नया अंक

सितम्‍बर 2009


















ग़रीबों पर मन्दी का कहर अभी जारी रहेगा 

पूँजीवाद के विनाशकारी संकट से उबरने के आसार नहीं!
 

इस व्यवस्था को कब्र में पहुँचाकर ही इन संकटों से निजात मिलेगी!! 
योजना आयोग ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में भविष्यवाणी की है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर घटेगी और खाद्य वस्तुओं के दाम बढेंग़े। 2013 तक चलने वाली इस पंचवर्षीय योजना के दौरान विकास दर पहले 9.0 प्रतिशत रहने का अनुमान था लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह महज़ 7.8 प्रतिशत रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक सेवा क्षेत्र और भवन निर्माण के क्षेत्रों में विकास की दर थोड़ी बढेग़ी लेकिन कृषि और मैन्युफैक्चरिंग की दर घट सकती है।   आगे पढ़ें   

एक तरफ भूख और अकाल - दूसरी तरफ गोदामों में सड़ता अनाज यह है पूँजी की मुनाफाखोर व्यवस्था की सच्चाई... 
एक तरफ देश के आधे से अधिक जिले भीषण सूखे और अकाल से जूझ रहे हैं, देशभर में करोड़ों लोग अनाज की बढ़ती क़ीमतों के कारण आधा पेट ख़ाकर गुज़ारा कर रहे हैं, दूसरी ओर सरकारी गोदामों में पड़ा लाखों टन अनाज सड़ रहा है। कृषि मन्‍त्री शरद पवार ने संसद में बताया कि इस वर्ष अप्रैल-मई के महीनों के दौरान परिवहन और भण्डारण के दौरान 2.2 लाख टन गेहूँ और चावल सड़ गया। इस अनाज से 12 लाख लोगों का एक साल तक पेट भरा जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तव में बर्बादी इससे भी ज्यादा की हुई होगी। पंजाब के तरनतारन ज़िले में 5300 टन गेहूँ खुले में पड़े-पड़े सड़ गया। अब यह गेहूँ जानवरों को खिलाने लायक भी नहीं रह गया है। जिस अनाज से 30,000 लोगों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता था, उसे अब खाद बनाने के लिए नीलाम कर दिया जायेगा!   आगे पढ़ें   

गोरखपुर के संगठित मज़दूरों के नाम - साथियो, आगे बढ़ो... 
जुलाई महीने का बिगुल पढ़कर बड़ी खुशी हुई। गोरखपुर के एकजुट मज़दूरों के संघर्ष की शानदार जीत यह दर्शाती है कि निराशा के इस दौर में मज़दूरों के संघर्ष की नयी शुरुआत हो रही है। संघर्ष के अलावा और कोई चारा नहीं है।   आगे पढ़ें   

कारख़ाना मालिकों की मुनाफे की हवस ने किया एक और शिकार 
लुधियाना के रंगाई कारख़ानों में कभी बॉयलर फटने, कभी मशीन की खराबी से मज़दूरों की जान जाने का सिलसिला रुक ही नहीं रहा है। मालिकों के लालच और लापरवाही का शिकार होने वाले मज़दूरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 14 अगस्त को श्रीगणेश डाईंग में मशीन फटने से नीलू नाम का एक और मज़दूर मुनाफे की हवस का शिकार हो गया।   आगे पढ़ें   

दिल्ली के समयपुर व बादली औद्योगिक क्षेत्र की ख़ूनी फैक्ट्रियों के ख़िलाफ बिगुल मज़दूर दस्ता की मुहिम 
गत 30 अगस्त को 'हितकारी ब्रदर्स', शेड 5, बादली औद्योगिक क्षेत्र स्थित फैक्ट्री में अजय ओझा नाम के मज़दूर की सीने में लोहे की पत्ती लगने से मौत हो गयी। अजय बादली की ख़ूनी फैक्ट्रियों का एक और शिकार बन गया! पिछले चन्द महीनों में इस छोटे से औद्योगिक क्षेत्र में दुर्घटना में हुई मौत की यह कम से कम छठी घटना थी।   आगे पढ़ें   

दिन-ब-दिन बिगड़ती लुधियाना के पावरलूम मज़दूरों की हालत 
लुधियाना के बहुत बड़े इलाके में पावरलूम चलता है। हजारों कारीगर पावरलूम मशीनों पर 12-14 घण्टे काम कर रहे हैं। औसत कारीगर शॉल बनाने वाली 3-4 प्लेन और ढाबी मशीनें तथा 2 जैकेट बनाने वाली मशीनें तक एक साथ चला रहे हैं। 12 घण्टे में बहुत अधिक काम करने के बाद भी 3,500 से 6,000 तक वेतन बन पाता है। लेकिन अब बिजली कमी के कारण लम्बे-लम्बे पावर कट लग रहे हैं। टेक्सटाइल कॉलोनी में तो हफ्ते में तीन दिन बिजली का कट लग रहा है। जिन कारख़ानों में जनरेटर नहीं हैं वहाँ के कारीगर महीने में 15-16 दिन ही काम कर रहे हैं। कुछ बड़े कारख़ानों को छोड़कर सभी जगह पीस रेट पर काम होता है। इनमें कोई श्रम कानून लागू नहीं है। पीस रेट पर काम होने की वजह से बिजली कट का सारा बोझ मज़दूरों पर आन पड़ा है। अब जब आटा 14-15 रुपये, दाल 90-100 रुपये, सरसों का तेल 80 रुपये, चीनी 34-35 रुपये, मिट्टी का तेल 25-30 रुपये लीटर और कमरे का किराया 500-600 चल रहा है; तो देखा जा सकता है कि इस मँहगाई के जमाने में इतने कम वेतन में किस के घर का खर्च चल सकता है।   आगे पढ़ें   

कमरतोड़ महँगाई और बेहिसाब बिजली कटौती के ख़िलाफ धरना 
कारख़ाना मज़दूर यूनियन, लुधियाना, नौजवान भारत सभा, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियन, डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रण्‍ट, डेमोक्रेटिक इम्पलाइज़ फ्रण्‍ट, इंक़लाबी केन्द्र पंजाब और लोक मोर्चा पंजाब द्वारा खाद्य पदार्थों की आसमान छूती कीमतों और बेहिसाब बिजली कटौती के ख़िलाफ इस महीने की 2 तारीख को लुधियाना के डी.सी. कार्यालय के सामने जोरदार प्रदर्शन किया गया और तीन घण्टे तक धरना दिया। इसमें सरकार से माँग की गयी कि अनाज की कीमतें कम करने के लिए फौरी तौर पर कदम उठाये जायें, सरकार की तरफ से सभी ग़रीबों को सस्ते दामों पर अनाज मुहैया करवाया जाये, बिजली की बेहिसाब कटौती बन्द की जाये, बिजली की पूर्ति के पुख्ता इन्तजाम किये जायें। धरना-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में पहुँचे कारख़ाना मज़दूरों सहित नौजवानों, अघ्‍यापकों तथा अन्य सरकारी कर्मचारियों ने रोषपूर्ण नारे लगाते हुए कमरतोड़ महँगाई और बिजली की भारी कमी के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार मुनाफाख़ोरों और सरकार के नापाक गठबन्‍धन के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द की। ''मुनाफाख़ोरों-सरकारों का जनविरोधी गठबन्‍धन मुर्दाबाद'', ''मेहनतकशों की एकता जिन्दाबाद'', ''कमरतोड़ महँगाई का कौन है जिम्मेदार, मुनाफाख़ोर लुटेरे और यह सरकार'', ''खत्म करो पूँजी का राज, लड़ो बनाओ लोकस्वराज'', आदि गगनभेदी नारों से पूरा मिनी सेकेट्रिएट गूँज उठा।   आगे पढ़ें   

टोरण्टो के मज़दूरों की शानदार जीत 
सारी दुनिया की तरह ही कनाडा में भी वहाँ की सरकार नवउदारवादी नीतियाँ लागू कर रही है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मज़दूरों ने संघर्ष और कुरबानियाँ देकर जो हक हासिल किये थे, कनाडा सरकार वे सारे हक उनसे छीन लेना चाहती है और उन्हें मुनाफाखोर भूखे भेड़ियों के आगे परोस देना चाहती है। निजी क्षेत्र के मज़दूरों के हक तो व्यावहारिक तौर पर काफी हद तक छीने जा चुके हैं। सरकार पब्लिक सेक्टर के मज़दूरों के हकों पर भी डाका डालने की ज़ोरदार कोशिशें कर रही है। 2008 के आख़िरी महीनों में शुरू हुई विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी की लपेट में कनाडा भी आया। जहाँ निजी कम्पनियों ने तो मज़दूरों की छँटनी की और उनके वेतनों और अन्य सुविधाओं पर कटौती की, वहाँ सरकार ने भी पब्लिक सेक्टर के मज़दूरों की कमाई पर डाका डालने के लिए मन्दी को बहाना बनाया। मन्दी का बहाना बनाकर पब्लिक सेक्टर के मज़दूरों से 'सहयोग' करने के लिए कहा गया।   आगे पढ़ें   

जजों की सम्पत्ति सार्वजनिक करने या न करने के बारे में - परदे में रहने दो, परदा ना उठाओ... 
आजकल यू.पी.ए. सरकार न्यायाधीशों को उनकी सम्पत्ति सार्वजनिक करने से छूट देने वाले विधेयक को सदन में पारित कराने की जी-तोड़ कोशिश में लगी हुई है। हालाँकि विपक्ष के विरोध के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो पा रहा है। लेकिन देर-सवेर तो यह होकर ही रहेगा। दरअसल कभी-कभी जब जनता को लुभाने और भरमाने के लिए की जाने वाली कवायदें अनजाने ही उन सीमाओं को लाँघ जाती हैं जो व्यवस्था के लिए संकट पैदा कर सकती हैं तो ऐसी कवायदों पर लगाम लगाना व्यवस्था के पैरोकारों के लिए ज़रूरी हो जाता है।   आगे पढ़ें   

पंजाब में भी जनता बदहाल, नेता मालामाल - विधायकों-मन्त्रियों के वेतन-भत्तों में भारी बढ़ोत्तरी की तैयारी 
पंजाब सरकार खजाना खाली होने की दुहाई दे रही है और जनता पर तरह-तरह के टैक्स लगाने की तैयारी कर रही है। वहीं पंजाब विधानसभा के विधायकों के वेतन, भत्तों तथा अन्य सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की तैयारी की जा रही। सभी पार्टियाँ आपस में चाहे जितना भी लड़ें-झगड़ें, लेकिन इस मुद्दे पर सब एक हैं। 11 जुलाई को जब पंजाब विधानसभा में विधायकों के वेतन, भत्तों तथा अन्य सहूलियतों को बढ़ाने का प्रस्ताव रखने वाली रिपोर्ट पेश की गयी तो एक भी पार्टी या विधायक ने विरोध नहीं किया। रिपोर्ट में मुख्यमन्‍त्री, मन्त्रियों, डिप्टी मन्त्रियों, विरोधी पक्ष की नेता, मुख्य संसदीय सचिवों, स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के वेतनों और भत्तों में भी बढ़ोत्तरी करने की सिफारिश की गई है।   आगे पढ़ें   

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (चौथी किश्त) 
अब तक हमने फासीवाद के उदय की आम पृष्ठभूमि और आर्थिक-सामाजिक स्थितियों के बारे में पढ़ा और साथ ही जिन दो देशों में फासीवाद के क्लासिकीय विनाशकारी प्रयोग हुए उनके बारे में भी जाना, यानी, जर्मनी और इटली। इस बार हम भारत में फासीवादी उभार के इतिहास, पृष्ठभूमि, विशेषताओं और उसके वर्तमान हालात के बारे में पढ़ेंगे। 
भारत में फासीवाद जर्मनी या इटली की तरह कभी सत्ता में नहीं आया। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एक गठबन्‍धन सरकार भारत में करीब 6 वर्षों तक रही लेकिन वह हिटलर या मुसोलिनी के सत्ता में आने से बिल्कुल भिन्न था। इसके अतिरिक्त, भाजपा ने अपने बूते सरकार नहीं बनायी थी। वह एक गठबन्‍धन सरकार थी जिसके अपने आन्तरिक खिंचाव और तनाव थे, जिनके कारण भाजपा अपने फासीवादी एजेण्डे को खुलकर लागू नहीं कर सकती थी।   आगे पढ़ें   

फर्ज़ी मुठभेड़ों, पुलिस हिरासत में प्रतिदिन 4 बेकसूर मारे जाते हैं - दमनकारी, शोषक, जनविरोधी सरकार को ऐसी ही सेना, ऐसी पुलिस चाहिए!! 
गुजरात पुलिस के हाथों फर्ज़ी मुठभेड़ में इशरत जहां और तीन अन्य नौजवानों की हत्या की सच्चाई जाँच कमेटी ने तो अब बतायी है लेकिन देश की आदमख़ोर पुलिस और नरेन्द्र मोदी की ख़ूनी सरकार को जानने वाले लोग शुरू से ही इसे एक नृशंस हत्या ही मानते रहे हैं। पुलिस को फर्ज़ी मुठभेड़ों में बेकसूरों की हत्याएँ करने का लाइसेंस मिला हुआ है। चाहे देहरादून में उत्तराखण्ड पुलिस के हाथों 22 वर्र्षीय छात्र रणवीर की हत्या हो, बाटला हाउस में कथित मुठभेड़ में आतंकवादियों के नाम पर चार नौजवानों की हत्या का मामला हो या कश्मीर के शोपियां में दो युवतियों की बलात्कार के बाद हत्या की घटना हो - हर जगह पुलिस और सेना की घिनौनी करतूतें सामने आते ही सरकारें फौरन उनके बचाव में उतर आती हैं।   आगे पढ़ें   

मज़दूर वर्ग का नारा होना चाहिए - ''मज़दूरी की व्यवस्था का नाश हो!'' 
अपनी श्रम-शक्ति बेचकर और वर्तमान व्यवस्था में उसे यह बेचनी ही पड़ती है मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति पूँजीपति को इस्तेमाल करने के लिए सौंप देता है, पर कुछ तर्कसंगत सीमाओं के भीतर। मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति को कायम रखने के लिए उसे बेचता है, नष्ट करने के लिए नहीं, हाँ, इस्तेमाल के दौरान में वह भले ही थोड़ी घिस जाये, या कम हो जाये। यह भी पहले से मान लिया जाता है कि यदि मज़दूर ने दैनिक या साप्ताहिक मूल्य पर अपनी श्रम-शक्ति बेची है, तो एक दिन में या एक सप्ताह में उसकी श्रम-शक्ति की दो दिन या दो सप्ताह के बराबर घिसाई या बरबादी नहीं होगी।   आगे पढ़ें   

अदम्य बोल्शेविक – नताशा : एक स्‍त्री मज़दूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (नवीं किश्त)    पढ़ें   


दिशा छात्र संगठन-नौजवान भारत सभा ने शुरू किया 'शहरी रोज़गार गारण्टी अभियान' 
ग्रामीण बेरोज़गारों के लिए रोज़गार की योजना 'नरेगा' में सरकार ने यह माना है कि ग्रामीण आबादी को रोज़गार का अधिकार है और इसकी ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है। लेकिन शहरी बेरोज़गारों की सरकार को कोई चिन्ता नहीं है। यह हालत तब है जब शहर के युवाओं में 60 प्रतिशत बेरोज़गार हैं। सरकरी ऑंकड़े ही बताते हैं कि शहरों में कुपोषण और भुखमरी गाँवों की तुलना में अधिक है। इसलिए अब 'दिशा छात्र संगठन' और 'नौजवान भारत सभा' ने एक साथ पाँच राज्यों में 'शहरी रोज़गार गारण्टी अभियान' शुरू किया है। हालाँकि, दोनों संगठनों का मानना है कि ऐसी कोई योजना मौजूदा मुनाफा केन्द्रित-व्यवस्था में बेरोज़गारी और ग़रीबी की समस्याओं का स्थायी समाधन नहीं पेश कर सकती है। लेकिन इस योजना से शहरी आबादी को भुखमरी, आत्महत्या और अपराध् की ओर जाने से रोका जा सकता है और ऐसी योजना शहर के ग़रीबों- बेरोज़गारों का जन्मसिद्ध अधिकार है।   आगे पढ़ें   

बरगदवा, गोरखपुर में दो कारखानों के मज़दूरों का डेढ़ माह से जारी जुझारू आन्दोलन निर्णायक मुकाम पर 
गोरखपुर के बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के करीब एक हजार मज़दूरों का डेढ़ महीने से जारी आन्दोलन अब निर्णायक मुकाम पर पहुँच गया है। गत तीन अगस्त को उपश्रमायुक्त को माँगपत्रक देने से इस आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। 
मालिकों और श्रम विभाग की मिलीभगत और ज़िला प्रशासन की शह से जारी टालमटोल के चलते मालिकान डेढ़ महीने से वार्ताओं के बहाने इसे लटकाये हुए हैं। इस बीच मज़दूरों को डराने-धमकाने-ललचाने और आन्दोलन के नेतृत्व में अगुआ भूमिका निभा रहे बिगुल मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं को आतंकित करने की तमाम कोशिशों के बावजूद मज़दूर न सिर्फ एकजुट रहे हैं बल्कि आन्दोलन का तेवर और जुझारू हो गया है।   आगे पढ़ें   
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