वेदव्यास/ Vedvyas

पौराणिक युग की महान विभूति, महाभारत, अट्ठारह पुराण, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग ३००० ई पूर्व में हुआ था। इनके पिता ऋषि पराशर और माता सत्यवती थी।

महर्षि वेदव्यास के जन्म से सम्बंधित एक कथा इस प्रकार है। महान् तेजस्वी ऋषि पराशर तीर्थ यात्रा पर थे। घूमते हुए वे यमुना के पावन तट पर आए और एक मछुआरे से नदी के उस पार पहुँचाने के लिए कहा। मछुआरे ने अपनी पुत्री सत्यवती को मुनि को नदी पार पहुँचाने की आज्ञा दी। सत्यवती मुनि को नौका से नदी पार कराने लगी। जब मुनि पराशर की दृष्टि सत्यवती पर पड़ी तो दैववश उनके मन में सत्यवती से सहवास करने की इच्छा हुई। ऋषि ने योगबल से चारों ओर घने कुहरे का जाल रच दिया और सत्यवती के साथ सहवास किया। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से वेद वेदांगों में पारंगत महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ।

महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। जीवों के कल्याण के लिए स्वयं श्रीहरि द्वापर युग के अंतिम चरण में महर्षि पराशर के अंश से सत्यवती के गर्भ द्वारा महर्षि व्यास के रूप में अवतरित हुए। व्यासजी का जन्म द्वीप में होने से इनका नाम द्वैपायन पडा। श्यामवर्ण का शरीर होने से ये कृष्णद्वैपायन कहलाए। जन्म लेते ही इन्होंने अपनी माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारंभ में इनकी माता ने इन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, किन्तु अन्त में इन्होंने माँ की अनुमति प्राप्त कर ली। ये तप करने के लिए हिमालय चले गए और वहाँ नर-नारायण की साधना स्थली बदरीवन (बद्रीनाथ) में तपस्या की। इससे इनकी बादरायण नाम से प्रसिद्धि हो गई।

महर्षि व्यास अलौकिक शक्ति-संपन्न महाविद्वान हैं। कलियुग में मनुष्यों की धारणा-शक्ति को कमजोर होते देख व्यासजी ने वेद को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद - इन चार भागों में विभाजित किया और एक-एक वैदिक संहिता अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढाई। तत्पश्चात प्रत्येक संहिता की फिर अनेक शाखा-प्रशाखाएं हुई। इस प्रकार इन्हीं के द्वारा वैदिक वाङ्गमय का सम्पादन और विस्तार हुआ। वेदों का विस्तार इनके माध्यम से होने के कारण इनका नाम वेदव्यास पडा।

वेदों का संकलन और संपादन करने के बाद महर्षि व्यास के मन में एक ऐसे महाकाव्य की रचना करने का विचार उत्पन्न हुआ, जिससे संसार लाभान्वित हो सके। वे ब्रह्माजी के पास गए और उनसे मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की। व्यासजी का ध्येय जानकर ब्रह्माजी प्रसन्न होकर बोले—‘‘वत्स ! तुम्हारा विचार अति उत्तम है। परंतु पृथ्वी पर ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जो तुम्हारे ग्रंथ को लिखित रूप प्रदान कर सके। अतः आप गणेश जी की उपासना करके उनसे प्रार्थना करें कि वे इस कार्य में आपकी सहायता करें।’’ व्यासजी ने भगवान् गणेश की स्तुति की तो वे साक्षात् प्रकट हो गए। तब व्यास जी ने उनसे अपने ग्रंथ के लिपिक बनने की प्रार्थना की। गणेश जी बोले—‘‘मुनिवर ! मुझे आपका प्रस्ताव स्वीकार है लेकिन याद रहे; मेरी लेखनी एक पल के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए।’’ व्यासजी बोले—‘‘ऐसा ही होगा भगवन् ! परंतु आप भी कोई श्लोक तब तक नहीं लिखेंगे जब तक कि आप उसका अर्थ न समझ लें।’’ गणेश जी ने शर्त स्वीकार कर ली। इस प्रकार, महर्षि व्यास ने एक महान महाकाव्य की रचना की जो संसार में महाभारत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीमद्भगवद्गीता इस महाभारत का ही अंश है। संसार को श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अनुपम आध्यात्मिक रत्न श्रीवेदव्यास की कृपा से ही प्राप्त हुआ। इन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण के उस अमर उपदेश को अपनी महाभारत में ग्रंथित कर उसे संपूर्ण विश्व के लिए सुलभ बना दिया।

वेदान्त-दर्शन के साथ अनादि पुराण को लुप्त होते देखकर श्रीवेदव्यास ने अट्ठारह पुराणों का प्रणयन किया। प्राणियों के कल्याण की कामना से भक्ति-रस के सागर को महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण के १८ हजार श्लोकों में बांध दिया है। उपनिषदों का सार-तत्व समझाने के लिए इन्होंने ब्रह्मसूत्र का निर्माण किया, जिनपर शंकराचार्य, वल्लभाचार्यआदि अनेक महाविद्वानों ने भाष्य-रचना कर अपना-अपना अलग मत स्थापित किया। व्यास-स्मृति के नाम से रचा हुआ इनका एक स्मृतिग्रंथ भी उपलब्ध होता है।

दिव्य तेज, असीम शक्ति एवं असाधारण गुणों से संपन्न महर्षि व्यास को मनीषियों ने त्रिदेवों की समकक्षता प्रदान की है - श्रीव्यासदेव चतुर्मुख न होते हुए भी ब्रह्मा, दो भुजाओं वाले होते हुए भी विष्णु तथा त्रिनेत्र धारी न होने पर भी साक्षात् शिव ही हैं। भारतीय वाङ्गमय एवं हिन्दू संस्कृति पर वेदव्यास जी का बहुत बडा ऋण है। ये श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के प्रधान व्याख्याता हैं। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका विशिष्ट योगदान है। व्यास-जन्मतिथि आषाढी पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा के रूप में महापर्व बन गई है, जिसे प्रतिवर्ष अत्यंत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा को सुदृढ बनाने के उद्देश्य से व्यास-पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

वस्तुत:वेद भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आचार-विचार, रीति-नीति, विज्ञान-कला आदि सभी कुछ वेद से ही अनुप्राणित है। हमारे जीवन और साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसका बीज वेद में न मिले। सही मायनों में वेद हमारी सभ्यता की आधारभूमिहै। महर्षि वेदव्यासने वेद के विभाजन का युगान्तकारी कार्य करके इस अथाह ज्ञान-राशि को लोकहित में संपादित कर दिया। महाभारत के माध्यम से वेदांश समाज के सभी वर्गो तक पहुँचाया। ऐसे अवतारी महापुरुष का अवतरण-दिवस सबके लिए गुरु पूर्णिमा के रूप में सत्प्रेरणा का महापर्व बन गया है।

 
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