यादे-ग़ालिब

सबसे ऊँचे दर्जे की कविता या शायरी वह है जो मंत्र बन जाय, आयत बन जाय।


जैसा कि श्री अरविन्द ने द फ्यूचर ऑफ पोयट्री में लिखा है, ऐसी शायरी बिरले ही देखने को मिलती है। उन्हें उस दर्जे की झलक मेरेडिथ, रवींद्र नाथ, यीट्स, और कहीं-कहीं, शेली और वर्ड्सवर्थ की शायरी में दिखी थी।


बात श्री अरविन्द की अच्छी लगी, और मैंने गंगा-जमुनी शायरी के संदर्भ में सोचना शुरू किया। शाश्वत विचारों की एक धारा! पिएँ तो अमृत, सुनें तो संगीत।


खुसरो की गोरी सोवे सेज पर, कबीर की झीनी-झीनी चदरिया लिये, पर सूर मन, अनत सुख कहाँ? देह, दिल, और दिमाग के आगे की शायरी। ठीक वही, जो मंत्र कहलाये, आयत कहलाये।


कितना सुलभ है यह ज्ञान, फिर भी भागमभाग!  इस भागमभाग में हम कहीं खो तो नहीं जा रहे?  चकमक तो बहुत है, पर खुशी की रूह अब क्यूँ नहीं दिखती? हम बियाँबा में हैं, या घर में बहार आई है?


और ख़याल आ ठहरता है ग़ालिब पर, उनकी खुशी की रूह, वो आज होते तो, कैसे जा़हिर होती?


एक सोच पैदा हुई, इसी बहाने, ग़ालिब को एक भावांजलि अर्पित करने की। दीवाने-ग़ालिब से कुछ हीरे लिये हैं, और उनके साथ कुछ फूल लगाकर मालायें तैयार की हैं। ग़ालिब के आसपास भी पहुँचने की न मेरी औकात है, न वैसा समझने की भूल ही मैं कर रहा हूँ। पर जो बन पडा़ है, आपके सामने है।

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