एकलव्य

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एकलव्य के बारे में देश को कहानियों, परम्पराओं व जनुश्रुतियों के जरिए जितना मालूम है, उसका अधिकांश महाभारत में दर्ज है। आप किसी बच्चे के सामने भी एकलव्य का नाम लेंगे तो वह एकलव्य के प्रति बड़े आदर और सम्मान के भाव से बता देगा कि वह एक भील बालक था।

महाभारत के मुताबिक वह निषादराज हिरण्यधानु का पुत्र था- ततो निषादराजस्य हिरण्यधानुष: सुत: एकलव्य: (महाभारत आदिपर्व 131.31) ऐसा लगता है कि पुराने जमाने में निषादों का, जो भील भी थे और मछलीपालन तथा नौकायन का काम भी करते थे, अपना व्यावसायिक और राजनीतिक संगठन काफी मजबूत था और उसे बकायदा राजकीय मान्यता हासिल थी। राम के समय निषादराज गुह की भूमिका से हम सभी सुपरिचित हैं कि कैसे उसने एक बार राम के पक्ष में भरत से लड़ने का मन बना लिया था, पर जब भरत के बारे में वास्तविकता मालूम पड़ी तो उसे बड़ा हर्ष हुआ। शान्तनु की पत्नी सत्यवती के पिता दाश का परिचय भी हमें निषादराज के रूप में ही करवाया जाता है। एकलव्य के पिता भी निषादराज थे।

द्रुपद से अपमानित और पीड़ित द्रोण जब घूमते-घामते हस्तिनापुर पहुंचे और परिस्थितियों के चमत्कार से वे कुरु राजकुमारों यानी पाण्डवों और कौरवों को शस्त्रविद्या सिखाने के लिए राजकुल द्वारा नियुक्त कर लिए गए तो उनकी ख्याति सुनकर अन्य अनेक शिष्यताकामी युवाओं की तरह एकलव्य भी धनुर्विद्या सीखने के इरादे से उनके पास गए। शिष्यत्व चाहा, पर द्रोण ने एकलव्य को इस बिना पर सिखाने से मना कर दिया है कि वे केवल कुरु राजकुमारों को ही धनुर्विद्या सिखा रहे हैं, इसलिए एक नैषादि यानी भील बालक को कैसे अपना शिष्यत्व प्रदान कर दें?
नसतं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्। शिष्यं धानुषधार्मज्ञ: तेषामेवान्ववक्षया’ (आदिपर्व 131.32)

बस यहां से एकलव्य का चरित्र जो उभरना शुरू होता है तो वह उभरता ही जाता है। एकलव्य निराश नहीं हुआ। उसने द्रोण को मन ही मन अपना गुरु धारण कर लिया था और अपने इस भाव से वह डिगना भी नहीं चाहता था। इसलिए उसने द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा बनाई- कृत्वा द्रोणं महीमयम् (आदिपर्व 131.33) और उसी प्रतिमा में गुरु द्रोण के साक्षात् दर्शन कर उनकी देखरेख में या निर्देशन में धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा और अभ्यास करते-करते अपनी विद्या का परम विशेषज्ञ जैसा हो गया।

यही परमविशेषता एकलव्य की मानो दुश्मन बन गई। जो हुआ, वह कथा भी हम सबको मालूम है, पर फिर से बताने में कोई हर्ज नहीं। एक बार द्रोणाचार्य अर्जुन सहित अपने शिष्यों के साथ वन में घूम रहे थे। तभी एक कुत्ता उनके पास आया जिसके मुंह में सात बाण इस कुशलता से मारे गये थे कि वह घायल तो नहीं हुआ, पर उसका भूंकना रुक गया। अर्जुन यह देख लजा गया कि इस धरती पर एक ऐसा धनुर्धर भी है जिसने कुत्तो के मुंह को इस तरह बींधा दिया है कि जिस तरह शायद वह भी न बींधा पाए। उधर द्रोण ने अपने शिष्य अर्जुन से मानो प्रतिज्ञा जैसी कर रखी थी कि वे उसे धनुर्विद्या में ऐसा विशिष्ट बना देंगे कि उस जैसा और कोई धनुर्धर इस पृथ्वी पर नहीं होगा। पर बिंधे मुंह वाले कुत्तो को देखकर अर्जुन को साफ आभास हो गया कि उससे बढ़कर न सही, पर उस जैसा एक और धनुर्धारी भी इस धरती पर है।

सो द्रोण ने अपने शिष्यों के साथ तलाश शुरू की और जल्दी ही उन सबकी मुलाकात एकलव्य से हो गई। उसके बाद जो घटा वह मानवीय गरिमा और मानवीय करुणा के लिए सचमुच विदारक है। द्रोण ने परिचय पूछा तो जानते हैं एकलव्य ने क्या कहा? ‘मैं द्रोण का शिष्य हूं- द्रोणशिष्यं तु मां विद्धि’ (आदिपर्व 131.45) इससे बढ़कर गुरुभक्ति क्या हो सकती है? पर अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने की अपनी प्रतिज्ञा या घोषित इच्छा के मोह के कारण द्रोण इतने कमजोर हो चुके थे कि वह सहसा क्रूरता पर उतर आए। गुरु होने के नाते इस स्वत: स्फूर्त और विशेषज्ञ धनुर्धारी एकलव्य को हृदय से लगाकर आशीर्वाद देने के बजाए उन्होंने उससे निर्मम गुरुदक्षिणा मांग ली। यहां आकर तो स्वयं महाभारतकार भी द्रोण का उपहास करने से नहीं चूकते।

द्रोण ने एकलव्य से जो दुर्व्यवहार किया वह एक गुरु का नहीं, किसी स्वार्थी राजकर्मचारी का ही हो सकता था। इसलिए द्रोण ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में जो मांगा उसे महाभारतकार ने गुरुदक्षिणा नहीं, वेतन कहा है- यदि शिष्योस मे वीर वेतनं दीयतामिति (आदिपर्व 131.54) यानी हे वीर, अगर मेरे शिष्य हो तो मेरा वेतन भी दो। एकलव्य के हर्ष का पारावार नहीं रहा। उसे उस गुरु ने अपना शिष्य मान लिया था जिसने कभी उसे शिष्यत्व देने से इनकार कर दिया था, पर जिसकी मिट्टी की मूर्ति को गुरु धारण कर उसने सारी विद्या सीखी थी। वह दक्षिणा देने को उतावला हो गया तो द्रोण ने वह मांगा जो मांगने के कारण अन्यथा उज्जवल चरित्र वाले द्रोण को इतिहास ने कभी क्षमा नहीं किया है। द्रोण बोले, अपना दाएं हाथ का अंगूठा मुझे दे दो- तमब्रवीत् त्वयांगुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति (आदिपर्व 131.56)।

द्रोण की इस लघुता, इस छोटेपन के आगे, अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए एक प्रतिभा को नष्ट कर देने के इस क्षुद्रकर्म के आगे एकलव्य ने क्या किया? जो किया वह सचमुच अद्भुत था। उसने एक क्षण विलम्ब किए बिना, यह जानते हुए भी कि दायां अंगूठा दे देने का परिणाम क्या होगा, तत्काल अपना अंगूठा काट कर दे दिया। उसके बाद भी एकलव्य ने हार नहीं मानी। उसने नए सिरे से अभ्यास करना शुरू किया और अपने दाएं हाथ की शेष उंगलियों से धनुष चलाना शुरू किया और जाहिर है कि वैसी प्रखरता उसकी धनुर्विद्या में उसके बाद नहीं आ सकी जैसी अंगूठा काटने से पहले थी। उसके बावजूद एकलव्य में इतनी कुशलता तो आ गई थी कि उसने महाभारत युद्ध में न केवल हिस्सा लिया बल्कि कुछ दिन वह वीरतापूर्वक लड़ता भी रहा। इस युद्ध में वह कौरवों की ओर से लड़ा था।

शताब्दियों की भारत-गाथा में एकलव्य एक ऐसा मीलपत्थर है जिसका महत्व इस देश के बच्चों ने तो समझ लिया है, शिक्षकों ने भी समझ लिया है, पर राजनेताओं ने नहीं। पहले तो ऐसा था और आज भी कहीं-कहीं हो तो ठीक ही माना जाएगा बच्चों को अपनी प्रारम्भिक कक्षाओं में एकलव्य की कहानी अनन्य गुरुभक्ति के आदर्श के रूप में पढ़ाई जाती थी। दुनिया में शायद भारत ही अकेला ऐसा देश है, जहां गुरु और गुरुभक्ति का महत्व है। इस माहौल में अकेले एकलव्य का एक पाठ ही बच्चों को गुरु और गुरुभक्ति के सम्पूर्ण महत्व को बिना व्याख्या और टीका टिप्पणी के समझा देता है।

उधर द्रोण का चरित्र क्या कहता है? शायद ऐसे शिक्षकों के इस तरह के कारनामों को आदर्श न मानने की धारणा से प्रेरित होकर ही उपनिषदकार ने लिखा होगा- यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वया ग्रहीतव्यानि नो इतराणि, अर्थात् हे शिष्य, हमारे जो अच्छे काम हैं उन्हीं से तुम प्रेरणा लेना, दूसरे (यानी खराब) कामों से प्रेरणा कतई मत लेना।

पर राजनेता? हमारे देश में राजनीति द्वारा समाज के सिर पर चढ़ कर अपना महत्व जताने की प्रवृत्ति चूंकि अभी नई-नई शुरू हुई है, और इस राजनीति ने समाज को तोड़कर सत्ता का ताज हासिल करने की अपनी आदत बना ली है, इसलिए एकलव्य की निर्दोष पर सशक्त संदेशपूर्ण घटना को आज जाति और वर्ग के खाने में रखकर देखने में राजनेताओं को मजा आ रहा है। इन राजनेताओं को द्रोण एक व्यक्ति नहीं बल्कि ब्राह्मण और एकलव्य एक व्यक्ति नहीं बल्कि जनजाति का प्रतिनिधि नजर आता है और फिर थ्योरी यह बन जाती है कि देखो, ये ब्राह्मण शुरू से ही अपने से नीचा समझने वालों को प्रताड़ित करते रहे हैं। ऐसी राजनीति को न ऋषि पद को प्राप्त कवष ऐलूष नजर आता है और न ही शम्बूक जिसका प्रबल मान इसी तथाकथित ब्राह्मण परम्परा में हुआ है। न शबरी नजर आती है जिन्हें राम ने आदर दिया और न ही निषादराज गुह जिसके साथ राम ने मैत्री की।

ऐसी राजनीति को न सत्यवती से कोई लेना-देना है, जो कुरु-कुल-राजरानी बनी और न ही विदुर से कोई तात्पर्य है जो धृतराष्ट्र के महामंत्री रहे। ऐसी राजनीति को सिर्फ तोड़ने में मजा आता है, जोड़ने वाली घटनाएं याद करने में नहीं। पर क्या देश के छात्रों और शिक्षकों को और उन सभी को जो देश का कल्याण चाहते हैं, ऐसे मीलपत्थर को इस तरह राजनीतिक कलुष का शिकार होने देना चाहिए?


Based on article in bhartiyapaksh.com



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