आवाज़ साधने की तैयारी

गायकी में गले का तैयार होना बहुत आवश्यक है. गला अगर तैयार है तो गायकी स्वाभाविक रूप से, बिना ज्यादा प्रयास किये होती है. फिर सुर का सही ज्ञान हो तो संगीत सीखना आसान हो जाता है.

गले की तैयारी के दो हिस्से हैं.
  • सांस की स्थिरता और फेफड़ों की लम्बी सांस खींचने की शक्ति
  • आवाज़ की सुगमता और सफाई
कुछ लोगों में दोनों ही खूबियाँ प्राकृतिक रूप से मौजूद होतीं है. लेकिन ज्यादातर आम लोगों में ये दोनों खूबियाँ पूरी तरह से तैयार नहीं होती है और इसलिए जैसे हम व्यायाम कर के शरीर को सुडौल और मजबूत बनाते है, वैसे ही, गले को तैयार करने के लिए गायकी का व्यायाम बहुत जरूरी है. हम यहाँ पर ऐसे ही कुछ बहुत सरल और प्रभावशाली अभ्यास बताएँगे जो आपको नियमित रूप से करने होंगे. २-३ महीने के अन्दर ही आप फरक महसूस करने लगेंगे.

ओंकार का अभ्यास
उस्ताद हाफिज़ खां ओंकार की ध्वनि और उसके सतत अभ्यास को संगीत सीखने वालों के लिए रामबाण मानते हैं. उनके हिसाब से सुबह 5 बजे उठ के किया हुआ ओंकार का रियाज़ फेफड़ों को मजबूत करता है, आवाज़ साफ़ करता है और सांस को स्थिर बनाता है. धीरे धीरे अभ्यास करते रहने से एक सांस में ज्यादा लम्बे अन्तराल तक सुर लगा सकते हैं.

ओंकार के अभ्यास के लिए आप अपने मूल 'स' स्वर में ही ओंकार (ओ म) का उच्चारण करें. ये कम से कम 20 मिनट रोज करें. अभ्यास की सुविधा के लिए काली १ के मूल स्वर में ओमकार के अभ्यास की ऑडियो रिकॉर्डिंग नीचे उपलब्ध है. आप इसको चला कर इसके साथ साथ घर में अभ्यास कर सकते है.

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खर्ज का अभ्यास
खर्ज सप्तक के सुर ('सुर की समझ' लिंक देखें) सबसे नीचे और भारी होते हैं. जब आपने अपना मूल 'स' स्वर पकड़ लिया हो तो उसके नीचे से नी ध प म ग रे स का अभ्यास खर्ज का अभ्यास कहलाता है. खर्ज के सुर लगाना आम तौर पे आसान नहीं होता. संगीत रियाज़ का एक बड़ा रहस्य जो बहुत लोग नहीं जानते हैं कि खर्ज के सुर में आप जितना ज्यादा रियाज़ करेंगे, आप उतनी आसानी से ऊंचे सुर लगा  पाएंगे. जितना ऊंचा आपको गाना हो, उतने ही नीचे सुर में रियाज़ करें. ओंकार के अभ्यास से जहाँ आपकी सांस मजबूत और स्थिर बनेगी, खर्ज सुरों के अभ्यास से आपका गला पूरा खुलेगा और आवाज़ साफ़ होगी.


साँस के सही नियंत्रण और प्रयोग का अभ्यास

गायन कला साँस की लय और संगीत की लय का बड़ा बारीक़ तालमेल है. साधरणतयः गाते समय कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा साँस भर के (वो भी सही समय पर), और फिर साँस को धीरे धीरे छोड़ते हुए, साँस का भरपूर इस्तेमाल करते हुए गायन किया जाता है. गाने के बीच साँस लेना एक कला है. बहुत जल्दी साँस लेने पर या जल्दी साँस भर के रोके रखने पे गायकी में तनाव आ सकता है, या फिर लय बना कर रखने में परेशानी हो सकती है. अच्छे गायन के लिए साँस बड़ी सधी हुई, एक सामान, पूरी तरह नियंत्रण में और गहरी होनी चाहिए. साँस मज़बूत करने के लिए प्राणायाम एक अचूक उपाय है जिसके निरंतर अभ्यास से गायन की क्षमता में बहुत बढ़त होती है. रियाज़ और गायन में साँस के प्रभाव के बारे में जानने के लिए ये नोट पढ़ें - रियाज़ और साँस

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