Glory of Ramcharitmanas -by Gopaldasji (1851)

In 1851, Gopaldasji, a saint, composed "Ramayana Mahatmya" (Glory of Ramayana) to pay tribute to ShriRamcharitmanas. "Ramayana Mahatmya" contains a beautiful description of the greatness of Ramcharitmanas. 



श्री गोपालदासकृत
रामायण माहात्म्य प्रारंभः |



दो.- गुरु हरि हर गण इश धी, सुमिरौं तुलसीदास |
करत गोपाल माहात्म्य श्री, रामायण सुखरास ||१||

रामायण सुरतरूकी छाया | दुःख भये दूरि निकट जो आया ||
सप्तकांड स्तंभ सुहाई | दोहा लघु शाखा छबि छाई ||
शुचि सोरठा सीठका कोई | पत्री बहु चौपाई जोई ||
छंदनकी शोभा अति रूरी | जनु नवीन अंकुरछवि पूरी ||
अक्षर सुमन रहे गहगाई | अति अद्भुत सुगंध कविताई ||
विविधप्रकार अर्थ सोई फल | श्रोता सुमति स्वादु जानै भल ||
भक्ति ज्ञान वैराग्य सरस रस | बीजा दोय निर्गुण सगुण अस ||
मुनि भुशुंड शिव प्रथमहि गाई | सोई गाइ जगहेतु गोसांई ||
 
दो.- तुलसीदास रामायण, नहिं करते परचार |
कालिके कुटिल जीवये, को कर तौ निस्तार ||२||

रामायण सुरधेनुसमाना | दायक अभिमत फल कल्याना ||
गुण समूह कवि सकैं कौन गनि | जासु प्रभाव सरिस चिन्तामनि ||
रामअयन रामायण आही | वर्णि पार पावै को ताही ||
रामायण अद्भुत फुलवारी | रामभ्रमर भूषित रूचि भारी ||
श्रीरामायण जेहि घरमाहीं | भूत प्रेत तहं भूलि न जाहीं ||
नहिं गति तहाँ दरिद्रहुकेरी | तहं श्री महावीरकी फेरी ||
यंत्र मंत्र सगुणोती जेती | रामायणमहँ जानिय तेती ||
प्रीति करैं रामायणमाहीं | तेहि सम भाग्यवंत कोउ नाहीं ||
 
दो.- रामायण सम नहिं कोउ, सब उपमा उपमेय |
उपमा भाषा औरकी, कैसे कोउ कवि देय ||३||
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