4. Jan.to Mar. 2018

 

Megh Chetana

(For free and restricted distribution amongst members only)

Devoted to the educational, economic and social betterment of our people.

Vol. XV

Issue: Jan. 2018 - Mar. 2018

Trilingual magazine of English, Hindi and Punjabi


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(नोट : पत्रिका में प्रकाशित विभिन्न लेखकों के आलेख उनके अपने विचार हैं। मेघ चेतना के संपादक/प्रबंधक मंडल का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है।)



संपादकीय


ग़रीब समुदायों में जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार हुआ है उसी के अनुसार उनके ज्ञान का क्षितिज भी विस्तृत होता गया है. अब वे अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में बेहतर सोच से सुसज्जित हैं.


हम मजबूरन संस्कृत साहित्य के वैदिक काल में अपना अतीत ढूँढते हैं. संस्कृत का प्राचीन साहित्य कई शैलियों में लिखा गया. उसके शब्दों का प्रयोग विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार से ध्वनित हुआ और प्रयुक्तियों के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ छटाएँ भी उनमें शामिल होती चली गईं. वेदों में और पौराणिक कथाओं में ऐसा बहुत कुछ था जिसका सही अर्थ सदियों अशिक्षित रहे समुदाय सही परिप्रेक्ष्य में नहीं जान पाए. शिक्षित समुदाय ने उन्हें जो बताया या समझाया वे उससे संतुष्ट रहने के लिए मजबूर थे. लेकिन जैसे-जैसे भारत में अंगरेज़ी का विस्तार हुआ और शिक्षा के द्वार सभी के लिए खुल गए उसके बाद से लगभग सभी दलित जातियों ने अपना इतिहास ख़ुद ढूँढने और लिखने का उद्यम शुरू किया. हमारा मेघ समुदाय भी इस प्रवृत्ति से प्रेरित और प्रभावित हुआ. हमारे अपने विद्वानों ने भी लिखा और उन जातियों के विद्वानों ने भी लिखा जिनकी जातियों के नाम में मेघ शब्द जुड़ा था. वे सभी अपने प्रयासों के दौरान ऐसी शोध सामग्री ढूँढ पा रहे थे जो उन सभी जातियों के उस अतीत को छू रही थी जो मेघ, मग, मेकी, मेद, मेघ ऋषि या उनसे मिलते-जुलते शब्दों के साथ ख़ुद को जोड़ती रही हैं. वे इस बात को शिद्दत के साथ समझ पा रहे थे कि उनके समुदायों के बारे में अन्य ने जो लिखा था वो उन लेखकों ने अपने या अपनों के आत्मगौरव को ध्यान में रख कर लिखा था. अपने आत्मगौरव के लिए तो ख़ुद ही लिखना पड़ता है और ऐसा लेखन उन सभी के लिए एक अद्भुत अनुभव रहा.


उसी अनुभव से से ग़ुज़रा हुआ एक आलेख जोधपुर से ताराराम जी ने भेजा है जिसे ‘मेघ-चेतना’ के इस अंक में संपादित रूप में प्रकाशित किया जा रहा है. आदरणीय ताराराम जी ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक के लेखक हैं जिसके दो वॉल्यूम प्रकाशित हो चुके हैं. प्रस्तुत आलेख एक रिसर्च पेपर का संक्षिप्त पाठ है. इसमें कई वैदिक मान्यताओं के आधार पर मेघ, मेघ-ऋषि, मेघवाल, मेघवार, असुर, वृत्र जैसे शब्दों की व्याख्याएँ विभिन्न देशी और विदेशी विद्वानों की लिखतों में खोजी गई हैं. ‘मेघ-चेतना’ के पाठकों को इससे ज़रूर बेहतर जानकारी मिलेगी.


‘मेघ-चेतना’ के पिछले अंक में डॉ. ध्यान सिंह का जम्मू स्थित मेघों की देहुरियों (देरियों) पर लिखा एक आलेख पंजाबी में प्रकाशित किया गया था जिसे अपनी प्रकार का पहला खोजी आलेख कहा जा सकता है. चूँकि ‘मेघ-चेतना’ ऐसे सदस्यों को भी जाती है जिन्हें पंजाबी नहीं आती इसलिए उसका हिंदी अनुवाद इस अंक में प्रकाशित करना उचित समझा गया है.


पिछले दिनों देखने में आया है कि पंजाब में मेघ समुदाय के सामाजिक संगठन अधिक सक्रिय हुए हैं. जालंधर स्थित संस्था ‘मेघ जागृति फाउंडेशन’ पंजाब, गढ़ा, जालंधर ने एक नई पहलकदमी करते हुए एक सेमिनार का आयोजन किया जिसमें मेघ समुदाय से संबंधित समस्याओं पर कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे. उस सेमिनार की रिपोर्ट इस अंक में प्रकाशित की जा रही है. इसे पढ़ना आप सभी के लिए रुचिकर होगा. आशा है इस प्रकार के बहुत से आयोजन आगे चल कर होंगे. ‘मेघ जागृति फाउंडेशन’ के इस कार्यक्रम से प्रमाणित होता है कि मेघ समाज अब पहले से कहीं अधिक जागृत है. इससे कई उम्मीदें बँधी हैं.

 



मेघ: लोक-परंपराएं और वैदिक पुराकथा (Mythology)

ताराराम,

जोधपुर (राजस्थान)     


विषय की पृष्ठभूमि -  मेघ या मेग भारत का एक अति प्राचीन राजनीतिक और सांस्कृतिक जातीय समूह है. कर्नल कन्निंघम ने इसे भारत की आदिम जाति कहा है. वेदों  में उल्लिखित मेगाद्री नदी का ‘मेगाद्री’ नाम उस नदी के मुहानों पर मेघों के बसे होने के कारण ही पड़ा. मेगाद्री नदी को ही बाद में सताद्री और सतलज नदी कहा गया है. प्राचीन काल में मेघ जाति का विस्तार मेगाद्री नदी से मेघना नदी तक रहा है.  वर्तमान में यह जाति-समूह भारत के 10 राज्यों और 2 केंद्र शासित राज्यों में अधिसूचित अनुसूचित जातियों में शुमार है. भारत के 8 राज्यों में यह मेघ नाम से, दो राज्यों (छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश) में सिर्फ मेघवाल नाम से, महाराष्ट्र में मेघवाल व मेंघवार नाम से, गुजरात में मेघवाल, मेघवल, मेंघवार नाम से, राजस्थान में मेघ, मेघवाल, मेगवाल और मेंघवार नाम से, जम्मू-कश्मीर में मेघ/कबीरपंथी के नाम से, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा आदि में मेघ के नाम से अधिसूचित हैं. इन राज्यों में मेघ लोग भगत, आर्य-भगत, कबीरपंथी, रिखी या रिखिया  आदि अन्य नामों से भी जाने जाते हैं. मेघ शब्द व्यक्तिवाचक और गुणवाचक शब्द है और इसके साथ जुड़े ‘वाल’ का अर्थ ‘समूह’ या ‘वंशज’ से हैं. ‘पीपल ऑफ़ इंडिया-राजस्थान’ में  मेघ जाति की उत्पत्ति या निकास एक ऐसे ऋषि से हुआ बताया गया है, जिसमें बादलों से वर्षा कराने की शक्ति थी, अस्तु उस ऋषि को मेघ कहते थे. मारवाड़ मर्दुम शुमारी में भी मेघ जाति की उत्पत्ति ‘मेघ ऋषि’ से होना बताया गया है और  ‘मेघ’ को ब्राह्मण उल्लेखित किया है. बॉम्बे गजेटियर में मेघवालों की उत्पत्ति और उनकी प्राचीनता के बारे में उल्लेख है कि –-मेग, संभवतः तिमुर के मेगियन ( Magians of Timur ) हैं, जो रियासी जम्मू और अख़्नूर की वृहद् जनसंख्या है, ये निम्न जाति  मूल-प्रजाति (pure race) है, दूसरी जगहों में ये बहिष्कृत या जाति-बाह्य हैं. ये संभवतः आर्यन के मेकी ( Mekie ) है और मेखोवल उनसे ही सम्बंधित है. ये सारस्वत ब्राह्मण होने का दावा करते हैं. बुर्नेस (Burnes) इन्हें दक्षिण थार की मूल प्रजाति (aboriginal race) मानता है. ये निचले सिंध के मेहर (Mehar) और बलूचिस्तान के मेघरी (Meghari) है. ये प्लिनी (Pliny) के मेगरी (Megari) या मेगाल्लाए (Megallae) हैं तथा मेगास्थनीज की Indica में इनका उल्लेख मेघल्लाए के नाम से हुआ है. और ये राजपूत-इतिवृत्त में मोकर (Mokar) हैं.  पंजाब कास्ट्स में भी मेघ जाति की उत्पत्ति किसी मेघ नामक व्यक्ति से ही हुई बताई गई है. ऋग्वेद के बालखिल्य सूक्त में आने वाला मेघ शब्द एक अनिश्चित आशय का शब्द है. निरुक्त में इसे बादल के अर्थ में लिया गया है. इन सब प्रसंगों में मेघ जाति अपना सम्बन्ध मेघ यानि बादल से जोड़ती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है. और इस जाति की मान्यता है कि इस धरती पर सबसे पहले मेघ ही हुआ, उसी की संतति में बाकी सभी जातियां हैं. राजस्थानी शब्दकोष में मेघ को एक वंश का नाम बताया गया है. मेघ आर्यों के भारत-आगमन से पूर्व भारत में बसी हुई एक प्राचीन आदिम-जाति है. राजपूतों के परिघटन के समय कई अन्य समूह भी इस जाति में शामिल हुए. मूलतः यह ऋग्वैदिक समय में सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारों पर बसा हुआ एक राजनीतिक और सांस्कृतिक समूह था.

भारत की विभिन्न जातियों की लोक-कथाओं में इसके बारे में तरह-तरह की कथायें प्रचलित हैं, जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद में प्रयुक्त मेघ, वृत्र और इंद्र आदि से किसी न किसी रूप से जुड़ा हुआ है. यह जानना रुचिकर है कि ऋग्वेद में कई प्रसंगों में इसका उल्लेख हुआ है. मेघों में प्रचलित या उनके बारे में प्रचलित कथा-कहानियों  में साफ़ तौर पर वैदिक आधारभूमि दृष्टिगोचर होती है. वेदों में जिन पात्रों का वर्णन है या उल्लेख है, वे केवल रूपक नहीं है; बल्कि उनका लौकिक सन्दर्भ भी सिद्ध होता है और न्यूनाधिक रूप से उनकी ऐतिहासिकता प्रकट होती है. उनका ऐतिहासिक निरूपण जन-मानस में प्रचलित लोक-कथाओं के माध्यम से संधारित (conform) किया जा सकता है. मेघ, वृत्र, पणि, असुर, दास, दस्यु आदि ऐसे ही पात्र है. ये शब्द ऋग्वेद में बार-बार आये हैं और देश के कोने-कोने में इन्हें कथा और कहानियों के माध्यम से आज तक संजोकर रखा गया है. ‘निरुक्त’ में मेघ के 30 नामों का उल्लेख है, जिसमें वृत्र को भी मेघ कहा गया है. (अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः, कोश इति त्रिंशन्मेघ्नामानि, निरुक्त,1.10) मेघ हेतु प्रयुक्त ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है, जिसे बाद की कथा-कहानियों में भी उकेरा गया है, इन शब्दों में से अधिकांश शब्द मेघ जाति की उपजातियों (clans) के द्वारा आज भी धारण किये जाते हैं, यथा अद्रि से आद्रा, ग्रावा से गरावा/गारवा, गोत्र से गोत्रा, बल से बल और बाला, उपल से उपल और उपला, अहि से अहीनिया, रौहीन से रोहिणा और रोहिन आदि-आदि. ये सभी जातियां अपना आदि-पुरुष ‘मेघ’ को ही मानते हैं. क्या ऋग्वैदिक मेघ ही इस मेघ जाति का आदि पुरुष रहा है? यह एक बहुत बड़ी गुत्थी है. आलेख में लोक में प्रचलित इस मेघ या मेघवाल के ‘मेघ’ शब्द के अर्थ को ऋग्वेद में आये मेघ और वृत्र शब्द के सन्दर्भ में समझने का एक लघु प्रयास किया गया है. चूँकि इस बारे में किसी भी प्रकार का अनुसन्धान (रिसर्च) नहीं हुआ है, अतः प्रस्तुत आलेख की अपनी बाध्यताएं हैं. यह इस सन्दर्भ में शोधार्थियों का ध्यान आकर्षित करने का एक संकेत भर है. इसकी प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता भविष्य के शोध पर भी टिकी है अर्थात यह कोई अंतिम गवेषणा नहीं है.

सिन्धु-घाटी के लोग-  निरुक्त में मेघ को असुर कहा गया है और आर्यों के आगमन के पूर्व वे सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों के मुहानों पर और पर्वतों पर बसे हुए थे. आर्यों के आदिम देश को लेकर मुख्यतः चार सिद्धांत प्रतिपादित हुए हैं. ये हैं - यूरोप का सिद्धांत, मध्य-एशिया का सिद्धांत, उत्तरी ध्रुव का सिद्धांत और सप्त-सैन्धव का सिद्धांत. इनमें से अंतिम दो सिद्धांतों को अधिक समादर नहीं मिला है और अभी तक यह प्रश्न विवादास्पद ही रहा है कि आर्य किस प्रदेश के निवासी थे. प्रस्तुत शोध-पत्र का प्रत्यक्षतः यह विषय नहीं है. अतः ये यहाँ विवेचनाधीन नहीं है. हम इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि आर्यों का सम्बन्ध भारत के बाहर के देशों से था और ये भारत में आक्रमणकारी के रूप में आये. किन्तु यह निर्विवाद रूप से माना जाता है कि आर्य सीधे ही भारत में नहीं आये, अपितु आदिम स्थान से उनका पहला अभिगमन बाल्ख प्रदेश के समीप हुआ. यहाँ ये पर्याप्त समय तक रहे. वेद और अवेस्ता की धार्मिक एवं सांस्कृतिक समानता को देखते हुए यह मानना अनुचित नहीं होगा कि जहाँ अन्य आर्य जातियां आदिम देश से ही मूल जाति से अलग हो गईं, वहां वैदिक एवं ईरानी आर्य काफी समय तक साथ-साथ रहे. यह समय बाल्ख प्रदेश में निवास का था.

इतिहास पुस्तकों से हमें जानकारी मिलती है कि वैदिक आर्य बाल्ख प्रदेश से सप्त-सिन्धु की ओर आये. बाल्ख-प्रदेश से सिन्धु-प्रदेश में आने तक उनको किन-किन बाधाओं या जातियों से संघर्ष करना पड़ा, इसकी जानकारी भी अत्यल्प है. परन्तु, यह गवेषित है कि वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में आगमन से पूर्व यहाँ एक संस्कृति विकसित थी, जिसे हम ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ कह सकते हैं. आर्य लोग घुमक्कड़ थे, स्थायी रूप से एक जगह नहीं रहने वाले वैदिक आर्यों के विरुद्ध सिन्धु घाटी के लोग मोहनजोदड़ो और हड़प्पा नामक दो बड़े-बड़े नगरों में रहते थे, जो एक विकसित नगरीय संस्कृति थी. आर्यों का मेघों, असुरों, पणियों, दासों या दस्युओं आदि से अनवरत संघर्ष चला. वृत्र नाम का असुर आर्यों के विरोधी दल का सबसे बड़ा पराक्रमी नेता था.

स्पष्टतः वैदिक आर्यों के सप्त-सिन्धु प्रदेश में प्रवेश का सिन्धु-सभ्यता के लोगों ने कड़ा विरोध किया. आक्रमणकारी एवं गृह-विहीन आर्यों के विरुद्ध नगर और दृढ़ पुरों वाले इन लोगों का विरोध निश्चय ही उग्र था, जिसकी स्पष्ट तस्वीर इंद्र और वृत्र के संघर्ष में दिखती है. यह ध्यातव्य है कि सिन्धु-घाटी की सभ्यता के लोगों का सम्बन्ध असीरिया की सभ्यता के लोगों से था और सिन्धु-घाटी के लोगों और असीरिया के लोगों में कई बातों में समानता होने के कारण वैदिक आर्यों ने उन्हें असुर कहा. प्रो. डी.डी. कोसाम्बी का मत है कि यदि असुरों को असीरियन नहीं भी माने, तब भी उन्हें मनुष्य मानना उपयुक्त है. अर्थात ऋग्वेद में प्रयुक्त वृत्र या मेघ मनुष्य ही थे. अतः आर्यों के द्वारा प्रयुक्त ‘असुर’ शब्द को हम सिन्धु-घाटी के लोगों के लिए प्रयुक्त ही मानेंगे.

लोक-कथाओं में मेघ- भारत की कई जन-जातियों में वृत्र, जिसे मेघ राजा कहा गया है, उसकी कई कथा-कहानियां आज भी प्रचलित हैं. मेघ, जिसे ऋग्वेद में बादल या असुर कहा गया है, उसे कई जन-जातियां एक व्यक्ति-रूप ‘मेघ’ व वर्षा से सम्बंधित देवता या ऋषि मानती हैं. वे इसे केवल बादल का ही प्रतीक नहीं मानती हैं. मेघ जाति मेघ को सिर्फ बादल ही नहीं मानती, बल्कि इसे अपना आदि पुरुष मानती है एवं जाति के नामकरण का कारण भी इसे ही मानती है. गोंड (बोही, पंडरिया ज़मींदारी) में प्रचलित कथा में सूरज और चन्द्रमा को मेघ राजा और मेघ रानी की पुत्रियों के रूप में कहा गया है. बिजली उनकी तीसरी पुत्री कही गयी है. यह प्रतीकात्मक प्रतीत होता है, परन्तु इन जातियों में मेघ को लेकर जो परम्परायें प्रचलित हैं, वे इन प्रतीकों को व्यक्तिरूप और सामाजिक-गठन का रूप देती हैं; यथा: विवाह से पूर्व वधु के घर कार्य करना, वधु के हल्दी आदि लगाना और वधु के सुसराल पहुँचाने से पहले वर द्वारा वधु का मुंह नहीं देखना आदि इस कहानी के माध्यम से कहा गया है, जो इन जन-जातियों और अन्य आदि-निवासियों में आज भी परंपरा के रूप में प्रचलित है.

भील जन जाति में ‘मेघ राजा’ को कालो वारो या कि काला वायरा (हवा) कहा जाता है और उसे वर्षा का देवता माना जाता है. उनमें प्रचलित कहानी में काली बादली (Dark Cloud) मेघ राजा की पत्नी है. बारी मेघ (Twelve Rains), गजन घोटो (Thunder House), थोथी वीजल (Limping Lightning), काली वीजल (Dark Lightning) उनकी संतति है. इनकी कहानी में मेघ राजा के किसी यात्रा के समय दो देवताओं से युद्ध का जिक्र है और कहा गया है, सैनिकों के खून की जितनी भी बूँदें गिरतीं उतने ही सैनिक पैदा हो जाते थे. यह इंद्र और वृत्र के युद्ध की झलक है. वे काली हवा के पास गए, काली हवा बादलों के साथ आई और भयंकर बरसात करने लगी, जिससे सैनिकों के घाव से बूंदें धुल जाती और नए सैनिक पैदा होने बंद हो गए और अंत में राजा पराजित हो गया. बैगा जन-जाति (कसैकुंड, कवर्धा-स्टेट) में भी मेघ राजा और मेघ रानी की कहानी प्रचलित है और उनके दरबार का जिक्र है. इस कहानी में भीमसेन, दुर्होदानो (दुर्योधन) आदि पात्रों का भी जिक्र किया जाता है. गुजरात के इतिहास में सिद्धराज सोलंकी के द्वारा खुदवाए गए तालाब में मायो नामक मेघ के प्राणोत्सर्ग से ही जल की आवाप्ति सुनिश्चित हो सकी, साथ ही मातंग मेघ के द्वारा गिरनार पर तपस्या और जल की बाढ़ आना आदि मध्यकालीन कथाएं भी मेघों के जल से संबंध को सुनिश्चित करती हैं जो वेदों की पुरा कथाओं से मेल खाती सी लगती है. गुर्जर जाति में मेघ को. मेघ-बाबा’ के रूप में पूजा जाता है. वह इंद्र और मेघ दोनों के प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर मेघ की पूजा-अर्चना करती है. प्रतीकात्मक रूप में इंद्र को उल्टा लटकाती है और उसके सामने मेघ का प्रतीक बनाकर पूजती है. यह इंद्र और मेघ के प्रति इस जाति की धारणा को व्यक्त करता है. वहीं मेघ, मेघवाल, मेघवार जाति तो मेघ को अपना आदि पुरुष ही मानती है, वे इसे रिखी या ऋषि की उपमा भी देते हैं. उनकी मान्यता में मेघ न तो असुर है और न आसुरी शक्ति का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि का प्रथम पुरुष है. इन विभिन्न जन-जातियों में प्रचलित मेघ का जल से सम्बन्ध है और उनके लिए वह जल का देवता है, हालाँकि वेद में मेघ को असुर कहा गया है और जल-वर्षण को रोकने वाली या जल की बाधक शक्ति के रूप में उसका निरूपण है. इंद्र उससे जल को मुक्त कराता है. वहां जल का देवता इंद्र है. वेद में मेघ के प्रति श्रृद्धा नहीं है, वहीं इन जातियों में मेघ के प्रति अगाध श्रृद्धा है.

वृत्र और मेघ की वैदिक अवधारणा- वैदिक साहित्य में वृत्र को भी असुर कहा गया है. यास्क ने सर्वप्रथम निरुक्त में वृत्र सम्बन्धी जिज्ञाषा में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि ‘मेघ’ रूपी वृत्र को विद्युत रूपी वज्र से आहत करके इंद्र ने जल को मुक्त किया. निरुक्त का लेखक यास्क प्रश्न करता है- ‘को वृत्र?’ अर्थात वृत्र कौन? और इसके जबाब में लिखता है- ‘वृत्रो मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिका’. इसमें न्यूनाधिक रूप से वृत्र के बारे में उस समय प्रचलित रही दो परम्पराओं का दिग्दर्शन होता है. वह पूर्वपक्ष को रखने के बाद ऐतिहासिकों की मान्यता को भी रखता है, जिनके अनुसार वृत्र एक असुर था. वह तवष्टा का पुत्र था. इस पर इससे अधिक विमर्श न करते हुए, वह इस परंपरा की अनदेखी करता है और नकारता है. यास्क निरुक्त की परंपरा का पालन करता है और उसी अनुरूप इसका यत्र-तत्र वर्णन करता है. सायण भी निरुक्त की विचार-परंपरा का अनुगमन करता है. परन्तु, निरुक्त में उल्लेखित इस वर्णन से भी यह स्पष्ट है कि आदि काल से ही वेद की पुराकथाओं (mythology) की व्याख्या को लेकर दो परम्पराएँ विद्यमान थीं- एक ऐतिहासिक परंपरा (historical school) और दूसरी नैसर्गिक या प्राकृतिक परंपरा (naturalistic school). प्राकृतिक परंपरा का अनुगमन करने वाले वेदों के प्रतीकवाद को दृष्टिगत रखकर वेदमंत्रों का अर्थ करते हैं. यास्क और सायानाचार्य इस परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके पश्चात् मैकडोनल, ओल्डेनबर्ग, पेरी, ब्लूमफील्ड आदि कई विद्वान इस परम्परा का समर्थन करते हैं. इस परम्परा को प्रतीकवाद भी कह सकते हैं, लेकिन यह रूपक या प्रतीकवाद सब जगह और सब सन्दर्भों में उपयुक्त नहीं बैठता है. क्योंकि घटनाएँ और घटनाओं के पात्र सब जगह रूपक या प्रतीक ही नहीं है. इंद्र और वृत्र के सन्दर्भ में तो यह प्रतीकवाद धराशायी होता हुआ दिखता है एवं ऐतिहासिकों की परंपरा सभी तरह से सही ठहरती है.

ऋग्वेद में वृत्र का उल्लेख कई मन्त्रों और प्रसंगों में मिलता है. जिनकी मान्यता है कि ऋग्वैदिक मन्त्रों में आये हुए नाम या पात्र रूपक या प्रतीक है, उनके विचार में वृत्र एक बाधा है. यह नकारात्मक या आसुरी प्रवृतियों हेतु प्रयुक्त रूपक या नाम है. उनका यह भी मानना है कि जिस समय आर्य अपने मूल निवास या आदि प्रदेश में थे, तब उनका जीवन कठिन था और विभिन्न तरह की बाधाओं का सामना करते थे. उन बाधाओं के लिए उन्होंने एक शब्द चुना और उन्हें ‘वृथ्र’ नाम दिया. यह नाम अवेस्ता में सुरक्षित है. और, जब बाल्ख प्रदेश से ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी वह धारणा उनके दिमाग में चलती रही और वैदिक आर्यों का जब सिन्धु प्रदेश में आव्रजन हुआ तो उसी वृथ्र को ऋग्वेद में वृत्र कहकर संबोधित किया. लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि ऋग्वेद में आये हुए वृत्र का सम्बन्ध मेघ या जल से सम्बंधित है, जबकि अवेस्ता के वृथ्र का जल से कोई सम्बन्ध नहीं है. दूसरी बात यह है कि अवेस्ता का वृथ्र ‘बाधा’ है, वहीं ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधक’ है. साथ ही, ऋग्वेद का वृत्र एक वचन में ही नहीं बल्कि कई स्थलों पर बहुवचन में भी प्रयुक्त हुआ है. ऋग्वेद में वृत्र के नपुंसक लिंग के  बहुवचन के ‘वृत्राणि’ शब्द का प्रयोग प्रायः उन दैत्यों के साथ हुआ है, जो वृत्र के मित्र थे और वृत्र से कम भयंकर भी थे. एकवचन में उल्लेखित ‘वृत्र’ इंद्र का मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं एवं बहुवचन में प्रयुक्त ‘वृत्राणि’ गौण प्रतिद्वंद्वी है या अन्य प्रतिद्वंदियों के गण या समूह है.

वृत्र को मेघ भी कहा गया है, उसके अनुसार ‘वृत्र अर्थात मेघ जल को रोक लेता है, वर्षण नहीं करता. इंद्र, जो कि वर्षण का देवता है, अपने वज्र से अर्थात विद्युत से मेघ को विदीर्ण कर जल धाराओं को बरसाने के लिए मुक्त कर देता है’. इस मत के अनुसार ‘पर्वत’ अथवा गिरी जहाँ जल संचित रहता है, मेघ ही है. ऋग्वेद में अन्यत्र भी पर्वत का अर्थ मेघ ही है. इस प्रतीकात्मकता में आमतौर पर पर्वत का अर्थ ‘मेघ’ होता है, किन्तु फिर भी ओल्डेनबर्ग की स्वीकृति है कि इंद्र-वृत्र युद्ध में वर्णित पर्वत मेघ नहीं, अपितु वैदिक ऋषि की दृष्टि में वास्तविक पर्वत थे. इसी भांति इंद्र द्वारा विमुक्त नदियां भी सूक्ष्म न होकर पार्थिव है, विशेषकर विपाशा और शुतुद्रि (मेगाद्री). कर्नल एलेग्ज़ेंडर कनिन्घम ने शताद्री को मेघों की नदी कहा है, इसका मूल नाम मेगाद्री ही था. मेगाद्री अर्थात मेघों की नदी और ये मेघ लोग यहाँ के आदि-निवासी थे. निरुक्त में मेघ के 30 नामों (अद्रिः, ग्रावा, गोत्रः, बलः, अश्न:, पुरुभोजा:, बलिशान:, अश्मान, पर्वतः, गिरिः, वज्रः, चरुः,वराहः, शम्बरः, रौहिनः, रैवतः, फलिग:, उपरः, उपल:, चमसः, अहिः, अभ्रं, बलाहकः, मेघः, दृतिः, ओदनः, वृशधि:, वृत्रः, असुरः.) का उल्लेख है, जिसमें वृत्र भी को भी एक मेघ ही कहा गया है. स्पष्ट यह है कि  ऐतिहासिक परम्परा की दृष्टि से ये शब्द रूपक मात्र ही नहीं है, बल्कि इन शब्दों का लौकिक अर्थ और सन्दर्भ भी है और इस दृष्टि से वृत्र या मेघ उस कालावधि में व्यक्ति-विशेष ही ठहरते है, न कि कोई प्रतीकात्मक बाधा.

वृत्र, जिसे इंद्र ने अपने वज्र से मारा, उसे असुर कहा गया है. ऋग्वेद के कई मन्त्रों में वृत्र का मानव के रूप में उल्लेखित किया गया है.

परम्परा के अनुसार इंद्र और वृत्र के युद्ध का रोचक वर्णन कई स्थलों पर हुआ है. इंद्र-वृत्र युद्ध के सन्दर्भ में उल्लेखित झंझावत (storms) एवं विद्युत आदि अपरोक्ष रूप से बहुत ही कम आते है, अधिकतर परोक्ष रूप में आते हैं. ऋग्वेद में किसी भी स्थल में इंद्र को स्पष्टतः जल-वर्षण करने वाला नहीं कहा है. प्रो. कार्पेंतियर (Charpentier) के अनुसार इंद्र देवता झंझावत या ग्रीष्मकालीन उष्णता का देवता न होकर एक जातीय नेता था, जो समय के आदिम जनों का देवता बन गया. बाल्ख से भारत में आने तक इंद्र को अनेक जातियों से युद्ध करना पड़ा, तथा भारत में भी उसे सहज प्रवेश नहीं मिला. उसे सिन्धु-घाटी के लोगों से लड़ना पड़ा. वृत्र मेघ उनमें सबसे प्रबल शत्रु था. आर्यों के भारत में बस जाने के बाद भी यदा-कदा विद्रोह करने वाली जातियों का भी उसे दमन करना पड़ा. ऋग्वेद में इन समस्त विरोधी जातियों के लिए ‘दास’ शब्द का भी प्रयोग हुआ है. आदिम घुमक्कड़ और सरल जीवन में पद-पद पर आर्यों को अनेकानेक कठिनाइयों और बाधाओं का सामना करना पड़ा. उन कठिनाईयों और बाधाओं को आज हम दुर्भाग्य, आपत्ति अथवा विघ्न आदि कई शब्दों से व्यक्त करते हैं और जानते हैं. अवेस्ता में ‘वृथ्र’ शब्द बाधाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है. बाल्ख-प्रदेश से जब ईरानी और वैदिक आर्य अलग-अलग हो गए, तब भी उनके मन-मस्तिष्क में वह अवधारणा चलती रही, यही कारण है कि सप्त-सिन्धु में प्रवेश करने पर सामने आने वाली हर बाधा को उन्होंने वृत्राणि कहकर संबोधित किया. चाहे ये बधाएं प्राकृतिक रही हों या मानवीय. यही कारण है कि अवेस्ता में वृथ्र (vrera) तथा ऋग्वेद में वृत्र अथवा वृत्राणि शब्द मिलते हैं. शब्द साम्यता के साथ ही इन दोनों शब्दों के अर्थ और सन्दर्भ में जो सबसे महत्त्वपूर्ण भेद भी मिलता है, ऋग्वेद में वृत्र प्रायः जल या जल-वर्षण से सम्बंधित है, वहीं अवेस्ता में वृथ्र का जल से सम्बन्ध नहीं मिलता है. साथ ही ऋग्वेद का वृत्र ‘बाधा’ मात्र नहीं है, बल्कि ‘बाधक’ भी है और एक व्यक्ति के रूप में भी ज्ञाप्त होता है.


इंद्र के शत्रुओं को दैत्य मानकर भी उल्लेखित किया गया है. वृत्र व शम्बर आदि इंद्र के प्रमुख शत्रु वर्णित किये गए हैं. ऋग्वेद में इंद्र का प्रमुखतम प्रबल शत्रु वृत्र ही है. वृत्र का वध करने के कारण ही इंद्र को वृत्रहन की उपाधि मिली. इंद्र के शत्रुओं के जो अन्य नाम मिलते हैं, उन में अहि, शुष्ण, पणि अर्बुद, बल, रोहिण, व्यंस, अहीशुव, विश्वरूप, स्वर्भानु, उरण, अश्न, पिशाची, शंडिका, क्रिवी, शम्बर, पिपु, नमुचि, धुनि, चुमुरी, वर्चिन, कुयव, कर्णज, पनेय, कुवयच, इली-बिश, नार्मर, नव-वास्त्य, मृगय, वृष-शिप्र, मख, अनर्शाने, पद-ग्रभी, रुधिका, दृभीक, वंग्रद आदि कई हैं.


जहाँ निरुक्त में वृत्र के बारे कहा गया है, ‘तत्को वृत्रो? मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोसुर इत्यैतिहासिकाः. (निरुक्त, 2-16) वहाँ स्पष्टतः वृत्र एक ऐतिहासिक व्यक्ति था. वह एक मेघ था. ऐतिहासिकों के मतानुसार वृत्र वस्तुतः कोई पार्थिव व्यक्ति था. जिसके साथ इंद्र का संघर्ष वास्तविक युद्ध का परिचायक है. ऋग्वेद में वृत्र को एक व्यक्ति मानकर उसके माता और पिता का उल्लेख भी मिलता है. जिसके अनुसार वृत्र की माता दानु थी और उसके पिता का नाम त्वष्ट्र था. बुद्ध प्रकाश के अनुसार इंद्र आर्यों का युद्ध नेता था व वृत्र दस्यु थे. वे इंद्र को एक व्यक्ति मानते हैं. उनके अनुसार वृत्रासुर असीरिया, सीरिया या शाम का प्रसिद्ध दलपति था. रामगोविंद त्रिवेदी का कथन है कि ‘अवेस्ता से ज्ञात होता है कि बेबीलोन नगर को आर्यशून्य करने के लिए वृत्र ने अद्विशूर नाम की देवी की उपासना की थी, किन्तु प्रयत्न में असफल रहा. फ़ारस के राजा साइरस ने जैसे टाइगर्स नदी का प्रवाह रोककर बेबीलोन को जीतने का निश्चय किया था .....’ (हिंदी ऋग्वेद की भूमिका) ऐ.ब्रा.(8.18) के उद्धरण से स्पष्ट है कि दस्युओं द्वारा आर्यजन अभिप्रेत थे. वृत्र को अहि कहने का तात्पर्य है कि उसके अनुगामीजन सर्पपूजक थे. (हिंदी ऋग्वेद की भूमिका), अन्यत्र बुद्धप्रकाश ने वृत्रों को प्राग्वैदिक (pre-historic) भारतीय जाति माना है, जिसे मेगास्थनीज ने अपनी इंडिका पुस्तक में “Veretatae” कहा है. इंद्र द्वारा वृत्र का वध करना ब्रह्महत्या माना गया है. इससे यह साबित होता है कि वृत्र ब्राह्मण था. मेघ जाति भी अपने इस आदि-पुरुष मेघ को ब्राह्मण ही मानती है. इंद्र को वर्षण का देवता मानने वाले विद्वान वृत्र को ‘मेघ’ मानते हैं.


वैदिक इंडेक्स आदि के लेखकों ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वेद में आर्यों और दस्युओं के युद्धों का वर्णन है. यह सर्व-संज्ञात है कि वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन मिलता है. इन्द्र और वृत्र के युद्ध का तो रोचक वर्णन ऋग्वेद और पुराण में मिलता है. वृत्र को असुरों का राजा कहा गया है. वृत्र मेघ का नाम है या कि वृत्र एक मेघ है. इसे प्रथम मेघ, अहि मेघ आदि नामों से भी संबोधित किया गया है. अगर इस युद्ध को रूपक या अलंकारिक भाषा में मान लिया जाय तो इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा है. परन्तु दधीचि, इन्द्र, वृत्र, मेघ, असुर आदि रूपक मात्र ही नहीं हैं, ये उस समय के इतिहास-पुरुष हैं और इनमें इतिहास छुपा पड़ा है. इतिहास की दृष्टि से इसकी गवेषणा का कार्य अभी भी वांछित है. इतिहासकार का काम इन कथा-कहानियों से इतिहास के सूत्र ढूँढ़ना है.


वेद में देव और असुर दो वर्गों का वर्णन हुआ मानते हैं. कुछ देव दोनों वर्ग में उल्लेखित किये गए हैं. उसके मतानुसार असुर शब्द अशुभचिंतक या दुष्ट लोगों (malevolent beings) के लिए प्रयुक्त हुआ है. असुरों में भी दो वर्ग थे- अच्छे और बुरे, जिन असुरों को अच्छा कहा गया, वे आदित्य कहे गए और बुरे, जिन्हें दानव कहा गया है, जिनका नेता वृत्र था. असुर का मूल अर्थ मालिक (lord) के जैसा है, परन्तु अनुप्रयोग में इसका अर्थ बलशाली या बलवान व्यक्ति या अतिमानव या मायावी होता है. ऋग्वेद में वरुण, मित्रवरुण, आदित्य आदि समूहों के लिए असुर शब्द का प्रयोग हुआ है. इंद्र, अग्नि, सूर्य और संभवतः रूद्र आदि के लिए भी असुर शब्द का प्रयोग हुआ है. द्यौस के लिए भी लिए भी हुआ है। यह सिद्ध है कि असुरों को देवों से अलग किया जा सकता है. यह भी प्रस्तावित किया जा चुका है कि इंडो-ईरानियन लोगों के अलग-अलग धर्म में बंटने के कारण भारत में असुर और ईरान में अहुर का अलग विकास हुआ. ब्रद्के (P. Von Bradke) ने हौग के सिद्धांत का परिमार्जन करते हुए असुर का अर्थ highest lordship से लिया है और बताया कि असुर शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग द्यौस के लिए किया गया है. रुडोल्फ ओटो (Rudolf Otto) हौग के मत का अनुसरण करते हुए स्पष्ट करता है कि एक असुर धर्म था, जो ईरानियों और वैदिक आर्यों के अलग-अलग होने से पहले अस्तित्व में था. भारत में उस धर्म को वैदिक ‘देव’ धर्म ने अवशोषित कर लिया गया, परन्तु ईरान में वह शुद्ध रूप से अस्तित्व में रहा, जिससे ज़रौसुस्त्र धर्म का उद्भव हुआ. एमिले  बेंवेनिस्ते(Emile Benveniste) भी इंडो-ईरानियन संस्कृति को असुर-पूजक मानने वालों में है जो अहुर मज़्दा को असुर परिवार का सदस्य मानती है. यू. वेंकटकृष्णा राव (U. Venkatakrishna Rao) के अनुसार पूर्व-काल में असुर पूजे जाते थे. उसके अनुसार अहुर मज़्दा और संस्कृत के असुरोमहा में साम्यता है एवं अमरकोश में पूर्व-देवों की सूची में असुर उसका पर्यायवाची शब्द है. आर.एन. दांडेकर (R. N. Dandekar) का मत है कि असुर शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जो रहस्यमय सर्वोच्च शक्तियों से संपन्न थे. असुर शब्द की निष्पत्ति असु+र से हुई है जिसका भाषाई अर्थ हुआ, वह व्यक्ति जो असु (शक्ति) संपन्न हो और यह शब्द जीवन-शक्ति को इंगित करता है. असुरों की विशेष शक्ति ही माया कहलाती थी. वैदिक धर्म में इंद्र और असुर के बीच दुश्मनी असुर और असीरियन नामों के संदेह से लोक-कथाओं में बढ़-चढ़ गयी. जेम्स दर्मेसतेटर(James Darmesteter) का सुझाव है कि इंडो-ईरानियन भाषा में देव (god) के लिए तीन शब्द हैं- असुर, याग्ता और देव, इसमें असुर सर्वोच्च देव है. याग्ता वह देव है जिसे बलि दी जाए और देवता का अर्थ अभाषित (shining). देव शब्द ही बिगड़ कर दैत्य बना. आर.जी. भंडारकर एवं के.आर.वी राजा (R.G. Bhandarkar and K.R.V. Raja) जैसे कई विद्वानों ने असुर शब्द को सेमेटिक भाषा के अस्सुर से सम्बंधित माना है. के. आर. वी. राजा ने पहली बार सन् 1908 में सुझाव दिया कि भारतीय-आर्यों ने असुर शब्द असीरिया से ग्रहण किया है. सन् 1918 में आर. वी. भंडारकर ने उसी परिप्रेक्ष्य में सिद्ध किया कि ऋग्वेद का असुर शब्द ईश्वर (देव) का द्योतक है, लेकिन कुछ अपवादों में कभी-कभी देव का विरोधी और मनुष्यों का शत्रु रूप में भी प्रयुक्त हुआ है. असुर शब्द पूर्व में देव के लिए प्रयुक्त रहा व बाद में घुमक्कड़ आर्यों के खूंखार मानव-दुश्मनों के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा और बाद में पुरा-कथाओं (mythology) में देवताओं के सूक्ष्म दुश्मनों के रूप में प्रयुक्त होने लगा. पतंजलि और शतपथ ब्राह्मण के आधार पर ए. बनर्जी और शास्त्री (A. Banerji-Sastri) के मत में असुर शब्द की उत्पत्ति असीरियन से ही हुई है.


ऋग्वेद में अग्नि के सम्बन्ध में आये मन्त्र में असुर शब्द में अग्नि को असुर कहा गया है. 6 बार अग्नि के लिए, दो बार सावित्री के लिए, दो बार वरुण के लिए, दो बार मित्रवरुण के लिए,  रूद्र के लिए, ध्योस के लिए, आर्यमन के लिए, पूसन के लिए, प्रजन्य के लिए, मनुष्य के लिए असुर शब्द का प्रयोग चार मन्त्रों में हुआ है. उन्हें संतति की वृद्धि या रक्षा करने वाला कहा भी गया है. वरुण के साथ असुर का प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है जिसमें उसे (असुर को) राज करने वाला बुद्धिमान राजा कहा गया है.


इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से पुराणों पर काफी कुछ कार्य हुआ है और उससे भारत का प्राचीन इतिहास उजागर हुआ है, परन्तु वेदों में वर्णित घटनाओं और नामों पर इतिहास-अन्वेषण की दृष्टि से किंचित-मात्र भी अन्वेषण नहीं हुआ है. इन पर शोध कर हम अपने इतिहास को और अधिक रोशन कर सकते हैं.


संदर्भों और उद्धरणों सहित उक्त आलेख के संभावित अपडेटिड वर्शन आप इस लिंक पर देख सकते हैं -

https://goo.gl/mZC33C



मेघ जन समुदायों की देहुरियाँ

डॉ. ध्यान सिंह, कपूरथला

9914916660


पंजाब/भारत के मेघ (कबीरपंथी) समाज के मूलधारा में प्रवेश करने से पहले जनजातीय स्तर पर थे. जनजातियों के धार्मिक स्वरूप, रीति-रिवाज के बारे में बहुत से विद्वानों ने खोजपूर्ण लेख लिखे हैं. निर्विवाद रूप में कहा जाए तो जनजातीय लोगों का धर्म आदम जादुई प्रकार का होता है. उनके पास कोई परमात्मा नहीं होता. कोई भक्ति नहीं होती. वे किसी उच्च सत्ता से कुछ पाने के लिए इकट्ठे होकर विनम्र और आदर योग्य (विनीत) प्रार्थनाएं नहीं करते बल्कि जादूमय ढंग से कर्मकांड करके वे अपनी इच्छा पूर्ति के लिए प्राकृतिक और अप्राकृतिक शक्तियों के लिए क्रियाशील होते हैं. वे लोग सामूहिक कर्मकांड करते हैं जो सभी के हित में किए जाते हैं. निजी संपत्ति के स्वामित्व के उभरने (पैदा होने) से पहले तक मानव समाज अपने और बेगानों में बँटा हुआ नहीं होता.


पंजाब/भारत के मेघों के भी आदि धर्म का स्वरूप भी इससे अलग नहीं रहा. मौजूदा समय में मेघों (कबीरपंथियों) का अध्ययन करते हुए हमें उनके धार्मिक दृष्टिकोण का अध्ययन करने का मौका मिला है. उनमें एक ओर आदि धर्म की जड़ें मौजूद हैं और दूसरी ओर वे मूलधारा के धर्मों को अपनाते (धारण करते) हुए धार्मिक संस्थानों का निर्माण करते आ रहे हैं. गौर करने लायक है कि मानव समाज के सारे समुदायों में जनजाति धर्म के अवशेष (बचे-खुचे) देखे जा सकते हैं. परंतु पंजाब के मेघ/कबीरपंथी अभी भी शुरुआती दौर से गुज़र रहे हैं. हम जानते हैं कि ब्रिटिश सत्ता के समय में 19वीं शताब्दी के मध्य के बाद इनको अनेक कारणों से मूलधारा के धर्मों में शामिल होने का मौका प्राप्त हुआ है. हम उस समय से आगे मेघों के धार्मिक स्वरूप का अध्ययन करने जा रहे हैं.


जैसा कि हम जानते हैं पंजाब के कबीरपंथियों का मूल क्षेत्र जम्मू का तराई इलाका है. वहां एक मेघ जनजाति प्राचीन समय से निवासित है. इनके प्राचीन धर्म के बारे में जो खोज की गई है उसके अनुसार आज उनके प्राचीन धर्म स्थानों को देहुरियां कहा जाता है. देखने वाली बात यह है कि इस मेघ कबीले के अलग-अलग गोत्रों के समुदायों की अलग-अलग देहुरियां हैं. देहुरी एक धार्मिक स्थान को कहा जाता है जहां लोग अपने धार्मिक कर्मकांड संपन्न करते हैं. ये देहुरियां उसी तरह प्रचलित हो रही हैं जैसे पंजाब के अन्य क्षेत्रों में अन्य जात बिरादरियों में ‘जठेरों’ के स्थान प्रचलित हैं.


पंजाब की मेघ जाति के लोगों की लगभग सभी देहुरियां और देहुरे जम्मू क्षेत्र में ही हैं. पंजाब में एक-दो स्थानों पर देहुरियां बनाई गई हैं जो जम्मू कि देहुरियों से ही कुछ मिट्टी या पत्थर लाकर यहां इन की स्थापना की गई है. पंजाब के मेघ जाति के कबीरपंथी लोग अपने कर्म कांड करने के लिए इन देहुरियों पर जाते हैं जो हर जाति की अलग-अलग और अपनी-अपनी होती है. इन देहुरियों पर साल में दो बार दशहरा और जून महीने में मेला लगता है जिसे ‘मेल’ कहा जाता है. हर जाति अपनी-अपनी देहुरी पर इकट्ठी होती है जहां वह अपने शरीकों अर्थात अपनी जाति के अन्य लोगों के साथ मिल बैठते हैं. इन मेघ लोगों की कुछ देहुरियां जम्मू के आसपास के छोटे-छोटे गांव में है और कुछ देहुरियां झिड़ी गांव में भी है. झिड़ी और बावे तलाअ में देहुरियों की गिनती काफी ज्यादा है.


जम्मू में ज्यादातर देहुरियां गांव के खेतों में बनी हुई हैं. कई स्थानों पर इन तक पहुंचने की रास्ता तक नहीं होता. खेतों की मेढ़ों से होकर ही देहुरियों तक पहुंचा जाता है. देखने में यह भी आया है कि कुछ देहुरियों का स्थान जंगल जैसा दिखाई देता है. वहां दरख़्त और झाड़ियां होती हैं जिन्हें बाग़ कहा जाता है. कुछ स्थानों पर अब इन बाग़ों को काटकर सफाई कर दी गई है और देहुरियों को बेहतर रूप जा रहा है. लेकिन पहले यह ज्यादातर कच्ची मिट्टी की और बहुत छोटी बनी होती थीं.


इन देहुरियों के मौखिक इतिहास से यह पता चलता है कि ये देहुरियां ‘शहीदों’ और ‘सती’ की निशानी है जिसे किसी ऊंची जाति वाले ने कत्ल कर दिया. उसे ही शहीद कहा गया और जब उसकी मौत की सूचना उनके घर पहुंची तो उसकी पत्नी ने या बहन ने यह सूचना सुनकर आत्महत्या कर ली (सती हो गई). उनकी याद में इन लोगों ने कुछ पत्थर या पिंडी रूपी कुछ पत्थर बनवा के लगा दिए हैं और उनकी पूजा करने लगे हैं. कुछ स्थानों पर पत्नी की बजाय बहन भी सती हुई होगी इसलिए कुछ स्थानों को ‘बू’ की देहुरी (‘बू’ से भाव होता है - ‘बड़ी बहन’) भी कहा जाता है.


मेघ समाज में कभी भी राजपूत समाज की तरह औरत के सती होने का प्रचलन नहीं रहा ना ही विधवा-विवाह की कभी मनाही रही है. इसलिए यह देहुरियां उन्हीं लोगों की हैं जो सच्चाई के लिए लड़ते हुए शहीद हुए थे, जो सच्चाई पर खड़े थे. इसी अर्थ में इन्हें सच/सती की देहुरी कहा जाता है. यह पति प्रेम या भाई से लगाव को भी दर्शाता है.




अधिकतर देहुरियाँ इतनी छोटी होती हैं कि इनके भीतर बैठना, खड़े होना संभव नहीं लगता. इनके भीतर बैठना कठिन है. देहुरी के भीतर जो पिंडी होती है उसे ये लोग 'स्थान' अथवा 'शक्तिपीठ' भी कहते हैं. इनके अनुसार उसमें बहुत शक्ति होती है. अब कुछ देहुरियां अच्छी तरह बनाई जाने लगी हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि जब से पंजाब के मेघ, भगत, कबीरपंथी इन देहुरियों पर जाने लगे हैं, इनकी हालत में सुधार आया है. कुछ देहुरियों पर जहाँ जाने का रास्ता नहीं था वहाँ ज़मींदारों से ज़मीन खरीद कर रास्ते बनाए जा रहे हैं. यह भी पता चला है कि आज से 20-25 वर्ष पहले पंजाब से मेघ जाति के बहुत कम लोग इन देहुरियों पर जाते थे. उन्हें अपनी देहुरियों के बारे में पता तक नहीं होता था. लेकिन पिछले कुछ समय से लोगों का देखा देखी इस ओर रुझान बढ़ गया है.


यह भी पता लगा है कि पहले इन देहुरियों में बकरा हलाल किया जाता था. पर अब यहां झटका हो रहा है. इसका कारण पहले यहां मुसलमानों का प्रभाव था. वो इनको झटका नहीं करने देते थे और ना ही इन को झटका करने या हलाल करने में कोई बहुत अंतर महसूस होता था. बस इसका मतलब लोग देहुरियों पर अपनी मन्नतें मांगते थे. मन्नत पूरी होने पर प्रसाद के रूप में बकरे की बलि दी जाती है. यहां लोग अपने सबसे बड़े पुत्र (पलेठी दा पुत्तर) का बकरा देते हैं. जब मुंडन करवाने होते हैं तो भी बकरा देते हैं. जब कोई नया विवाह होता है तो कुछ देहुरियों पर बकरा लगता है जिसे ये अपनी-अपनी जाति की देहुरी पर ले जाते हैं. देहुरी के पुजारी को ‘पात्र’ कहा जाता है. पुजारी का एक ‘चेला’ भी होता है. पात्र या चेला मेल वाले दिन देहुरी पर बैठते हैं. जो लोग बकरे को बलि के लिए लेकर आते हैं वो परिवार समेत देहुरी के अंदर या बाहर बैठते हैं और कहते हैं कि “बाबा जी दर्शन दो, बकरा परवान करो, मेहर करो”.


बकरे के सामने धूप जलाई जाती है उसका सिर और पैर पानी से साफ किया जाता है जिसकी वजह से बकरा शरीर झटकता है. यदि वो शरीर न झटके तो उस पर पानी के छींटे मारे जाते हैं जिससे वो अपना शरीर झटकता है. तब लोग कहते हैं कि ‘बिझी गया’ और उसके बाद बकरे को काट दिया जाता है. उसके लहू से सभी को टीका लगाया जाता है. उसकी पोट कलेजी को पहले अलग से बनाकर खाया जाता है जिसे यह लोग ‘मंडले का प्रसाद’ कहते हैं.


यदि किसी कारण से बकरा अपना शरीर नहीं झटकता तो बकरा चढ़ाने वाले परिवार के बूढ़े-बुजुर्ग कान पकड़ते हैं, नाक रगड़ते हैं और कहते हैं कि हमारी गलतियां माफ कर दीजिए. हमें कुछ पता नहीं था. हमारी भूल क्षमा करो. सिर झुकाते हैं. यह बात वो तब तक दोहराते रहते हैं जब तक बकरा बिझ (मान) नहीं जाता. देहरी पर आने वाले लोगों को जाति निर्धारित नियमों का उपदेश दिया जाता है. पहले जो बकरे की बलि दी जाती थी उसे जाति के लोग मिल बांट कर खाते थे. लेकिन अब देखने में आया है कि उसे सभी खा लेते हैं यहां तक कि राजपूत और मुसलमान भी. अब यह कोई बहुत सख्त नियम नहीं रह गया.


मेल के अवसरों पर बकरा चढ़ाते हुए शराब भी पी जाती .है मीट खाया जाता है. कई बार इसी कारण से विवाद भी हो जाते हैं. इसीलिए कुछ देरियों पर बकरा काट के पकाने की मनाही है कर दी गई है. कुछ देरियों पर दो दिन निर्धारित कर लिए गए हैं. एक दिन बकरा खाने वाले लोग जाते हैं. दूसरे दिन वो लोग जाते हैं जो बकरा नहीं खाते और वो बकरे की जगह ‘मोख’ ही देने लगे हैं. देहुरियों के साथ देहुरे भी बने हुए हैं. कई जगह तो देहुरे और देहुरियां कुछ दूरी के अंतर पर ही हैं.


इन देहुरियों पर लाल रंग का झंडा होता है. कुछ देहुरियों पर चूहों ने बिल में से मिट्टी निकालकर ढेर लगाया होता है. इस स्थान पर कहा जाता है कि नाग देवता निवास करते हैं. इस मिट्टी को ये लोग वर्मी कहते हैं. उसकी कुछ लोग पूजा करते हैं. एक देहुरी पर एक ही दिन में कई-कई बकरों की बलि दी जाती है. यह भी बताने योग्य है कि जब एक देहुरी के पात्र से यह पूछा गया कि क्या एक बकरा दोबारा भी लग सकता है तो पित्र ने कहा के बिझ तो सकता है लेकिन हम ऐसा नहीं करते क्योंकि एक तो लोगों ने खाना-पीना होता है और दूसरा लोगों की मानसिक तौर से संतुष्टि नहीं होती. यहां तक कि बजाला जाति की देहुरी पर देखा गया कि वे लोग भी बकरे के मीट का प्रसाद ले रहे थे जो किसी और मत/पंथ को भी मानने के कारण मीट आदि को हाथ नहीं लगाते. पूछने पर उन्होंने बताया कि यह रीत जरूरी है इसलिए हम ने चख लिया. उनके पात्र ने कहा था कि वे अपने लड़के का बकरा देने आए थे. यदि वो ऐसा नहीं करते तो बकरा नहीं लगेगा. देहुरी पर पात्र मेल वाले दिन चौकी देता है, सिर हिलाता है और आए हुए लोगों की पुच्छों (प्रश्नों, दिल की बातों) के बारे में बताता है.


पहले कभी इन देहुरियों पर पीने का पानी नहीं होता नहीं था. लेकिन अब वहाँ नल लगा लिए गए हैं. कुछ देहुरियों पर छाया के लिए शैड बना लिए गए हैं और आने-जाने वालों के लिए बर्तनों का भी प्रबंध कर लिया है ताकि आने वाले लोग भोजन कर सकें. बकरा बनाने के लिए वहीं से लकड़ियाँ इकट्ठी कर के आग जला ली जाती है.


कुछ देहुरियों पर यह भी देखा गया है कि उनके अंदर अलग-अलग फोटो लगाई गई होती हैं जिनमें अलग-अलग गुरुओं, पीरों, फकीरों, देवी देवताओं आदि के चित्र हैं. यह भी देखा गया है कि अन्य फोटो के साथ-साथ एक देहुरी में कुत्ते का चित्र लगा हुआ है. लगता है कि जब कोई शहीद हुआ होगा या कोई औरत सती हुई होगी वह भी साथ ही होगा. उसकी भी पूजा होती है.


मेघों की बहुत सी जातियों का पता लगा है. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान आदि के मेघ जाति के कबीरपंथियों की जातियां नीचे दी जा रही हैं. इसमें देखा गया है कि बहुत सी ऐसी जातियां है जो कि एक ही जाति का बिगड़ा हुआ नाम प्रतीत होता है. इसी कारण इन जातियों की लंबी सूची बन गई है. कुछ ऐसी भी जातियां हैं जो ब्राह्मणों, पंडितों, खत्रियों और अन्य दूसरी ऊंची जातियों में भी मिलती हैं. नीचे कुछ जातियों की लिस्ट दी जा रही है हालांकि यह भी पता लगा है इससे अलावा और भी जातियां हैं. प्राप्त जानकारी के आधार पर जातियों की वर्णक्रमानुसार तैयार की हुई सूची नीचे लिखे अनुसार है-


अगर, अस्सरिया, एरियन, कंगोत्रा, ककड़, कतियाल, कड़थोल, कपाहे, कम्होत्रे, कलसोंत्रा, कलमुंडा, करालियाँ, कांचर, कांडल, काटिल, काले, किलकमार, कूदे, केशप, कैले, कोकड़िया, कोण, खंगोतरे, खंडोत्रे, खड़िया, खढ़ने, खबरटाँगिया, खरखड़े, खलड़े, खलोत्रा, खोखर, खोरड़िये, गंगोत्रा, गाँधी, गुटकर, गड़गाला, गड़वाले, गिद्धड़, गोत्रा, गौरिये, घई, घराई, घराटिया, घराल, घुम्मन, चखाड़िये, चगोत्रा, चगैथिया, चबांते, चलगौर, चलोआनियाँ, चितरे, चोकड़े, चोपड़ा, चोहड़े, चोहाड़िए, चौदेचुहान, चौहान, छापड़िया, छोंके, जजूआं, जल्लन, जल्लू, टंभ, टनीना, टुंडर, टुस्स, टेकर, टोंडल, डंडिये, डंबडकाले, डग्गर, डांडिये, डोगरा, डोगे, ढम, ढींगरिये, तरपाथी, तराहल, तरियल, तित्तर, थंदीरा, थिंदीआलिया, थापर, दत्त, दमाथियां, दलवैड, दरापते, धूरबारे, नजोआरे, नजोंतरे, नमोत्रा, पंजगोत्रे, पंजवाथिए, पंजाथिया, पकाहे, पटोआथ, पडेयर, पराने, परालिये, पलाथियाँ, पवार, पहाड़ियाँ, पाड़हा, पानोत्रा, पाहवा, पूंबें, पौनगोत्रा, प्राशर (पराशर), बकरवाल, बजगोत्रे, बजाले, बदोरू, बक्शी, बग्गन, बाखड़ू, बादल, बटैहड़े, बरेह, बिल्ले, बैहलमें, भगोत्रा, भलथिये, भसूले, भिंडर, भिड्डू, मंगलीक, मंगोच, मंगोतरा, मंजोतरे, मड़ोच, मनवार, मन्हास, ममोआलिया, मल्लाके, मांडे, मुसले, मैतले, रतन, रत्ते, रमोत्रा, रूज़म, लंगोतरा, लंबदार, लालोतरा, लचाला, लचुंबे, लसकोतरा, लातोतरा, लासोतरा, लीखी, लुड्डन, लेखी, लोंचारे, शौंके, संगलिया, संगवाल, संगोत्रे, सकोलिया, सपोलिया, समोत्रा, सलगोत्रे, सलगोत्रा, सलहान, सलैड, सांगड़ा, साठी, सिरहान, सीकल, सीहाला, सोहला, सुंबरिये, सेह, हरबैठा, हितैषी.


मेघों की देहुरियों पर पहले बहुत सी मनाहियों (निषेधों) की ओर ध्यान दिलाया जाता था. अब तेजी से बदलाव आ रहा है. लोग इनको कम ही मानते हैं. कुछ मनाहियाँ इस प्रकार हैं-

1. किसी अन्य को दूध नहीं बेचना. 2. दूसरी बिरादरी वाले को पीने के लिए भी नहीं देना. 3. घी को तराजू पर नहीं चढ़ाना. 4. जब घर में नया दूध आए तो उसका ‘सुच्चा उतारना’. 5. पहले घी को जठेरों की देहुरी के लिए भेजना. 6. कुछ जातियों में काला कपड़ा पहनने की मनाही. 7. कुंवारे लड़के-लड़कियां मेहंदी नहीं लगाएंगे. 8. कुछ जातियों में बेटी (धी-धियानी) को पूजते हैं कुछ में दौहित्रवान (दोहतरवान, नातियों वाले) की पूजा की जाती है और कुछ जातियों में दोनों को ही माना जाता है. 9. मायके वालों का सुरमा ही इस्तेमाल करना होता है. 10. बालों में काला परांदा नहीं लगाना.


लेकिन आजकल इन मनाहियों में बहुत सी ढील आ गई है. इनके अलावा अलग-अलग देहुरियों पर कई और तरह की अलग-अलग मनाहियाँ बताई जाती हैं. यहां यह भी बताने योग्य है कि बहुत से मेघ जन समुदायों की जातियों में परिवार की बहू तब तक अपनी जाति में शामिल नहीं मानी जाती जब तक वो अपनी जाति की देहुरी पर जाकर रकाधे (शादी के फेरे) नहीं ले लेते. इसलिए कई देहुरियों पर देखा गया है कि बड़ी उम्र के लोग भी जो पहली बार देहुरी पर जाते हैं वे वहां जा कर रकाधे लेते हैं. इसके लिए उन्हें कहा जाता है कि वे अपने विवाह के समय की महां जाल वाली चुन्नी, कलीरे, सेहरा आदि और परिवार के बड़े परिवारिक मेंबरों को साथ लेकर लेकर आएँ.

(देहुरियों की फोटो उपलब्ध कराने के लिए जम्मू के श्री चंद्रमोहन स्कोलिया या का आभार)



मेघ जागृति फाउंडेशन (रजिस्टर्ड) पंजाब, गढ़ा, जालंधर ने सेमिनार का आयोजन किया

(एक रिपोर्ट)


मेघ जागृति फाउंडेशन (रजिस्टर्ड) पंजाब, गढ़ा, जालंधर ने मेघ भगत समुदाय से संबंधित विभिन्न विषयों पर मंथन करने के लिए 04 मार्च 20ॊ8 को एक सेमिनार का आयोजन किया.

सेमिनार का एजेंडा निम्नानुसार था-

“AGENDA: -

1. DISCUSSION/ DELIBERATION / PAPER READING ON VARIOUS ASPECTS OF MEGH / BHAGAT COMMUNITY CULMINATING IN TO BOOK PROBABLY TO BE RELEASED BY YEAR END, UNDER THE PATRONAGE OF MEGH JAGRITI FOUNDATION.

2. FIXING PRIORITY AREAS OF ACTIVITIES FOR MEGH JAGRITI FOUNDATION REGD. PUNJAB, JALANDHAR.”


सेमिनार का प्रयोजन मेघ-भगत समुदाय से संबंधित विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श आयोजित करके पूरे विमर्श को समाहित करते हुए एक पुस्तक का प्रकाशन अपने तत्वाधान में करना चाहता है. तदनुसार मेघ जागृति फाउंडेशन अपनी गतिविधियों की प्राथमिकताएं भी निर्धारित करना चाहेगा.


सेमिनार में वक्ताओं ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए. उनका सार नीचे दिया गया है.


जैसा कि दिए गए विषय से स्पष्ट था यह एक प्रकार का खुला सत्र था जिसमें हर वक्ता अपनी पसंद के विषय पर बोल सकता था. जिन लोगों को सेमिनार में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था वे अपने विषय के जानकार थे. इस दृष्टि से हरेक वक्ता की बात का अपना महत्व था जो सेमिनार के दौरान झलका.


मेघ भगत समुदाय के सामाजिक संगठनों का अपना-अपना एक प्रभामंडल रहा है जो विभिन्न इलाकों में अपनी गतिविधियाँ चलाते रहे हैं. श्री मोहनलाल डोगरा ने उन संगठनों पर एक बृहद् दृष्टि डालते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मेघ समुदाय इतना सब होने के बावजूद धार्मिक आधार पर बहुत बँटता हुआ नजर आ रहा है. जाति व्यवस्था की वजह से हो रहे सामाजिक भेदभाव के दबाव में कुछ लोग धर्म परिवर्तन कर रहे हैं.


क्योंकि इस सेमिनार की एक समय सीमा तय थी इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से बातचीत नहीं हुई. आशा है आगे चलकर इस विषय पर मेघ समाज में बहस होगी और किन्हीं सेमिनारों में यह विषय विस्तार से कवर किया जाएगा.


समाज का विभाजन केवल धार्मिक आधार पर नहीं होता वो राजनीतिक आधार पर भी होता है. इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हुए श्री एम.आर. भगत (सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त) ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए अपने जीवन के कुछ अनुभव साझा किए कि कैसे गरीबी के कारण मेधावी छात्रों की शिक्षा प्रभावित होती है. उन्होंने कहा कि समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए कि गरीबी के खिलाफ संघर्ष तेज़ हो. उसके लिए जरूरी है कि समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए समतुल्य प्रयास हों. इसी बात को रेखांकित करते हुए श्री इंद्रजीत मेघ ने कहा कि समुदाय के बहुत से गरीब बच्चे हैं जिन्हें शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की बहुत ज़रूरत है. उन्होंने बताया कि ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ ने इस दिशा में कार्य किया है और बहुत से छात्रों को आर्थिक सहायता दी है. इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया अब सघन प्रयास जरूरी हैं. वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समुदाय के विभिन्न संगठनों में सहयोग जरूरी होगा. (श्री इंद्रजीत मेघ ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ के अध्यक्ष रह चुके हैं).


मेघ समुदाय के भीतर उसके अपने कई संगठन हैं जो अपनी-अपनी कठिनाइयों के साथ जूझ रहे हैं. श्री आर.एल. भगत,........... ने इन्हीं कठिनाइयों पर विचार रखे और बताया कि बहुत से संगठन आर्थिक कठिनाइयों के कारण ही अपने लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते. इसी नजरिए से यह बात उठी कि समुदाय के पास अपनी एक बड़ी निधि (फंड) होनी चाहिए जिसका उपयोग समाज के विकास के लिए किया जा सके. ऐसी निधियों का प्रयोग शिक्षा के लिए भी किया जा सकता है और सामाजिक संगठनों के विकास के लिए भी. इसके उपयोग की असीमित संभावनाएं हैं.


श्री बचन सिंह, भूतपूर्व डिप्टी मेयर ने अपनी बात रखते हुए मेघ समुदाय की कुछ अन्य अपेक्षाओं की ओर ध्यान दिलाया. शिक्षा के अतिरिक्त उन्होंने करियर गाइडेंस, वैवाहिकी (मैट्रिमोनियल) की समस्याओं पर विशेष जोर दिया जिनके कारण मेघ समुदाय पर एक दूसरे ही प्रकार का दबाव बन रहा है. ड्रग्स की समस्या भी ख़तरनाक रूप धारण कर चुकी है जिसके कारण युवाओं का जीवन बर्बाद होना गंभीर चिंता की बात है. इस पर विस्तृत बहस की जरूरत है.


पंजाबी साहित्य में पहचान बना चुके कवि और लेखक श्री रामलाल भगत ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि मेघ समुदाय आज भी बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों में बसता है जहां जागीरदारी प्रथा, सामंती प्रथा आज भी प्रचलित है. वहाँ मेघों की अधिकतर जनसंख्या कृषि और कृषि से जुड़े अन्य कामों में लगी है. वहाँ मेघों को अपने रोजगार के लिए पूरी तरह उस जागीरदारी प्रथा के तहत काम करना पड़ता है जो सदियों से चली आ रही है. शोषण, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना ऐसी बातें हैं जो उनकी ज़िंदगी का हिस्सा हैं. वो जागीरदारी प्रथा के सामाजिक-आर्थिक सिस्टम के दबाव में जीने के लिए मजबूर हैं. श्री रामलाल ने सामाजिक कार्य को लेकर भाषा का मुद्दा उठाया जब उन्होंने श्री जी. एल. भगत (जो सेवानिवृत्त इनकम टैक्स कमिश्नर हैं) उनके द्वारा लिखी हुई कुछ पुस्तकों का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि वो पुस्तकें बहुत उपयोगी हो सकती हैं लेकिन अंग्रेजी में लिखी होने की वजह से उनका सही उपयोग मेघ भगत समुदाय नहीं कर पाता.


मेघ भगत समुदाय के इतिहास का विषय इस सेमिनार का महत्वपूर्ण स्पेस रहा. इस विषय पर तीन वक्ताओं ने अपने विचार रखे. प्रसंगवश, इस संबंध में पहला प्राधिकृत शोधग्रंथ डॉक्टर ध्यान सिंह ने दिया था जिसके लिए उन्हें गुरुनानक देव यूनीवर्सिटी, अमृतसर ने पीएचडी की डिग्री प्रदान की है. उनके शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास’ पर ज़बानी तौर पर कई लोगों ने यहाँ-वहाँ बहुत कुछ कहा है. यह सुखद आश्चर्य था कि उक्त शोधग्रंथ के बारे में विद्वानों ने कोई गंभीर आपत्ति इस सेमिनार में नहीं उठाई. अलबत्ता कुछ वक्ताओं ने शोधग्रंथ में कही ऐसी कुछ बातों पर सहमति जताई जो अन्यथा विवादित बताई जाती थीं. अपने शोधग्रंथ के विभिन्न पक्षों की कुछ कमियों के बारे में डॉक्टर ध्यान सिंह ने स्वयं ध्यान दिलाया और कहा कि यह शोधग्रंथ पहला है लेकिन अंतिम नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भगत समुदाय और उसके इतिहास के बारे में उनको पुस्तकालयों में विशिष्ट और विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी थी. इसलिए निर्णय लिया गया कि शोध के लिए फील्ड वर्क को आधार बनाया जाए और लोगों से साक्षात्कार करके सामग्री एकत्रित की जाए जो कि शोध के लिए एक स्वीकृत पद्धति (methodology) है. यह सामग्री केवल मेघ भगत समुदाय के लोगों से बात करके एकत्रित की गई थी. डॉक्टर सिंह ने बताया कि उनको शोध के दौरान इस बात पर विशेष अध्ययन करना पड़ा कि जब जन-जातियाँ मुख्यधारा में शामिल होती हैं तो वो स्वतः शूद्र कैसे हो जाती हैं.


एक अन्य समाज सेवी प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा, जो 80 पार कर चुके हैं और अभी भी समाजसेवा में लगे हैं ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया कि मेघ भगत समुदाय वास्तव में कई जनजातियों का समूह है. बकरवाल और कुछ अन्य जनजातियों का उल्लेख उन्होंने किया. वे बताते हैं कि जम्मू क्षेत्र में मेघों की ख़राब सामाजिक स्थिति का प्रमुख कारण 19वीं शताब्दी में दो बार फैली प्लेग की महामारी में भी दिखता है जिसने उन्हें कई स्तरों पर तोड़ कर रख दिया. उन्होंने अन्य वक्ताओं का समर्थन करते हुए कहा कि मेघ समुदाय के उत्थान के लिए ज़रूरी है कि शिक्षा के क्षेत्र पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाए.


एक ब्लॉगर भारत भूषण ने जानकारी दी कि मेघ जाति के वंशकर्ता का पता ढूंढने पर भी नहीं मिला है. वो इतिहास की सीमाओं में कहीं है ही नहीं. प्राचीन साहित्य में कुछ संकेत मिलते हैं. इतिहासपूर्व मेघों की जानकारी का अध्ययन श्री आर.एल. गोत्रा (सेवानिवृत्त इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर, सीबीआई) ने अपने लंबे आलेख Pre-historic Meghs और Meghs of India में किया है. वो जानकारी वेदों में उल्लिखित है और वैदिक कथाओं के रूप में उपलब्ध है. आलेख लगभग 60 पृष्ठों का है. लेकिन इस कार्य को भी अंतिम नहीं माना जा सकता. इस पर शोध की बहुत गुंजाइश है. श्री ताराराम द्वारा लिखित पुस्तक ‘मेघवंश: इतिहास और संस्कृति’ में मेघ सरनेम वाले राजाओं का उल्लेख है लेकिन उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका संबंध जम्मू कश्मीर और पंजाब की मेघ जाति से है या नहीं. मेघवंश और मेघ जाति के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि मेघवंश एक रेस है जबकि हिंदूओं की जाति प्रथा के अनुसार मेघवंश के तहत कई जातियां हैं. उन जातियों में हमारा मेघ भगत समाज एक अलग जाति है. कई अन्य मेघवंशी जातियाँ हैं जो राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों में विभिन्न नामों के तहत अलग-अलग स्थानों पर बसी हुई हैं. आधुनिक काल के अंतर्गत डॉक्टर ध्यान सिंह का शोध ग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ मेघ समुदाय के पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्ष का इतिहास समेटे हुए है. उसे हम अपने इतिहास की प्राधिकृत जानकारी मान सकते हैं. डॉक्टर ध्यान सिंह उस पर अभी भी कार्य कर रहे हैं और उम्मीद है कि आगे चलकर मेघों के पिछले 150-से 200 वर्ष के इतिहास की एक बेहतर जानकारी मिलेगी. इस सेमिनार में चर्चा के दौरान उभरी जानकारियों और प्रश्नों के आधार पर उस सुझाव की ओर विशेष ध्यान दिलाया कि हमारे समुदाय के धनाढ्य लोगों को एक निधि (फंड) की स्थापना करनी चाहिए जो समाज के उत्थान के लिए जरूरी सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में सहायक हो. इस दिशा में की गई कोई भी पहलकदमी मेघों भगत समाज के भावी इतिहास को दिशा देने की क्षमता रखती है.

कार्यक्रम के अंत में डॉ शिवदयाल माली चेयरमैन, मेघ जागृति फाउंडेशन ने सभी सहभागियों, उपस्थितों और आयोजन कार्य में संलग्न महानुभावों का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा कि इस सेमिनार के साथ उन्होंने वास्तव में एक कार्यक्रम की शुरुआत की है. आने वाले समय में कई और सेमिनार आयोजित किए जाएंगे. अधिक से अधिक विद्वानों को जोड़ा जाएगा. सेमिनार में पधारे सहभागियों का उन्होंने धन्यवाद किया और अपने वक्तव्य में उनके द्वारा दी गई जानकारी की प्रशंसा करते हुए उसे अमूल्य बताया और कहा कि समाज इस जानकारी से लाभान्वित होगा और समाज के उत्थान के लिए एक कार्यनीति बनाने में मदद मिलेगी.


मेघ जागृति फाउंडेशन का प्रस्ताव कि वे इस सेमिनार से प्राप्त जानकारी के आधार पर एक पुस्तक प्रकाशित करेंगे एक बहुत महत्वपूर्ण एजेंडा की ओर संकेत करता है. कहा जा सकता है कि यह अपनी तरह का पहला और महत्वपूर्ण आयोजन था.


Sitting Row (Left to Right): Sh. M. L. Bhagat, Sh. Som Nath, Sh. Bharat Bhushan, Adv. R.L. Bhagat, Prof. Kasturi Lal Sotra, Sh. M.R. Bhagat, Thekedar Ram Chand, Sh. Inderjit Megh, Prof. Ram Lal

Standing Row (Left to Right): Sh. Nand Kishore Mali, Sh. Tilak Raj, Sh. Hari Parkash, Sh. Parvinder Kumar, Sh. Balbir Kumar, Sub. C. L. Bhagat, Sh. Tajinder Pal Kailey, Sh. Mohinder Pal Bhagat, Dr. Dhian Singh, Dr. Shiv Dayal Mali, Sh. Ramesh Bhagat, Sh. Dushant Bhagat, Sh. Dwarka Parshad




कबीर जी महाराज और पुनर्जन्म का सिद्धांत


कबीर जी महाराज की वाणी में बहुत से अंतर्विरोधों की बात होती रहती है. उसका मुख्य कारण कबीर की वाणी में दूसरों के द्वारा जबरदस्ती ठूँसी गई बातें है. यही वजह है कि कबीर जब कर्म और कर्मफल की बात करते हैं तो वह एक अलग अर्थ देता है जबकि उनके समय की मनुवादी विचारधारा का पुनर्जन्म और उस पर आधारित कर्मफल का सिद्धांत उससे मेल नहीं खाता. उसे इस बात के साथ जोड़ कर देखने की ज़रूरत है कि भारतीय दर्शन में इच्छा करने को कर्म कहा गया है. इसे लेकर कबीरपंथी एकमत नहीं हैं कि कबीर का कर्म सिद्धांत किस ओर झुका हुआ है. लेकिन जब कबीर को बौधमत की समकालीन परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो मालूम पड़ता है कि कबीर पुनर्जन्म आधारित कर्म सिद्धांत की बात तो नहीं ही करते हैं. जन्म-मरण, आवागमन से बाहर जाने की बात करने वाला कबीर जैसा विवेकी व्यक्ति पुनर्जन्म की बात कैसे कर सकता है. इसे तर्क पर तौलना ज़रूरी है. कबीर तो स्पष्ट कह रहे हैं कि ‘पंडितवाद वदंते झूठा’. ज़ाहिर है कि उनकी विचारधारा मनुवादी विचारधारा से अलग थी.- भारत भूषण, चंडीगढ़.



                    


सूचनाएँ

जो हमारे बीच नहीं रहे

Our deepest sympathies go out to Their families.


With profound grief it is informed that our friend .Tilak Raj Bhagat (Retd. Chief Manager, SBOP) and very important person of Megh Jagriti  Foundation, Garha, Jalandhar (Bank Enclave Jalandhar) expired on 18 January, 2018.


Sardar Narain Singh father of Col. Sukhdev Singh, Patiala left for his heavenly abode on 23-02-2018. We are deeply saddened by the loss. Heartfelt condolences.



Donations

श्री/सुश्री

Pradeep Bhagat, Rs.1000/- (Dec.2017)

(जन. से मार्च 2018)

Kamal Kishore, 109, Sector-30, Chandigarh, Rs.500/-

Santosh Bhagat, FM-70,  Model House, Jalandhar. Rs.100/-

B.R. Rattan, 2253, 38-C, Chandigarh. Rs.1100/-

Ramesh Kiran, 233, 23-A, Chandigarh. Rs.1100/-

Viru Mal, 2601, 22-C, Chandigarh. Rs.1000/-

Vijay Laxmi, 3014, 20-D, Chandigarh. Rs.5000/-

G.D. Bhagat, 3255/1, 49-D, Chandigarh. Rs.1000/-

Sunita Bhagat, 2601, 22-C, Chandigarh. Rs.2400/-

Col. Raj Kumar, 1318, 34 C, Chandigarh, Rs.2100/-

Kamal Kanta, 3584, 46-C, Chandigarh.  Rs.1000/-

Kewal Kumar, 3348/2, 40-D, Chandigarh.  Rs.500/-

Santosh Bhagat, FM-70,  Model House, Jalandhar. Rs.100/-

Rakesh Kumar, C-174, Sector-126, Model Town, Greator Mohali.  Rs.8000/-

Santosh Bhagat, FM-70,  Model House, Jalandhar. Rs.100/-

Bala Devi, 349, 15-A, Chandigarh. Rs.500/-

Thakur Singh, 2870/1, Sector-47, Chandigarh.   Rs.500/-

(ऑल इडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ को पिछले वर्ष की आखिरी तिमाही मेैं रु.4500/- की राशि पात्र छात्रों सहायता के लिए प्राप्त हुई थी. सभा की कार्यकारिणी द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसरण में मार्च, 2018 में उस राशि में से रु.1500/- दो छात्रों को भिजवा दिए गए. शेष राशि आगले वित्त वर्ष में शिक्षा में सहायता के लिए इस्तेमाल की जाएगी.)  


Matrimonials

1. Wanted suitable match for a Girl. Family is resident of Jalandhar. DOB 06.09.1994, Time of birth 1 P.M, Jalandhar City. Height 5’-8”, Qualification: BTech. (Hons), from University of Technology, Sydney. Working as Business Analyst at Sydney (Australia). Contact No. +91 9872111188.


2. Manglik girl, date of birth 27-10-90, time of birth 7.10 P.M at Fajjupura, Gurdaspur. Hight  feet, fair and slim. Qualification BSc. Computer Science, MCA. Doing private job. Contact No. +91 9780 581 866


4. Required suitable match for Ambala based girl. Date of Birth 11-03-90. Time of birth 7.25 PM, at Ambala. Both parents retired, Brother Mechanical Engineer in Ministry of Petrolium. All siblings married. Girl Pursuing Ph.D in Pharmacology at Hisar University. Contact. No. +91 7404641904


3. Wanted suitable girl for MBBS Doctor Boy, Date of birth 25-2-989 Time of birth 1:55 a.m., at Chandigarh. Height 5’-8”. Sub caste (Gotra) Damathia. Preferred MBBS girl also preferred IAS/PCS or any Gazetted post. Presently living at Mohali near Chandigarh Contact No. +91 9888 694 211.






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