नया अंक

  


वर्ष 12    अंक 1    जनवरी-मार्च 2008 (विशेष अंक) 

संपूर्ण अंक 

इस अंक में 

अपनी बात

गुज़रे साल पर एक नज़र और आने वाले संघर्षों की आहटें

 विशेष लेख

नक्‍सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक : एक सिंहावलोकन

अमेरिकी सबप्राइम संकट : गहराते साम्राज्‍यवादी संकट की नयी अभिव्‍यक्ति  

सामयिक

'जुआघर' अर्थव्‍यवस्‍था के निराले तोहफ़े  

पूँजीवाद और मज़दूरों का प्रवास 

निकोलस सारकोजी की जीत के मायने

विशेष

सर्वहारा अधिनायकत्‍व के बारे में चुने हुए उद्धरण - लेनिन

दर्शन के प्रश्‍नों पर वार्ता - माओ त्‍से-तुंग

शोध-अध्‍ययन

भारतीय कृषि में पूँजीवादी विकास (दूसरी किस्‍त)

टिप्‍पणियाँ

पूँजीवाद को रामकथा की संजीवनी

दलित मुक्ति के सपनों की माया

मोदी की वापसी के अर्थ और अनर्थ

  

जन्‍म-शताब्‍दी वर्ष
(28 सितम्‍बर 2007-2008) के अवसर पर

क्रान्ति से हमारा क्‍या आशय है, यह स्‍पष्‍ट है। इस शताब्‍दी में इसका सिर्फ़ एक ही अर्थ हो सकता है - जनता के लिए जनता का राजनीतिक शक्ति हासिल करना। वास्‍तव में यही है 'क्रान्ति', बाक़ी सभी विद्रोह तो सिर्फ़ मालिकों के परिवर्तन द्वारा पूँजीवादी सड़ांध को ही आगे बढ़ाते हैं।... भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को - भारत में साम्राज्‍यवादियों और उनके मददगार हटाकर जो कि उसी आर्थिक व्‍यवस्‍था के पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें शोषण पर आधारित हैं - आगे आना है।
हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्‍ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां, एक स्‍वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्‍थान लेने के लिए तैयार हैं।

साम्राज्‍यवादियों को गद्दी से उतारने के लिए भारत का एकमात्र हथियार श्रमिक क्रान्ति है। कोई और चीज़ इस उद्देश्‍य को पूरा नहीं कर सकती।

भगतसिंह ('क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा' से)