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This site is created in memory of a Sant Satguru who lead the entire life on the path of peace.

In his youth, one Baba Sat Kartar had given him a suggestion of going out of circle of life and death which assumed its form in 1963 when he came into contact with Baba Faqir Chand.

Pram Dayalji (Baba Faqir Chandji), in his discourses, had often said, “Living (रहनी) of Munshi Ram is thousand times better than my living”. Finally after 18 years of continuous companionship, Param Dayalji, through his will designated Bhagat Munshiramji to work as Satguru in his place.  It was a specified work specifically mentioned in the last will. 

Bhagatji continued to work in Chandigarh for the mission of Param Dayalji and the same is reflected in his literature. Many people from Hoshiarpur, with understanding of what Faqir had taught and having respect for the words of Param Dayalji, continued to visit Bhagatji for discourses (Satsang). It commands a mention here that Param Dayalji had told his followers to take instructions from Bhagatji and do inner practices in the company of Bhagatji during his absence from the temple.

This site contains almost entire literature of Bhagat Munshi Ram and some information about his life. His work is confirmation of the life experience of Param Dayalji and at same time it preserves its originality and consciousness. I believe that researchers working on Radhasoami, Santmat and Religion of Humanity will take advantage of this in future.

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यह साइट एक संत सत्गुरु की स्मृति में बनाई गई है जिसका जीवन शांति के मार्ग पर चला.

उनकी युवावस्था में एक बाबा सत करतार ने उन्हें जीवन-मरण से निकलने का संस्कार दिया था जो 1963 में बाबा फकीर चंद के संपर्क में आने के बाद अपना स्वरूप ग्रहण कर गया.

परम दयाल (फकीर चंद जी महाराज) ने अपने सत्संगों कई बार कहा है कि मुंशीराम की रहनी मेरी रहनी से हज़ार दर्जे बेहतर है’. अंततः 18 वर्ष की संगति के बाद परम दयाल जी ने अपनी वसीयत के ज़रिए भगत मुंशीराम जी को अपनी जगह सत्गुरु का कार्य करने के लिए मनोनीत किया. यह एक विनिर्दिष्ट कार्य था जिसका विशेष उल्लेख वसीयतनामे में किया गया था.

भगत जी ने चंडीगढ़ में रह कर परम दयाल जी के मिशन का कार्य जारी रखा जो उसके साहित्य में कूट-कूट कर भरा है. परम दयाल जी के शब्दों को समझने और सम्मान देने वाले सज्जन भगत जी की संगत करने के लिए होशियारपुर से चंडीगढ़ में आते रहे. उल्लेखनीय है कि परम दयाल जी ने सत्संगियों को कहा हुआ था कि उनकी अनुपस्थिति में वे मुंशीराम जी से हिदायत ले सकते हैं और उनके साथ बैठ कर अभ्यास कर सकते हैं.

इस साइट पर भगत जी का लगभग समस्त साहित्य और कुछ जीवन के बारे में जानकारी दे दी गई हैं. उनका कार्य परम दयाल जी के जीवन अनुभव का पुष्टिकरण है और अपनी मौलिकता और चैतन्यता बरकरार रखता है. मुझे विश्वास है कि राधास्वामी मत, संतमत और मानव-धर्म पर कार्य करने वाले शोधार्थी भविष्य में इससे लाभ उठाएँगे.

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