Meditate with Indra Blog : Ego, प्रज्ञा परिशोधन

It decks me only to mock me,

this jeweled chain of mine.

It bruises me on my neck,

it strangles me when I struggle to tear it off.

It grips my throat,

it chokes my singing.

Could I but offer it to your hand, my Lord,

I would be saved.

Take it from me,

and in exchange bind me to you with a garland,

for I am ashamed to stand before you

with this jeweled chain on my neck.

--Tagore

 

Comment:

Ego, a jeweled chain

The worth of ego is parallel to that of a jeweled chain. Just as jeweled chain bruises the neck it adorns, similarly ego bruises the awareness that embraces it. Jeweled chain strangles us when we struggle to rip it off. Ego chokes us when we tussle to sever connection. Jeweled chain is a discomfort at its best, still we wear it, and ego is distress to our freedom and we still embrace it. 

Question:

Are you ready to release it in exchange of connecting to the Divine?

--Indra (Dhir) Wadehra

 

विषय : मौन

दुःख हमें भैतिक जगत से दूर रहने की क्षमता प्रदान करता है और मौन अंतरतम के पुण्य मंदिर में प्रवेश प्रवृत्ति प्रदान करता हैं !

---इन्द्रा धीर वडेरा

...यह मन की एकात्रता में हमारी सहायता करता है; किंतु इसका इससे भी अधिक गूढ़ महत्व हमारे उच्चतर स्वभाव का अनावरण करने में है !” ---स्वामी परमानंद, मौन योग 2

प्रज्ञा परिशोधन

प्रश्न : हम अपने बच्चों की अध्यात्मिक उन्नति कैसे करें ताकि वह एक अच्छे नागरिक बन पाएँ ? --कविता चोपड़ा (भारत)

उत्तर : बच्चे सदा कथा सुनने के उत्सुक होते हैं ! बच्चों की आत्मिक उन्नति के लिए उन्हें आसानी से शिक्षा कहानी के माध्यम से ही दी जाती है ! उन्हें रामचरितमानस जैसे अद्भुत शास्त्र से परिचित करवाने के लिए आज के युग में टी. वी. जैसे साधन का प्रयोग किया जा सकता है और रात को सोने से पहले उन्हें कोई सार गर्भित पौराणिक कथा सुना, कहानी के माध्यम से बालक का मन विकसित किया जा सकता है ! हमारी पौराणिक कथाएँ बच्चों की नैतिक और अध्यात्मिक उन्नति के लिए एक सर्व श्रेष्ट साधन हैं ! आपके इस प्रश्नोत्तर का स्पष्टीकरण मैं दूसरे प्रश्नोत्तर के माध्यम से करने की अनुमति लेते हुए आगे चलती हूँ !

प्रश्न : मैंने अपने ही पुराणों की कुछ कहानियाँ पढ़ी हैं और मुझे उनकी सत्यता पर कुछ शंका सी है ! आप मेरी इस शंका का समाधान करेंगी ? --पुष्पा सेठ (अमेरिका)

शोधन : ऊपर लिखित दोनों प्रश्नों का उत्तर देने से पहले यदि हम किसी कहानी का उदाहरण लें तो उत्तर देने में कुछ आसानी होगी ! यहाँ हम एक ऐसी सारगर्भित पौराणिक कथा लेते हैं जिसका उल्लेख करते हुए माँ भुवनेश्वरी अपने बालक नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) के कोरे मन, उसकी कोमल मेधा, और निर्मल आत्मा पर कुदरत के नियम की एक गहरी छाप छोड़ती है !

हिन्दी चेतना का पिछला विशेषांक डॉ नरेन्द्र कोहली के जीवन और उनकी हिन्दी साहित्य के प्रति सेवा के विषय में निकला था ! इस लिए आज हम उदाहरण वहीं से लेते हैं !

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तोड़ो कारा तोड़ो'' में डॉ नरेन्द्र कोहली कहानी का संक्षिप्त उल्लेख कुछ यूँ करते है : बचपन में एक दिन नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) चीखते चिल्लाते और छुरी लेकर भागते फिर रहे थे ! घर के सभी सदस्यों नें उन से छुरी पकड़नी चाही लेकिन असफल रहे ! अंत में, जब माँ भुवनेश्वरी और दो नौकरानियों की पकड़ में नरेन्द्र आए तो माँ भुवनेश्वरी उनका ध्यान दूसरी ओर आकर्षित करती हैं और उन के सिर पर पानी डालती हुई कहती हैं "शिव शिव ! हर-हर महादेव ! बोल शिव ! बोल शिव !''

नरेन्द्र का चिल्लाना कम हुआ तो माँ बोली, "अब तू पाजीपन करेगा तो महादेव तुझ से रूठ जाएँगे !" नरेन्द्र के "सच माँ ?'' प्रश्न पर माँ भुवनेश्वरी उन्हें पौराणिक-कथा सुनाती हैं !

इस प्रश्न के संदर्भ को लेकर नरेन्द्र कोहली यहाँ माँ और बेटे के मध्य हुए वार्तालाप का उल्लेख करते हुए लिखते हैं :

भुवनेश्वरी नें कथा आरंभ की, "किशोरावस्था में एक दिन खेलते हुए गणेश जी की दृष्टी एक बिल्ली पर जा पड़ी ! अपनी चपलता के वशीभूत होकर, उन्होंने उसे नाना प्रकार के कष्ट देते हुए, मार-पीट कर उसे घायल कर डाला ! किसी प्रकार अपने प्राण बचाकर बिल्ली भाग गई ! कुछ देर पश्चात गणेश जी अपनी माता के पास पहुँचे ! उन्होंने आश्चर्य से देखा कि माँ के अंगों पर स्थान-स्थान पर मार के चिन्ह वर्तमान थे ! उन्होंने अत्यन्त व्यथित होकर उसका कारण पूछा ! माँ ने विषण्णता से उत्तर दिया, ‘तुम्हारे ही कारण मेरी यह दुर्दशा हुई है !’ गणेश जी नें अत्यंत व्यथित होकर, आँखों में आँसु भर कर पूछा, 'क्या कह रही हो माँ ! मैंने तुम्हें कब मारा ?' देवी ने उत्तर दिया, तुम ही विचार कर देखो कि आज तुमने किसी प्राणी को मारा है या नहीं ?'
गणेश जी बोले, 'हाँ ! अभी कुछ देर पहले मैंने एक बिल्ली को मारा है !' माँ बोली, ध्यान रखो पुत्र ! तुम किसी को भी पीड़ित कर रहे हो, तो मुझे ही पीड़ित कर रहे हो ! अंततः तुम्हारे उस पाजीपन का दुष्परिणाम मुझे ही भुगतना पड़ता है !' "

"माँ !" नरेन्द्र की आँखों में आँसू आ गए, "मैं किसी को भी परेशान नहीं करुँगा माँ !''

कविता और पुष्पा जी, लेखक कहानी लिखे या कवि कविता का सृजन करे, हर निखरे हुए कलाकार का ध्यान इसी तरफ़ होता है कि पाठक का विवेक कैसे जागृत हो, उसे सत्य की झलक कैसे मिले, उसका जीवन श्रेयपूर्ण कैसे हो ! हमारे ऋषि मुनियों नें जीवन के गहन रहस्य और महत्वपूर्ण सच्चाइयाँ पुराण-कथाओं में भर जीवन के रहस्यमयी सत्य जानने का एक आसान माध्यम हमें प्रदान किया है !

ऊपर लिखित पुराण-कथा किसी भी दृष्टिकोण से बहुत सारगर्भित है ! हमारा बच्चा किसी को किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचाए उसका कष्ट हमें होगा ! लेकिन यह भाव हम बालक को कैसे प्रकट करें, उससे हम अपने कष्ट का स्पष्टीकरण कैसे करें, बालक में उदारता कैसे विकसित हो, उसका विवेक कैसे जागृत हो, उसके हृदय पर सत्य की गहरी छाप कैसे छोड़ें, इन सब प्रश्नों से हम दिन-रात जूझते हैं ! लेकिन बच्चे को सोने से पहले पौराणिक-कथा सुना हम बालक का आसानी से विवेक जागृत करते हुए उसकी निर्मोल मेधा को विशुद्ध करनें में अपना योगदान दे जाते हैं !

पुष्पा जी, आपका प्रश्न व आपकी शंका पौराणिक कहानियों की सत्यता पर है !
पुराण की मर्म निहित कथा में घटना की प्रमाणिकता का उतना महत्व नहीं जितना महत्व उसके द्वारा किए गए इशारे का है ! घटना की प्रमाणिकता महत्वपूर्ण स्थान वहाँ लेती है जहाँ प्रश्न निर्दोषिता या अपराधिता का हो !

संक्षेप में, मेरा यह मत है कि कथोपकथन में दृष्टिकोण का, सारगर्भित पुराण-कथाओं में प्रतीक का और अपराधिता व निर्दोषिता की स्थिति में घटना की प्रमाणिकता का एक महत्वपूर्ण स्थान है ! पौराणिक कथा में इंद्रियग्राह्य प्रमाणिकता का महत्व कम है परंतु कथा के द्वारा किए गए इशारे का महत्व उससे कहीं ज्यादा है !!!

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इन्द्रा (धीर) वडेरा

 
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