तृप्ति

क़रीब सौ साल पहले, अंग्रेज़  चिंतक मूर ने अपनी पुस्तक ‘प्रिंसिपिया  एथिका’ (नीति के सिद्धांत) में शिव (अच्छा) की विवेचना करते हुए कहा था कि मानवीय संबंधों से प्राप्त आनंद और सौंदर्य के आस्वादन से बढ़कर मूल्यवान कुछ भी नहीं है।


संबंध और सौंदर्य से होकर सत्य की ओर। आनंद और आस्वादन से आगे अध्यात्म तक। पंतजी के ‘महाक्षितिज के पार मौन शाश्वत की प्रज्ज्वलित भूमि’ तक जाने की इच्छा। आख़िर सच क्या है? जो दृश्य है वो, या जो दृष्टि है वो? सच की एक स्वयंसिद्ध विशेषता अपरिवर्तनशीलता बताई गई है। ऐसा समझें तो न दृश्य सत्य है, न दृष्टि।


आइंस्टाइन ने एक महान प्रयास किया था इसे समझने का -- सापेक्षवाद। उन्होंने बताया कि दृश्य और दृष्टि सापेक्ष हैं। अगर दृश्य है तभी दृष्टि है, और दृष्टि है तभी दृश्य। वस्तुतः इनका जन्म साथ ही होता है। और साथ ही होता है इनका विलय। फ़िर शेष रह शायद रह जाता है, सिर्फ़ दर्शन। यह दर्शन ही है मानव सभ्यता की धरोहर।


कविता, जैसा कि वर्ड्सवर्थ ने कहा था, भावनाओं का स्वतः उच्छलन है, सर्वदा दर्शन तक नहीं जाती। मैंने कभी कविता को कृत्रिम बनाने का प्रयास भी नहीं किया। मेरी कविता किसी वन्य क्षेत्र का मुक्त प्रतिबिम्ब है, सजे-धजे बग़ीचे का नहीं। जहाँ दृश्य तक आई वहां दृश्य तक रह गई। जहाँ दर्शन तक पहुंची वहां दर्शन बन गई।


इस तरह से तीन खण्डों में विभाजन मैंने मात्र इसलिए किया कि मैं इन तीनों आयामों पर अलग-अलग से ध्यान आकृष्ट करना चाहता था। वैसे तो यह विभाजन इतना स्वच्छ कभी भी नहीं हो सकता।


दृश्य, दुपट्टे के श्रृंगार से लेकर शाल्मली के रोष तक फैला हुआ है। कविता हर जगह है; बर्तन मांजती औरत, ताल में नहाते बच्चे, जगमगाता शहर। पर कई जगहों पर यह प्रतिक्रिया के रूप में सामने आता है। स्मृति के बंधनों पर प्रतिक्रिया, बंद पर, ख़ामोशी  पर, और कहीं कविता की लय पर ही -- वही शब्द फ़िर क्यूँ दुहराऊँ।


दृष्टि फ़िर बादल देखती है और मन कवितामय हो जाता है। किसी को मंदिर में देखने से आस्था का जन्म होता है। कुछ सीधे-सादे शब्द कंठ में रह जाते है, और विश्व जो समझता है वो सब झूठ है। सपनों का भी अपना एक लोक होता है, जहाँ दुःस्वप्न दिखे हैं। और दिखाई पड़ते हैं मरी हुई कामनाओं के भूत।


मन कितने प्रश्न उठता है। विश्व की स्वार्थपरता के प्रश्न। और अँधेरे के आमंत्रण के प्रश्न। जब मैं मरने लगता हूँ तो प्राण खोजने चलता हूँ । सर्वदा संघर्षरत । बाढ़ के गुज़र जाने के बाद बाढ़ का अंजाम भोगते हुये। कैसे सामंजस्य स्थापित हो स्वार्थ और परमार्थ में। पता चलता है, कि दूरदर्शिता के साथ, स्वार्थ परमार्थ में ही हो सकता है। एक हंसों का जोड़ा अचानक उड़ता है, और मन को विश्वास होता है, होने का। दुःख और सुख की एकरसता का शायद बुद्ध को भी अहसास हुआ होगा। यह लोक ही परलोक है। यह सुख ही सुख है। और सुख ही दुःख। ज्ञान का यह आलोक अंततः प्रदान करता है, तृप्ति!


 First published in 2001, now out of print.