गुरु नानक/Nanak

संत शिरोमणि गुरु नानकदेव
सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरु थे
लगभग छियालीस वर्षों तक एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूमकर उन्होंने अपने उपदेशों और संदेशों से लोगों का प्रेम और विश्वास पाया उनके विचार इतने व्यापक थे कि सभी धर्मों के लोग उनका सम्मान करते थे

गुरु नानक का जन्म १५ अप्रैल, १४६९ को लाहौर के निकट तलवंडी नामक गाँव में हुआ था
। यह स्थान अब पाकिस्तान में है और 'ननकाना साहब' के नाम से जाना जाता है। नानक जी की माँ अत्यंत धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनके मन में गरीब और असहाय लोगों के लिए बड़ी सहानुभूति थी। बालक नानक के लालन पालन और शिक्षा-दीक्षा का विशेष ध्यान रखा गया। पंडित गोपाल दास से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद नानक जी ने संस्कृत तथा प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद मौलवी ने उन्हें फारसी- अरबी और इस्लाम धर्म के सिद्धांतों की शिक्षा दी। बचपन से ही नानक जी विलक्षण प्रतिभा के धनी तथा अत्यंत जिज्ञासु प्रवत्ति के थे। मौलवी या पंडित द्वारा दी जाने वाली शिक्षा को वे बड़ी जल्दी ग्रहण कर लिया करते थे। वे किसी भी बात को पूरी तरह समझे बिना उसे स्वीकार नहीं करते थे

एक दिन पंडित गोपालदास ने नानक जी को 'ॐ' का उच्चारण करने के लिए कहा
। नानकजी ने 'ॐ' का उच्चारण करने के बाद उसका अर्थ भी पूछा। अचानक यह प्रश्न सुनकर पंडित गोपालदास चकित रह गए। वे तुरंत कोई उत्तर नहीं दे पाए। बाद में कुछ सोचकर उन्होंने नानकजी को बताया, "ॐ उस परमपिता परमात्मा का नाम है, जो हम सभी को उत्पन्न करता है और सबका पालनहार है।" यह सुनकर नानकजी ने तुरंत कहा, "मैं उसी परमपिता परमात्मा को 'सत करतार' कहता हूँ। वही सिरजनहार है।" नानकजी के मुँह से इतने विलक्षण ज्ञान की बात सुनकर पंडित गोपालदास के आश्चर्य का ठिकाना न रहानानकजी की विलक्षण प्रतिभा और उनके आध्यात्मिक ज्ञान से वे बड़े प्रभावित हुए। नानकजी को बचपन से ही साधु-सन्यासियों का सानिद्ध्य सुखद लगता था। साधु-सन्यासियों को देखकर वे उनके पास पहुँच जाया करते थे, उनके प्रवचन बड़ी रूचि के साथ सुनते थे और उनसे जीवन-दर्शन, आत्मा-परमात्मा, माया-मुक्ति, पुनर्जन्म आदि दार्शनिक विषयों से संबंधित प्रश्न भी पूछते थे। बीच-बीच में साधु-संतों की संगत में जाते रहने के कारण नानकजी की शिक्षा नियमित रूप से नहीं चल पायी

नानकजी को अब सांसारिक मोह-माया के बंधन झूठे लगने लगे
। परिवार के लोगों, रिश्तेदारों व मित्रों में वे रूचि नहीं लेते थे। उनका अधिकांश समय साधु-संतों और ग़रीबों की सेवा करने, प्रवचन सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने में व्यतीत होने लगा। ऐसे कार्यों से उन्हें बहुत आनंद और संतोष प्राप्त होता था।  नानकजी के पिता को उसके भविष्य की चिंता रहने लगी। वे चाहते थे कि उनका बेटा अच्छी तरह पढ़ लिखकर कोई व्यवसाय करे और अपनी गृहस्थी बसाए यह सोचकर उन्होंने नानकजी का मन पारिवारिक कार्यों की तरफ मोड़ने का प्रयास शुरू कर दिया। उन्होंने नानकजी को जंगल में पशु चराने का काम सौंप दिया

नानकजी एक आज्ञाकारी बालक थे
। अतः वे जंगल में पशु चराने के लिए प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गए। जंगल में नानक जी को अपने अनुकूल शांत व स्वच्छ वातावरण मिला। ऐसे में उन्हें एकांत में 'सत करतार' का ध्यान लगाने का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। वे अक्सर जंगल में अपने पशुओं को चरता छोड़कर स्वयं एकांत में बैठकर ध्यान में मग्न हो जाते थे। एक दिन जंगल में पशुओ को चराते समय नानक जी एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए और सत करतार का ध्यान करने लगे। थोड़ी देर बाद उन्हें झपकी आने लगी और वे वहीं सो गए। सोते समय धीरे-धीरे पेड़ की छाया उनके चेहरे से हटने लगी और चेहरे पर धूप पड़ने लगी। तभी अचानक एक सांप वहां आया । उसने अपना फन फैलाकर नानकजी के चेहरे पर छाया कर दी। जब तक नानकजी सोते रहे तब तक वह सांप तेज धूप में अपना फन फैलाकर उनके चेहरे पर छाया किये बैठे रहा। उसके बाद जैसे ही उनकी नींद खुली, सांप शांति से झाड़ियों में चला गया। उस समय नगर का शाशक अपने घोड़े पर सवार होकर उधर से गुजर रहा था। उसने रूककर यह दृश्य अपनी आँखों से देखा तो समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। धीरे-धीरे यह बात चारों ओर फ़ैल गयी। दूर-दूर के लोग भी नानकजी की विलक्षणता से परिचित होने लगे। अब लोग उन्हें चमत्कारी बालक मानने लगे                                           

कुछ दिन बाद नानकजी ने पशुओं को चराने का काम बंद कर दिया और घर ही में रहने लगे
। घर में वे अकसर गुमसुम से रहते थे। उनके पिता को यह सब अच्छा नहीं लगता था। वे नानकजी का ध्यान सांसारिक कार्यों में लगाना चाहते थे। यह सोचकर उन्होंने नानकजी को खेती-बाडी के काम में लगाना चाहा; परन्तु इस काम में वे अपनी चिंता छोड़कर दूसरों के बारे में ही सोचा करते थे। उन्हें तो साधु-संतों और दीन-दुखियों की सेवा करने में ही आनंद आता था। एक दिन पिता ने नानकजी को अपने पास बुलाकर समझाया कि इस प्रकार के कार्यों में कोई फायदा नहीं है; तुम कोई व्यापार करो, ताकि कुछ कमाई हो सके। उन्होंने नानकजी को बीस रूपये देते हुए कहा, "ये लो बीस रूपये और इनसे कोई खरा सौदा करके आओ, जिससे अच्छा मुनाफा हो" नानकजी मुनाफा देनेवाले व्यापार की तलाश में निकल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद मार्ग में उन्हें साधु-फकीरों का एक दल मिल गया। वे साधु कई दिनों से भूखे थे और इस कारण बेहाल हो रहे थे। उन्हें इस स्थिति में देखकर नानकजी को बड़ी दया आयी। उन्होंने सोचा, 'इन भूखे साधु-फकीरों को भोजन करा दिया जाए तो इससे खरा सौदा और क्या हो सकता है। पिताजी ने भी कोई खरा सौदा करने के लिए ही बीस रूपये दिए हैं।'  यह सोचकर उन्होंने उन रुपयों से साधु-फकीरों को भोजन करा दिया और प्रसन्न भाव से घर लौट आये। घर पहुँचने पर जब पिताजी ने पूछा तो नानकजी ने सब कुछ सच-सच बता दिया और कहा कि मुझे इससे खरा सौदा दूसरा नहीं सूझा, इसलिए मैंने यही सौदा कर लिया। नानकजी की बात सुनकर उनके पिताजी को गुस्सा आया। अब उन्हें अपने बेटे के भविष्य को लेकर और अधिक चिंता होने लगी

जिस समय नानकजी का जन्म हुआ था उस समय हिन्दू  और इसलाम धर्मों का पतन हो रहा था
। हिन्दू लोग वेदों और उपनिषदों के मार्ग को छोड़कर पाखण्ड का प्रचार कर रहे थे। हिन्दू समाज में वर्ण-व्यवस्था कठोर बन चुकी थी। चारों और जात-पात का भेदभाव फैला हुआ था। जब नानकजी ने देखा कि मनुष्य जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी कर्मकांड से बंधा हुआ है तो उन्हें बहुत दुःख हुआ उन्होंने उन ब्राह्मणों का विरोध किया जो स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कर्मकांडों का ढोंग करते थे। नानकजी ने समाज में फैले इस प्रकार के आडम्बरों को दूर करने का संकल्प लिया। वे लोगों को प्रेम और भाईचारे का सन्देश देने लगे। उन्होंने लोगों को व्यर्थ के आडम्बरों से ऊपर उठकर सत करतार की उपासना करने के लिए प्रेरित किया

एक दिन नानकजी ने देखा कि मरदाना नाम का एक मुसलमान वृक्ष के नीचे बैठकर रकाब बजा रहा था
। उसकी मोहक धुन सुनकर नानकजी आनंद-विभोर हो गए और वहीं बैठकर उसे सुनने लगे। थोड़ी देर में ही नानकजी स्वयं उसके साथ 'शबद' गाने लगे। उसके बाद अब वे दोनों अकसर मिलने लगे। मरदाना रकाब बजाता और नानकजी परमात्मा की स्तुति के गीत गाते। उसे सुनने के लिए धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग आने लगे। यहीं से 'संगत' का जन्म हुआ और नानकजी एवं मरदाना का जीवन भर का साथ हो गया

नानकजी की साधु-प्रवत्ति से अब उनके पिता बहुत परेशान रहने लगे
। नानकजी को सांसारिक बंधन में बांधने का भरपूर प्रयास किया गया। उन्होंने सोचा कि नानकजी गृहस्थी के बंधन में बंधने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को शायद समझने लगें। यही सोचकर उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में नानकजी का विवाह कर दिया। नानकजी के दो पुत्र भी हुए नानकजी का विवाह करके उनके पिता ने सोचा कि अब वे गृहस्थी में फंसकर सांसारिक कार्यों में रूचि लेने लगेंगे; परन्तु वास्तव में नानकजी का जन्म तो मानव जाति के उद्धार के लिए हुआ था। परिवार का मोह भला उन्हें अपने पथ से किस प्रकार विचलित कर सकता था। उनकी जीवनधारा में कोई परिवर्तन नहीं आया। वे निरंतर परम सत्य की खोज के मार्ग पर चलते रहे। धीरे-धीरे उनके साथियों व अनुनायियों की संख्या भी बढ़ने लगी

नानकजी ने मनुष्य को अन्याय, अत्याचार और शोषण से बचाने तथा उनके भीतर आध्यात्मिक ज्योति जगाने के लिए लम्बी-लम्बी यात्रायें शुरू कीं
। उन्होंने अपने जीवन काल में चार बड़ी यात्रायें की, जिन्हें 'गुरु नानक की उदासियाँ' कहा जाता है। वे अपनी यात्रा में लोगों को जात-पात, धर्म, संप्रदाय और ऊंच-नीच के भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम और आपसी भाई-चारे के मार्ग पर चलने का सन्देश देते थे। अब तक वे लोगों के बीच में 'गुरु नानक' के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। गुरु नानकजी ने उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक की यात्रा की। वे अफगानिस्तान, बर्मा, तुर्की और श्रीलंका भी गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए वहां-वहां उन्होंने जाति, धर्म और वर्ण की सीमाओं को लांघकर लोगों में परस्पर समन्वय स्थापित किया। उन्होंने राम-रहीम और अल्लाह-ईश्वर के भेद को 'पाखंड' और सम्पूर्ण मानव जाति को 'एक ही परमात्मा की संतान' बताया

गुरु नानक गाँव-देहात घूमते-घूमते लाहौर पहुंचे
। वहां दुनीचंद नामक एक प्रसिद्ध व्यापारी ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। दुनीचंद को अपनी धन-दौलत का बहुत अभिमान था। गुरु नानक के सामने भी वह अपनी धन-दौलत का बखान करने लगा। उसकी बातें सुनकर गुरु नानक ने उसे एक सुई देते हुए कहा, "इसे जरा संभालकर रख लो, परलोक में इसे मुझे लौटा देना।" उनकी बात सुनकर दुनीचंद ने आश्चर्यचकित होकर कहा, "भला परलोक में इसे कैसे ले जा पाऊंगा!" "जिस तरह तुम अपना सारा धन व दौलत लेकर जाओगे उसी तरह इस सुई को भी लेते जाना।" गुरु नानक की ज्ञानपूर्ण बात सुनकर दुनीचंद की आँखें खुल गईं। वह उनके चरणों में गिर पड़ा। धन-दौलत का उसे जो अभिमान था, वह एक क्षण में चूर-चूर हो गया। गुरु नानक का मानना था कि अहंकार अनेक प्रकार के बुरे कार्यों को जन्म देता है; इसलिए मनुष्य को इसका त्याग करके सच्चाई, प्रेम और भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए

लोगों को सच्चाई, समानता और सहिष्णुता का मार्ग दिखाते हुए एक बार गुरु नानक मदीना गए
। वहां एक निश्चित समय पर वे 'काबा' की ओर पैर पसारकर सो गए। तभी एक मुसलमान ने आकर उन्हें झकझोरकर जगाया और अपमानित करते हुए कहा, "अँधा है क्या? तुझे इतना भी दिखाई नहीं देता कि उधर 'काबा' है, जिधर तू पैर पसारकर सो रहा है!" उसकी बात सुनकर गुरु नानक ने हँसते हुए कहा, "भाई, मुझे तो सब और काबा-ही-काबा दिखाई दे रहा है। तुम्हे जिस ओर काबा न दिखाई दे रहा हो, कृपा करके उधर ही मेरा पैर कर दो।" गुरु नानक की बात सुनकर वहां उपस्थित सभी मुसलमान एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। कुछ देर बाद दो मुसलमान आगे बढे और गुरु नानक के पैर घसीटकर विपरीत दिशा में घुमाने लगे। तभी एक चमत्कार हुआ। जिस ओर उनका पैर घुमाया जा रहा था, उसी ओर काबा भी घूम गया। यह देखकर वहां उपस्थित मुसलमान दंग रह गए। गुरु नानक ने उन्हें समझाते हुए कहा, "खुदा तो इस सृष्टि के कण-कण में निवास करता है। वह हर दिशा में है।"

इस प्रकार स्थान-स्थान पर घूमते हुए और लोगों को उपदेश देते हुए सन १५२१ में गुरु नानक करतारपुर वापस आ गए
। उस समय वे बावन वर्ष के थे। अब उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के संबंध में विचार करना शुरू किया। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने अपने परम-शिष्य 'भाई लहणा' को गुरु गद्दी सौंप दी। जब गुरु नानक को अपनी जीवन यात्रा का अंतिम समय निकट आता जान पड़ा तो उन्होंने अपनी सारी संगत को इकट्ठा किया। उन्होंने अपने परम शिष्य भाई लहणा को तिलक लगाकर अपनी गद्दी पर बिठाया और संगत को संबोधित करते हुए कहा, " भाई लहणा मेरा ही दूसरा रूप है। आज से मैं इसके शरीर के अंगों में वास करूंगा।" इस प्रकार भाई लहणा गुरु अंगद देव के नाम से सिखों के दूसरे गुरु बन गए। २२ सितम्बर, १५३९ को गुरु नानक देव ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। गुरु नानक देव ने भटकी हुई मानवता का पथ-प्रदर्शन किया और प्रेम, सच्चाई तथा सत्कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनकी वाणी 'गुरु ग्रन्थ साहब' में 'महला १' के शीर्षक से दर्ज है 

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