भारद्वाज

महर्षि भारद्वाज रचित ‘विमान शास्त्र‘ में भी अनेक यंत्रों का वर्णन है, जिसका उल्लेख विमान शास्त्र अध्याय के प्रसंग में करेंगे।


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विमान विद्या के जनक महर्षि भरद्वाज
विमान विद्या के जनक महर्षि भरद्वाज

जन सामान्य में हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के बारे में ऐसी धारणा जड़ जमाकर बैठी हुई है कि वे जंगलों में रहते थे, जटाजूटधारी थे, कोपीन और वल्कल वस्त्र पहनते थे, झोपड़ियों में रहते हुए दिन-रात ब्रह्म-चिन्तन में निमग्न रहते थे, सांसारिकता से उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहता था।

इस एकांगी अवधारणा का एक बहुत बड़ा अनर्थकारी पहलू यह है कि हम अपने महान पूर्वजों के जीवन के उस पक्ष को एकदम भुला बैठे, जो उनके महान् वैज्ञानिक होने को न केवल उजागर करता है वरन् सप्रमाण पुष्ट भी करता है। महर्षि भरद्वाज हमारे उन प्राचीन विज्ञानवेत्ताओं में से ही एक ऐसे महान् वैज्ञानिक थे जिनका जीवन तो अति साधारण था लेकिन उनके पास लोकोपकारक विज्ञान की महान दृष्टि थी।

ऋग्वेद के मंत्रों की शाब्दिक रचना जिन ऋषि परिवारों द्वारा हुई है, उनमें सात अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन सात में महर्षि भरद्वाज अनन्यतम हैं। ये छठे मण्डल के ऋषि के रूप में विख्यात हैं। भारतीय वांग्मय में अनेक स्थानों पर इन्हें बृहस्पति का पुत्र बताया गया है। एक ऋषि तथा मन्त्रकार के रूप में भरद्वाज का उल्लेख अन्य संहिताओं तथा ब्राह्मणों (ब्राह्मण-ग्रंथों) में प्राय: हुआ है। रामायण तथा महाभारत में भी गोत्रज ऋषि के रूप में भरद्वाज का उल्लेख है। इन्हें एक महान् चिन्तक और ज्ञानी माना गया है।

वेदकाल से लेकर महाभारत तक मिलती है भरद्वाज परंपरा
ऋग्वेद से लेकर महाभारत तक जिन महर्षि भरद्वाज का उल्लेख स्थान-स्थान पर प्राप्त होता है, उनके जन्म का वृत्तान्त बड़ा विचित्र है। श्रीमद्भागवत, मत्स्य-पुराण (8-27( 49-15-33), ब्रह्म पुराण (2-38-27) और वायु पुराण (99-137, 148, 150, 169) में यह कथा कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप में दी गयी है। इन सबमें इन्हें उतथ्य ऋषि का क्षेत्रज और बृहस्पति का औरस पुत्र बतलाया गया हैं उक्त सभी के अनुसार ये देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे। माता ममता और पिता बृहस्पति दोनों के द्वारा परित्याग कर दिये जाने पर मरुद्गणों ने इनका पालन किया। तब इनका एक नाम वितथ पड़ा। जब राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र सम्राट भरत का वंश डूबने लगा, तो उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु मरुत्सोम यज्ञ किया, जिससे प्रसन्न होकर मरुतों ने अपने पालित पुत्र `भरद्वाज´ को उपहार रूप में भरत को अर्पित कर दिया-

भरत का दत्तक-पुत्र बनने पर ये ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गये थे। इनका निवास गोवर्द्धन पर्वत (व्रज-क्षेत्र) पर था जहाँ इन्होंने वृक्ष लगाये। (कालान्तर में गोवर्द्धन पर्वत पुन: वृक्षहीन हो गया। केन्द्र में केबिनेट मंत्री तथा उत्तर प्रदेश के (द्वितीय) राज्यपाल रहे डॉ0 कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने जब `वन-महोत्सव´ के नाम से वृक्षारोपण का आंदोलन चलाया, तो उस समय इस पवित्र पर्वत पर उन्होंने वृक्षारोपण कराया था।

भरद्वाज के जन्म की जो विचित्र कथा विभिन्न ग्रंथों में दी है, उसमें क्या रहस्य छिपा है, यह अन्वेषण का विषय है। अभिधा (शब्दों के अर्थ ज्यों के त्यों मान लेने) में यह कथा देवगुरु बृहस्पति के आचार-विचार पर आक्षेपपूर्ण दिखती है( परन्तु लक्षणा या व्यंजना में इसके गूढ़ रहस्य के अन्तर्निहित होने की पूरी संभावना इसलिए बनती है क्योंकि ऋग्वेद में बृहस्पति के संदर्भ में किया गया वर्णन खगोलीय घटनाओं से जुड़ता है। इनकी पत्नी तारा के चन्द्रमा द्वारा अपहरण और उससे बुध की उत्पत्ति की पौराणिक कथा अपने में खगोल-शास्त्रीय किसी रहस्य को छिपाये है, यह स्पष्टतः भासित होता है।

भरद्वाज आंगिरस गोत्र में उत्पन्न एक वैदिक ऋषि हैं। ये गोत्र प्रवर्तक तथा वैवस्वत मन्वन्तर के सप्त ऋषियों (कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज) में से एक हैं।

महाभारत के अनुसार अजेय धनुर्धर तथा कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं के पुत्र थे। भरद्वाज ने एक बार भ्रम में पड़कर अपने मित्र रैभ्य को शाप दे दिया और बाद में मारे शोक के जलकर प्राण त्याग दिये। परन्तु रैभ्य के पुत्र अर्वावसु ने इन्हें अपने तपोबल से जीवित कर दिया। वन जाते समय तथा लंका-विजय के पश्चात् वापस लौटते समय श्री रामचन्द्र जी इनके आश्रम में गये थे। वायुमार्ग से पुष्पक विमान से लौटते समय प्रभु राम महर्षि भरद्वाज के आश्रम के वर्णन करते हुए कहते हैं-

(सुमित्रानन्दन! वह देखो प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजा रूप धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं।) (वा0रा0, अ0का0, 54-5)


महर्षि वाल्मिकी अपने ग्रंथ रामायण में लिखते हैं- श्रीराम चन्द्र जी ने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया।

तीर्थराज प्रयाग में संगम से थोड़ी दूरी पर इनका आश्रम था, जो आज भी विद्यमान है।
महर्षि भरद्वाज की दो पुत्रियाँ थीं, जिनमें से एक (सम्भवत: मैत्रेयी) महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्याही थीं और दूसरी इडविडा (इलविला) विश्रवा मुनि को-

विश्रवा-इडविडा के ही पुत्र थे यक्षराज कुबेर, जिनकी स्वर्ण-नगरी लंका ओर पुष्पक विमान को रावण ने छीन लिया था। वर्णन आता है कि महर्षि भरद्वाज धर्मराज युधिष्टिर के राजसूय-यज्ञ में भी आमंत्रित थे।

महर्षि भरद्वाज आंगिरस की पन्द्रह शाखाओं में से शाखा प्रवर्तक तथा एक मन्त्रदृष्टा ऋषि हैं। (वायुपुराण-65, 103( 207 तथा 59, 101)। ये आयुर्वेद शास्त्र के आदि प्रवर्तक भी हैं, जिसे इन्होंने आठ भागों में बाँटा था। अष्टांग आयुर्वेद से प्राय: सभी आयुर्वेदज्ञ सुपरिचित हैं और महर्षि ने इन भागों को पृथक-पृथक कर इनका ज्ञान अपने शिष्यों को दिया था। इन्होंने आयुर्वेद पर प्रथम संगोष्ठी का आयोजन किया था। आयुर्वेद की शिक्षा इन्होंने इन्द्र से ली थी (भाव प्रकाश)। काशिराज दिवोदास और धन्वन्तरि इन्हीं के शिष्य थे (हरिवंश पुराण)।

यह तो रहा महर्षि भरद्वाज का एक वैदिक एवं पौराणिक रूप( किन्तु व्यक्तित्व एवं कृतित्व की दृष्टि से उनके जीवन का जो दूसरा रूप है, वह है एक महान् तथा अद्वितीय वैज्ञानिक का। वे जहाँ आयुर्वेद के धुरन्धर ज्ञाता थे, वहीं मंत्र, यंत्र और तंत्र तीनों क्षेत्रों में पारंगत थे। दिव्यास्त्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के यन्त्र तथा विलक्षण विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आज तक उन्हें कोई पा नहीं सका है। उनके इस रूप के बारे में लोगों को शायद ही कोई जानकारी हो क्योंकि ऋषि-मुनि की हमारी कल्पना ही बड़ी विचित्र रही है।

विमानशास्त्री महर्षि भरद्वाज
एक महान् आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त भरद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे। वेदों में विमान संबंधी उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलते हैं। ऋभु देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेख ऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है। ऋभुओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उड़ने वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी पाया जाता है।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान’ के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं। लेकिन इन सबको कपोल-कल्पित माना जाता रहा है। लगभग छह दशक पूर्व सुविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डॉ0 वामनराव काटेकर ने अपने एक शोध-प्रबंध में पुष्पक विमान को अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित बतलाया था, जिसका आधार `अगस्त्य संहिता´ की एक प्राचीन पाण्डुलिपि थी। अगस्त्य के `अग्नियान´ ग्रंथ के भी सन्दर्भ अन्यत्र भी मिले हैं। इनमें विमान में प्रयुक्त विद्युत्-ऊर्जा के लिए `मित्रावरुण तेज´ का उल्लेख है। महर्षि भरद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत् ज्ञान को अभिवर्द्धित किया। तब उसकी संज्ञा विद्युत्, सौदामिनी, हलालिनी आदि वर्गीकृत नामों से की जाने लगी।

अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत शोध मण्डल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किये। फलस्वरूप् जो ग्रन्थ मिले, उनके आधार पर भरद्वाज का `विमान-प्रकरण´ प्रकाश में आया।
महर्षि भरद्वाज रचित `यन्त्र-सर्वस्व´ के `विमान-प्रकरण´ की यती बोधायनकृत वृत्ति (व्याख्या) सहित पाण्डुलिपि मिली, उसमें प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चामत्कारिक तथ्य उद्घाटित हुए। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा इस विमान-प्रकरण का स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक की हिन्दी टीका सहित सुसम्पादित संस्करण `बृहत् विमान शास्त्र के नाम से 1958 ई. में प्रकाशित हुआ। यह दो अंशों में प्राप्त हुआ। कुछ अंश पहले बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय की पाण्डलिपियों में मिला, जिसे वैदिक शोध-छात्र प्रियरत्न आर्य ने `विमान-शास्त्र´ नाम से वेदानुसन्धान सदन, हरिद्वार से प्रकाशित कराया। बाद में कुछ और महत्वपूर्ण अंश मैसूर राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में प्राप्त हुए। इस ग्रंथ के प्रकाशन से भारत की प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्यों का पता चला।

भरद्वाज प्रणीत `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रंथ तत्कालीन प्रचलित सूत्र शैली में लिखा गया है। इसके वृत्तिकार यती बोधायन ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि- महर्षि भरद्वाज ने वेद रूपी समुद्र का निर्मन्थन कर सब मनुष्यों के अभीश्ट फलप्रद `यन्त्रसर्वस्व´ ग्रन्थरूप् नवनीत (मक्खन) को निकालकर दिया।


इन्हें भी देखें
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स्पष्ट है कि ‘यन्त्रसर्वस्व´ ग्रन्थ’ और उसके अन्तर्गत वैमानिक-प्रकरण की रचना वेदमंत्रों के आधार पर ही की गयी है। विमान की तत्कालीन प्रचलित परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए भरद्वाज ने बतलाया है कि `वेगसाम्याद् विमानोण्डजजानामिति´ अर्थात् आकाश में पक्षियों के वेग सी जिसकी क्षमता हो, वह विमान कहा गया है। वैमानिक प्रकरण में आठ (8) अध्याय हैं, जो एक सौ (100) अधिकरणों में विभक्त और पाँच सौ (500) सूत्रों में निबद्ध हैं। इस प्रकरण में बतलाया गया है कि विमान के रहस्यों का ज्ञाता ही उसे चलाने का अधिकारी है । इन रहस्यों की संख्या बत्तीस (32) है। यथा-विमान बनाना, उसे आकाश में ले जाना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना, वेग को कम या अधिक करना, लंघन (लाँघना), सर्पगमन, चपल परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण, शब्दप्रसारण, दिक्प्रदर्शन इत्यादि। ये तो हुए विमानों के सामान्य रहस्य है। विभिन्न प्रकार के विमानों में चालकों को उनके विशिश्ट रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता था। `रहस्य लहरी´ नामक ग्रंथ में विमानों के इन रहस्यों का विस्तृत वर्णन है।

`वैमानिक प्रकरण´ के अनुसार विमान मुख्यत: तीन प्रकार के होते थे- 1. मान्त्रिक (मंत्रचालित दिव्य विमान), 2. तांत्रिक-औषधियों तथा शक्तिमय वस्तुओं से संचालित तथा, 3. कृतक-यन्त्रों द्वारा संचालित।

पुष्पक मांत्रिक विमान था। यह विमान मंत्रों के आधार पर चलता था। कह सकते हैं कि यह रिमोट पद्धति से चलता था। मान्त्रिक विमानों का प्रयोग त्रेता युग तक रहा और तांत्रिक विमानों का द्वापर तक। इस श्रेणी में छप्पन (56) प्रकार के विमानों की गणना की गयी है। तृतीय श्रेणी कृतक के विमान कलियुग में प्रचलित रहे। ये विमान पच्चीस (25) प्रकार के गिनाये गये हैं। इनमें शकुन अर्थात पक्षी के आकार का पंख-पूँछ सहित, सुन्दर अर्थात धुएँ के आधार पर चलने वाला-यथा आज का जेट विमान, रुक्म अर्थात खनिज पदार्थों के योग से रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभायुक्त लोहे से बिना विमान, त्रिपुर अर्थात जल, स्थल और आकाश तीनों में चलने, उड़ने में समर्थ आदि का उल्लेख आता है।

इन विमानों की गति अत्याधुनिक विमानों की गति से कहीं अधिक होती थी। विमानों और उनमें प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों को बनाने के काम में लाया जाने वाला लोहा भी कई प्रकार को होता था। भरद्वाज ने जिन विमानों तथा यन्त्रों का उल्लेख अपने `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ में किया है, उनमें से अनेक तो ऐसे हैं, जिन्हें आज के समुन्नत वैज्ञानिक युग में भी नहीं बनाया जा सका है। `शकुन´, `सुन्दर´ और `रुक्म´ के अतिरिक्त एक ऐसे भी विमान का वर्णन उक्त ग्रन्थ में है, जिसे न तो खण्डित किया जा सके, न जलाया जा सके और न ही काटा जा सके। ऐसे विमानों का उल्लेख भी है, जिनमें यात्रा करने पर मनुष्य का शरीर जरा भी न हिले, शत्रु के विमान की सभी बातें सुनी जा सकें और यह भी ज्ञात किया जा सके कि शत्रु-विमान कहाँ तक कितने समय में पहुँचेगा। विमान को हवा में स्थिर रखने (जैसे हैलीकॉप्टर) और कार की तरह बिना मुड़े ही पीछे जाने का उल्लेख है। (हवा में स्थिर रह सकने वाला हेलीकॉटर तो बना लिया गया है( परन्तु कार की तरह बिना मुड़े पीछे की ओर गति कर सकने वाला विमान अभी तक नहीं बनाया जा सका है।)
महर्षि भरद्वाजकृत `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ के अतिरिक्त उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक `अंशुबोधिनी´ में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं इसमे प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होनेवाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है। महर्षि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए यती बोधायन ने आठ प्रकार के विमान बतलाये हैं-
1. शक्त्युद्गम - बिजली से चलने वाला।
2. भूतवाह - अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।
3. धूमयान - गैस से चलने वाला।
4. शिखोद्गम - तेल से चलने वाला।
5. अंशुवाह - सूर्यरश्मियों से चलने वाला।
6. तारामुख - चुम्बक से चलने वाला।
7. मणिवाह - चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।
8. मरुत्सखा - केवल आयु से चलने वाला।

परमाणु-ऊर्जा विभाग के भूतपूर्व वैज्ञानिक जी0एस0 भटनागर द्वारा संपादित पुस्तक `साइंस एण्ड टेक्नालोजी ऑफ डायमण्ड´ में कहा गया है कि `रत्न-प्रदीपिका´ नामक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में कृत्रिम हीरा के निर्माण के विषय में मुनि वैज्ञानिक भरद्वाज ने हीरे और कृत्रिम हीरे के संघटन को विस्तार से बताया है। पचास के दशक के अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी द्वारा पहले कृत्रिम हीरे के निर्माण से भी सहस्रों वर्ष पूर्व मुनिवर भरद्वाज ने कृत्रिम हीरा के निर्माण की विधि बतलायी थी। एकदम स्पष्ट है कि वे रत्नों के पारखी ही नहीं, रत्नों की निर्माण-विधि के पूर्ण ज्ञाता भी थे। भरद्वाज मुनि के इस वैज्ञानिक-रूप की जानकारी आज शायद ही किसी को हो।

पहले विमान निर्माता नहीं हैं राइट ब्रदर्स
महर्षि भरद्वाज द्वारा वर्णित विमानों में से एक `मरुत्सखा´ विमान का निर्माण 1895 ई. में `मुम्बई स्कूल ऑफ आर्टस´ के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान् वैदिक विद्वान् थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की पण्डिता थीं) की सहायता से विमान का एक मॉडल (नमूना) तैयार किया। फिर प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित विवरणों के आधार पर एक `मरुत्सखा´ प्रकार के विमान का निर्माण किया। यह विमान एक चालकरहित विमान था। इसकी उड़ान का प्रदर्शन तलपड़े जी ने मुंबई चौपाटी पर तत्कालीन बड़ौदा नरेश सर सयाजी राव गायकवाड़ और बम्बई के प्रमुख नागरिक लालजी नारायण के सामने किया था। विमान 1500 (पन्द्रह सौ फुट) की ऊँचाई तक उड़ा और फिर अपने आप नीचे उतर आया। बताया जाता है कि इस विमान में एक ऐसा यंत्र लगा था, जिससे एक निश्चित ऊँचाई के बाद उसका ऊपर उठना बन्द हो जाता था। इस विमान को उन्होंने महादेव गोविन्द रानडे को भी दिखलाया था। दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपदेजी की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। 17 सितंबर, 1917 ई. को उनका स्वर्गवास हो जाने के बाद उस मॉडल विमान तथा सामग्री को उत्तराधिकारियों ने एक ब्रिटिश फर्म `रैली ब्रदर्स´ के हाथ बेंच दिया।
`राइट ब्रदर्स´ के काफी पहले वायुयान निर्माण कर उसे उड़ाकर दिखा देने वाले तलपडे महोदय को `आधुनिक विश्व का प्रथम विमान निर्माता´ होने की मान्यता देश के स्वाधीन हो जाने के इतने वर्षों बाद भी नहीं दिलायी जा सकी, यह निश्चय ही अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे भी कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पाठ्य-पुस्तकों में शिवकर बापूजी तलपदे के बजाय `राइट ब्रदर्स´ (राइट बन्धुओं) को ही अब भी `प्रथम विमान निर्माता´ होने का श्रेय दिया जा रहा है, जो नितान्त असत्य है।

क्रमशः......

(संदर्भः हमारे वैज्ञानिक पुस्तक से साभार, लेखक-आनन्द मिश्र ‘अभय’, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ।)
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