुए सारे समाज के लोगों का जीवन सुखी बनाएँ. जैसे महर्षि शिवव्रतलाल जी के शब्द में आया है :-

 

बुद्धि जब तुम को मिलीमिलजुल के रहना सीख लो।

द्वेष तजकर प्रेम कीयुक्ति का गहना सीख लो ।

भाईयों से बैर त्यागोमित्रता का भाव लो।

मुख से मीठे और मधुरवचनों का कहना सीख लो ।

लड़ते लड़ते हो गये होअब निबल सोचो भी कुछ।

यह दशा अच्छी नहींसुमति का लहना सीख लो ।

ऐसा हो व्यौहार जिससेसुख मिले और शान्ति।

कौन कहता है कि दुख सागर में बहना सीख लो ।

राधास्वामी जग में आएप्रेम का परिचय दिया।

मेल का साधन होमिलजुल कर निबहना सीख लो ।

 

मुझे छोटी आयु से यह जानने की तलाश थी मैं कौन हूं?’ इस तलाश के सिलसिले में मैंने बहुत दौड़ धूप की. सन्‌ 1911 ई. में मैंने गायत्री मन्त्र का जाप शुरू किया. कई संतों-महात्माओं से मिला. धर्म ग्रन्थों का अध्ययन कियामगर शांति नहीं आई. अन्त में 1963 ई. में मौज मुझे परम संत परम दयाल फकीरचन्द जी महाराज, जो होशियापुर, पंजाब के रहने वाले थेउनके चरणकमलों में ले गई. उन्होंने मुझे बताया कि इन्सान एक चेतन का बुलबुला है. मौज से जिन्दगी बन जाती है और मैंपना आ जाता है और देश केक्षेत्र केजातिवर्ग के धर्मोंपंथोंसंप्रदायों और भाषाओं के प्रभाव मनुष्य के मन पर प्रभाव डालते रहते हैं. अपनी समझ को अच्छा और दूसरों की समझ को बुरा समझने लग जाते हैं और जीवन अशांत हो जाता है. समाज में भी अशांति पैदा हो जाती है.

इन प्रभावों से बचने के लिए हुजूर परम दयाल जी महाराज ने मानव जाति के लिए इस ज्ञान का अपने जीवन में अनुभव किया कि इन्सान एक चेतन का बुलबुला है. जीवन गुजारने के लिए इस नामरूप संसार में सब का आदरसब का मान सत्कारदूसरों की भावनाओं का विरोध न करते हुए, ‘किसी से आश्रय लो और किसी को दो के नियमों पर चलते हुए जीवन यात्रा पूरी करें. इस तरह घर-घर मिला कर ही देश बन जाता हैदेश में भी शांति आ सकती है.

इस पुस्तक में जो कुछ मैंने लिखा हैयह उस शिक्षा व ज्ञान के आधार पर है जो मैंने पवित्र विभूति परमदयाल फकीरचन्द जी महाराज के चरणों में बैठकर प्राप्त किया. इसलिए यह पुस्तक मैं उन्हीं के चरणों में भेंट करता हूँ.

                 

एम.आर. भगत

 

छुआछूत...कब और क्यों

 

मैं आज हिन्दी ट्रिब्यून समाचार पत्र दिनांक 13 जनवरी 1983 पढ़ रहा थाजिसमें एक लेख छपा है जिसमें श्री जगदीश मुनि जी महाराज नेजो सन्त मण्डल आश्रमहरिद्वार के आचार्य तथा विश्व हिन्दू परिषद द्वारा गठित धर्म संसद के सदस्य हैंलिखा है कि वैदिकरामायण और महाभारत काल में हिन्दू समाज में कोई छुआछूत नहीं थी अर्थात्‌ उस समय हिन्दू समाज में छुआछूत का स्थान नहीं था. इसी तरह और भी महापुरुषवर्तमान शकंराचार्य और अनेक हिन्दू संस्थाएँ इस वक़्त छुआछूत के उन्मूलन में काम कर रही हैं. भारत की स्वतन्त्रता के बाद हमारी सरकार भी यथाशक्ति इस दिशा में काम कर रही है. स्वतन्त्रता से पूर्व भी इस बात की आवश्यकता महसूस की जाती थी कि हिन्दुओं में जाति-वर्ण-भेदनीच और ऊँचपवित्र और अपवित्रछूत और अछूत के भाव शीघ्र दूर होने चाहिएँ. इसी सिलसिले में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और दूसरे  वरिष्ठ नेताओं ने वायदा किया था कि स्वतन्त्र भारत में दलित जातियोंजिन पर सदियों से दुर्व्यवहारअत्याचार हो रहा है उनका सरकार सुधार व उद्धार करेगी जिससे उनका जीवन स्तर ऊँचा हो सकता है. संविधान बनाने वालों ने जाति के आधार पर होने वाले शोषण को रोकने के अनेक नियम बनाए. हिन्दुओं का अपने ही भाइयों से दुर्व्यवहार देख-सुन कर कौन ऐसा कठोर मन होगाजो द्रवित न हो. अछूतों से खान-पानआहार-व्यवहारमेलजोल बिल्कुल बन्द किया हुआ था. कुओं से पानी नहीं ले सकते थे. चलने के लिए सड़कें अलग थीं. घर व मोहल्ले अलैहदा हुआ करते थे. शूद्रों को खास निशान या कपड़े पहनने के लिए विवश किया जाता था ताकि पता लग सके कि शूद्र आ रहा है. स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करना कठिन था. मन्दिरों में दाखिल नहीं हो सकते थे. यहाँ तक कि भगवान का नाम लेने पर उनकी जबान काट दी जाती थी और कहा जाता था कि अगर शूद्र भगवान का नाम सुन ले तो उसके कानों में सिक्का भर दो.

इसका परिणाम हिन्दू समाज के सामने है. हिन्दू धर्म अथवा हिन्दू समाज में प्राचीन काल से इस संसार में प्रेममय जीवन व्यतीत करने के लिए कहा गया और ऐसा नाना ग्रन्थों में लिखा गया. द्वेष और घृणा से मानव जाति का जीवन सुखमय नहीं हो सकताबल्कि प्रेम से हो सकता है. इसकी अब बहुत आवश्यकता है. भारतवर्ष का विभाजन भी किसी न किसी तरह इसी घृणाद्वेष और भेदभाव के कारण हुआ. और जो हिन्दू समाज पर संकट आएवे आपस में प्रेम न होने के कारण थे. इसलिए आवश्यकता है कि मानव जाति अब संसार में प्रेम लाने के लिए अग्रसर होक्योंकि घृणा से घृणा बढ़ती है. घृणा से समाज में स्वाभाविक दुख पैदा होता है. न्यूटन की थ्यूरी भी यही कहती है कि अपना हाथ हिलाएँ तो उस क्रिया का प्रभाव ऊपर के लोकों तक जाता है और फिर वापिस वहीं पर आता है जहाँ से वो चला था. जो किसी के लिए गड्‌ढा खोदता है वो आप ही गड्‌ढे में गिरता है. तो यह जो कुछ हुआ उसका परिणाम हिन्दू समाज के सामने है. क्या वो कुरीतियाँ चली गईं या अब भी हैंसभी जानते हैं कि कई कुरीतियों के कारण या जातिवर्ण भेदआपस में ईर्ष्या-द्वेषसंगठन की कमीप्रेम भाव और एकता न होने या छोटे-छोटे राज्य होने के कारण भारतवर्ष में बाहर के आक्रमणकारी हमारे देश में प्रभुसत्ता जमा गए और जिस जातिभेद और वर्ण-आश्रम के कारण हम हिन्दू लोग सदियों से बंटे हुए हैंवो अब भी प्रचलित हैं. इसलिए आवश्यकता है कि राजनीति वालों के अतिरिक्त हिन्दू संस्थाएँ संगठन करें और इस अपने पुराने दुश्मन जातिभेदभाव को समाज से निकालने का यत्न करें. राजनीति वाले जनता से वोट प्राप्त करने के लिए घृणाद्वेष और ईर्ष्या के विचार एक दूसरे के विरुद्ध प्रयोग करते हैं और देशवासियों के दिमागों पर प्रभाव डालते हैं. यह भी जातिवर्णवाद से कम दूषित नहीं. इसीलिए लोकतन्त्र की वर्तमान चुनाव प्रणाली को मीठा ज़हर कहा गया है. हम समझते हैं कि अब जनता का राज्य हैखुश होते हैंमगर इन दलों के एक दूसरे के विरुद्ध घृणापूर्ण विचारों की प्रतिक्रिया देश के लिए बहुत हानिकारक है.

श्री जगदीश मुनि जी महाराज ने लिखा है कि छुआछूत वैदिकरामायण और महाभारत काल में नहीं थी. यह उन्होंने ठीक कहाक्योंकि हिन्दू समाज में शूद्रों को अछूत नहीं समझा जाता था.

1.वैदिक कालः

वैदिक काल में सभी का दर्जा समान था. ऋग्वेद में लिखा हैः-

सं गच्छध्वं सं वदध्वं वो मनासि जानताम (.1-19-2)

समानी प्रपा सह वोन्न भागः समाने योक्त्रे सह वो यूनज्मि सम्यंचोअग्निम् समर्यतारा नाभिभिवाभितः (अ. 3-30-6)

 

अर्थात्‌:-हे मनुष्योमिलकर चलोमिलकर बोलोतुम सबका मन एक होतुम्हारा खानपान इकट्‌ठा होमैं तुमको एकता के सूत्र में बाँधता हूँ. जिस प्रकार रथ की नाभि में आरे जुड़े रहते हैंउस प्रकार एक परमेश्वर की पूजा में तुम सब इकट्‌ठे मिले रहो.

इस वेद मंत्र से यह सिद्ध होता है कि उस समय कोई जाति या वर्ण भेदभाव नहीं था. सभी मानव जाति एक थी और एकता के भाव को रखते हुए सबके लिए सुख शांति की कामना करते थे. वैदिक काल में आध्यात्मिकता सिखलाई जाती थी जिसे हासिल कर के स्वाभाविक ही शारीरिक और मानसिक सभी भेदभाव नहीं पाये जाते थे.

 

2. रामायण कालः

रामायण काल में भगवान राम ने भीलनी के जूठे बेर खाए और वानरों की सेना बनाकर लंका पर चढ़ाई की. रावण पर विजय पाकर सीता को ले आए. ऋषि वाल्मीकि से ऊँची और श्रेष्ठ जाति वालों ने ब्रह्मज्ञान हासिल किया. माता सीता बनवास मिलने पर वाल्मीकि आश्रम में रहीं और वहाँ ही लव और कुश को जन्म दिया.

 

3. महाभारत कालः

महाभारत काल में सुपच चंडाल के बिना पाण्डवों का यज्ञ संपूर्ण न हुआ. जब महाभारत की लड़ाई खत्म हुई तो श्री कृष्ण भगवान ने पाण्डवों को बुला कर कहा कि अश्वमेध यज्ञ कराओप्रायश्चित करोनहीं तो नरकों में जाओगे और तुम्हारा यज्ञ तब सम्पूर्ण होगा जब आकाश में घंटा बजेगा. पाण्डवों ने यज्ञ कियासारे भारतवर्ष के साधु-महात्मा बुलाये. सब खा चुके पर घंटा न बजा. सोचा कि भगवान को नहीं खिलाया. भगवान कृष्ण ने भी भोजन कियापरन्तु फिर भी घंटा न बजा. आखिर कहने लगे कि भगवन आप योगदृष्टि से देखोकोई रह तो नहीं गया है. भगवान ने कहा कि एक निम्न जाति का साधु हैनाम सुपच है. उसको बुलाओ तब आपका यज्ञ सम्पूर्ण होगा. पाण्डव वहाँ गए कि महात्मा जी! हमारे यहाँ यज्ञ है आप चलकर सम्पूर्ण करो. महात्मा ने कहा कि मैं उसके घर जाता हूँ जो मुझे एक सौ एक अश्वमेध यज्ञ का फल दे. वे कहने लगे कि हमारा तो एक यज्ञ भी सम्पूर्ण नहीं हो रहा है और तुम एक सौ एक यज्ञ का फल माँग रहे हो. वह बोला कि मेरी तो शर्त यही है. पाँचों पाण्डव बारी-बारी गए लेकिन महात्मा ने अपनी शर्त नहीं बदली. हार कर वापिस आ गए. पाण्डव निराश हो बैठे थे कि द्रौपदी ने कहा, “आप उदास क्यों बैठे होमैं सुपच को लाती हूँयह भी कोई बड़ी बात है?” उठीनंगे पैरों पानी लाईअपने हाथों से प्यार के साथ खाना बनाया. फिर नंगे पैर चल कर महात्मा के पास गई और अर्ज  की, “महात्मा जी! हमारे यहाँ यज्ञ है. आप चल कर सम्पूर्ण करें. महात्मा ने कहा कि तुम्हें पाण्डवों ने बताया होगा कि मेरी क्या शर्त हैकहने लगी कि महाराज मुझे पता है. महात्मा ने कहालाओ फिर एक सौ एक यज्ञों का फल. द्रौपदी ने कहा, महात्मा जीमैंने आप जैसे सन्तों से सुना है कि जब सन्तों की ओर जाते हैं तो एक-एक कदम पर अश्वमेध का फल होता है. इसलिए मैं जितने कदम आप के पास चल कर आई हूँउसमें से एक सौ एक अश्वमेध यज्ञों का फल आप ले लें और बाकी मुझे दे दें. यह सुनकर सुपच चुपचाप द्रौपदी के साथ चल पड़ा. जब खाना परोसा तो महात्मा ने सब प्रकार के व्यंजनों को एक में मिला दियायह दिखाने के लिए कि एकता में विजय है. द्रौपदी दिल में कहने लगी कि आखिर नीच जाति ही निकला. अगर अलग-अलग खाता तो इसको पता लग जाता कि द्रौपदी के खाने में क्या स्वाद है. जब खा चुका तब भी घंटा न बजा. श्री कृष्ण जी से पूछा गया कि अब क्या कसर हैभगवान ने कहा द्रौपदी से पूछोउसके मन की कसर (कमी) है. जैसा उसने ख्याल कियावैसा हो गया. जब द्रोपदी ने अपना मन शुद्ध कर लियातो घंटा बजा. इसलिए सिद्ध हुआ कि इन तीनों कालों में छुआछूत नहीं थी.

 

क्या शूद्र अछूत थेचारों वर्णों के गोत्र ऋषियों के नाम पर प्रचलित थे. पहले ये सात ही गोत्र थेफिर बाद में ज्यादा हो गए. (1) विश्वामित्र (2) जमदग्नि (3) भरद्वाज (4) गौतम (5) अत्रि (6) वशिष्ठ (7) कश्यप. अब भी अगर सरकारी जाति कोष पढ़े जाएँ तो पता चलेगा कि हिन्दुओं में बहुत सी उपजातियाँ और गोत्र समान हैं. कई उपजातियाँ और गोत्र ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्रों में अब भी मिलते हैं.

1. जब जातिवाद या वर्णवाद प्रचलित थाइतिहास सिद्ध करता है कि चारों वर्ण एकता और समानता का जीवन गुजारा करते थे. आपस में सब मिलकर खाया करते थे. आपस में सब सम्बन्ध रखते थे.

 

2. लड़के लड़कियों की शादियाँ आपस में हो जाती थीं. मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता मगर बड़े-बड़े ऋषि शूद्र स्त्रियों से पैदा हुए.

 

3. रंग-ढंग में फर्क नहीं था. चारों वर्णों में लोगों के रंग काले भी थे और गोरे भी थे. सब अपना-अपना काम करते हुए एक दूसरे का सत्कार करते थे. यदि हम महाभारत के शान्ति पर्व और वन पर्व को पढ़ें तो पता चलता है कि ब्राह्मण और शूद्र कर्म और संस्कार से बनते हैंकिसी जाति विशेष के पुरुष के वीर्य से नहीं.

 

नाना प्रकार की जातियाँ कैसे बन गईं?

 

1. अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि छुआछूत वैदिकरामायण और महाभारत काल में नहीं थी तो कब आरम्भ हुई. अधिकतर पुराणों और स्मृतियों में इसका उल्लेख है. ये ग्रन्थ भी सन्तों-ऋषियों द्वारा लिखे गये जिसमें उन्होंने अपने विचार इस ढंग से प्रकट किए जिसके अनेक अर्थ निकलते हैं. यह उनकी वर्णन शैली का चमत्कार था. उन्होंने अपने अन्तर के अनुभवजिसे उन्होंने बड़े-बड़े साधन करकेअनुष्ठान करके प्राप्त कियाकथा-कहानी के रोचक रूप में समय की मांग के मुताबिक ग्रन्थों में भर दिया. समय व्यतीत होने पर लोगों ने उनके असली भाव को न समझ कर उलटे अर्थ लगा लिए जो हिन्दू समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हुए. ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में एक श्लोक में आता :-

 

विश्वकर्मा च शुद्रायां वीर्याधान चकार ह।

ततो बभूवः पुत्रास्ते नवैते शिल्पकारिणः ।।

मालकारः कर्मकारः शंखकारः कुविन्दकः।

कुम्भकारः कांसकारः षडेते शिल्पिनां वराः ।।

सूत्रधारश्चित्रकारः स्वर्णकारस्तथैव च।

पतितास्ते ब्रह्मशपाद्‌ अजात्या वर्णसंकराः ।।

क्षत्रावीर्येण शूद्रायामृतुदोषेण पापत।

बलवत्योदुरन्ताश्चबभूवुर्म्लेच्छजातयः 

 

इसका अर्थ इस समय के या बीते समयजब अज्ञानता बढ़ीतो लोगों ने इसका जो बाह्य अर्थ समझा वो निम्नलिखित हैः-

 

विश्वकर्मा ने शूद्रा के गर्भ से नौ शिल्पकार पुत्र उत्पन्न किये थेः मालीलुहारशंखकारकुविन्दकुम्हारकंसेराबढ़ईचित्रकार और सुनार. क्षत्रिय पिता और शूद्रा माता के संयोग से म्लेच्छ की उत्पत्ति हुई.

विश्वकर्मा कोई विशेष व्यक्ति नहीं हुआ. विश्वकर्मा ब्रह्म या हमारी उस आंतरिक दिव्य शक्ति का नाम है जो हमें कर्म में प्रवृत्त करती है अर्थात्‌ एक ख्याल है जो हमें अपनी इच्छापूर्ति के लिए कर्म करने पर  विवश करता है. जिस नियम के अनुसार हमारे शरीर पर बाह्य प्रभावों से हमारा मस्तिष्क प्रभावित होता हैउसी नियमानुसार जैसी-जैसी माँग तथा आवश्यकता संसार में होती हैऊपर के लोकों से एक शक्ति आकर उस माँग तथा आवश्यकता की पूर्ति करती है. जो शक्ति हमें शारीरिक श्रम व उद्योग में प्रवृत्त करती हैउसका नाम विश्वकर्मा है. समाज चाहे तो किसी समय के ऐसे व्यक्ति जो हमें उद्योगों में लगने की प्रेरणा करता है उसको अवतार का नाम दे दे. इसी प्रकार जिस शूद्रा का उल्लेख इस ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में किया गया है वह शूद्रा कोई विशेष स्त्री या महिला नहीं थी. वो हमारे अन्दर वासना या इच्छा के रूप में आकर उस इच्छा की पूर्ति के लिए हमें गति में लाती हैहरकत करने के लिए विवश करती है या कर्म करवाती है. क्योंकि वो इच्छा हमारे अंतर से प्रकाश स्वरूपी आत्मा की शक्ति से आती है इसलिए आत्मा का सम्बन्ध इस स्थूल या सबल देह के साथ हो जाने से हमारा विश्व बन जाता है. तो जिस शक्ति ने अन्तर यह सब करायाउसको ऊपर व्यक्त किया गया है. उस शक्ति का नाम विश्वकर्मा रखा गया है और उस चाहइच्छा या वासना का नाम बाहरी रूप में शूद्रा रखा गया है.

 

चाह चूहड़ी चाह चमारी चाह नीचन ते नीच

मैं तो शुद्ध ब्राह्मण था जो यह न होती बीच

                                          -कबीर

इस सिलसिले में मैं आपको संतों की वाणी सुनाता हूँ. हुजूर दाता दयाल महर्षि शिवव्रत लाल जी महाराज का शब्द हैः-

आसा इस भव के कारागार मेंसचमुच जम की फांसी है।

आसा का बन्धन काटे वहगुरमुख है गुर विश्वासी है ।।

आसा वाले को चैन कहांआसा के साथ है त्रास घनी।

मंगल आनन्द का भागी वहसंसार से जिस को उदासी है ।।

जैसी आसा वैसी वासाजब लग आसा तब लग बासा।

जो आसा का बन्धन काटेसत मत का वह अभ्यासी है ।।

आसा है जन्म मरण प्यारेआसा तज दे फिर मुक्ति है।

आसा को सोच विचार ले तूजड़ चेतन ग्रन्थि की गांसी है ।।

आसा में दुविधा दुचिताईआसा में भय लज्जा रहते।

यह तीनों पाप अवस्था हैंतज इनको फिर सुखरासी है ।।

आसा त्रिगुण की खानी हैयह सत रज तम की रासी है।

रज ब्रह्म सत है विष्णुबलीतम शिव शम्भू कैलाशी है ।।

आशा है काम क्रोध लालचआसा मद मोह द्वेष की जड़ ।

क्यों आस में पड़ के निराश हुआतेरा रूप अजर अविनाशी है ।।

सत्संगत में सतगुर के जासुन हित चित से गुर की वानी।

बानी सुन सुन निर्बानी होगुरू बानी सर्व प्रकाशी है ।।

राधास्वामी ने समझायाघट ही में है तेरे सब कुछ।

घट में धँस आपा अपना परखजल में क्यों मीन प्यासी है ।।

 

जब रजोगुण वृत्तियाँ रखने वाले मनुष्य जिसको क्षत्रिय कहा गया हैके अन्तर मलिन वासना या इच्छा पैदा होती है और उन वासनाओं के अधीन जो बुरे अशुद्ध विचार पैदा हो जाते हैंउन विचारों का नाम म्लेच्छ है और बाह्य रूप में ऐसे विचार रखने वाले व्यक्ति को भी म्लेच्छ कहते हैं. जिसके अन्दर मलिन वासनाएँ उठती हैं वास्तव में वही म्लेच्छ है. इसमें कोई जाति पाँति का प्रश्न नहीं हैं. तो सिद्ध हुआ कि ऋषियों ने जिन्होंने ये पुराण आदि ग्रन्थ लिखे उनके असली भाव को न समझते हुए अज्ञानवश छुआछूत चल पड़ी. सिद्ध हो गया कि संसार की उत्पत्ति या हम मानव जाति आशा या इच्छा ही की उत्पत्ति हैं. इसी तरह जब उन महापुरुषोंजो ये नौ प्रकार की सेवाएँ करते थेमें जब यह चाह पैदा हुई कि यह सेवा भविष्य में भी चलती रहे तो उनकी इस चाह ने अपनी जाति या अस्तित्व को आगे बढ़ाया और नौ प्रकार की जातियां चल पड़ीं. उसको पुराण के शाब्दिक अर्थों में विश्वकर्मा ने शूद्रा द्वारा नौ प्रकार की जातियाँ उत्पन्न कीं कहा गया है. बात क्या थी और हमने अज्ञानवश क्या समझ लिया.

 

2. स्त्रियों की पवित्रता पर शक करने कारण:

 

हिन्दू समाज में नाना प्रकार की जातियाँ और वर्ण स्त्री जाति की पवित्रता पर शक करने से बने. ये भी वैदिकरामायण और महाभारत काल में नहीं थेक्योंकि हिन्दू समाज में तत्त्व ज्ञानी समझते थे कि प्रकृति में मानव की उत्पत्ति कई ढंगों से हो सकती है. इसका उल्लेख हमारे शास्त्रों में आता है जिसको नीचे लिखा जाता है.

 

(क) वैदिक कालः-

 

छान्दोग्य उपनिषद में एक कथा आती हैः- जाबाला के पुत्र सत्यकाम ने अपनी माता से कहा, “माँमैं ब्रह्मचर्य आश्रम ग्रहण करना चाहता हूँमुझे मेरा गोत्र बता दो. माँ ने कहा, “बेटामैं नहीं जानती तुम किस कुल के हो. युवा अवस्था में जब मैं दासी के सदृश जीवन बिताती थीमैंने तुम्हें गर्भ में धारण किया. मैं नहीं जानती तुम्हारा गोत्र क्या है. मेरा नाम जाबाला हैतुम सत्यकाम हो. इसलिए अपने आपको सत्यकाम जाबाल कहना. सत्यकामगौतम नाम वाले हरिद्रमान के पुत्र हारिद्रुमत के पास गया और उनसे बोला, “आर्यमैं ब्रह्मचारी बनना चाहता हूँ. क्या आप की शरण में आ सकता हूँ?” हारिद्रुमत ने पूछा, “बेटातुम ने किस गोत्र में जन्म लिया है?” सत्यकाम ने उत्तर दिया, “आर्यमैं किस कुल का हूँयह नहीं जानता. माँ का नाम जाबाला है और मैं सत्यकाम हूँ. इसलिए आर्य मैं सत्यकाम जाबाल हुआ.

हारिद्रुमत ने कहा, सच्चे ब्राह्मण के सिवा और कोई ऐसी सच्ची बात नहीं कह सकता. देखिए ऋषि हारिद्रुमत ने बजाए घृणा के सत्यकाम को ब्राह्मण की पदवी दे दी.

 

(ख) रामायण कालः-

 

सूर्य के वरदान से सुमेरू नामक पर्वत सोने का है. वहाँ हनुमान के पिता केसरी राज्य करते थे. उनकी इष्ट भार्या अंजना नामक थी. उस अंजना में वायु नेधान की बाली की नोक के समान वर्ण वाले इस पुत्र को उत्पन्न किया. (श्रीमद वाल्मीकीय रामायण, उत्तरार्द्ध पृ.92)

 

(ग) 1. महाभारत कालः-

 

पहले युग में गंगा द्वार नामक स्थान पर महर्षि भारद्वाज रहा करते थे. वे बड़े व्रतशील और यशस्वी थे एक बार वे यज्ञ कर रहे थे. उस दिन सबसे पहले ही वे महर्षियों को साथ लेकर गंगा स्नान करने गये. वहाँ उन्होंने देखा कि घृताची अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही थी. उसे देख कर उसके मन में काम वासना जाग उठी. जब उनका वीर्य स्खलित होने लगातब उन्होंने उसे द्रोण नामक यज्ञापात्र में रख दिया. उसी में द्रोणाचार्य जी का जन्म हुआ.

2महर्षि गौतम के पुत्र थे शरद्वान. वे वाणों के साथ ही पैदा हुए थे. उनका मन धनुर्वेद में जितना लगता थाउतना वेदाभ्यास में नहीं. उन्होंने तपस्या पूर्वक सारे अस्त्र प्राप्त किए. शरद्वान की घोर तपस्या और धनुर्वेद में निपुणता देख कर इन्द्र बहुत भयभीत हुए. उन्होंने शरद्वान की तपस्या में विघ्न डालने के लिए जानपादी नाम की देवकन्या भेजी. वह धनुर्धर शरद्वान के आश्रम में जाकर तरह-तरह के हाव-भाव से उन्हें लुभाने लगी. उस सुन्दरी और एक साड़ी पहने युवती को देख कर उनके मन में कंपकंपी आने लगी. उनके हाथ से धनुष बाण गिर पड़े. वे बड़े विवेकी और तपस्या के पक्षपाती थे. इसलिए उन्होंने धैर्य से अपने को रोक लिया. उनके मन में विकार हो चुका थाइसलिए उनके अनजान में ही शुक्रपात हो गया. उन्होंने धनुष बाणमृगचर्म, आश्रम और उस कन्या को छोड़ कर तुरन्त वहाँ से यात्रा कर दी. उनका वीर्य सरकंडों पर गिरा था. इसलिए वह दो भागों में विभक्त हो गया. उससे एक कन्या और पुत्र की उत्पत्ति हुई. संयोगवश राजर्षि शान्तनु अपने दल के साथ शिकार खेलते हुए वहाँ आ निकले. किसी सेवक की दृष्टि उधर पड़ गई. उसने यह सोच कर कि हो न हो यह बालक किसी धनुर्वेद पारदर्शी ब्राह्मण के हैंराजर्षि को सूचना दी. उन्होंने कृपा परवश होकर उन बालकों को उठा लिया और ये तो अपने ही बालक हैं ऐसा सोच कर घर ले आए. उन्होंने उन बच्चों का पालन-पोषण और यथोचित संस्कार किया और उनके नाम कृपी एवं कृप रख दिए.  कृप बाद में कृपाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ.”

 

3. वसुदेव जी के पिता का नाम शूरसेन था. उनकी एक अनुपम रूपवती कन्या थीजिसका नाम पृथा था. शूरसेन ने अग्नि के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपनी पहली सन्तान अपनी बुआ के संतानहीन पुत्र कुन्तिभोज को दे दूँगा. उनके यहां पहले पृथा का ही जन्म हुआ इसलिए उन्होंने उसे कुन्तिभोज को दे दिया. जिस समय पृथा छोटी थीअपने पिता कुन्तिभोज के पास रहती और अतिथियों की सेवा-सत्कार करती. एक बार पृथा ने दुर्वासा ऋषि की बड़ी सेवा की. उसी सेवा से जितेन्द्रिय ऋषि बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने पृथा को एक मन्त्र बतलाया और कहा कि कल्याणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ. तुम इस मंत्र से जिस देवता का आह्वान करोगीउसी के कृपा प्रसाद से तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा. दुर्वासा ऋषि की बात सुन कर पृथा (कुन्ती) को बड़ा कुतूहल हुआ. उसने एकान्त में जाकर भगवान सूर्य का आह्वान किया. सूर्यदेव ने आकर तत्काल गर्भस्थापन कियाजिससे उन्हीं के समान तेजस्वी कवच कुण्डल पहने एक सर्वांग सुन्दर बालक हुआ. कलंक से भयभीत होकर कुन्ति ने उस बालक को छिपाकर नदी में बहा दिया. अधिरथ ने उसे निकाला और अपनी पत्नी राधा के पास ले जाकर उसे पुत्र बना लिया. उन दोनों ने उस बालक का नाम वसुषेण रखा था. वही बाद में कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ.”

 

(घ) वर्तमान कालः-

 

अब वर्तमान युग में विज्ञानियों ने सिद्ध कर दिया कि मनुष्य जाति की उत्पत्ति बिना स्त्रीपुरुष के संभोग से भी हो सकती है और उन्होंने ट्‌यूब द्वारा बच्चे पैदा कर दिए जिसको अब सब जानते हैं. अब वो इन्सान जो ट्‌यूब द्वारा पैदा हुए हैं वो किस जातिवर्ण के होंगे क्योंकि शुक्राणु तो बैंक से लिया जाता है. बुद्धिमान वर्ग सोचे.

अब ऊपर लिखे उदाहरणों से इस रहस्य को समझ सकते हैं कि सत्यकाम जाबालद्रोणाचार्यकृपाचार्य और कर्ण का जन्म कैसे हुआ. सत्यकाम को ऋषि हारिद्रुमत ने बजाए घृणा के ब्राह्मण पदवी दे दी. ब्राह्मण वह जो ब्रह्म में रमण करता है और शब्द और प्रकाश में रहता है और वो अपना जीवन उस ब्रह्मज्ञान के सहारे व्यतीत करता है. तो सत्यकाम के सच्चाई वक्तव्य से हारिद्रुमत ने जान लिया कि इसमें ब्राह्मणत्व है. यदि जातपात का समय होता तो सत्यकाम  का जाति बहिष्कार कर दिया जाता. उसको अछूत करार दे देते और उसे वर्णसंकर जान कर घृणा करतेमगर ऐसा नहीं हुआ. इसी तरह रामायण और महाभारत काल के ऊपर के उदाहरण सिद्ध करते हैं कि स्त्री जाति की पवित्रता पर शक नहीं किया जाता था.

सृष्टि के आरम्भ में जो पहला इन्सान अर्थात्‌ आदि मनु उत्पन्न हुआ उसको बाहर के किसी बड़े इन्सान ने जिसकी आत्मा हिरण्यगर्भजिसका मन अव्याकृत और शरीर विराट कहलाता है उसने अपनी इच्छा से आदि मनु को पैदा किया और जब तक इसी नियम के आधार पर आदि मनु ने अपने ही ख्याल से और मनुष्य पैदा किए वह क्रम चलता रहा जब तक मानव के मन के विचार बलवान रहे. जब मनुष्य के विचारों की शक्ति क्षीण हो गई तो फिर यह मैथुन सृष्टि आरम्भ हो गई. मगर बिना विवाह किए स्त्रियों ने बच्चों को जन्म दिये जैसे यीशु मसीह भी थे. इस वक्त बाहर के मुल्कों में डाक्टरों ने देखा है कि बिना पुरुष के साथ मिलने के स्त्रियाँ गर्भवती हो जाती हैं. बीते समय में जब किसी के सन्तान नहीं होती थी तो उसके लिए वो स्त्री और पुरुष पुत्र की कामना को लेकर साधुसन्तोंऋषियों को बुलाकर पुत्र के निमित्त यज्ञ कराते थे. जैसे राजा दशरथ के यहाँ जब सन्तान उत्पन्न न हुई तो उसने सन्तान कामना से वशिष्ठ और श्रृंगी ऋषि को बुलाया और यज्ञ कराया जिसका उल्लेख रामचरित मानस के बालकांड में आता है. वहाँ जो लिखा हुआ है वो नीचे दिया जाता है :-

एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरे सुत नाहीं।।

गुरू गृह गएउ तुरत महिपाला। चरन लाग करि बिनय बिसाला ।।

निज दुख सुख सब गुरहि सुनाएउ। कहि वशिष्ठ बहु विधि समझाएउ ।।

धरहु धीर होइहंहि सुत चारी। त्रिभुवन विदित भगत भयहारी ।।

श्रृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ।।

भगति सहित मुनि अहुति दीन्हे। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हे ।।

जो बसिष्ठ कुछ हृदय बिचारा। सकल काज भा सिद्ध तुम्हारा ।।

 

अगर आप इसको ध्यानपूर्वक पढ़ें तो पता चलता है कि वशिष्ठ जी महाराज ने अपने हृदय में जो धारण करके भक्तिपूर्वक आहुति दीउसके फलस्वरूप दशरथ को पुत्र की प्राप्ति हुई.

 

स्त्री का गर्भवती हो जाना सीधे प्रकाश द्वारा भी हो सकता है. इसका प्रमाण परम सन्त परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज जिन्होंने मेरे साथ सत्गुरु का काम किया,  जिनकी याद आते ही मेरा सिर झुकता हैउनके जीवनकाल में सरसों हेड़ी जिला सहारनपुर से एक महिला आई जिसने उनको कहा कि आपने मुझे स्वप्न में प्रकाश का बच्चा दिया और वो गर्भवती हो गई और बाद में लड़का पैदा हो गया. यह घटना सत सनातन धर्म नामी पुस्तक जो हुजूर परम दयाल जी महाराज ने लिखी उसके पृष्ठ 56 पर उल्लिखित है.

इन ऊपर लिखे सब दृष्टांतों से सिद्ध हो जाता है कि मानव की उत्पत्ति वास्तव में प्रकाश से होती है या अन्य कई रास्तों से होती है जो ऊपर लिखे गए हैं. तो जिस पुरुष ने जाबाला स्त्री के अन्तर ब्राह्मणत्व का बीज डालाचाहे वह अपने ख्याल सेचाहे प्रकाश द्वारावो व्यक्ति महान व्यक्ति था और उसकी पहचान कर उस आचार्य हारिद्रुमत ने जाते ही कह दिया कि तू सच्चा ब्राह्मण है. गुरु वशिष्ट जी ने श्री रामचन्द्र जी महाराज से एक बार कहा था कि ऐ राम! तू ब्रह्म का अवतार है. श्री रामचन्द्र जी महाराज ने कहा कि महाराज! मुझे तो पता नहीं. मगर वशिष्ट जी जानते थेउनके अपने ही संस्कार का परिणाम है.

इसलिए स्त्रियों की पवित्रता पर संशय करके उनकी सन्तान का बहिष्कार जो किसी समय हुआ वो अज्ञान था जिसके कारण नाना प्रकार की जातियाँ बन गईं.

1. किसी खास प्रदेश या गाँव में बसने से उसी प्रदेश या गाँव के नाम पर जातियाँ बनीं. यह प्रथा इस वक्त भी है. कई हिन्दू जातियाँ ऐसी हैं जो ब्राह्मण तो नहींमगर वो अपनी जाति में विवाह आदियज्ञ आदि कराने वाले को ब्राह्मण मान लेती हैं और उसको पंडित जी कहते हैं. 

2. भिन्न-भिन्न गुण कर्म स्वभाव सेः पिछले समय में यज्ञ आदि करने की रीति प्रचलित थी. जब ऋषि मुनि साधन-अभ्यास में बैठते थे तो अपने अन्तर सावित्री या प्रकाश को पैदा करते थे. पहले अपनी तमोगुणी वृत्तियों की आहुति देते थे. जब तमोगुणी गुण से छुटकारा मिल जाता था तो फिर रजोगुणी वृत्तियों की अपने अन्तर में आहुति देते थे. अन्त में सतोगुणी वत्तियों की भी आहुति देकर शुद्ध प्रकाश स्वरूप अवस्था में चले जाते थे. जब वह समय आया कि लोग इस असली यज्ञ को करने में असमर्थ हो गए तो लोगों ने अज्ञानवश बाहर की कुरबानियाँ अर्थात्‌ त्याग बना लिए और बकरेघोड़े और बैलों को मारना यज्ञ समझ लिया. जिन लोगों ने पहले पहल ये कुरबानियां दीं उन लोगों को भी नीच अछूत निश्चित करके उनका समाज से बहिष्कार कर दिया.

 

3. खाने पीने के लिहाज से भी जातियाँ बन गईं. यह भी अज्ञानता थी. भोजन से ही हमारे अन्तर तरह-तरह की हालतें पैदा होती हैं. जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन. इसमें कोई जाति विशेष का सवाल नहीं.

 

4. पत्थरों पर खुदे साहित्य में तब्दीली के कारण जो कि आसानी से बदला जा सकता था.

6. हिन्दू जाति ऐसी बलवान थीजिसने धार्मिक स्वतन्त्रता सबको दी थीमगर व्यावहारिक स्वतन्त्रता नहीं दी. जहाँ किसी ने व्यवहार तोड़ा उसको बिरादरी से खारिज कर दिया.

6. किसी संन्यासी के फिर से गृहस्थ में प्रवेश करने पर उसकी सन्तानें अस्पृश्य होकर नई जाति बन जाती थी.

 

छुआछूत कब और क्यों?

 

1. इस बात का पता कि छुआछूत क्यों और कब बनीहतिहास से नहीं मिलामगर युक्ति से सिद्ध होता है कि समय के अनुसार इसी जातिवर्णसमाजभाव का प्रयोग धीरे-धीरे अज्ञानवश अपनी श्रेष्ठता कायम रखने के लिएकुछ धन सम्पत्ति बढ़ाने के लिए किया गया.  अपने को ऊँचा बनाया गया और दूसरों को नीच और अछूत कहा गया. साधारण मानव यह चाहता है कि मैं सत्ता का स्वामी बन जाऊँन इकट्‌ठा कर लूँ और उसका भी कोई अंत नहीं. उसकी इस कामना का अंत नहीं होता. वो चाहता है कि ये सब चीजें मेरी आने वाली पीढियाँ भोगें. मेरी जातिमेरा वर्ण इन सब चीजों का मालिक होवे. अब पहले राजनीति में ले लें. बड़े-बड़े नेता चाहते हैं कि हमारे बाल बच्चे भी हमारी तरह ऊँचे पदों पर आएँ. धर्म, पंथ और सम्प्रदाय के गुरु लोग भी अपने मरने के पश्चात्‌ अपने बच्चों को गदि्‌दयाँ दे जाते हैं. यह भावना अपने आप को उभारने और दूसरों को दबाने का ज़रिया बनती है. यहाँ तक कि दूसरों को अछूत बना कर हमेशा के लिए दलित बना दिया ताकि लोग उनकी आने वाली पीढियों की समानता न कर सकें.

 

2. किसी देश में राष्ट्रीयता न होने के कारणः-अपनी जातिअपनी भाषा और अपना प्रदेश बनाकर कमजोर वर्ग के लोगों को उन्नति करने के साधनों से वंचित रखा जाता था. भारत पर जब बाहर से आक्रमण हुए तो अनेक जातियाँ और अनेक उपजातियाँ और वर्ण होने के कारण मुकाबला न हो सका और हार कर सदियों के लिए गुलाम और असहाय बने रहे.

 

4. लम्बे समय तक एक काम करने के कारणः- हिन्दुओं ने वर्णव्यवस्था बनाई. उस समय इसकी आवश्यकता होगी. हर एक आदमी के गुणकर्म और स्वभाव के मुताबिक अलग-अलग काम बाँटे गए. शूद्रों ने समाज की सेवा के कार्य अपने जिम्मे लिए. लम्बे समय तक जो काम किया जाए आदमी उसी का रूप बन जाता है. जैसा काम वैसा नामजैसा नाम वैसा रूप. यह सारी सृष्टि नामरूप की है. कर्मों के संस्कारों द्वारा जो काम कोई करता हैउसकी वही जाति बन गई. मैं सब का नाम तो नहीं लेना चाहता क्योंकि अब समय बदल रहा है. कोई शूद्र कहलाना नहीं चाहता क्योंकि यह शब्द घृणा सूचक हो गया है. अगर तमाम शूद्र जातियों के नाम दिये जाएँ तो सम्भव है कि किसी के मन का ठेस पहुँचे. मगर इशारे के तौर पर लिखना जरूरी है. कपड़े धोने वाले का काम करने वाले धोबी बन गए. हजामत का काम करने वाले हज्जाम बन गए. कृषि का काम करने वाले कृषक बन गए. इस तरह और भी समझिये. जिन जातियों की सेवाएँ कुछ घटिया किस्म की थीं वो अछूत बन गईं और जिनकी सेवाएँ कुछ अच्छी थीं और उनके बगैर गुजारा नहीं था वो छूत बन गई.

 

5. विवेक न होने के कारणः- इस सिलसिले में कबीर साहिब का एक शब्द हैः-

 

पंडित सुनहु मनहिं चित लाई ।

 

पंडित के कई अर्थ हैं. एक अर्थ तो यह है कि आत्मविषयक बुद्धि पंडा है और वह पंडा बुद्धि जिसमें हो वह पंडित है. दूसरे जो ब्राह्मण या पंडित के घर पैदा होउसको पंडित कहते हैं. तीसरे जो कर्मकाण्ड का अनुयायी है और प्रचार करता है. मगर इस शब्द में कबीर साहिब ने उस व्यक्ति को सम्बोधित किया है जो विद्वान होपुस्तकीय ज्ञान रखता होविवेकहीन हो और लोगों को उपदेश करता है. ऐसे लोगों को संत कबीर कहते हैं कि भाई छुआछूत सब मन का खेल है.

 

जोई सूत के बन्यो जनेऊताकि पाग बनाई।

धोती पहर के भोजन कीन्हापगरी में छूत लगाई ।।

 

कबीर साहिब कहते हैं कि तमाम वस्त्र सूत के बनते हैं. एक ही सूत सब में है. जनेऊधोतीपगड़ी आदि सभी सूत से बने मगर भोजन खाते समय पगड़ी निषेध कर दी जाती है या पगड़ी को अछूत समझने लग जाना यह ठीक नहीं. जिस तरह तमाम वस्त्र एक सूत से बने हैंउसी तरह सब जीव जन्तु एक ही मालिक और पाँच तत्त्वों से बने हैंकिसी को नीच कह देना ठीक नहीं.

 

रक्त मांस को दूध बनो हैचमड़ा धरी दुराई।

सोई दूध से पुरखा तरिगेचमड़ा में छूत लगाई ।।

 

दूध रक्त मांस से बनता है और यह सब चमड़े के अन्दर होता है. दूध पीने से सभी प्रसन्न चित्त हो जाते हैंमगर चमड़े और चमड़े का काम करने वाले के साथ घृणा करते हैं. चमड़ारक्तमांस और दूध सब एक ही तत्त्व से बने हैं. किसी को बुरा भला कहना विवेक हीनता है.

 

जन्म लेत उढ़री अबला के लै मुख छीर पियाई।  

जब पंडित तुम भये ज्ञानी चालत पंथ बड़ाई ।।

हम सब माता के पेट से पैदा हुए हैं. माता के पेट में एक न दिखाई देने वाला स्पर्मेटोरिया जर्म पिता के वीर्य से आया. पिता का वीर्य और  माता का रजजो उन्होंने अन्न खायाउससे बना. अन्न पृथ्वी से पैदा हुआ. पृथ्वी में अन्न तब तक नहीं उत्पन्न हो सकता जब तक चांदसूरज और सितारों की किरणें उन पर न पड़ें अर्थात्‌ यह सारी सृष्टियह प्रकृति और उनके तत्त्व प्रकाश से बने हैं. इसीलिए हम लोग धरती को माता और सूर्य को पिता कहते हैं. अब उढ़री अबला से कबीर साहिब का क्या भाव हैपता नहीं. बीते समय में उपपत्नियोंदासियों या असहाय अबला नारियों के सन्तान उत्पन्न हो जाती थी. ऐसी माताओं के गर्भ से पैदा होकरउसका दूध पीकर जब बड़े हो जाते थे और जब बुद्धि बढ़ जाती थी तब वैसी माताओं के दोष देखने लग जाते थे. ये दोष चाहे शारीरिक होंमानसिक हों या सामाजिक कुरीतियों की वजह सेज्ञान और विवेक न होने के कारण उनको अछूत बना लेते थे. यह भूल जाते थे कि वास्तव में हमारा जीवन एक ही प्रकाशउससे बनी प्रकृति और तत्त्वों से बना है. तो कबीर साहिब फरमाते हैं:-

 

कहे कबीर सुनो हो पंडित नाहक जग में आई।

बिना विवेक ठौर न कतहूँविरथा जन्म गंवाई ।।

 

आखिर में कबीर साहिब फरमाते हैं कि अगर इस संसार में आकर हमें सत-असतगलत और ठीक का ज्ञान नहीं हुआनिश्चयात्मक बुद्धि नहीं मिली तो हमारा जन्म व्यर्थ जाता है. एक मालिक की सन्तान हैं. यहाँ रंगरूप में भिन्नता आ गई और हम विवेक के खो जाने के कारण अपने दुखों को दूर करने के लिए कोई न कोई सामाजिक सिद्धांत बनाते हैं. कुछ समय के लिए वो सिद्धांत काम करते हैं. मगर फिर व्यवस्था बिगड़ जाती है और उसी का परिणाम छुआछूत है. वह वर्ण व्यवस्था अर्थात्‌ ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र के काम करने की शक्तियाँ स्वाभाविक ही प्रत्येक मानव के अन्तर हैंकिसी में थोड़ी किसी में ज्यादा. उनमें संस्कारों के कारण परिवर्तन भी आता रहता है. इसलिए जातिवाद वर्ण व्यवस्था द्वारा छुआछूत सर्वदा असंगत है. इसलिए विवेक की जरूरत है लेकिन विवेक कैसे प्राप्त हो.

हमारे समाज में कई ऋषिमुनिसाधु संत हुए हैं जो आध्यात्मिकता के मार्ग पर चल कर अपना जीवन व्यतीत करते रहे हैं. ऐसे महापुरुषों के सत्संग द्वारा इन्सान में विवेक आता है. सन्त तुलसीदास जी ने लिखा हैः-

बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई।

संत महात्माओं के सत्संग के द्वारा हमें समाज में सुखी रहने का रास्ता मिलता है. वो सच्ची शिक्षा देते हैं जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिकता से होता है. उनका मार्ग अपने अन्तर के साधन द्वारा प्राप्त की गई अवस्थाओं से होता है. उस पर विशेष आदमी अन्तर का साधन करके उस ज्ञान को प्राप्त कर सकता है. सर्वसाधारण के लिए उनके कहे हुए वचनों पर विश्वास करके अपना जीवन सफल बनाना है.

इस जाति वर्ण भेद या छुआछूत के सिलसिले में मैं आपको धनी धर्मदास जी का एक शब्द सुनाता हूँ जिससे हमको पता लग जाता है कि छुआछूत का असली कारण क्या है. कब और कैसे चलीइस विषय में धनी धर्मदास का एक शब्द हैः-

 

कैसे मैं आरति करूँ तुम्हारी, महा मलिन साहब देह हमारी।।

 

धनी धर्मदास जी फरमाते हैं कि ऐ मालिकमैं तुम्हारी आरती कैसे करूँआरती करते समय स्वयं आरत बनकर हम अपने इष्ट को बाहरी रूप में सजाते हैं. सुन्दर भूषणवस्त्र पहनाते हैं और इष्ट से प्रेम-प्रीति लाते हैं. थाली में दिया धूप आदि रखकर उसके सुन्दर मुखड़े के इर्द गिर्द घुमाते हैं. फिर कई अमूल्य वस्तुएँ भेंट करते हैं. फिर अपने शब्दों में या दूसरे किसी महापुरुष के गढ़े हुए शब्दों में गाना गाया जाता है. मगर हुजूर धर्मदास जी कह रहे हैं कि ऐ मालिकमैं तेरी आरती कैसे करूँक्योंकि मेरा तन-मन महामलीन है. सच्चे साधक जब अपने इष्ट की आरती करते हैं तो सखियाँ या इन्द्रियां भी साथ गाती हैं. मगर मलिन तन-मन सेसखियों का भी मलिन रूप से आरती का होना धनी धर्मदास कठिन समझते हैं. सभी सन्तों ने आरतियाँ लिखी हैंकितने प्रेम और उमंग के साथ लिखीं. आरती एक तो एहसान के जज़्बे में की जाती हैदूसरे देखा-देखी असलियत की नकल की जाती है. एहसान का जज़्बा उस समय पैदा होता है जब सत्गुरु से शक्ति हासिल करके उसकी दया से जब हम इस मलिन या अछूत शरीर और मन से ऊपर जा कर अपने रूप में ठहर जाते हैं. असली आरती अपने मालिक से सदा के लिए मिल जाना है. धर्मदास जी का भी यही अभिप्राय है. ऐ मालिक मैं तुमसे कैसे मिलूँमलिन देह के कारण मिलना मुश्किल है.

देह की मलीनता तो सब जानते हैं. हमारी देह हाड़मांसरक्तनस नाडियाँ और चमड़े से बनी है. इसमें से मलमूत्रनाकथूकगीध कान का बहनापसीना आदि निकलते रहते हैं उसको साफ रखने के लिए हमें प्रत्येक दिन नहाना धोना पड़ता है. नए वस्त्र डालें तो कुछ दिनों के बाद वस्त्र गंदे हो जाते हैं. फिर धोने पड़ते हैं. इसी तरह मन में अच्छे और बुरे विचार भी उठते रहते हैं. साइंस कहती है कि आदमी का शरीर एक रेडियो स्टेशन की भांति है. इसमें से रेडियेशन निकलती है और हमारे सम्पर्क में आने वाले पर असर करती है. हमारे अच्छे-बुरे विचार ब्रह्मांड में रहते हैं और लोगों पर असर करते हैं. इस देही में आने पर बड़े-बड़े सन्तों ने अपने आपको पतितनीच कहा. गुरु नानक साहिब ने अपने आपको मैं नीचन ते नीच कहा. सन्त तुलसीदास जी ने अपने आपको अधम और पुरातन पतित कहा. भगत सूरदास जी का शब्द हैः-

 

मो सम कौन कुटिल खल कामी।

जिन तन दियो ताहि बिसरायो ऐसो निमक हरामी ।।

भर भर उदर विषय को धावों जैसे सूकर ग्रामी।

हरिजन छांड हरिविमुखन की निसी दिन करत गुलामी ।।

पापी कौन बड़ो है मो तेसब पतितन में नामी।

सूर पतित को ठौर कहाँ हैसुनिए श्रीपति स्वामी ।।

 

और राधास्वामी दयाल का शब्द हैः-

 

गुरु मैं गुनहगार अति भारी।

काम क्रोध और छल चुतराईइन संग है मेरी यारी ।।

लोभ मोह अहंकार इर्षामान बड़ाई धारी ।।

कपटी लम्पट झूठा हिंसकअस अस पाप करा री ।।

दुक्ख निरादर सहा न जाईसुख आदर अभिलाख भरा री ।।

बिंजन स्वाद अधिक रस चाहेमन रसना यही चाट पड़ा री ।।

धन और कामिन चित बसाएपुत्र कालितर आसभरा री ।।

नाना विधि दुख पावत पापीतो भी यह करतूत न छोड़ी ।।

यह मन दुष्ट काल का चेरानित भरमावत निडर हुआ री ।।

जब जब चोट पड़ी दुखन कीतब डर डर कर भजन करा री ।।

देखो दया मेहर सतुगुरु कीउसी को भजन मान लिया री ।।

बुधि चतुराई बचन बनावटहार जीत की चर्चा धारी ।।

शेखी बहुत प्रीति नहीं अन्तरभोले भक्ततन धोख दिया री ।।

नर नारी बहुतक बस कीनेमान प्रतिष्ठा भोग किया री ।।

गुरु संग प्रीत कपट कुछ डर कीकभी थोड़ी कभी बहुत किया री ।।

कहाँ लग औगुन बरनूँ अपनेयाद न आवत भूल गया री ।।

चोर चुगल इन्द्रि रस मातामतलब की सब बात विचारी ।।

खुद मतलबी निर्दई मानीबहुतन का अपमान किया री ।।

कोटिन पाप किये बहुतेरेकहूँ कहाँ लग वार न पारी ।।

हे सतगुरु अब दया विचारोक्या मुख लै मैं करूं पुकारी ।।

नहीं परतीत प्रीति नहीं रंचककस कस मेरा करो उबारी ।।

मो सा कुटिल और नहीं जग मेंतुम सतगुरु मोहि लेव सुधारी ।।

जतन करूँ तो नहीं आवतहार हार अब सरन पड़ा री ।।

यह भी बात कही मैं मुँह सेमन से सरना कठिन भया री ।।

सरना लेना यह भी कहनाझूठ हुआ मुँह का कहना री ।।

तुम्हारी गति मति तुमहीं जानोजस जस करो उबारी ।।

मैं तो नीच निपट संशयरतलगे न चरनन प्रीत करारी ।।

मेरे रोग असाध भरे हैंतुम बिन को उस करे दवा री ।।

जब चाहो जब छिन में टारोमेहर दया की मौज निरारी ।।

बारम्बार करूँ मैं बिनतीऔर प्रार्थना करूँ तुम्हारी ।।

तुम बिन और न कोई दीखेतुमहीं हो मेरे रखवारी ।।

बुरा बुरा फिर बुरा बुरा हूँजैसा तैसा आन पड़ा री ।।

अब तो लाज तुम्हें है मेरीराधास्वामी खेवो बला री ।।

 

इसलिए सिद्ध हुआ कि इस देह में आ जाने से हम किसी अवस्था से गिर जाते हैंपतित हो जाते हैंअछूत बन जाते हैं.

 

छूते से उपजा संसारा, मैं छुतिया गुन गाऊँ तुम्हारा।।

इस देह और मन से संसार की उत्पत्ति होती है क्योंकि इस देह और मन से चौरासी में घूमने की व्यवस्था की गई है. जितने भी संसार के प्राणी हैं जो देह और मन रखते हैंइसी मलिन देह द्वारा पैदा होते रहते हैं और आगे अनगिनत देहधारी इस संसार में आतेकुछ दिन रहते और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं. मगर छुआछूत का ज़माना कैसे आया. लोग अपनी हस्ती को भूल गए. एक मैं पना आ जाने के कारण अपने आपको ऊँचा और दूसरे देहधारियों को नीचा समझने लग गए. जितने हमारे मन के विचार हैंयही संसार है. आगे धनी धर्मदास जी कहते हैं –‘मैं छुतिया गुन गाऊँ तुम्हारा’- जब हमारी सुरत उस देह मन में आ जाती हैहम जीव रूप हो जाते हैंतो फिर मालिक के गुण गाते हैं. हे मालिकआपने मुझे जीव रूप बना दियाआप दया के सागर हैंपतित उद्धारनहार हैं. मुझ छुतिया को अपने साथ मिला लो. हम इस देह-मन से छुटकारा चाहते हैंक्यों कि ये छूत हैं. इसमें रहने से हम नीच बन जाते हैंपतित और अछूत बन जाते हैं. हमारी सुरत के सामने यह शरीर और मन के खेल या अहसासातबोध-भान ऐसे आते हैं जिनको सत्य मानना पड़ता हैसार मानना पड़ता है. इस मलिन और अछूत अवस्था का हमारे सामने सार बन कर आना ही संसार कहलाता है. अगर सुरत इनमें न होतो कोई संसार नहीं. सत्गुरु की आरती हम इसलिए  करते हैं कि वो हमारे दुखदायी मलिन और अछूत संसार को लोप कर देता है और धर्मदास जी ने ठीक कहा है कि मेरा इस मलिन देह जो वास्तव में अछूत हैछू जाने से मेरा संसार बन जाता है और हमारी सुरत छुतिया हो जाती हैभ्रष्ट महसूस करती हैपतित या गिरी हुई महसूस करती है.

जब हमारी सुरत छुतिया बन जाती है यानी छूत के साथ संगत हो जाती है तो फिर वो गुरु के गुण गाती हैसच्चे मालिक के गुण गाती हैऔर कोई चारा नहीं होता. इस त्रिगुणात्मक जगत में सिवाए गुण गाने के और हम क्या कर सकते हैं. बेबस होकर मालिक का इष्ट बना कर गुणों को इष्ट से जोड़ते हैं ताकि हमारा कल्याण हो. इसलिए धनी धर्मदास कहते हैं कि मैं छुतिया गुन गाऊँ तुम्हारा’. इस अछूतेपन में आकर फिर हम उस अवस्था को याद करते हैं या उसके गुण गाते हैं या उसमें अपनी रहनी की इच्छा करते हैंजहाँ हम अछूत न हों. इसलिए मेरे ख्याल में यह छूत और अछूत का लफ़्ज़ सन्तोंयोगियों और साधकों ने उस वक्त गढ़ा जब उनके क्रियात्मक जीवन में आया कि बुरे विचारों वाले लोग जब उनके पास आते हैंमत्थे टेकते हैंशरीर के साथ जफ्फा (आलिंगन) लगाते हैं तो उनकी गंदी देहउनके विचार और संस्कारउनकी बुरी वासनाएँ उन महान पुरुषों पर असर करती हैं. अकसर साधक लोग इसीलिए जंगलों में एकान्त स्थान पर चले जाते हैं जहाँ उनको कोई न मिल सके या छू सके. जो महापुरुष गुरु का काम करते हैंहजारों-लाखों चेले हैंवो अपने चेलों से ज्यादा बातें करने या मत्था टिकाने से परहेज़ करते हैं. इसका सबूत हुजूर परम दयाल फ़कीरचन्द जी महाराज के जीवन से मिलता है. जब लोग बिला मज़हबो मिल्लत और जातपात उनके चरणों पर मत्था टेकते थेतो वो फ़रमाया करते थे कि आपके मत्था टेकने से या छूने से आपके विचारसंस्कार और आशाएँ मुझ पर असर करती हैं. अगर मेरी रेडियेशन आप तक पहुँचती है तो आपकी रेडियेशन का भी मुझ तक पहुँचना जरूरी है और कहा करते थे कि कुत्ते चोरों के कपड़े सूँघ कर उन चोरों को पकड़ लेते हैं. और आखिर में वो कई सत्संगों में फ़रमा गए कि अगर मुझे पहले पता लग जाता कि गुरुवाई करने कामत्थे टिकाने का यह अंजाम होता है तो आज से बीस साल पहले यह काम छोड़ देता. यह बात उनहोंने 08-07-1981 को जो उनका आखिरी सत्संग थाअमरीका के अस्पताल में कही.

मेरे एक परम मित्र स्वामी रामेश्वर गिरि जी महाराज एक बार जूनागढ़ गए. क्योंकि उनके गुरु महाराज जिनका नाम स्वामी रत्न गिरि थाचोला छोड़ गए थे. उनके चोला छोड़ने से पहले स्वामी रामेश्वर गिरी जी महाराज 18 घंटे की समाधि में रहते थे. वो चाहते थे कि कोई गुरु ऐसा मिले जिससे मुझे बाकी 6 घंटे की समाधि अवस्था प्राप्त हो जाए. अर्थात्‌ मैं 24 घंटे समाधि में रहूँ. इस इच्छा को लेकर वो जूनागढ़ पहुँचे. सारा दिन शहर में रहेमगर रात के वक्त वहाँ किसी पहाड़ी की गुफा में आकर रहे. जब रात को अन्तर्ध्यान हुए तो देखते हैं कि दो साधु उस पहाड़ के अन्दर समाधि लगाए बैठे हैं. उन्होंने उठ कर उन तक पहुँचने का रास्ता देखना चाहा. मगर कोई पता नहीं लगा. अखिरकार अपनी ध्यान शक्ति द्वारा उनको रास्ता मिल गया. गुफा को पत्थरों से बन्द किया हुआ था स्वामी जी महाराज ने जब वो पत्थर हटाए तो रास्ता मिल गया. अन्दर जाकर क्या देखते हैं कि एक दिव्य मूर्ति साधु समाधि अवस्था में बैठे हुए हैं. आसपास घास उगा हुआ है. स्वामी जी महाराज सामने बैठ गए. मगर उसकी समाधि बहुत देर तक न खुली. अन्त में स्वामी जी महाराज को अपने विचारख्याल उनके अन्तर में प्रवेश करने पड़े ताकि उनकी देह में स्फूर्ति आ जाए. जब वे हिले तो फिर उनकी आँखें नहीं खुलती थीं. पत्थर के पत्थर थे. फिर स्वामी जी महाराज ने अपने हाथों से उनकी आँखों की पलकें पीछे हटाकर आँखों की पुतलियाँ नंगी कीं. जब वो पूरी होश में आए तो सामने स्वामी जी महाराज बैठे हुए थे. साधु ने पूछा कि आप क्यों आए हैंउन्होंने कहा, महाराजकुछ पूछना चाहता हूँ. 24 घंटे की समाधि लगाना चाहता हूँ. तो उस साधु ने प्राणायाम की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ऐसे करते जाओ मंजिल तक पहुँच जाओगे. फिर उस साधु ने स्वामी जी से प्रश्न किए कि क्या दत्तात्रेय जी हैंउसने कहा -नहीं महाराज. दत्तात्रेय जी महाराज तो बहुत समय हो गया शरीर छोड़ गए. वो साधु दत्तात्रेय जी महाराज के वक्त का बैठा हुआ था. फिर साधु ने पूछा कि इस वक्त राज्य किस का हैस्वामी जी ने कहा कि कांग्रेस का राज्य है. साधु कहने लगा कि वो क्या होती हैस्वामी जी ने बताया कि इस समय भारत में लोकतंत्र प्रणाली चल रही है. हर पाँच साल के बाद चुनाव होते हैं. कई राजनीतिक दलों के उम्मीदवार संसद सदस्य बनने के लिए खड़े होते हैं. जिसको मत ज्यादा मिल जाएँ वो सदस्य बन जाता है. फिर वो सदस्य अपनी सरकार बना लेते हैं जिनकी संसद में ज्यादा गणना होती है. राजनीतिक दल वालों का चुनाव के समय बहुत संघर्ष होता है. एक दूसरे के विरुद्ध अपने-अपने विचार प्रकट करते हैं जो जनता को किसी न किसी प्रकार से वोट देने के लिए विवश करते हैं. यह सुन साधु महाराज जोश में आ गए और कहने लगे कि आप इस गुफा से चले जाओ और रास्ता पत्थरों से बन्द कर दो. हमें इस प्रकार के राज्य की हवा भी नहीं लगनी चाहिए. यह अस्पर्शता का यथार्थ भाव है. अब आप सोचेंगे कि जो साधु-महात्मा अपनी देह-मन की छूत अवस्था को छोड़ने के यत्न में हैंउन पर राजनीतिक दलों के एकदूसरे के विरुद्ध ख्यालात भी असर करते हैं. उनके लिए राजनीति वालों के ये विचार भी घातक हैं अथवा अछूत हैं जिनसे वो बचना चाहते हैं.

मेरे इस सत्संग को पढ़ करसंसार के प्राणी लफ़्ज़ों के जाल में न पड़ करसच्चाई को समझ कर अपने जीवन बना सकते हैं. सन्तों की वाणियों के दो-दो मतलब निकलते हैं. एक वो जो अपने अनुभव द्वारा अन्दर में जो उन्होंने समझा वो लिख दिया. बाकी दूसरे संसारी लोग जिन्होंने न कोई साधन कियान अपने अन्दर दाखिल हो सकेवे इन वाणियों का इस दुनिया के कारोबार के मुताबिक उन लफ़्ज़ों के अर्थ समझ लेते हैं. मिसाल के तौर पर सन्तों ने अछूत बनने का भाव इस अवस्था को लिया जब हम निर्विकल्प अवस्था से नीचे मन के विचारों में फँस जाते हैं.

मन और देह में आना ही अछूतपन धारण कर लेना हैइसीलिए हम देह और मन में रहने वाले छूत और अछूत हैं और दुनियादारों ने यह मतलब लिया कि अछूत वो हैं जो ऐसे इन्सानों के घर में पैदा हों जो वो सेवा कार्य करते हैं जो उनके विचारों के लिहाज़  से नीच काम हैं. मैंने जो कुछ लिखा है मेरे जीवन का अनुभव भी ठीक सिद्ध करता हैं. इस विषय में हुजूर दाता दयाल महर्षि शिवब्रतलाल जी का शब्द हैः-

तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना।

नीचे नीच की संगतनीच भाव में नीच की रंगत।

त्याग कुसंगत कर सत्संगतभव के दुख दुख क्यों सहना ।।

सीधा मारग जगत काउल्टा सन्त का पन्थ।

जो कोई उलटे मग चलेसो पावे निज कन्थ।

तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना ।।

नीचे माया नीचे कायानीचे झाईं नीचे छाया।

इस के भरम में जो कोई आयासो तो रहा यम बंध बंधाया।

भव के भरम में क्यों बहना ।

तुम उलट चलो हां उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना।।

ऊँचे गंग तरंग हैऊँचे जमुन का तीर।

ऊँचे सरस्वती धार हैसिंधु अथाह गम्भीर।

तुम उलट चलोहाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना ।।

नीचे कष्ट कलेश है भारीनीचे माया करे दुखारी।

करम भरम में पड़े संसारीसार न पावें माया धारी।

तीन ताप में क्यों दहना - तुम उलट चलो...।।

ऊँचे सूर्य प्रकाश हैऊँचे चन्द्र की जोत।

ऊँचे ज्ञान भंडार हैऊँचे सत का सोत।

तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहाना ।।

नीचे नीच क्रोध की घाटीनीचे तृष्णा मोह कुठाठी।

नीचे लोभ की जलती भाटीनीचे भरम की पड़ी है टाटी।

नीचे नीच का लहना - तुम उटल चलो...।।

ऊँचे पुरुष विराट हैंऊँचे हैं ओंकार।

ऊँचे शून्य का देश है, ऊँचे सोहं सार।

तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना ।।

नीचे इन्द्री भोग बिलासानीचे आसा नीचे वासा।

नीचे जो कोई करे निवासा सो तो रहे दिन रात निरासा।

नीची राह को क्यों चहना - तुम उलट चलो...।।

ऊँचे सतपद धाम हैऊँचे अगम अलेख।

ऊँचे राधास्वामी नाम हैऊँचे चढ़ कर देख।

तुम उलट चलो हाँ उलट चलो असमाननीचे क्यों रहना ।।

नीचे काल कर्म है व्यापानीचे भरम पाखंड का पापा।

नीचे माया मारे छापाभ्रांति ते नहीं सूझे आपा ।

नीच कथा को क्यों कहना - तुम उलट चलो...।।

 

दाता दयाल जी महाराज ने इस शब्द में तन-मन को छोड़ कर ऊपर चले जाने की कितनी महानता बताई है और कहा है कि तन-मन ही नीच हैइसमें रहना पतितपना है. इसलिए इस मलिन देह में आ जाने के कारण हम सब प्राणी अछूत बन जाते हैं.

 

अब सवाल पैदा होता है कि क्या देह-मन को छोड़ कर अगर कोई ऊपर चला जाए तो वो अछूत अवस्था से मुक्त हो सकता हैइस विषय में आप गुरु रविदास जी महाराज के अमृतवचन सुनें उनका शब्द हैः-

 

बेग़मपुरा शहर को नाऊँदुख अंदोह नहीं तिस ठाऊँ।

गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में लिखते हैं कि देह-मन की संगत छोड़ कर मेरी एक ऐसे देश में रहनी बन गई जो बेग़मपुरा है. उस बेग़म देश में कोई दुख अंदेशा नहीं हैअचिंत देश है.

 

ना तसवीस खिराज न मालखौफ़ न ख़ता न तरस जवाल।

 

वहाँ पर हमारे पास कोई माल नहीं होता जिस पर वहाँ जाने वाले को महसूल लग सके. जिसके पास कुछ भी न होउसको मसूल का क्या डर.  न वहाँ पाप-पुण्य हैन वहाँ डर है. न पतित होने का या गिरने का डर है. ये सब बातें उस वक्त तक रहती हैं जब तक इस शरीर और मन के कर्मक्षेत्र में हम कार्य करते हैं. किसी इच्छा को लेकर करते हैंकोई पूरी हो जाती हैकोई नहीं होती. दुख-सुख पैदा हो जाते हैं. उस बेग़मपुरे में ये बातें नहीं.

 

अब मोहि खूब वतनगाह पाईउहां खैर सदा मेरे भाई।

 

वो रहनी आश्चर्यजनक हैवहाँ सदा ही कुशल है.

 

हर आन हँसी हर आन खुशीहर वक्त अमीरी है बाबा।

जब आशिक मस्त फ़कीर हुआफिर क्या दिलगीरी है बाबा।

 

वतनगाह हमारी रहनी की अवस्था है जिसका गुरु रविदास जी वर्णन कर रहे हैं:-

कायम दायम सदा पातशाहीदोम न सोम एक सो आही ।

 

उस बेग़म वतनगाह में अर्थात्‌ उस रहनी की अवस्था में इन्सान बादशाह हो जाता है और वो अवस्था सदा के लिए मिल जाती हैफिर उससे आदमी गिरता नहीं. वहाँ पर उस रहनी में रहने वाले के लिए कोई ऊँच-नीच नहींकोई जाति-वर्ण-भेद नहीं. यह जो भेदभावनीच-ऊँचदोम-सोम का प्रश्न हैये मन के राज्य में है. ज्योंहि इस छूत को छोड़ कर उस रहनी में चला जाता हैअटल राज्य मिल जाता है.

अबादान सदा मशहूर। उहाँ ग़नी बसे मामूर।

वो देश हमेशा ही आबाद हैवो उजड़ता नहीं. वहाँ खुशियाँ हैं. वो सदा के लिए सब के लिए है. वहाँ के रहने वाले बड़े उदार चित्त और खुशहाल हैं. उनको किसी वस्तु की कमी नहीं रहती. अगर कोई इच्छा होती है तो प्रकृति उनकी इच्छा पूर्ण करती है.

 

                  त्यों सैल करहिं जिऊँ भावेमरहम महल न को अटकावे।

वो जहाँ और जिधर चाहे जा सकता है. उसको कोई जगह भी ऐसी नहीं मिलती जिस पर नो एडमिशन या अन्दर आने की इजाज़त नहीं लिखा हो. ये ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्र या किसी मज़हबर्म-पंथ के होंइस संसार में लोगों ने अपने-अपने दायरे बनाए हुए हैं. मन्दिरमस्जिद बनाए हुए हैं. एक-दूसरे की जगह आने की इजाज़त नहीं. खास तौर पर छूत और अछूत लोगों को इन जगहों पर जाने की रुकावट थी. मगर उस रहनी मेंउस बेग़मपुरे में यह बात नहीं.

 

कहे रविदास खलास चमारा, जो हम शहरी सो मीत हमारा।

 

अंत में गुरु रविदास जी महाराज लिखते हैं कि उस देश में जितने भी हम पर चमड़े चढ़े हुए होते हैं--देह का चमड़ामन का चमड़ाप्रकाश और शब्द का चमड़ाया जितनी भी चेतनाएँ हैं-- शारीरिकमानसिकआत्मिक आदि सब छूट जाते हैं. जिसकी ये सब प्रकार की चेतनाएँ या देह उतर जाती हैं वो खालिस चमार होता हैवास्तविक चमड़ा उतारने वाला. उसकी कोई चेतनता बाकी नहीं केवल आदि चैतन्यआदि शब्द से अनुभव प्राप्त करके जीवनमुक्त अवस्था में रहता है. जो भी उस रहनी में आ जाता है वो सबका मित्र हैयानी सब की एक प्रकार की रहनी बन जाती है.

इस विषय में हुजूर बाबा सावन सिंह जी महाराज (ब्यास वाले) की एक घटना सुनें. एक बार कोई अछूत जाति का एक भाई उनके सत्संग में गया और पीछे बैठे गया. उसके कपड़े मैले कुचैले थेरंगरूप भी साँवला था. उसके साथ एक बड़ी जाति का आदमी आ बैठा और उससे  घृणा करने लगा कि तू अछूत कहाँ यहाँ आ गया. वो बेचारा सुनता रहा. वो नीच जाति के होते हुए भी अभ्यास करता था और देह को छोड़ कर ऊपर त्रिकुटी में ठहर कर गुरु मूर्ति बना लेता था और वहाँ आनन्द लेता था. बाबा जी की दृष्टि उन दोनों पर पड़ीवो आए और अछूत से पूछा -क्या बात हैउसने उत्तर दिया--महाराजमेरे पास ये बैठे हुए सज्जन ऊँची जात के हैंमुझ से घृणा करते हैं. वह कहते हैं कि यहाँ क्यों बैठ गए. यह सुन कर बाबा जी ने फ़रमाया कि अछूत तुम नहीं होयह है. क्योंकि उस अछूत की आत्मा देह को छोड़ कर त्रिकुटी तक जाती थी और गुरु के ध्यान में मगन रहती थी और वो ऊँची जात वाला अभी देह में थाइस दृष्टिकोण से बाबा जी महाराज ने ऊँची जाति में जन्म लेने वाले को अछूत कह दिया क्योंकि वो अभी तन-मन में रहता हुआ वास्तविक अछूत अवस्था में था जैसा कि धनी धर्मदास ने कहा और दाता दयाल जी महाराज ने भी कहा. अब धनी धर्मदास का शब्द आगे सुनें:-

 

झरना झरे दसों दिस द्वारा। कैसे मैं आऊँ साहब निकट तुम्हारा।

 

धनी धर्मदास जी कहते हैं कि ऐ मालिकख्यालात और विचार मेरी कर्म और ज्ञानेन्द्रियों को हर समय जैसे चाहेंजिधर चाहें ले जाते हैं और हर समय झरना चलता रहता हैजो मुझ को तेरे निकट तक नहीं आने देता. संतों ने अपनी बानियों में अपना अनुभव ब्यान कियामगर समझेगा कौनअभ्यासी लोग जानते हैं कि सुरत को जीव गति में आते समय प्रकाश के झरने नज़र आते हैं. धनी धर्मदास ने ठीक लिखा. जब प्रकाश के झरने द्वारा प्रकाश रूपी आत्मा देह में आता है तो मन बन जाता हैविचार-भाव पैदा होने लग जाते हैं. मन के ख्यालों का नाम ही संसार है.

 

जो प्रभु देहु अमर की देही। तब हम हों साहिब नाम स्नेही ।।

 

आगे फरमाते हैं कि अगर आप हमें अपना रूप दिखा देंहमें अपने रूप का ज्ञान करा देंतो हम सच्चे मानों में नामधारी बन सकते हैं. सत्गुरु क्या करता हैमलीन देह को तोड़ने के लिए या अछूत अवस्था को छोड़ कर शुद्ध अवस्था में जाने के लिए अगर की देही देता है. तो वो अगर की देही जैसे गंदे पानी में फिटकरी डाल दें तो पानी शुद्ध हो जाता हैइसी तरह हमारी सुरतआत्मा अछूत की संगत छोड़ कर शुद्ध धाम जो हमारा अपना ही रूप हैमें चली जाती है. तब हम सच्चे नामधारी बन कर अपने रूप में ठहर सकते हैं.

 

मलिया गिरी पर बसे भुअंगा। विष अमृत रहे एक ही संगा ।।

 

मलय गिरी पहाड़ में सन्दल के पेड़ होते हैं. चारों तरफ खुशबू होती हैमगर वहाँ जो साँप रहता हैउस साँप में विष होता है. इसी तरह इन्सान देह और मन को रखता हुआ भी उसमें शुब्द चेतना और तन-मन की मलीनता रहती है चाहे देह कितनी ही सुन्दर और स्वच्छ हो. अछूतेपन में भी शुद्धता साथ रहती है.

तिनका तोड़ देहू परवाना। तब हम पाए साहब पद निरवाना ।।

 

धनी धर्मदास जी फरमाते हैं कि ऐ मालिकआपने दया करके थोड़ा सच्चे ज्ञान का परवाना बक्श दिया. तब हम छूत देही को छोड़ कर अर्थात्‌ इससे तिनका तोड़ कर निर्वाण अवस्था कोजहाँ अछूत नहीं होतापा लेते हैं यानी तन-मन को हम छोड़ जाते हैशुद्ध हो जाते हैं.

दुनिया के लोगबड़े-बड़े धार्मिक नेताओं ने जब अछूत उद्धार का काम शुरू किया तो अछूतों को शुद्ध किया जाता था. यह बाहर की दुनिया का काम था. आर्य समाज ने यह काम पहले शुरू किया तो बाद में सनातन धर्म और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे महापुरुषों ने भी शुद्धि का काम किया. यह बाहर की शुद्धि है. असली शुद्धि सत्गुरु द्वारा होती हैजो हमें नाम का परवाना देता है तो फिर हम सही मानों में शुद्ध हो जाते हैं. अछूतेपन को छोड़ जाते हैं. सिवाए इस सत्गुरु की दया के हम इस संसार अर्थात्‌ मन के भावों-विचारों में फँसे हुए हैंनिर्वाण पद मिलना मुश्किल है.

 

धनी धर्मदास कबीर बल गाजे। गुरु प्रताप आरती साजे ।।

 

इस कड़ी का भी यही भाव है कि धनी धर्मदास सत्गुरु का बल पाकर आरती गाने के काबिल हुएजब कि उनकी सुरत देहमन और आत्मा से निकल कर ऊपर शब्द में चली गई. सुरत का ऊपर जा कर शब्द सुनना ही गाजना है. फिर जाकर सत्गुरु की आरती पूरी होती हैजो कि सत्गुरु की दया और मेहर थी. मेरा इस सत्संग से यह भाव है कि छुआछूत का रिवाज अज्ञानता से शुरू हुआ. असलीयत को न जानते हुए आम लोग बजाए मन के बुरे भावों-विचारों से दूर रहते जो कि असली अछूत अवस्था हैउन्होंने अपने समाज के अपने जैसे जीवों को जो मालिक की ही सन्तान हैं जौर सबकी सेवा करते हैंअछूत समझ लिया और आज संसार में क्या दशा है.

 

6. छुआछूत (अस्पर्शता) वैज्ञानिक दृष्टिकोण सेः-

 

अछूत कहते हैं जो अस्पृश्य है. स्पर्श वायु का गुण हैइसलिए अछूत वो है जिसकी बुरी हवा नहीं लगनी चाहिए. किसी चीज के स्पर्श से हम उस चीज के गुण को ग्रहण करते हैं या अनुभव करते हैं और उसका प्रभाव स्पर्श द्वारा हमारे चित्त पर पड़ता हैजो कि संस्कार बन जाते हैं और वो संस्कार मनुष्य के जीवन में तब्दीलीअच्छी या बुरी लाते हैं. किसी व्यक्ति की हालत जो इन संस्कारों से बनती हैदूसरे के हाथ या किसी अंग से छू जाने पर दूसरे के जीवन पर प्रभाव डालती है.

बुरा प्रभावः-

 

इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण यह है कि जब हजूर परम दयाल जी महाराज फिरोज़पुर में काम करते थे तो एक व्यक्ति आया और कहा कि हमारे एक बच्चा पैदा हुआ है जो बहुत रोता हैकई दिन हो गए चुप नहीं करता. उन्होंने कहा कि डाक्टर को दिखाया थाउस व्यक्ति ने कहा कि डाक्टर तो कहते हैं कि उसको कोई बीमारी नहीं. फिर महाराज जी ने पूछा कि इसको पहले किस ने छुआ हैउन्होंने कहा कि दाई ने. दाई को बुलाया गयाजिसने बताया कि उसके एक सगे सम्बन्धी की मृत्यु हो गई थी और वो बड़ी दुखी थी. महाराज जी ने कहाबस ठीक है. जब इसने बच्चे को स्पर्श किया या छुआ तो जो इसके चित्त के अन्तर शोक के संस्कार थेवे इस बच्चे में गए और इसको वही रुला रहे हैं. उन्होंने फूलों का प्रसाद बना दिया जिसमें बच्चे के कल्याण के लिए स्पर्श द्वारा अपनी शुभ कामना बरती और कहा कि बच्चे को फूलों में रख दो और बच्चे का रोना बन्द हो गया. यह अछूतेपन का असली भाव है. अब एक व्यक्ति सफाई का काम करता है या जूते बनाता है अगर उसके चित्त पर कोई शोक या संताप के संस्कार नहीं तो उसको अछूत कहना अज्ञानता है. इसीलिए गुरु नानक देव जी महाराज ने चित्त पर बैठे संस्कारोंजो हमारे मनचित्तबुद्धिअहंकार पर प्रभावित होते हैंउनको नीच जात कहा हैः-

 

कुबुद्धि डूमणीकुदया कसाईनपरनिन्दा घट चुहड़ीमुठी क्रोध चंडाल। कारी काढि क्या थिएजां चारे बैठियां नाल।।

कारी काढि का अर्थ है कि बाहरी रूप में अपने आपको शुद्ध बनाना या चौके में आटे के साथ लकीरें बनाना ताकि चौका शुद्ध हो जाए.

कई ऐसे शारीरिक रोग हैं जो मरीज को छूने से या सांस द्वारा या उसकी कोई जूठी वस्तुजलअन्न वगैरा खाने सेदूसरा व्यक्ति भी रोगी हो जाता है. 

व्यक्ति के अन्दर जो स्पर्श शक्ति है उसमें रचना करने के सभी गुण मौजूद हैं. स्पर्श वायु का गुण है. इसी तरह गंध पृथ्वी कारस जल कारूप अग्नि का और शब्द आकाश का गुण है. इसमें अलग-अलग तत्त्वों में अर्थात्‌ प्रत्येक गुण में पाँचों तत्त्वों की रचनात्मक शक्ति है. हमारे जीवन पर केवल स्पर्श से ही दूसरे गुण नहीं आते बल्कि सभी तत्त्वों के गुण हम ग्रहण करते रहते हैंपृथ्वी के गुण सूंघने सेजल के गुण जिह्‌वा सेवायु के गुण छूने सेअग्नि के गुण दृष्टि से और आकाश के गुण शब्द द्वारा यानि उसका नाम लेने से. जिस तरह नींबू का नाम लेने से हमारी जिह्‌वा में खट्‌टापन आ जाता है. इसमें किसी विशेष व्यक्ति या जाति वर्ण का कोई प्रश्न नहीं.

आजकल अन्न के बीजों मेंपशुपक्षियों की नस्लों मेंफलदार दरख्तों में या फलों में सुधार लाया जा रहा है उनको प्योंद (पैबंदी) लगाई जा रही है. जो सत्पुरुष इस भेद को जानते हैं वो अपने ख्यालातज्ञान का दूसरे के अन्तर स्पर्श द्वारा संचार कर सकते हैं. ये सब चीजें सिद्ध करती हैं कि अस्पर्शता किसी जाति और वर्ण पर ठोंसना एक अज्ञान मात्र है.

अगर किसी व्यक्ति में किसी एक गुण की कमी हो तो वह दूसरे अंगों से अपना काम चला सकता है. जैसे एक अंधा व्यक्ति अपनी स्पर्श शक्ति से या दूसरी शक्तियों से अपना जीवन यापन कर सकता है.

आजकल का विज्ञान इस स्पर्श शक्ति से बड़े-बड़े आविष्कार कर रहा है. स्पर्श जो कि वायु का गुण है उस तक तो अभी विज्ञान नहीं पहुँचामगर वायु तत्त्व के द्वारा बहुत कुछ बना रहे हैं. क्योंकि उनका भौतिक विज्ञान है इसलिए वो वायु का प्रयोग मनुष्य जाति को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं. ये जितने एटम बम आदि बन रहे हैंइनमें सब वायु तत्त्व का ही चमत्कार है. वैसे भी जब वायु तीव्र गति से चलती है तो हमारे घरों कोखेतों में धान आदि को हानि पहुँचाती है. आँधी में कई व्यक्तियों की मृत्यु भी हो जाती है. मगर जब वैज्ञानिक ढंग से इसकी गति को और भी तीव्र कर देते हैं तो नाना प्राणियों के प्राण खत्म कर देते हैं. एटम में इलैक्ट्रॉन के ज़रिये गरमी पैदा कर के हवा के लिए ख़ला पैदा किया जाता है और इस ख़ला को भरने के लिए हवा अधिक तीव्र गति से भरती है. उस समय धमाका होता है और उस वायु मंडल में प्राणियों का जीवन नहीं रह सकता है. यह तो बुरा प्रभाव हैअब अच्छा प्रभाव लें.

 

अच्छा प्रभावः-

 

वायु वर्षा लाती हैजिससे अन्न पैदा होता है और जीव खाते हैं. गर्मियों में ठंडी हवा सुख और आनन्द देती है. पुराने ज़माने के किसान वायु की नाना गतियों को अच्छी तरह समझते थे. कभी ऐसी वायु भी चलती है जो अन्न बोने में बड़ी सहायक सिद्ध होती है. हम वायु द्वारा ही सांस लेते हुए जीवित हैं. जब वायु में इतनी शक्ति है तो इसके गुण में जिसे स्पर्श कहते हैजो अति सूक्ष्म हैउसमें कितनी शक्ति होगी. हिन्दू समाज में तत्त्व ज्ञानी हुए हैं जो स्पर्श के महत्व को जानते थे और उन्होंने समाज के भले के लिए ताकि वो लोग स्पर्श शक्ति के बुरे प्रभावों को छोड़ कर अच्छे प्रभाव ग्रहण कर सकेंइस स्पर्श के गुण और अवगुण दोनों संसार के प्राणियों के सामने रखे. जो समझ गए अपना जीवन बना गए. जो न समझे उन्होंने अज्ञानवश यह अस्पर्शता किसी विशेष जाति वर्ण और संप्रदाय के लोगों पर ठोंस दी. अब आवश्यकता है कि इस अस्पर्शता के अज्ञान को भूल कर स्पर्श शक्ति के नियमों को जानते हुए अपने और सारे समाज के जीवन को सुखी बनाएँ.

क्या यह सन्तमत में घृणा या प्रतिक्रिया है?

क्या सन्तमत में और अन्य साधु-महात्माओं के मतों में बुरे विचार वालों या बुरी रेडिएशन से बचने के लिए सर्वसाधारण को अपने चरणों पर माथा टेकने से मना करते हैं या दूसरे के छू जाने से सन्तों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है तो यह उनका दूर रहने का काम घृणासूचक होता हैया माथा टेकने वालों को वो बुरा समझते हैंक्या उनके मन में लोगों के विरुद्ध बुरी भावनाओं की प्रतिक्रिया पैदा होती हैइसका उत्तर है कि नहीं. वो सबके साथ प्रेम भाव रखते हैं. जो जिस भाव से उनके पास आता हैउसके प्रेम का जवाब प्रेम से देते हैं. अपने स्वार्थ के लिए अर्थात्‌ अपनी मानप्रतिष्ठा या धन लेने के लिए स्वार्थ पूर्ण प्रेम नहीं रखते. इस वास्ते वो बुरी रेडिएशन या विचारों के प्रभाव से बचे रहते हैं.

मन और आत्मा को निर्मल बनाने और रखने के लिए क्या वैराग की जरूरत होती है?

यह त्याग और वैराग घृणा नहीं है बल्कि सच्ची समझ से काम लिया जाता है. मेरे मित्र योगीराज स्वामी रामेश्वर गिरि बहुत ऊँचे अभ्यासी थे. उनके पास खाना बनाने के लिए दो सज्जन आते थे. एक ब्राह्मण और एक बनिया था. जब वो खाना बना लेते थे तो स्वामी जी उनको कहते कि भाई तुम पहले खा लो. जब वो दोनों खाना खाकर चले जाते तो स्वामी जी महाराज फिर खाना खाते. मैंने एक दिन पूछा कि महाराज आप पहले खाना क्यों नहीं खाते. उन्होंने फरमाया कि इनका ख्याल भोजन में रहता हैअगर मैं पहले खा लूँ तो वो ख्याल मुझ पर असर करते हैं. तन-मन छोड  कर प्रकाश और शब्द में चले जाने वालों की वृत्तियाँ बहुत सूक्ष्म हो जाती हैं. दूसरों की वृत्तियाँ जो अभी तन-मन में हैंउन पर छूतपने के प्रभाव डालती हैं.

अब दूसरी घटना हुजूर परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज की है जिन्होंने मेरे साथ सत्गुरु का काम किया. एक बार वो अपने एक प्रेमी के पास ऊना गए. उसने उनकी बहुत सेवा की. खाना भी खिलायामन्दिर के लिए दान भी दिया. यह सब कुछ उसने इसलिए किया कि उसका जमीन का मुकद्‌दमा था. वो परम दयाल जी महाराज का ध्यान करके अदालत में हाजिर हुआ. वह क्या देखता है कि मजिस्ट्रेटवकील और गवाह फकीर चन्द जी महाराज के रूप में नज़र आते हैं और मुकद्‌दमे का फैसला उसके हक़ में हो गया. यह बात उस प्रेमी सज्जन ने ऊना पहुँचने पर बताई और बड़ी अहसानमन्दी से चरणों में मत्थे भी टेके. जब रात को होशियारपुर आएसाधन-अभ्यास में बैठे तो सुरत देहमन को छोड़ कर ऊपर नहीं जाती थी. वृत्ति देह-मन में ही फँसी रहती थी. महाराज जी ने अपने आदमी को बुलाया और कहा कि अभी मेरी तरफ से मन्दिर को दस रुपये दे आताकि भोजन खाने व माथा टिकाने की कीमत मन्दिर को दान कर देने से वे प्रभाव खत्म हो जाएँक्योंकि मन्दिर का पैसा दीन दुखियों की सेवा के लिए खर्च होता था. जब वो ऐसा करके अभ्यास में बैठे तो वृत्तियों का शीघ्र निरोध हो गया. देह-मन को छोड़ कर शब्द-प्रकाश की अवस्था में चले गये. इसलिए सिद्ध हो गया कि सन्तों-महात्माओं के मन में किसी के विरुद्ध घृणा या हिंसात्मक विचार नहीं होते. केवल अपनी आत्मा के उद्धार के लिए वो ऐसा करते हैं. किसी दूसरे का अकाज भी नहीं करते और अपना काज बना लेते हैं. सर्वसाधारण इन बातों का उलटा अर्थ लगा लेते हैं. किसी जाति विशेष को नीचछूत या अछूत समझ कर घृणा करते रहते हैं और समाज का वातावरण दूषित होता रहता है.

 

फिर आम जनता क्या करेः-

सबसे पहले सन्तों ने एक नियम बनाया कि आम लोगों को चाहिए कि सन्त-महात्मा जो कहते हैंवो करें. जो वो काम करते हैं उसकी नकल न करें. यह छूतछात उनके काम को देखने से अज्ञानवश बन गई है. ये लोगों को माथा नहीं टेकने देतेघृणा करते हैं. इस नासमझी से जाति वर्ण को नीच समझ कर छुआछूत करने लग गए.

मुझे श्री जगदीश मुनि का दैनिक ट्रिब्यून में लेख पढ़ कर ख्याल आया कि हिन्दुओं में वैदिकरामायण और  महाभारत काल में छुआछूत नहीं थी. मैंनेअपनी समझ में जो आयाब्यान करने की कोशिश की कि छुआछूत अज्ञान से पैदा हुई और यह वास्तव में किसी समय भी नहीं थी. वास्तव में सभी मानव जब तक देह-मन में हैं अछूत हैं या छूत. श्री जगदीश मुनि जी महाराज ने केवल हिन्दुओं का नाम लिया है मगर भारतीय समाज में और भी धर्म-सम्प्रदाय हैंमुसलमानईसाई आदि. यदि हिन्दू कोशिश करके हिन्दुओं में यह सदियों से आई छूत-छात को हटा सकेंलोगों के दिलों से निकाल सकें तो बड़ी अच्छी बात है. मगर सौ फीसदी यह समस्या समूचे भारत को दृष्टि में रखते हुए फिर भी हल नहीं होती.

हुजूर परम दयाल जी महाराज 1947 में भारत के विभाजन के समय जो घटनाएँ हुईउसके प्रभाव से दुखी हुए और सोचने लगे कि कोई ऐसी व्यवस्था भी है जिसमें सभी भारतवासी या संसार के प्राणी सुखी रह सकें. इस संकल्प को लेकर वो समाधि अवस्था में गएजहाँ से आवाज आई इन्सान बनो और इसी दिशा में वो सारी आयु काम कर गए. मानवता मन्दिर भी बनवाया. मानवता का प्रचार करने के लिए वृद्धावस्था में भी बाहर घूमते रहे. विदेशों में भी गए. कई जगहों पर इस काम के लिए संस्थाएँ खोल गए जो अब मानवता का काम कर रही हैं.

जब तक हम सब अपने पुराने धर्म-संप्रदाय और नामरूप को रखते हुए एक मानव जाति होने की दृष्टि से इकट्‌ठे नहीं हो जातेसंसार के लोगों पर दुख और मुसीबतें आएँगी. क्योंकि पुराने नाम सीमित हो गए हैंहमारे दिलों को विशाल नहीं होने देते. इसलिए मानवता के नाते सभी धार्मिक नेता एक प्लेट फार्म पर आएँ और मानवता के नियम बताएँ जो कि प्राकृतिक हैं. और समय-समय पर अवतारपैग़म्बरपीरफ़कीरसाधुसन्त आकर जो शिक्षा दे गएउसके आधार पर समाज को जीवन गुजारने के लिए प्रेरणा दी जाएतब जाकर भारत में शान्ति का राज्य हो सकता है. अगर सभी धर्म वाले अपनी गदि्‌दयाँ अलग-अलग बनाते रहेएक दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलाते रहेतो न राष्ट्रीय रूप में और न सामाजिक रूप में हम सुखी रह सकते हैं.

परम दयाल फकीरचन्द जी महाराज ने अपने जीवनकाल में क्रियात्मक रूप से संसार के लोगों को मानवता के असूलों पर चलने और भेदभाव को मिटाने के लिए आदर्श पैदा किये जिनमें से कुछ नीचे जाते हैः-

1. उनके सत्संग में सभी वर्गों के लोग आया करते थे और सब इकट्‌ठे बैठकर उनके वचन सुनते थे. खानपान इकट्‌ठा होता था. ख्यालभावविचार एक हो जाते थे. आपस में प्रेम बढ़ता था. हिन्दूमुसलमानसिखईसाई या और उपजातियों के सभी लोग उनसे सत्संग में एकपने का भाव अपने अन्तर ग्रहण करके जाते थे और हर प्रकार के भेदभाव समाप्त हो जाते थे. क्योंकि मानवता के नाते हम सब प्राणी इकट्‌ठे बैठते हैं तो कुदरती तौर पर मन में एकता की लहर दौड़ती है और सबकी विचारधारा में अनुकूलता आ जाने के कारण शान्त वातावरण बन जाता है. इसलिए मानव बन कर मानव समाज में मानवता के नियमों पर चल कर हम सब मानव हैंजो एक मालिक की सन्तान हैंचार दिन की जिन्दगी सुख से गुजार सकें.

2. वो अपने सत्संगों में फरमाया करते थे कि काश! मैं हरिजन होता. इससे उनका भाव सभी भेदभाव मिटाना था. दूसरेपरमार्थ में दीनता की बहुत आवश्यकता है. यह दीनता का भाव परमार्थ में अति आवश्यक है. जिनमें दीनता नहीं होती उन्हें दीनता का भाव लाने के लिए साधनाएँ करनी पड़ती हैं.

 

भला हुआ नीच भयेसबको करें सलाम,

यदि ऊँच घर जनमतेडूब मरते अभिमान।

 

3. जब वो नौकरी से अवकाश प्राप्त करके घर होशियारपुर आए तो काम कोई नहीं था. घर का गुजारा चलना कठिन हो रहा थातो उन्होंने एक दफा अपनी धर्मपत्नीहमारी माता जी को कहा कि मैं तीस-चालीस घरों की सफाई का काम कर लिया करूँगागुजारा चल जाया करेगा. माता जी नाराज हुईं और ऐसा करने की इजाज़त नहीं दी. समाज में कोई काम भी निन्दनीय नहीं है. अगर सेवाभाव से सभी काम करें तो सब व्यक्तियों को समाज में शान्ति का जीवन व्यतीत करने का अवसर मिल जाता है.

4. एक बार जब वो गिदड़वाहा रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे तो उनको कुछ आदमी मलोट के पास अपने डेरे में ले गए. एक आदमी और भी इनके साथ था. वो ले जाने वाले लोग जाति के भेड़ कुट (शूद्र) थे. उन्होंने महाराज जी और उनके साथी को भोजन खिलाना चाहा. इनके साथी ने तो खाया नहींमगर महाराज जी ने बड़ी खुशी से भोजन किया और उनके प्रेम को नहीं ठुकराया. वे भेड़ कुट सत्संगी थे और कहीं से नाम लिया हुआ था. एक आदमी ने प्रश्न किया कि महाराज जब मैं अभ्यास करता हूँ तो हरे रंग का प्रकाश आता है. महाराज जी बहुत हैरान हुए. उन्होंने कहाभाई कोई सुमिरन करते होतो वो कहने लगा जी हाँ करता हूँ. महाराज जी कहा कि मंत्र सुनाओ. उसने मंत्र सुनाया. उसमें तीन चार बार हरे का शब्द आता था. जैसे हम हिन्दू लोग हरे रामहरे रामराम रामहरे हरेः हरे कृष्णहरे कृष्ण कृष्ण कृष्णहरे हरे जपते हैं. इसी तरह उस मंत्र में हरे हरे आता था. जब भी वो आदमी देह को छोड़ कर आसमान पर जाता थातो हरे रंग का प्रकाश आता था.

 

जा की रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।।

 

उन्होंने कहा कि तू अनपढ़ हैन गुरु महाराज ने हरे का मतलब बताया. तुमने हरे को हरा रंग समझ लिया. इसलिए तेरी अपनी ही नासमझीअज्ञानता के कारण प्रकाश का रंग हरा होता है. इसी प्रकार छुआछूत का भी लोगों ने गलत संस्कार ले लिया.

5. जब उन्होंने हुजूर दाता दयाल महर्षि शिवव्रत लाल जी महाराज को गुरु माना तो उनकी अपनी ब्राह्मण बिरादरी वालों ने एतराज किया. ब्राह्मण होते हुए एक कायस्थ जाति के व्यक्ति को क्यों गुरु मानाइनका विरोध कियामगर ये उनको देह रूप नहीं मानते थेबल्कि राम का अवतार मानते थे. परमार्थ में जातपात का कोई प्रश्न नहीं. आत्मज्ञान कहीं से भी मिल जाएअच्छा है.

6. वो कहा करते थे कि शूद्र वो नहीं जो वर्ण आश्रम धर्म के मुताबिक सेवा का काम करने वाले हों या शूद्र के घर पैदा हुए होंबल्कि शूद्र वो है जो गन्दे विचार रखता है.

7. अन्त में अपना चोला छोड़ने से पहले मानवता मन्दिर में काम करने वाले दो आदमियों को आज्ञा दी जिसमें एक ब्राह्मण और एक शूद्र जाति का हैताकि संसार के लोगों को पता लगे कि जातिवर्ण को छोड़ कर केवल मानव बनें. उन्होंने अपनी जगह काम करने वालों को मानवता के चोले पहनाए. यह काम करने का क्रियात्मक रूप है. इससे पहले आज तक गुरु परंपरा के अनुसार जब गुरु अपनी जगह काम करने के लिए किसी को नियुक्त करते थे तो नारियलपगड़ीपाँच रुपये देकर तिलक लगाया करते थे. मगर यह उन्होंने शिक्षा को बदलने के हेतु नई चीज पैदा की. इन्सान बनो के चोगे पहनाए.

8. उन्होंने एक 'गरुड़ पुराण रहस्य नामी पुस्तक लिखीजिसमें उन्होंने लिखा है कि छुआछूतजातिवर्ण भेद या भेदभाव केवल अज्ञान है. वो इस पुस्तक के पृष्ठ 36 पर लिखते हैं:-

प्रश्नः- सत्गुरुपूर्ण पुरुष या वीतराग पुरुष किस जाति का होना चाहिए?

उत्तरः-गरुड़ पुराण में लिखा है कि यह गरुड़ पुराण सूत जी ने ऋषियों को सुनाया था और विष्णु भगवान ने गरुड़ से कहा था. होगामगर सूत जी कौन थेयह स्वयं इतिहास से समझ लो. यह जातिपांति का सवाल नहीं है. सब मनुष्य एक हैं. जो शब्द और प्रकाश का रूप हो गया और यदि वह सत्संग का सिलसिला चालू करता हैतो वह भी पूर्ण पुरुषवीतराग पुरुष हो सकता है.

 

प्रश्नः यह ठीक है कि सूत जी उच्च जाति या कुल के नहीं थेमगर वाणी तो विष्णु भगवान ने गरुड़ को कही थी?

उत्तरः उसका लिखने वाला कोई महान पुरुष है. सम्भव है कि वेद व्यास जी होंजिन्होंने विष्णु भगवान का नाम रख कर वाणी कही होक्योंकि गरुड़ पुराण में अजामिल आदि का उल्लेख आता है. इससे सिद्ध हुआ कि यह किसी सन्त का लिखा हुआ है. विष्णु और गरुड़ का एक नाम है. पुराण अलंकार और कथा के रूप में असलियत और सतपद के प्राकट्‌य के रूप हैं. जिस समय ये लिखे गए होंगे उस समय ऐसी ही वर्णन शैली होगी. दाता दयाल ने पुराणों की बड़ी प्रशंसा की है और साथ ही सोसाइटी को कायम रखने का ख्याल रहा होगा ताकि सामान्य जनता एक ज़ंजीर में रहे और सामाजिक प्रबन्ध न बिगड़े.

9. इसी पुस्तक के पृष्ठ 34 पर वो लिखते हैं:-

 

उत्तरः सनातन कहते हैं कि सबसे पुराने या आदि को. हम सब के सब मनुष्य ही हैं और हम सब का मार्ग एक ही हैमगर श्रेणियाँ हैं. मैंने इसलिए शब्द मानवता का प्रयोग किया है. हिन्दूमुसलमानसिखईसाई सब के सब मनुष्य हैं. हम सब का मार्ग प्राकृतिक है. हम अपने अज्ञान और भ्रमवश भेदभाव बना बैठे हैं.

इसलिए सिद्ध हुआ कि यह छुआछूतजाति-वर्णवाद जितने हैंइस सब का मूल कारण अज्ञान है. सन्तों महात्माओं के असली भाव को न समझ कर यह आपस में भेदभाव जारी हुआ.

मैंने जो कुछ अपनी समझ के मुताबिक लिखाइसकी पुष्टि में प्रमाण भी दे दिये. मगर कोई दावा नहीं कि जो कुछ मैंने समझा है यही ठीक है. छुआछूत का मूल कारण अज्ञान है. वर्तमान युग मशीन या कला का युग है. इसमें जो सेवाएँ भिन्न-भिन्न जाति वर्ण के लोग करते थे या वर्णाश्रम धर्म हिन्दू समाज द्वारा बनाए जाने के समय जो काम बाँटे गए थे वो अब मशीन के या कला के युग में मशीनों द्वारा किये जा रहे हैं. दूसरे हर एक काम अब बड़े उद्योगों में बदल गया है. जैसे पहले जुलाहा जाति के लोग कपड़ा बुनते थे और यह काम केवल जुलाहे ही करते थे. अब कपड़ा मिलें बन गई हैं और कपड़ा बनाने का काम सभी जाति वर्ग वाले करते हैं. इसी प्रकार और काम भी समझ लें. इसलिए अब जरूरत है कि हिन्दू समाज के नेता इकट्‌ठे होकर पुरानी प्रणाली में परिवर्तन लाएँ और वो व्यवस्था बनाएँ जो वर्णाश्रम हिन्दू समाज के धार्मिक नेतासाधुसन्त-महात्मा और संस्थाएँ जो मानव कल्याण का प्रचार करती हैंवो इस काम को हाथ में लें. वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए हाथ जोड़ कर निवेदन कर दिया.

 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्‌ दुख भाग्भवेत्‌ ।।

 

हे मालिक सबका भला होसभी हर प्रकार से सुखीआपस में प्रेममेल जोल रखेंसबको अच्छाभद्रनेक देखेंकिसी के भी हिस्से में दुख न आएकिसी को दुख का लेशमात्र न हो.

 

दाया राख धर्म को पालेजग से रहे उदासी।

अपना सा जिव सबका जानेताहि मिलै अबिनाशी।।

सहै कुसबद वाद को त्यागैछाड़ै गर्व गुमाना।

सत्तनाम ताही को मिलि हैकहैं कबीर सुजाना ।।

                                                -कबीर

 

साधो एक रूप सब माहीं।

अपने मनहिं बिचार के देखोऔर दूसरो नाहीं ।।

एकै तुचा रूधिर पुनि एकैविप्र सूद्र के माहीं।

कहीं नारि कहिं नर होई बोलैंगैब पुरुष वह आहीं ।।

आपै गुरू होय मंत्र देत हैंसिष होय सबै सुनाहीं।

जो जस गहै लहै तस मारगतिन के सतगुरू आहीं ।।

शब्द पुकार सत्त मैं भाषौंअंतर राखौं नाहीं।

कहैं कबीर ज्ञान जेहि निर्मलबिरले ताहि लखाहीं ।।

                                                          -कबीर

 

छुआछूत कहाँ से आईसोचें पुरुष सुजान।

समझे का मत एक हैभेदभाव अज्ञान ।।

 

सबका आदि अंत अविनाशीशक्ति कहाँ जो करे ब्यान।

हम सब प्राणी अंश रूप हैंभेदभाव अज्ञान ।।

 

आत्मरूप धरे सब मानवजो रचना की जान।

आत्मवत सर्व भूतेषुभेदभाव अज्ञान ।।

 

वही आत्मा मन बनीविचार भाव की खान।

अपना रूप न भूलो भाईभेदभाव अज्ञान ।।

 

एक ही माता एक पिताभूमि भानू सन्तान।

पाँच तत्त्व के चोले पहनेभेदभाव अज्ञान ।।

 

एक ही राष्ट्र के सब मानवभारत देश महान्‌।

भारतीय होने के नातेभेदभाव अज्ञान ।।

 

हिन्दु हैं हम एक हैंरंगरूप इन्सान।

नीच ऊँच जाति वर्णभेदभाव अज्ञान ।।

 

सीधी राह धर्म की केवलइन्सान की सेवा करे इन्सान।

फ़कीर निमाने अर्ज़ गुजारीभेदभाव अज्ञान ।।

 

Comments